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अब महात्मा गांधी की डगर पर मोदी!

बीसवीं सदी में देश में कांग्रेस छाई रही तो मोदी 21वीं सदी बीजेपी के नाम करना चाहते हैं. देशभर में पार्टी के नाम का डंका बजाने के लिए बीजेपी महात्मा गांधी के उसी मॉडल को अपना रही है जो कांग्रेस के लिए कारगर साबित हुआ था.

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aajtak.in
रवीश तिवारी 13 April 2015
अब महात्मा गांधी की डगर पर मोदी! बंगलुरू की राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में बीजेपी नेता

भारतीय जनता पार्टी (बीजेपी) की चुनाव प्रचार समिति का अध्यक्ष बनने के तुरंत बाद 9 जून, 2013 को नरेंद्र मोदी ने पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित करते हुए अब तकियाकलाम-सा बन चुका अपना वह वाक्य दोहराया जो 2014 के आम चुनाव में उनकी जीत का मंत्र बनने वाला था और जीत के बाद मोदी ने वही बात कही, "देश आज जिन भी समस्याओं का सामना कर रहा है उसका एकमात्र उपाय है कांग्रेस-मुक्त भारत." लगभग एक साल के भीतर उन्होंने इसे वाकई सच भी कर दिखाया.

विडंबना यह है कि अब मोदी के नेतृत्व वाली बीजेपी बदले हुए दौर की कांग्रेस के नक्शेकदम पर चलने की कोशिश कर रही है और भारत की इस वास्तविक राष्ट्रीय पार्टी की जगह लेकर देशव्यापी पार्टी बनने का सपना संजो रही है. बेंगलूरू में 3 और 4 अप्रैल को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में हुई पार्टी की पहली राष्टीय कार्यकारिणी की बैठक के दौरान भी बीजेपी लगातार बीते दौर की कांग्रेस (महात्मा गांधी के समय कांग्रेस का जो स्वरूप था) की हमराह बनने की कोशिश करती लगी.

आम चुनाव में बीजेपी को जहां 17.2 करोड़ वोट मिले थे वहीं कांग्रेस को सिर्फ 10.7 करोड़ वोट ही मिले. इस तरह वोट प्रतिशत के मामले में देश की सबसे पुरानी पार्टी को दूसरे पायदान पर धकेल अब बीजेपी का इरादा उन सभी स्थानों पर काबिज होने का है जहां अब तक कांग्रेस का राज था, यानी हर शहर और कस्बे के हर वार्ड से लेकर हर तालुका के हर गांव तक. इस लक्ष्य को पाने के लिए बीजेपी उन्हीं पाठों से सीख ले रही है जो भारतीय राष्टीय कांग्रेस ने आजादी की लड़ाई के दौरान सीखे थे, जब वह राजनीति में अपने पैर फैला रही थी.

सदस्यता की राह आसान हो
आरएसएस के अस्तित्व में आने से पांच साल पहले यानी 1920 में असहयोग आंदोलन का नेतृत्व कर रही कांग्रेस का नागपुर में सत्र आयोजित हुआ था जिसमें इस बात पर सहमति बनी थी कि देश के गांवों में पैठ बनाने के लिए पार्टी की सदस्यता की राह को आसान बनाना होगा. कांग्रेस ने सदस्यता शुल्क घटाकर चार आने (25 पैसा) कर दिया जिससे गरीब और खासकर गैर-शहरी लोग पार्टी के सदस्य बनें और पढ़े-लिखे संभ्रात अंग्रेजी के जानकार लोगों की पार्टी वाली छवि को बदलने में मदद दे सकें.

लगभग 95 साल बाद, 26 मई, 2014 को नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री पद की शपथ लेने के साथ ही एक दूसरी पार्टी के देशभर में पांव फैलाने के लिए मंच तैयार हो चुका है. बीते अगस्त में राष्ट्रीय राजधानी के जवाहरलाल नेहरू स्टेडियम में पार्टी की राष्टीय परिषद की बैठक को संबोधित करते हुए बीजेपी के अध्यक्ष अमित शाह ने अपनी महत्वाकांक्षा को इन शब्दों में जाहिर किया थाः "देश की राजनीति में कांग्रेस की विचारधारा ही लंबे समय तक प्रभावी रही है. लेकिन अब समय आ गया है कि हम अपनी विचारधारा का प्रसार करें और अपनी छाप छोड़ें."

नागपुर सत्र के बाद कांग्रेस ने जो पहला काम किया था, अपने लक्ष्य को पाने के लिए बीजेपी ने भी पहला कदम वही उठाया है यानी पार्टी की सदस्यता को आसान बनाना. सदस्यता को मुफ्त कर दिया गया है और लोगों तक पहुंच बनाने के लिए मोबाइल तकनीक का इस्तमेाल किया जा रहा है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले साल 1 नवंबर को टोल फ्री नंबर पर फोन मिलाकर पार्टी के सदस्यता अभियान की शुरुआत की थी. बीजेपी का दावा है कि 6 अप्रैल को पार्टी के 35वें स्थापना दिवस तक इस नंबर पर 16 करोड़ मिस्ड कॉल आ चुके हैं और करीब 9.5 करोड़ लोगों का पंजीकरण हो चुका है. पिछले साल तक पार्टी के सिर्फ 3.5 करोड़ सदस्य ही थे, उनके मुकाबले यह संख्या कहीं ज्यादा है. पहले पार्टी का सदस्यता अभियान 31 मार्च को खत्म होने वाला था लेकिन अब इसकी अवधि एक माह और बढ़ा दी गई है. पार्टी को उम्मीद है कि तब तक और 10 करोड़ नए सदस्य बन जाएंगे.

बीजेपी के नेताओं का दावा है कि यह तो महज शुरुआत है. मोदी और शाह चाहते हैं कि पार्टी की पहुंच गांव-गांव तक हो, यह एक ऐसा सपना है जिसे आज तक सिर्फ कांग्रेस पूरा कर सकी है, वह भी तब जब वह अपने दौर के शीर्ष पर थी. पार्टी के उपाध्यक्ष दिनेश शर्मा कहते हैं, "सदस्यता अभियान का आयोजक होने के नाते मैंने 19 राज्यों का दौरा किया है और अप्रैल के अंत तक बीजेपी अध्यक्ष पंजीकरण की जानकारी लेने और आगे के लक्ष्य तय करने के लिए हर राज्य का दौरा कर चुके होंगे."

सही मौके पर सही कदम
फरवरी, 1922 में असहयोग आंदोलन के अचानक स्थगित हो जाने से जब इसका उत्साह ठंडा पडऩे लगा तो गांधी ने कांग्रेस को जन-जन तक पहुंचाने का विचार पेश किया. उन्होंने कांग्रेस कार्यकर्ताओं को जनता और खासकर हाशिए पर पड़े उपेक्षित लोगों से मेल-मिलाप करने को प्रेरित किया. उन्होंने कार्यकर्ताओं को भेदभाव से ऊपर उठकर खादी, हिंदू-मुस्लिम एकता को बढ़ावा देने, छुआछूत का विरोध करने और आदिवासी तथा कमजोर तबके के लोगों के कल्याण के लिए काम करने की प्रेरणा भी दी.

ठीक इसी तर्ज पर पिछले साल अगस्त में, स्वतंत्रता दिवस समारोह पर अपने पहले संबोधन में प्रधानमंत्री मोदी ने भी भारत को खुले में शौच से मुक्त कराने की मंशा जाहिर की और महात्मा गांधी की जयंती पर स्वच्छ भारत अभियान की शुरुआत की. बेंगलूरू में हुई राष्टीय कार्यकारिणी की बैठक में भी उन्होंने यही लक्ष्य दोहराया. इस कार्यक्रम की निगरानी के लिए शाह ने प्रभात झा, पुरुषोत्तम रुपाला, जे.पी.नड्डा, विजय गोयल और माखन सिंह जैसे पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की एक समिति गठित कर दी.

प्रधानमंत्री ने पार्टी के नेताओं और कार्यकर्ताओं से अन्य सामाजिक कार्यों में शामिल होने के लिए भी कहा है जैसे मैला ढोने की परंपरा को खत्म करना, स्त्रियों के प्रति ज्यादा संवेदनशीलता लाना और नदियों की सफाई. उनके वफादार सहयोगी शाह ने इन सभी कार्यों की निगरानी के लिए अलग-अलग समितियां गठित कर दी हैं. कन्या भ्रूणहत्या रोकने और बेटियों को शिक्षा जैसे मोदी के लक्ष्यों के लिए शाह ने 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' अभियान की घोषणा की है और पार्टी के कार्यकर्ताओं पर इनके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी डाली है.
मोदी ने गंगा समेत अन्य नदियों की स्वच्छता पर भी जोर दिया है. प्रधानमंत्री ने इस बात के संकेत भी दिए हैं कि पार्टी 6,000 गांवों और 1,800 से ज्यादा शहरों से गुजरने वाली इस नदी की सफाई के लिए अभियान भी चला सकती है. जब वे इस कार्यक्रम से पर्यावरण को होने वाले फायदे की बात करते हैं तो इसे सियासी रूप से बेहद महत्वपूर्ण हिंदीभाषी राज्यों बिहार और उत्तर प्रदेश में राजैनतिक बढ़त लेने के प्रयास की तरह देखा जाता है, जहां क्रमशः इस साल के अंत में और 2017 में चुनाव होने हैं.

पुराने विचार नए कलेवर में
वित्त मंत्री अरुण जेटली के मुताबिक साफ तौर पर मुद्दे को वहीं से उठाते हुए, जहां कांग्रेस ने इसे छोड़ा था, मोदी ने बेंगलूरू में कहा कि जनसंघ के नेता पंडित दीनदयाल उपाध्याय के अंत्योदय के फलसफे के साथ चलते हुए पार्टी को उनके जन्म शताब्दी महोत्सव को गरीबों के कल्याण के लिए काम करते हुए मनाना चाहिए. अंत्योदय का अर्थ है समाज के अंतिम व्यक्ति तक के कल्याण की बात करना. जहां महात्मा गांधी का मूलमंत्र कांग्रेस की देशव्यापी पहुंच बनाने में मार्गदर्शक साबित हुआ, वहीं बीजेपी के पास अपने लक्ष्य को पाने के लिए अंत्योदय मंत्र है.

पार्टी के नेताओं से मैला ढोने की परंपरा को खत्म करने की दिशा में काम करने को कहा गया है तो अमित शाह ने इसे सुनिश्चित करने के लिए कार्यकर्ताओं से उन लगभग 23 लाख परिवारों के पुनर्वास के लिए काम करने को कहा है जो आज भी मैला ढोने का काम करते हैं. केंद्रीय मंत्री प्रकाश जावड़ेकर के मुताबिक शाह ने कहा, "ऐसी गतिविधियां, जो राजनीति से ऊपर उठकर सामाजिक सुधार से जुड़ी हैं, उनसे ही बीजेपी अन्य से अलग सोच वाली नजर आएगी."

बीजेपी, जैसा कि पार्टी के प्रवक्ता सुधांशु त्रिवेदी कहते हैं, "सिर्फ एक सियासी पार्टी नहीं बल्कि विचारधारा से जुड़ा अभियान है. समाज सुधार की ये गतिविधियां भले ही सियासी परिदृश्य से मेल न खाती हों लेकिन गांधी ने आजादी की लड़ाई में इनके जरिए जनता को जोडऩे का काम कर दिखाया था. त्रिवेदी के मुताबिक, ऐसे कार्यक्रमों के जरिए पार्टी जनता से बेहतर तरीके से जुड़ाव और देश भर में अपनी स्थिति को और मजबूत कर सकती है.

बीजेपी नेतृत्व का हमेशा से मानना रहा है कि आजादी के बाद भी कांग्रेस की लोकप्रियता बने रहने की सबसे बड़ी वजह यह सोच है कि इसी पार्टी ने भारत को आजादी दिलवाई. और दूसरी वजह यह नजरिया है कि अपने गठन के बाद से ही कांग्रेस ने सामाजिक बेहतरी के लिए काम किया है. लेकिन यह पहली बार है जब भगवा पार्टी इन्हीं विचारों और आकांक्षाओं को अपने शब्दों में पिरो रही है. बीजेपी के शीर्ष नेता और उसके निकट सहयोगी ने स्पष्ट कर दिया है कि इन सामाजिक-सांस्कृतिक और राजनैतिक विचारों को किस तरह क्रियान्वित किया जाएगा. 2 अप्रैल को मोदी ने पार्टी के राष्ट्रीय पदाधिकारियों, राज्य इकाई के प्रमुखों और राज्यों के संगठन सचिवों से कहा कि वे नए सदस्यों को इस अभियान में राजनैतिक कार्यकर्ता की तरह जोड़ें. अगले दिन शाह ने 15 लाख नए सदस्यों को सक्रिय राजनीति का प्रशिक्षण देने की घोषणा कर दी. इस व्यापक कार्यक्रम में पार्टी के कार्यकर्ता मई से जुलाई तक 10 करोड़ नए कार्यकर्ताओं के साथ संपर्क स्थापित करेंगे.

लेकिन समय के साथ जब इस विचारधारा की चमक फीकी पडऩे लगेगी, तब क्या बीजेपी भी कांग्रेस की राह अपनाएगी, जिसने आजादी के बाद सत्ता में आने पर गांधी के कई लक्ष्यों से हाथ झाड़ लिए थे? या फिर स्वच्छ भारत अभियान की तरह यह अभियान भी फोटो खिंचवाने तक सीमित हो जाएगा जिसकी मिसाल दिल्ली में देखने को मिली थी जब प्रदेश अध्यक्ष सतीश उपाध्याय का झाड़ू लगाते हुए फोटो खिंचवाने के लिए खास तौर से कचरा इकठ्ठा किया गया था?

यह गांधी का असर ही था जिसने आम कांग्रेसियों को समाज के भले के लिए काम करने को प्रेरित किया और जनता तक पार्टी की पहुंच बनाई. मोदी सरकार के भारी बहुमत से सत्ता में आने के बावजूद लगता है कि कार्यकर्ताओं की एकमात्र नैतिक जिक्वमेदारी आरएसएस के प्रति है. राष्ट्रवादी भगवा विचारधारा को मुख्यधारा में लाकर जनता से जोडऩे की मोदी की योजना बहुत हद तक इस पर निर्भर करेगी कि नागपुर में जो सपने देखे गए हैं, उनका क्रियान्वयन कितना हो रहा है. हैरानी नहीं कि शाह ने इन लक्ष्यों को अंजाम तक पहुंचाने और इनकी निगरानी के लिए जो समितियां गठित की हैं, उनकी कमान भी आरएसएस के करीबी लोगों को ही दी है.

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