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महाराष्ट्रः बाजी पलटने का पावर

राकांपा प्रमुख ने कांग्रेस और शिवसेना के बीच गठबंधन और फिर अपने विधायकों को तोडऩे की भाजपा की चाल को नाकाम करके अपना राजनीतिक कौशल और दमखम दिखाया

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aajtak.in
किरण डी. तारे और कौशिक डेकामहाराष्ट्र, 04 December 2019
महाराष्ट्रः बाजी पलटने का पावर गेट्टी इमेजेज

राजनीति शायद संभावनाओं की कला है. आखिर मुंबई के हयात होटल में 25 नवंबर को जो कुछ हुआ, उसे और कैसे समझा जा सकता है. शिवसेना के 56 विधायकों ने अपने अध्यक्ष उद्धव ठाकरे के अलावा राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (राकांपा) प्रमुख शरद पवार और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी के प्रति निष्ठा की शपथ ली. महीने भर पहले तक, शिवसेना की राजनीति राकांपा और कांग्रेस के खिलाफ तीखे विरोध के इर्द-गिर्द घूमती थी, और अक्सर इन पार्टियों के प्रमुखों पर व्यक्तिगत टीका-टिप्पणी तक पहुंच जाती थी. ऐसे में टीवी पर दिखा यह अविश्वसनीय घटनाक्रम यकीनन महाराष्ट्र की राजनीति के पुराने महाबली पवार के राजनैतिक कौशल, लगन और नेटवर्किंग का ही कमाल था.

21 अक्तूबर को महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव से पहले राकांपा के सात विधायक शिवसेना और भाजपा में चले गए थे. तब 6 अक्तूबर को इंडिया टुडे के साथ बातचीत में 79 वर्षीय पवार ने कहा था, ''यह मेरे लिए युवा नेताओं के साथ पार्टी के पुनर्निर्माण का अच्छा अवसर है.'' राकांपा का मनोबल गिरा हुआ था और इस मुश्किल घड़ी में पवार के कई दोस्त पार्टी को धन देने से हिचक रहे थे. इससे हालात कुछ कठिन ही हुए कि भाजपा ने, खासकर मुख्यमंत्री देवेंद्र फडऩवीस 'मी पुन्हा ये (मैं फिर आऊंगा)' के नारे से चुनावी फिजा तैयार की.

8 अक्तूबर को पवार ने राज्यव्यापी दौरा शुरू किया. उन्होंने अगले दस दिन तक 57 रैलियों को संबोधित किया और हर दिन औसतन 300 किमी की यात्रा की. मंच पर उनका अंदाज बदला हुआ था—बॉडी लैंग्वेज नई थी और भाषण तीखे और चुटीले हो गए थे. एक सभा में, पवार ने कहा कि क्या राकांपा को छोड़कर जो लोग गए, उन्होंने 15 साल तक सत्ता में रहते हुए चूडिय़ां पहन रखी थीं. सतारा में, बारिश में भीड़ को संबोधित करते उनकी तस्वीरें छपीं. एक अन्य रैली में, इसे बताने के लिए कि प्रतिद्वंद्वी पार्टियों में उनसे मुकाबला करने का दम नहीं है, उन्होंने एक हिजड़े की नकल उतारी थी. उन्होंने कहा, ''आता हे मला शिकावनार (वे मुझे सिखाने चले हैं).''

पवार के राज्यव्यापी दौरे ने चुनाव प्रचार को धार दी और उन्हें फिर महाराष्ट्र की राजनीति के केंद्र में ला खड़ा किया. पवार और राकांपा में जोश महाराष्ट्र राज्य सहकारी बैंक घोटाले में प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) के मामला दर्ज करने से भी बढ़ा. उन्होंने 25 सितंबर को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाई और घोषणा की कि वे दो दिन बाद खुद ईडी के सामने पेश होंगे. मराठा गौरव का आह्वान करते हुए, उन्होंने नरेंद्र मोदी सरकार की तुलना मुगल सल्तनत से की और ''दिल्ली दरबार के आगे घुटने नहीं टेकने'' की कसम खाई. बाद में, पवार ने ट्वीट किया कि वह ईडी दक्रतर अकेले जाएंगे. यह उनके समर्थकों को वहां जुटने का परोक्ष संदेश था. मुंबई के वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों ने पवार से अनुरोध किया कि वे मुंबई के ईडी कार्यालय न आएं क्योंकि इससे कानून-व्यवस्था की समस्या पैदा हो सकती है. तभी महाराष्ट्र से भाजपा के एक सांसद ने ईडी के समन के बारे में कहा था, ''हमारी पार्टी ने शरद पवार को नया जीवन दे दिया है. यह आगे भारी पड़ेगा.''

महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव परिणामों ने स्पष्ट कर दिया कि पवार ने बाधाओं को न सिर्फ पार किया बल्कि उसे अपने लिए अवसरों में बदल दिया और राजनैतिक रूप से मजबूत हुए. इस विधानसभा चुनाव में राकांपा ने 54 सीटें जीतीं, 2014 के मुकाबले 13 ज्यादा. तिस पर पार्टी ने 2014 में 250 के मुकाबले इस बार सिर्फ 117 सीटों पर ही चुनाव लड़ा था. राकांपा का वोट वोट प्रतिशत दूसरे नंबर पर रहा. यह पवार की स्ट्राइक रेट और उनके चुनाव अभियान को मिले समर्थन का संकेत था.

कांग्रेस को महाराष्ट्र विकास अघाड़ी (एमवीए) गठबंधन के तहत शिवसेना के नेतृत्व वाली सरकार में शामिल होने के लिए राजी करना भी पवार के लिए बड़ी चुनौती थी. कई बाधाएं थीं: सोनिया का पवार के प्रति अविश्वास, हिंदुत्ववादी पार्टी के साथ गठबंधन करने के बारे में कांग्रेस के भीतर असमंजस और सत्ता की साझीदारी के सर्वस्वीकार्य फार्मूले की जरूरत. कांग्रेस के कुछ नेता सशंकित थे कि गठबंधन उत्तर भारत में—खासकर बिहार, उत्तर प्रदेश और दिल्ली में पार्टी को नुक्सान पहुंचाएगा क्योंकि शिवसेना को प्रवासी विरोधी पार्टी के रूप में देखा जाता है. नाम न छापने की शर्त पर कांग्रेस के एक महासचिव कहते हैं, ''यह बड़ी भूल है. राकांपा के पास खोने को बहुत कुछ नहीं है, लेकिन हम अपने मतदाताओं से क्या कहेंगे? हम भाजपा से कैसे अलग हैं? यह (गठबंधन) हमारी पिछली राजनैतिक साख को गिरा चुका है.''

एक वरिष्ठ मुस्लिम नेता सहित कई कांग्रेसियों ने सोनिया को पवार की बात मानने की सलाह दी, जो सत्ता की साझेदारी में कांग्रेस को उचित हिस्सेदारी देने के लिए शिवसेना के साथ बातचीत को तैयार थे. सोनिया कांग्रेस की महाराष्ट्र इकाई द्वारा पार्टी चलाने के लिए फंड की घोर कमी बताए जाने के कारण भी झुकीं क्योंकि सत्ता से पांच साल दूर रहने से फंड की कमी राज्य में पार्टी का सफाया कर सकती थी. एक कांग्रेसी नेता बताते हैं कि इन सब बातों के बावजूद सोनिया और उनकी टीम ने इस बातचीत की गति को धीमा रखा क्योंकि इस सौदे के साथ बहुत कुछ दांव पर लगना था. इसके अलावा, कर्नाटक में गठबंधन के अनुभव को देखते हुए भी, पार्टी एक और 'असहज' सहयोगी से निपटने को लेकर सावधान मुद्रा में थी. पवार के साथ लंबी खींच रही चर्चाओं ने भाजपा को राकांपा नेता अजीत पवार को साधने का मौका दे दिया.

राकांपा के एक अंदरूनी सूत्र का कहना है कि शरद पवार भतीजे अजीत पवार के विद्रोह से हिल गए थे. 23 नवंबर को सुबह-सुबह भाजपा के नेतृत्व वाली सरकार के आश्चर्यजनक रूप से शपथग्रहण में देवेंद्र फडऩवीस के डिप्टी के रूप में अजीत ने शपथ ली थी. पवार को इस कदम के बारे में तब पता चला जब राकांपा के विधायक राजेंद्र शिंगने ने उन्हें सुबह 6 बजे फोन किया और बताया कि वे अजीत के साथ राजभवन जा रहे हैं. पवार ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं जयंत पाटिल, छगन भुजबल और दिलीप वाल्से-पाटिल को 15 बागियों को पार्टी में वापसी के लिए मनाने की जिम्मेदारी सौंपी. और अजीत को राकांपा विधायक दल के नेता पद से हटा दिया.

सोशल मीडिया में अफवाहें उडऩे लगीं कि अजित को खुद शरद पवार ने भाजपा में भेजा है. पवार शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे और कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष बालासाहेब थोराट के साथ मिलकर स्थिति को संभालने में जुट गए. वे राकांपा के सभी विद्रोहियों का पता लगाने में कामयाब रहे और उन्हें बांद्रा के एक पांच सितारा होटल में रखा गया. यही नहीं, पवार ने विकास अघाड़ी के सभी विधायकों को शपथ लेने के लिए भी कहा कि वे अपनी पार्टी के प्रति वफादार रहेंगे, जो कुछ असामान्य-सी घटना थी. राकांपा के मुंबई अध्यक्ष नवाब मलिक कहते हैं, ''पवार ने असंभव को संभव बना दिया. पवार ने घोषणा की कि वे आश्वस्त करेंगे कि कोई भी विधायक अयोग्य न घोषित हो और स्थिति नियंत्रण में आ गई. यकीनन कोई मास्टर रणनीतिकार ही ऐसा संभव करके दिखा सकता था.''

ये अटकलें भी हैं कि पवार शिवसेना से अपनी पार्टी के लिए भी मुख्यमंत्री पद की खातिर बराबरी का दावा कर सकते थे तो फिर पूरे पांच साल के लिए मुख्यमंत्री का पद शिवसेना को सौंपने के लिए क्यों राजी हो गए? राकांपा के एक नेता का कहना है कि पवार गछबंधन सरकार में गृह, वित्त और जल संसाधन जैसे महत्वपूर्ण मंत्रालय हासिल करना चाहते हैं, इसलिए ऐसा किया है. नेता याद दिलाते हैं कि पवार ने 2004 में भी मुख्यमंत्री पद का दावा छोड़ दिया था, जबकि राकांपा ने कांग्रेस से दो सीटें अधिक (71) जीती थीं.

17 नवंबर को पुणे में राकांपा की बैठक में, पवार के करीबी सहयोगी प्रफुल्ल पटेल, सुनील तटकरे और धनंजय मुंडे ने भाजपा का समर्थन करने के अजीत के विचार का समर्थन किया था. शायद, अपनी पार्टी के भविष्य और देश की राजनीति की अपनी दूरदृष्टि से पवार ने पार्टी नेताओं का यह सुझाव खारिज कर दिया. सहयोगी दलों को लेकर भाजपा का रिकॉर्ड उत्साहजनक नहीं रहा है.

कांग्रेस नेतृत्व संकट से जूझ रहा है और ममता बनर्जी, मायावती और अखिलेश यादव जैसे विपक्षी नेता अपनी जमीन बचाए रखने के लिए संघर्ष कर रहे हैं, ऐसे में पवार ने महाराष्ट्र के राजनैतिक संकट को ऐसे विपक्षी नेता के रूप में उभरने के अवसर के रूप में देखा है, जो नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी को उनके ही अपने खेल में मात दे सकता है. दो सबसे असंगत सहयोगियों को एक साथ लाकर, वे भाजपा विरोधी ताकतों को एकजुट करने के एक नए रणनीतिकार के रूप में स्थापित हुए हैं. इसमें दो राय नहीं कि  हताश-निराश विपक्ष को जिस उद्धारक की तलाश थी, शायद पवार के रूप में उसकी तलाश पूरी होती है.

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