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मुंबई: संकटग्रस्त शहर

मुंबई में कोरोनावायरस के सबसे ज्यादा मामले हैं. आखिर कैसे खड़ी होगी देश की आर्थिक राजधानी फिर से अपने पैरों पर?

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aajtak.in
किरण डी. तारेमुंबई, 11 May 2020
मुंबई: संकटग्रस्त शहर मुंबई के धारावी इलाके में कोरोना वायरस की स्क्रीनिंग करते स्वास्थ्यकर्मी (फोटोः रफीक मकबूल)

दक्षिण मुंबई में वर्ली के जीजामाता नगर पर मंडरा रही खौफ की चादर के बारे में बात करते हुए सूर्यकांत जाधव के आंसू थमने का नाम नहीं लेते. 49 वर्षीय जाधव यहीं रहते हैं और हार्डवेयर की दुकान में काम करते हैं. उनके दो पड़ोसी कोविड-19 से मारे जा चुके हैं. बुझे मन से वे कहते हैं, ''उनका इलाज चल रहा था पर वे बचे नहीं.''

कुल 68,400 वर्ग मीटर जमीन पर फैला यह 4,500 एक मंजिला मकानों वाला इलाका किसी पैबंदकारी जैसा दिखता है. महामारी की चपेट में आने से पहले यहां के बाशिंदों को खुशहाली की उम्मीद बंधाई गई थी—दो रसूखदार डेवलपर इस बस्ती का विकास करना चाहते थे. लोगों से कहा गया था कि उनके घरों के 70 लाख रुपए तक मिल सकते हैं जबकि इनमें से कुछ तो 10 गुना 12 फुट जितने छोटे हैं. इतनी रकम मलाड सरीखे उपनगरों में 600 वर्ग फुट का फ्लैट खरीदने के लिए काफी है. पिछले कुछ हफ्तों में वे सारे सपने हवा हो गए. जीजामाता नगर कोविड-19 का हॉटस्पॉट है, यानी कंटेनमेंट जोन, जिसे पुलिस ने सील कर दिया है. पूरा इलाका बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) का 'जी-दक्षिण' वार्ड है, जिसमें जीजामाता नगर, वर्ली कोलीवाडा और बीडीडी चाल आती हैं. यहां कोविड-19 के 1,000 से ज्यादा मरीज हैं और 50 से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं. महामारी का यह हॉटस्पॉट भारत की कारोबारी राजधानी के बीचोबीच है, जहां गगनचुंबी इमारतें किसी ग्राफ की उठती लाइन की तरह आसमान की ओर तनी हैं.

मुंबई भारत की वित्तीय, मनोरंजन और बैंकिंग राजधानी है. बॉम्बे स्टॉक एक्सचेंज, नेशनल स्टॉक एक्सचेंज, भारतीय रिजर्व बैंक और देश की दिग्गज कंपनियों के मुख्यालय यहीं हैं. वित्तीय कंपनियों और कार निर्माताओं से लेकर उपभोक्ता सामान और अंतरराष्ट्रीय तेल कंपनियों तक वैश्विक कारोबार के कुछ सबसे बड़े नाम यहां से काम करते हैं. सुकेतु मेहता के 2004 के उपन्यास में इसे 'मैक्सिमम सिटी' कहा गया क्योंकि यह कारोबार की चहल-पहल से हमेशा गुलजार रहता है और कभी सोता नहीं. ब्लूमबर्ग के अप्रैल 2019 के आकलन के मुताबिक, महाराष्ट्र के कुल 350-400 अरब डॉलर के एसजीडीपी में आधे से ज्यादा योगदान इस शहर का था. आज यह शहर महामारी के खौफ में अपनी नींद गंवा बैठा है. आम तौर पर ठसाठस भरी रहने वाली इसकी सडकें सुनसान हैं. रोज करीब 80 लाख लोगों को सफर करवाने वाली इसकी लोकल ट्रेन सेवाएं थम गई हैं. बेस्ट की बसें सड़कों से नदारद हैं. आर्थिक इंजन बंद पड़ा है.

मुंबई पर कोविड-19 की जबरदस्त मार पड़ी है. यहां 4 मई को 9,123 मरीज थे और 361 लोगों की जान जा चुकी थी. महाराष्ट्र के कुल 13,000 मरीजों में से 79 फीसद यहीं हैं और भारत की 20 फीसदी मौतें इसी शहर में हुई हैं. ऐसा तब है जब शहर बुरे वक्त से अनजान नहीं है. हाल के वर्षों में इसे आतंकी हमलों और जबरदस्त बाढ़ से निबटना पड़ा और दोनों में सैकड़ों लोग मारे गए. हर बार शहर ने अपनी लय और जिंदादिली फिर हासिल कर ली. कोरोना भी शहर को गिरफ्त में लेने वाली पहली महामारी नहीं है. 1918 में पहले विश्व युद्ध के दौरान यूरोप की रणभूमि से लौट रहे सैनिक 'स्पैनिश फ्लू' मुंबई ले आए थे. इंफ्लुएंजा के उस प्रकोप ने, जिसे 'बॉम्बे बुखार' भी कहा गया, पूरे भारत को तार-तार कर दिया था और आखिरकार 1.2 करोड़ से ज्यादा लोगों की जान ली थी.

बीएमसी का अनुमान है कि मध्य मई तक 70,000 मुंबईकर कोविड-19 के संक्रमण की चपेट में आ सकते हैं. मरीजों की संख्या में उछाल के इस अंदेशे के अनुरूप तैयारी के लिए अधिकारी जमीन-आसमान एक कर रहे हैं. स्कूलों, मैदानों और स्टेडियमों को क्वारंटीन केंद्रों में बदला जा रहा है. अस्पताल के बिस्तरों की तादाद बढ़ाई जा रही है. भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान संस्थान (आइसीएमआर) जांच कर रहा है कि वायरस शहर में कहीं भी सामुदायिक फैलाव के चरण में तो नहीं पहुंच गया है. इसी सबके चलते फिक्र यह है कि मोदी सरकार के लॉकडाउन 3.0 के तहत पाबंदियों में ढील का कोई आर्थिक फायदा शहर का होगा या नहीं.

मुंबई में कोरोना मर्ज और इलाज

यह हुआ कैसे?

मुंबई दुनिया के सबसे घने बसे शहरों में से एक है. शहर की 1.3 करोड़ आबादी करीब 600 वर्ग किलोमीटर इलाके में ठसाठस भरी है. औसत प्रति वर्ग किलोमीटर करीब 21,500 आता है. प्रॉपर्टी कंसल्टेंट नाइट फ्रैंक इंडिया के एक्जीक्यूटिव डायरेक्टर गुलाम जिया कहते हैं, ''शहर के ठसाठस भरे इलाकों में सामाजिक दूरी बनाने की गुंजाइश ही नहीं है.'' 25 अप्रैल तक मुंबई की कुल 204 मौतों में कम से कम 58 फीसद झुग्गी बस्तियों और चालों में हुई बताई जाती हैं. शहर के 1.3 करोड़ लोगों में से आधे से ज्यादा इन्हीं बस्तियों और चालों में रहते हैं. इन इलाकों में रहने वाले ज्यादातर लोगों का कोविड-19 से प्रभावित देशों की यात्रा का कोई इतिहास नहीं है. वे इन देशों से आए लोगों के संपर्क में आने की वजह से संक्रमित हुए.

इसमें लॉकडाउन को सख्ती से लागू करने में राज्य सरकार के नाकारापन ने भी कुछ भूमिका अदा की. हालांकि उसने फरवरी की शुरुआत में ही छत्रपति शिवाजी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे पर जांच केंद्र स्थापित कर दिए थे, पर जांच और क्वारंटीन की जरूरत जितने बड़े पैमाने पर पड़ी, प्रशासन उसके लिए तैयार नहीं था. सरकार की कोशिशों के बावजूद विदेश से लौटे कई यात्री बगैर जांच के शहर में दाखिल हो गए. उनमें से वायरस लेकर लौटे लोगों ने इसे दूसरों को भी दे दिया. मुंबई में कोविड-19 का पहला मरीज 6 मार्च को घाटकोपर में सामने आया. यह दुबई से लौटा एक कारोबारी था जो संक्रमित पाया गया. उसे एक प्राइवेट अस्पताल में भर्ती करवाया गया. पांच दिन बाद 11 मार्च को मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने तमाम सार्वजनिक जमावड़ों पर रोक लगा दी और 31 मार्च तक लॉकडाउन में रहने की अपील की. सरकार ने 16 मार्च को घर में क्वारंटीन लागू करना शुरू किया. 21 मार्च तक मुंबई में कुल 10 मरीज थे. 30 मार्च को उनकी तादाद 47 थी. तब से इनके बढ़ने की दर बहुत तेज हो गई है. महीने भर में, 21 अप्रैल तक 3,451 मामले आ चुके थे.

मुंबई प्रशासन ने वायरस के फैलने पर नियंत्रण करने में कुछ कामयाबी जरूर हासिल की है. मरीजों की तादाद दोगुनी होने में लगने वाला समय अप्रैल के पहले हफ्ते में तीन दिन से बढ़कर मई के पहले हफ्ते में 10 दिन हो गया. बीएमसी स्वास्थ्य सुविधाओं के बुनियादी ढांचे की कमियों को पूरा करने में जुटा है. राज्य सरकार के साथ मिलकर उसने 50,000 लोगों को क्वारंटीन करने की सुविधा निर्मित की है. महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे का कहना है कि चूंकि कोविड-19 के करीब 85 फीसद मरीज लक्षणहीन हैं, लिहाजा सरकार अपनी क्वारंटीन सुविधाएं बढ़ाने का मंसूबा बना रही है.

राज्य सरकार के एक बड़े अफसर नाम नहीं छापने के आग्रह के साथ कबूलते हैं कि शायद सख्त लॉकडाउन लागू करने में सरकार की अक्षमता ने शहर को संकट में धकेलने में अहम भूमिका निभाई. शारीरिक दूरी न बनाने की निश्चित तौर पर भूमिका रही—30 मार्च को संक्रमित पाए गए वर्ली कोलीवाडा के कम से कम चार लोगों का विदेश यात्रा का कोई इतिहास नहीं था. वे किसी संक्रमित व्यक्ति के संपर्क में आने की वजह से संक्रमित हुए.

विपक्ष, मुख्यमंत्री ठाकरे को संकट से निबटने के तौर-तरीकों के लिए लगातार निशाना बना रहा है. महाराष्ट्र भारतीय जनता पार्टी के उपाध्यक्ष किरीट सोमैया कहते हैं, ''गंभीरता की कमी है.'' वे आरोप लगाते हैं कि ''सरकार मरीजों की संख्या को लेकर अहम आंकड़े छिपा रही है'' और यह भी कि बीएमसी की तैयारियों में गंभीर खामियां हैं. ठाकरे अपने फेसबुक वीडियो में लगातार रक्षात्मक नजर आते हैं. ये वीडियो ही इन दिनों लोगों तक अपनी बात पहुंचाने के लिए उनका पसंदीदा तरीका बन गए हैं. अपनी सरकार के काम का बचाव करने में केंद्रीय गृह मंत्रालय के अतिरिक्त सचिव मनोज जोशी की अगुआई में पांच सदस्यीय समिति का निरीक्षण उनकी ढाल है. उन्होंने 30 अप्रैल को कहा, ''केंद्रीय समिति ने वर्ली में बीमारी पर काबू पाने की हमारी कोशिशों की तारीफ की है.''

मुंबई में कोविड-19 के मरीजों की अप्रैल के आखिर तक बहुत ज्यादा तादाद की एक और वजह बताते हुए एक फेसबुक संबोधन में टोपे ने कहा कि इन आंकड़ों से जांच की ऊंची दर की भी झलक मिलती है. जांच के नतीजतन अभी तक तस्वीर चिंताजनक ही है. भरोसा करना कठिन होगा कि शहर में (अप्रैल के आखिर तक) 1,036 कंटेनमेंट जोन—यानी एक से ज्यादा कोविड-19 पॉजिटिव मामलों वाले इलाके—600 वर्ग किलोमीटर में फैले महानगर में चौतरफा छितराए हुए हैं (देखें ग्राफिक). इनमें से 374 चाल और झुग्गी बस्तियों में हैं, जहां करीब 10 लाख आबादी है. ये जोन खतरनाक हैं क्योंकि इनमें एक से ज्यादा पॉजिटिव मरीज या कम से कम पांच ऊंचे जोखिम वाले संपर्क हैं—कुल मिलाकर इन इलाकों में 1,218 पॉजिटिव मामले और 6,900 ऊंचे जोखिम वाले संपर्क हैं. विले पार्ले और चेंबूर की दो चालों में 100 से ज्यादा ऊंचे जोखिम वाले संपर्क हैं.

महामारी से निबटने की जिम्मेदारी बीएमसी पर है. देश के इस सबसे अमीर नगर निगम का 33,441 करोड़ रुपए का सालाना बजट कई छोटे राज्यों के बजट से ज्यादा है. बीएमसी ने कंटेनमेंट जोन को तीन श्रेणियों—ब्लू, ऑरेंज और रेड—में बांटा है. कंटेनमेंट जोन की तमाम इमारतें (476) ब्लू श्रेणी में हैं. झुग्गी बस्तियों और चालों के भीड़ भरे हिस्से (146), जहां ऊंची जोखिम वाले पांच से कम मरीज या दो मौतें हैं, ऑरेंज श्रेणी में बताए जाते हैं. भीड़ भरे इलाके (414), जहां सख्त लॉकडाउन की जरूरत है, रेड जोन में हैं. किसी भी जोन को सुरक्षित तब घोषित किया जाता है जब पहले मामले का पता चलने के दिन से 14 दिन की क्वारंटीन अवधि पूरी होने के बाद तक कोई नया पॉजिटिव मामला सामने नहीं आता.

कुछ रेड जोन में हालत बहुत खौफनाक है. खराब साफ-सफाई और सटे मकानों ने गोवंडी को कोविड-19 का सुलगता ठिकाना बना दिया है. प्रति वर्ग किमी 36,000 के आबादी घनत्व वाला यह उपनगर उत्तर प्रदेश, बिहार, पश्चिम बंगाल के प्रवासी कामगारों और बांग्लादेश के अवैध प्रवासियों का मुख्य केंद्र है. मुंबई की कुल कोविड-19 मृत्यु दर 4.9 फीसद है, वहीं गोवंडी में यह 11 फीसद है. मायूसी बढ़ाने वाली बात यह कि यहां के 19 निजी डॉक्टरों की रिपोर्ट पॉजिटिव आने के बाद इलाके के 500 निजी डॉक्टरों ने अपने क्लिनिक बंद कर दिए हैं.

मुंबई में हर जगह कहर

अस्पतालों का संकट

महामारी ने पहले से ही बोझ से दबे मुंबई के अस्पतालों का काम और बढ़ा दिया है. शहर में जनसंख्या के मुकाबले डॉक्टरों का अनुपात बहुत कम है—मुंबई में 1,00,000 की आबादी पर 54 डॉक्टर हैं. इसके मुकाबले शंघाई में हर 1,00,000 आबादी पर 296 डॉक्टर हैं, हालांकि ये भी कम हैं. बदतर यह कि डॉक्टरों और नर्सों के पॉजिटिव पाए जाने के बाद शहर के करीब आधा दर्जन बड़े अस्पतालों के कुछ हिस्से सील कर दिए गए. इससे अस्पतालों में 900 बिस्तरों की कमी हो गई. ज्यादा चिंता की बात यह है कि कोविड-19 का पता लगने और इलाज के बीच काफी समय गंवा दिया गया है.

महाराष्ट्र सरकार के कोविड-19 कार्यबल के सदस्य डॉ. अविनाश सुपे की लिखी 'डेथ ऑडिट रिपोर्ट' मामलों का जल्दी से जल्दी पता लगाने पर जोर देती है. रिपोर्ट कहती है कि सबसे पहले लक्षणों का पता लगने और मरीज की मौत (उन मामलों में जहां कोविड-19 के चलते मौत हो गई) के बीच औसत समय महज 6.4 दिन था. सुपे ने 133 मौतों का अध्ययन किया, जिनमें से 80 अस्पताल में भर्ती होने के दो दिन के भीतर, 34 तीन से पांच दिन में और बाकी पांच दिन बाद मरे. महज 36 फीसद मरीजों को तत्काल चिकित्सा सहायता मिल सकी.

अप्रैल के दूसरे हफ्ते में मुख्यमंत्री उद्धव ठाकरे ने चेतावनी के बिल्कुल शुरुआती संकेतों को पहचानने की जरूरत पर जोर दिया, ताकि जल्दी से जल्दी इलाज मुहैया किया जा सके. स्वास्थ्य महकमे ने दिशानिर्देश जारी करके कामगारों को हिदायत दी कि वे हल्के से हल्के लक्षणों—बुखार, निम्न रक्तचाप, होंठों पर नीलापन, सांस घुटने और सीने में दर्द—पर कड़ी नजर रखें. बीएमसी कोविड-19 मरीजों के संपर्क में आए ऊंचे जोखिम वाले लोगों—जैसे उच्च रक्तचाप, डायबिटीज, अस्थमा, टीबी, किडनी की बीमारियों और कैंसर से ग्रस्त बुजुर्गों और गर्भवती औरतों—के लिए कार्यक्रम चला रहा है, जो उनमें बहुत थोड़े-से लक्षणों के उभरने का संज्ञान लेता है. कार्यबल प्रमुख डॉ. संजय ओक ने स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं से जोखिम से घिरे लोगों के ऑक्सीजन के स्तर की जांच करने को भी कहा है. वे कहते हैं, ''अगर स्तर 94 से कम है, तो उन्हें फौरन अस्पताल में भर्ती करना चाहिए.''

अस्पतालों की कमी से निबटने के लिए बीएमसी अपने 1,192 स्कूलों को क्वारंटीन केंद्रों में बदलना चाहती है. बीएमसी के शिक्षा अधिकारी महेश पालकर ने सभी उपक्षेत्रीय शिक्षा अधिकारियों से ऐसे स्कूलों की पहचान करने और यह देखने के लिए कहा है कि इनकी इमारतें मजबूत और गुसलखाने पर्याप्त हों. राज्य ने अस्पतालों में बिस्तरों की संख्या मई तक मौजूदा 2,000 से बढ़ाकर 7,000 करने की योजना बनाई है. इनमें करीब आधे सरकार और नगर निगम संचालित अस्पताल होंगे.

मुंबई महानगर क्षेत्र विकास प्राधिकरण ने भी एमएमआरडीए ग्राउंड में 1,000 बिस्तरों का अस्थायी अस्पताल बनाया है और कहा है कि इसकी क्षमता 5,000 बिस्तरों तक बढ़ाई जा सकती है. टोपे कहते हैं कि 1,500 इंटेंसिव केयर यूनिट और इतनी ही तादाद में वेंटिलेटर के साथ शहर ने पर्याप्त तैयारी की है. वे कहते हैं, ''करीब 85 फीसद मरीजों को अस्पताल में भर्ती होने की जरूरत नहीं है. करीब 10 से 12 फीसद मरीजों को ऑक्सीजन की और केवल तीन फीसद को वेंटिलेटर पर रखने की जरूरत है. उन सबके लिए हमारे पास काफी ऑक्सीजन सिलंडर और वेंटिलेटर हैं.''

मुंबई मुश्किल में है, उसने पहले भी मुश्किलें झेली हैं. खुशकिस्मती के साथ शहर का जुझारू जज्बा इस बार भी उसकी नैया पार लगाएगा.

—साथ में, एम.जी. अरुण

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