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एनएसजी: चीन ने रोकी भारत की राह

परमाणु आपूर्ति समूह की सदस्यता के लिए भारत की बेहिसाब कोशिशों और चीन की बेलौस अड़ंगेबाजी की अंदरूनी कहानी, बड़े झटके के बावजूद मोदी की टीम को अभी भी यकीन. चीन ने भारत से कहा कि वह उसकी अर्जी पर विचार करने को तैयार है, बशर्ते वह यह भरोसा दिलाए कि वह पाकिस्तान की एनएसजी सदस्यता का विरोध नहीं करेगा.

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aajtak.in
राज चेंगप्पा नई दिल्ली, 13 July 2016
एनएसजी: चीन ने रोकी भारत की राह

सत्ताइस जून को नई दिल्ली में बड़ी सादगी भरे आयोजन में विदेश सचिव एस. जयशंकर ने मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रेजिम (एमटीसीआर) पर हस्ताक्षर कर दिए और इस तरह भारत इस विशेष क्लब का 35वां सदस्य बन गया. यह एक तरह से भारत की जीत थी क्योंकि इसकी स्थापना 1987 में भारत और अन्य उभरते देशों के खिलाफ की गई थी, ताकि उन्हें परमाणु मिसाइल निर्माण के लिए जरूरी तकनीकी और सामग्री खरीदने से रोका जा सके. भारत का इसमें प्रवेश इसलिए भी खास है क्योंकि कई कोशिशों के बावजूद चीन अभी तक इसका सदस्य नहीं बन सका है.

MTCR में सफल, NSG में विफल
जहां भारत में राजनयिक और वैज्ञानिक तबका इस उपलब्धि पर फख्र महसूस कर रहा था, वहीं भारत सरकार खामोश थी क्योंकि परमाणु आपूर्ति समूह (एनएसजी) की सदस्यता की उसकी दावेदारी को जबरदस्त धक्का पहुंचा था. 48 सदस्यों के एनएसजी की स्थापना 1974 में भारत के पहले परमाणु परीक्षणों के मद्देनजर की गई थी और इसके तहत सख्त नियम बनाए गए जिनसे इसके सदस्य उन देशों के साथ परमाणु कारोबार को अंजाम नहीं दे सकते जिन्होंने परमाणु अप्रसार संधि (एनपीटी) पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं.

भारत ने लगाया था पूरा जोर
इससे पहले सियोल में 20-24 जून तक चली एनसीजी की बैठक में भारत ने इसका सदस्य बनने के लिए एक जबरदस्त और थका देने वाली लड़ाई लड़़ी थी. इस साल मई में भारत ने इसकी सदस्यता के लिए औपचारिक आवेदन किया था. 2004 में एनएसजी का सदस्य बना चीन उसके सामने दीवार बनकर खड़ा हो गया और अपने लिए सहमति बनाने में जुटे भारत के खिलाफ अभियान का नेतृत्व किया. हालांकि सदस्य राष्ट्र भारत के साथ कारोबार जारी रख सकते हैं क्योंकि एनएसजी ने 2008 में भारत को विशेष छूट दी थी जो भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते के बाद उसे मिली थी. फिर भी यह निर्विवाद था कि सियोल में आया नतीजा भारत के राजनयिक प्रयासों के लिए बड़ा झटका था.

विपक्ष ने सरकार को घेरा
विपक्षी दलों ने तुरंत इस मुद्दे को लपका और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की 'खराब टाइमिंग ,' शोर-शराबे वाली कूटनीतिक भूल को आड़े हाथों लेना शुरू कर दिया. कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने ट्वीट किया, 'एनएसजीः किस तरह नरेंद्र मोदी ने समझौता वार्ता को हाथ से जाने दिया. जब भारत के पास पहले से ही छूट है, ऐसे में एनएसजी के लिए भारत के प्रयासों पर बुद्धिजीवियों और पूर्व राजनयिकों ने सवालिया निशान लगाया. हालांकि सबसे बड़ा सवाल अपनी जगह पर ही कायम रहाः आखिर भारत ने एनएसजी की पूर्ण सदस्यता के लिए इतनी कोशिश क्यों की? क्या मोदी सरकार हमेशा नकारात्मक रहने वालों खासकर चीन से सही ढंग से निबटी? इंडिया टुडे ने एनएसजी को लेकर भारत के अभियान से जुड़े विभिन्न अधिकारियों से बात की और अंदर की कहानी से यह पता चला कि यह कूटनीतिक शिकस्त नहीं थी, जैसा इसे बताया जा रहा है बल्कि सोचा समझा और साहसिक कदम था. जानिए कैसे.

दिल्ली में 27 जून को एमटीसीआर में भारत के प्रवेश पर दस्तखत के बाद एस. जयशंकरक्या भारत को एनएसजी सदस्यता के लिए दबाव बनाना चाहिए?


सबसे ज्यादा आलोचना इस बात को लेकर हो रही है कि भारत को पहले ही एनएसजी से छूट प्राप्त है, ऐसे में जिसे 'द्वितीय श्रेणी की सदस्यता' कहा जाता है, उसे पाने के लिए इतनी मेहनत करने की क्या जरूरत थी, जिससे कोई विशेषाधिकार नहीं मिलने वाला. वरिष्ठ राजनयिक सत्यब्रत पाल ने द हिंदू में लिखाः 'एनएसजी जैसी गैर-महत्वपूर्ण चीज के लिए यह उन्माद, कूटनीति नहीं बल्कि नादानी थी.'

साहस की सराहना
पाल के तर्कों के साथ लिखे गए इस लेख में उन कई अनिवार्य बातों की अनदेखी की गई है जिनसे भारत को एनएसजी सदस्यता के अपने सफर के दौरान दो-चार होना पड़ा है. जब नरेंद्र मोदी ने मई, 2014 में भारत की कमान संभाली, परमाणु वाणिज्य में भारत के अछूत के दर्जे को खत्म करने की मनमोहन सिंह की अभूतपूर्व उपलद्ब्रिध के बावजूद कई ऐसे काम थे जो अधूर पड़े थे. भारत-अमेरिका परमाणु समझौते को लेकर अपनी पार्टी के विरोधों की उन्होंने अनदेखी की और मोदी ने बुलंद इरादों के साथ प्रतिबद्धताओं और प्रावधानों को लागू करने की दिशा में कदम बढ़ाए और उनके द्विपक्षीय नजरिए की सराहना किए जाने की जरूरत है.

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कोशिशें तेज
सबसे अहम प्राथमिकताओं में यह है कि एनएसजी समेत तमाम तरह की परमाणु निषेध व्यवस्थाओं का सदस्य बनने की भारत की कोशिशें तेज की जाएं जिस पर रोक इस मकसद से लगाई जा रही है ताकि महाविनाशकारी हथियारों के खिलाफ सुरक्षात्मक उपाय विकसित करने की भारत की कोशिशें धीमी पड़ जाएं या रुक जाएं. नवंबर 2010 में अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने मनमोहन सिंह से वादा किया था कि अमेरिका भारत को एनएसजी का पूर्ण सदस्य बनाने के अलावा बाकी तीन अप्रसार व्यवस्थाओं का भी सदस्य बनाने की ओर काम करेगा. ये तीन व्यवस्थाएं हैः ऑस्ट्रेलिया ग्रुप (रासायनिक जैविक हथियारों के प्रसार पर नियंत्रण), वासेनार अरेंजमेंट (दोहरे इस्तेमाल की वस्तुएं और तकनीकी के निर्यात पर नियंत्रण) और एमटीसीआर.

2011 में शुरू हुई थी कोशिश
मोदी की टीम ने पाया कि मनमोहन सिंह की सरकार ने चारों अप्रसार व्यवस्थाओं का सदस्य बनने की दिशा में 2011 से ही कोशिशें कीं लेकिन कई वजहों से उसकी कोशिशों में पचड़ा लगा रहा. विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी ने कहा, ''वह उस समय का नीतिगत फैसला था लेकिन हमने एक ही वक्त में कई तरफ हाथ आजमाए जो हमारे बस में नहीं था. सभी चार व्यवस्थाओं में खास तरह के प्रशासनिक और कानूनी उपायों की जरूरत है, जिसके लिए विभिन्न मंत्रालयों में एक तालमेल बनाना होगा. लिहाजा यह असंभव-सा था."

निशाने पर सीधे-सीधे भारत
इसलिए चारों के लिए एक ही समय में कोशिश करने के बदले मोदी की टीम ने प्राथमिकताएं तय करने का फैसला किया और एनएसजी तथा एमटीसीआर की सदस्यता के मामले को उसने सबसे ऊपर रखा. एनएसजी पर दूसरी चिंताओं के अलावा यह तथ्य भी है कि 2008 में यूपीए-1 सरकार ने दावा किया था कि एनएसजी से उसे ''साफ छूट" मिली हुई थी. लेकिन वह स्थिति तीन साल बाद बदल गई जब यूपीए-2 सत्ता में था. 2011 में एनएसजी ने अपने दिशा-निर्देशों को संशोधित किया और सभी सदस्यों को ऐसे देश के साथ परमाणु संवर्धन और पुनर्संसंस्करण तकनीक में व्यापार करने पर प्रतिबंध लगा दिया, जिसने एनपीटी पर दस्तखत न किए हों. भारत एनपीटी पर 1968 में इसकी शुरुआत से ही दस्तखत करने से इनकार करता रहा है और इसे भेदभावपूर्ण बताता रहा है. मतलब यह हुआ कि एनएसजी के संशोधन के निशाने पर सीधे-सीधे भारत था.

क्या है पश्चिमी देशों का रवैया?
भारत के विरोध करने पर अमेरिका, रूस और फ्रांस ने बयान जारी किया कि वे एनएसजी के नए दिशा-निर्देशों के बावजूद भारत को अपने समझौते के तहत 'पूरा परमाणु ईंधन चक्र' मुहैया कराने को तैयार हैं. लेकिन एक अधिकारी बताते हैं, 'यह हमारे तब के नीति-निर्माताओं को समझ लेना चाहिए था कि एनएसजी अपने नियम बदल सकता है और हम उसे मानने को मजबूर हो सकते हैं. इसलिए यह जरूरी था कि हम या तो फैसले लेने वाली मंडली के साथ बैठते या फिर बाहर इंतजार करते रहते और हमसे कहा जाता कि हम कर सकते हैं या नहीं कर सकते.'

यूपीए-2 क्यों नहीं कर पाई?
मोदी को सलाह दी गई कि एनएसजी सदस्यता केलिए हर तरह के घोड़े खोल दीजिए. वजह यह थी कि ओबामा को अपना वादा पूरा करना पड़ता और अमेरिकी प्रशासन को मजबूर होना पड़ता जैसा कि उसने 2008 में किया था. यूपीए-2 के आखिरी वर्षों के हालात के मद्देनजर भारत-अमेरिका रिश्तों में थोड़ा खिंचाव महसूस किया जाने लगा था. इसलिए 2002 के गुजरात दंगों के बाद वीजा देने से इनकार करने के अमेरिकी रवैए से आहत होने के बावजूद मोदी ने फौरन भारत-अमेरिकी रिश्तों को सुधारने का बड़ा कदम उठाया और सितंबर 2014 में ओबामा के साथ अपनी पहली मुलाकात में ही निजी ताल्लुकात स्थापित करने की कोशिश की. मोदी ने अपनी सरकार को कारोबार के प्रति अधिक खुला होने की छवि बनाने की कोशिश की. अमेरिकी कंपनियों ने उनसे कहा कि भारत-अमेरिकी परमाणु समझौते के बाद उन्हें उम्मीद थी कि वे भारत को परमाणु संयंत्र बेच सकेंगे और वह दोनों देशों के लिए फायदेमंद होता. लेकिन उनकी कोशिशें नए भारतीय परमाणु जवाबदेही कानून की समस्याओं की वजह से धरी रह गईं जिसे 2010 में संसद ने पास किया.

पीएम मोदी ने बनाई थी टीम
मोदी ने अमेरिका से लौटते ही इस समस्या से पार पाने के लिए विदेश, वित्त और कानून मंत्रालयों की एक टीम का गठन किया. भारत के नए जवाबदेही कानून के तहत परमाणु संयंत्र में किसी गड़बड़ी के लिए मूल कंपनी जिम्मेदार होगी और उसे भारी मुआवजा अदा करना पड़ेगा. अमेरिका को इसमें खतरा दिखा. रूस और फ्रांस को भी यह नहीं अच्छा लगा. ये दोनों भी भारत में नए परमाणु ऊर्जा संयंत्र लगाने के लिए सौदेबाजी कर रहे थे. इन लोगों ने बताया कि यह कानून जवाबदेही पर मौजूदा अंतरराष्ट्रीय कायदों से मेल नहीं खाता. निजी घरेलू परमाणु संयंत्र कंपनियां भी नए कानून से विमुख हो गईं. इसलिए मोदी की टीम ने कानून में संशोधन किए बिना जवाबदेही की विवादास्पद धाराओं में हेर-फेर करके इस समस्या से निजात पाने की कोशिश की. सरकार ने जुलाई 2015 में 1,500 करोड़ रु. के एक विशेष भारतीय परमाणु बीमा खाते का गठन किया जो विदेशी और घरेलू दोनों तरह के परमाणु संयंत्र आपूर्तिकर्ताओं की जवाबदेही का ख्याल रखता है.

अमेरिका के साथ दो और मुद्दों को सुलझाया
मोदी ने अमेरिका के साथ दो और मुद्दों को सुलझाया. भारत-अमेरिकी परमाणु सौदे में भारत सैन्य और असैन्य परमाणु ऊर्जा संयंत्रों की अलग पहचान रखने पर राजी हुआ था और असैन्य संयंत्रों की निगरानी के लिए भी तैयार हुआ था. दिसंबर 2014 में भारत ने दो बाकी बचे असैन्य संयंत्रों को भी आइएईए की निगरानी में रख दिया. फिर अप्रसार के प्रति अपनी प्रतिबद्धता के सबूत के तौर पर जनवरी 2015 में भारत एक विशेषज्ञ दल में इस पर चर्चा करने को शामिल हुआ कि संयुक्त राष्ट्र के फिसाइल मटीरियल कटऑफ ट्रीटी (एफएमसीटी) की जिनेवा वार्ता को कैसे आगे बढ़ाया जाए.

एनएसजी की सदस्यता हासिल करने की अब जल्दबाजी क्यों?
बकौल विदेश मंत्रालय के एक वरिष्ठ अधिकारी, ''यह कोई फितूर नहीं है." एनएसजी की सदस्यता का मामला दो अलग-अलग बड़ी वजहों से जरूरी हो गया है. एक, पेरिस जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन और दूसरे, यह तथ्य कि ओबामा का कार्यकाल दिसंबर, 2016 में खत्म हो जाएगा. नवंबर, 2015 के जलवायु परिवर्तन शिखर सम्मेलन में भारत एक समस्या के रूप में माना जाने लगा क्योंकि वह कोयला और अन्य जीवाश्म ईंधन पर अपनी निर्भरता घटाने से इनकार कर रहा था. मोदी ने बड़े साहस के साथ हालात बदल दिए और भारत को उसका हिस्सा बना दिया. वहां मोदी ने वादा किया कि 2030 तक भारत गैर-जीवाश्म ईंधन के जरिए ऊर्जा की अपनी हिस्सेदारी कुल 40 प्रतिशत तक बढ़ा देगा. उसके बाद उन्होंने अंतरराष्ट्रीय सौर ऊर्जा सहयोग की रूपरेखा तैयार की ताकि सौर ऊर्जा की सस्ती और कारगर तकनीक हासिल की जा सके.

बिजली उत्पादन पर सरकार उत्साह में
सिर्फ सौर ऊर्जा ही नहीं, मोदी और उनकी टीम यह गणना भी कर रही थी कि परमाणु बिजली संयंत्र में भारी इजाफे से भारत इस लक्ष्य को हासिल कर लेगा. फिलहाल परमाणु बिजली संयंत्र से करीब 6,000 मेगावाट बिजली बनती है और यह देश की कुल बिजली खपत की महज तीन फीसदी है. मोदी ने 2032 तक 63,000 मेगावाट बिजली के लिए परमाणु ऊर्जा संयंत्र लगाने की आक्रामक योजना तैयार की. इस तरह यह देश की कुल बिजली उत्पादन का नौ प्रतिशत तक हो जाएगा. इसलिए मोदी सरकार ने अतिरिक्त 10,600 मेगावाट बिजली उत्पादन के लिए 16 नए घरेलू बिजली संयंत्र लगाने की इजाजत देने के अलावा अमेरिका, रूस और फ्रांस की विदेशी कंपनियों से 26 नए बिजली संयंत्र लगाने का करार किया है, जिससे 29,500 मेगावाट बिजली पैदा होगी.

निवेशक नीतियों में स्थायित्व चाहते थे
ऐसे महत्वाकांक्षी लक्ष्य को पूरा करने के लिए भारतीय और विदेशी कंपनियों को वित्तीय और तकनीकी करारों की दरकार थी. इसके लिए अंतरराष्ट्रीय निवेशक नीतियों में स्थायित्व चाहते थे. परमाणु कारोबार में यूरोप, कोरिया और जापान जैसे बड़े खिलाडिय़ों ने कहा कि अगर भारत सदस्य बन जाता है तो उन्हें आसानी होगी और निवेश के वादे को निभाना मुश्किल नहीं होगा. इस तरह भारत के लिए एनएसजी की सदस्यता जरूरी बन गई. एक अधिकारी के मुताबिक, ''एनएसजी की सदस्यता निवेशकों के लिए उत्कृष्ट रेटिंग (एएए) जैसी है." फिर एनएसजी सदस्यता को जलवायु परिवर्तन के लक्ष्य से जोड़कर भारत बड़े देशों पर अतिरिक्त दबाव बना रहा था.

अमेरिकी राष्ट्रपति चुनावों पर भी नजर
इस बीच, भारतीय नीति-नियंता अमेरिकी राष्ट्रपति पद की दौड़ पर भी नजर गड़ाए हुए थे. तमाम अड़चनों के बावजूद मनमौजी डोनाल्ड ट्रंप अपने बेतुके बयानों के साथ रिपब्लिकन पार्टी की उम्मीदवारी की ओर बढ़ते जा रहे हैं. उधर, हिलेरी क्लिंटन डेमोक्रेट पार्टी की उम्मीदवारी के लिए अपने प्रतिद्वंद्वी बर्नी सैंडर्स से जूझीं. इसलिए मोदी और उनकी टीम ने अगले राष्ट्रपति का इंतजार करने के बजाए इसी साल भारत की कोशिशों को आगे बढ़ाने का फैसला किया. एक अधिकारी कहते हैं, ''एक मायने में हमारे लिए कोई चारा ही नहीं बचा. घटनाओं ने हमें जून में एनएसजी वार्षिक सम्मेलन में दांव लगाने पर मजबूर कर दिया."

प्रधानमंत्री मोदी मेक्सिको के राष्ट्रपति ई.पी. नीटो के साथक्या भारत ने दांव लगाने से पहले तैयारी पूरी कर ली थी?

 

अर्जेंटीना के राजदूत का सुझाव
अक्तूबर, 2015 में अर्जेंटीना  के राजदूत राफेल मरियानो ग्रॉसी, जो तब एनएसजी की अध्यक्षता के आसन पर थे, अपनी वार्षिक समीक्षा के लिए आए तो भारत ने उनसे सलाह मांगी कि सदस्यता के आवेदन का बेहतर तरीका क्या है. ग्रॉसी ने सुझाया कि औपचारिक आवेदन करने से पहले सदस्यों से बात करनी चाहिए और  उनकी चिंताओं को समझना चाहिए, फिर उनके सामने यह पेशकश रखनी चाहिए कि भारत कैसे उनकी चिंताओं का समाधान कर रहा है.

भारत ने सभी सदस्य देशों को लिखी चिट्ठी
इस साल अप्रैल में एनएसजी परामर्श समूह की विएना में बैठक के दौरान भारत ने सभी सदस्य देशों को एक चिट्ठी लिखी कि उसे अपना प्रेजेंटेशन दिखाने की इजाजत दी जाए. एनएसजी बैठक में चीन ने इसका कड़ा विरोध किया और कहा कि भारत की सदस्यता पर कोई सहमति नहीं बनी है, इसलिए कोई प्रेजेंटेशन नहीं होनी चाहिए. वहां मौजूद एक भारतीय अधिकारी ने इसे ''सांप-छछूंदर जैसी स्थिति बताया. हम इस प्रक्रिया को सहमति बनने तक शुरू नहीं कर सकते थे और प्रक्रिया शुरू न होने से सहमति बनाने के लिए काम नहीं कर सकते थे." हालांकि बैठक से अलग ऑस्ट्रेलिया ने चीन के विरोध की परवाह किए बगैर एक आयोजन किया जिसमें भारत ने अपनी प्रेजेंटेशन दी.

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