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छोटे उद्योग, बड़े संकट

सबसे ज्यादा रोजगार पैदा करने वाले, अर्थव्यवस्था की रीढ़ छोटे और मझोले उद्योग पूंजी और कर्ज के अभाव, खपत की कमी और सस्ते आयात से तबाही केकगार पर लेकिन उबारने के सरकारी प्रयास थोड़े.

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aajtak.in
शुभम शंखधर नई दिल्ली, 23 July 2019
छोटे उद्योग, बड़े संकट उद्योग

भव्य चुनावी जीत के साथ वापस लौटी एनडीए सरकार ने ऐसे समय में कामकाज संभाला है, जब अर्थव्यवस्था पर मंदी का साया मंडरा रहा है और बेरोजगारी चरम पर है. वित्त वर्ष 2019 में आर्थिक विकास दर पांच साल के निचले स्तर (6.8 प्रतिशत) पर रही और बेरोजगारी की दर (6.1 प्रतिशत) 45 साल में सबसे ज्यादा. ऐसे में कृषि के बाद सबसे ज्यादा रोजगार देने वाले (2017-18 की सबसे ताजा सरकारी रिपोर्ट के मुताबिक, 11.1 करोड़) कुटीर, लघु और मझोले उद्योगों की जैसे रीढ़ ही टूटती जा रही है. कहीं कारखाने बंद होने का सिलसिला जारी है तो कहीं खपत घटने से उत्पादन सिकुड़ रहा है और रोजगार छिन रहे हैं. देश भर में फैले हस्तकला और पारंपरिक छोटे उद्योगों के लिए मशहूर इलाकों में सन्नाटा पसरने लगा है. उत्तर प्रदेश के मेरठ, सहारनपुर, अलीगढ़, आगरा, बुलंदशहर, खुर्जा, बनारस, मिर्जापुर जैसे कभी स्थापित केंद्रों में कारीगरों के दिन-रात फाकों में गुजरने लगे हैं. संकट भारी है और उम्मीदें धुंधली नजर आ रही हैं.

दरअसल बाकी मामलों के अलावा इन उद्योग-धंधों को नोटबंदी और जीएसटी का ऐसा झटका लगा कि चादर तार-तार होने लगी. अब हालांकि कई कारोबारियों के मुताबिक, नोटबंदी का असर तो घटने लगा है पर जीएसटी का दर्द अभी बाकी है. फिर से खड़े होने के लिए माकूल माहौल और सरकारी मदद या कर्ज की बेहद जरूरत है, लेकिन कर्ज मिलने के दायरे भी सिकुड़ते जा रहे हैं. डूबे कर्ज से त्रस्त बैंक खासकर छोटे धंधों को कर्ज देने में भारी कंजूसी बरत रहे हैं.

यह संकट सरकार से छुपा नहीं है. उसने इस ओर कदम उठाने के इरादे जाहिर किए हैं. सरकार बनते ही रोजगार और निवेश के मोर्चे पर चुनौतियों से निबटने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की अगुआई में दो समितियों का गठन किया गया और नए मंत्रिमंडल में कुटीर, लघु और मध्यम उद्यम मंत्रालय (एमएसएमई) का जिम्मा नितिन गडकरी को सौंपा गया, जिनका प्रदर्शन पिछली सरकार में राजमार्ग और सड़क निर्माण में सबसे अच्छा बताया जाता है. लेकिन सवाल है कि सरकार इसके लिए क्या कदम उठाएगी?

वैसे, सरकार ने लक्ष्य तो ऊंचे रखे हैं. वह अगले पांच वर्षों में सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में एमएसएमई क्षेत्र का योगदान 29 फीसदी से बढ़ाकर 50 फीसदी तक ले जाना चाहती है. मौजूदा समय में एमएसएमई क्षेत्र 11.10 करोड़ लोगों को रोजगार देता है, सरकार का लक्ष्य अगले पांच वर्षों में यह आंकड़ा 15 करोड़ तक ले जाने का है.

देश में मैन्युफैक्चरिंग, कपड़ा, चमड़ा, हीरे-आभूषण और वाहन—ये पांच गहन श्रम वाले क्षेत्र हैं, जहां सबसे ज्यादा रोजगार पैदा होता है और उससे लाखों छोटे उद्यमियों की शृंखला जुड़ी होती है. इन क्षेत्रों में कर्ज का मर्ज पुराना है और खपत घटने से गहराती मंदी नई चुनौती है. छोटे और लघु उद्यम से जुड़े हुनर और उत्पाद बाजार की तलाश में हैं और सस्ते आयात और बदलते फैशन के सामने पारंपरिक उद्योग अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे हैं.

कर्ज का कष्ट सबसे पुराना

छोटे, लघु और मध्यम उद्यम (एमएसएमई) के ऊपर किए गए विभिन्न शोध, सरकारी समितियों की रिपोर्ट, एमएसएमई क्षेत्र की चुनौतियों पर होने वाले सेमिनार या देशभर में फैले व्यावसायिक संगठनों से बातचीत, सूचनाओं का हर स्रोत यह ताकीद करता है कि एमएसएमई क्षेत्र में अपर्याप्त कर्ज सबसे पुरानी और प्रमुख समस्या है. वर्तमान और पिछली सभी सरकारों में छोटे उद्यमियों को प्रोत्साहित करने के लिए कर्ज से जुड़ी विभिन्न स्कीमें चलाई गईं फिर भी यह समस्या जस की तस है. फेडरेशन ऑफ इंडियन माइक्रो, स्मॉल ऐंड मीडियम एंटरप्राइजेज (फिसमे) के महासचिव अनिल भारद्वाज कहते हैं, ''सूक्ष्म और लघु उद्योगों को कर्ज देना दरअसल बैंकों की प्राथमिकता में होता ही नहीं, क्योंकि इसमें रिटर्न भले सरकारी बॉण्ड से ज्यादा हो लेकिन जोखिम होता है. यही कारण है कि छोटे और सूक्ष्म उद्योगों को कर्ज देने में हम कभी बैंकों में प्रतिस्पर्धा नहीं देखते हैं, जैसी अक्सर हमें कार, व्यक्तिगत या मकान का कर्ज देने में दिखती है.''

ट्रांसयूनियन सिबिल—सिडबी एमएसएमई पल्स के पांचवें संस्करण के मुताबिक, एमएसएमई क्षेत्र की व्यावसायिक इकाइयों को कर्ज देने में सरकारी बैंकों की हिस्सेदारी बीते पांच वर्ष में 69 फीसद से घटकर 46 फीसदी पर आ गई है. जबकि निजी बैंक और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (एनबीएफसी) की हिस्सेदारी इसमें बढ़ी है. लेकिन किसी व्यक्ति को व्यापार करने के लिए कर्ज देने के मामले में सरकारी बैंक तीसरे पायदान पहुंच गए हैं. ऐसे समय में सरकार जब स्वरोजगार को प्रोत्साहित करने के लिए नई स्कीमें लॉन्च कर रही है, तब सरकारी बैंक लोन लेने के मामले में पिछड़ रहे हैं. 

ट्रांसयूनियन सिबिल की मुख्य कार्यकारी अधिकारी हर्षाला चंदोरकर कहती हैं, ''सरकारी बैंकों की हिस्सेदारी आने वाले दिनों में बढऩे की उम्मीद है.'' इसकी दो वजहें हैं. पहली, कई सरकारी बैंकों पर से कर्ज न देने की पाबंदी हटना (पीसीए फ्रेमवर्क से बाहर आना) और दूसरा एनबीएफसी क्षेत्र को मिलने वाले फंड में दिक्कत आना. गौरतलब है कि दिसंबर 2018 तक के आंकड़ों के मुताबिक, देश में दिए गए कुल व्यावसायिक कर्ज 111.1 लाख करोड़ रुपए में से एमएसएमई क्षेत्र को कुल 25.2 लाख करोड़ रुपए के कर्ज दिए गए हैं.  

सिडबी बैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, ''स्कीम कोई सरकार ले आए लेकिन कर्ज बैंक को देना होता है.'' बैंक जब तक कर्ज की वसूली पर पूरी तरह संतुष्ट नहीं होगा, कर्ज कैसे दे सकता है? कर्ज डूबने पर प्रदर्शन बैंक का खराब होता है. वसूली की जिम्मेदारी अगर सरकार की हो जाए तो बैंकों को कर्ज देने में कोई समस्या नहीं होगी. लेकिन ऐसा होता नहीं है.

केयर रेटिंग्स (एसएमई) के निदेशक सैकत रॉय कहते हैं, ''छोटे और लघु उद्योगों के लिए पर्याप्त कर्ज की व्यवस्था के लिए सरकार को कर्ज देने के नियमों में बड़े बदलाव करने की जरूरत है.'' वर्तमान में छोटे कारोबारियों को अधिकतर कर्ज किसी संपत्ति को गिरवी रखने पर ही मिलत पाता है. इस व्यवस्था को बदलकर कर्ज लेनदेन आधारित (ट्रांजैक्शन आधारित) होने चाहिए, जैसा कि बड़े उद्योगों के मामले में होता है. मसलन, किसी व्यापारी को कोई ऑर्डर मिला या उसने किसी व्यापारी को माल बेचा तो इस बेचे हुए माल के बिल पर बैंक छोटे कारोबारियों को कर्ज उपलब्ध करवाए और तय तारीख पर देनदार उस राशि को सीधे बैंक में जमा कर दे.

रॉय यह भी कहते हैं, ''अच्छे रिकॉर्ड वाले छोटे कारोबारियों की पहचान के लिए मौजूदा क्रेडिट रेटिंग की जगह क्रेडिट स्कोर लेनी चाहिए, जो किसी कारोबार में नकदी के प्रवाह के आधार पर तैयार होती है.'' अच्छे क्रेडिट स्कोर का आधार पिछले लेनदेन में बरता गया अनुशासन हो. छोटे कारोबारियों के लिए किसी संपत्ति को गिरवी रखे बगैर कर्ज दिए जाने की व्यवस्था बड़ा बदलाव होगी.  

सिकुड़ता बाजार

छोटे उद्योगों की एक बड़ी समस्या सही बाजार तक उनकी पहुंच न होना है. हैंडलूम वस्त्र व्यापार संघ के पूर्व महामंत्री संजीव गुप्ता कहते हैं, ''सरकार कोई आ जाए लेकिन छोटे व्यापारियों के लिए नए बाजार के रास्ते खुलने के बजाए बंद होते जा रहे हैं.'' कहीं सस्ते आयात के कारण तो कहीं नीतियों में खामी से बाजार तक छोटे व्यापारियों की पहुंच कम हो रही है. नोटबंदी के बाद बाजार में नकदी का संकट हुआ और उसके बाद जीएसटी, इन दोनों की वजह से बाजार में मांग घटी. मांग घटने से बाजार में उत्पाद की बिक्री नहीं हुई और हुई भी तो सही दाम नहीं मिले. इस स्थिति में बड़े और मध्यम उद्योग तो बच जाते हैं लेकिन कुटीर उद्योग संकट में फंस जाते हैं. मांग और आपूर्ति का चक्र टूटने से सीमित पूंजी वाले कुटीर उद्योग बंदी के कगार पर आ जाते हैं. यह हाल केवल हैंडलूम का ही नहीं, बल्कि विभिन्न क्षेत्रों से जुड़े कुटीर उद्योगों का है.

गौरतलब है कि सरकारी कंपनियों की ओर से की जाने वाली खरीद में सरकार ने छोटे उद्योगों की हिस्सेदारी 20 से बढ़ाकर 25 फीसद कर दी है. लेकिन बड़ा सवाल यह है कि छोटे व्यापारियों तक पहुंचने का कोई पुख्ता तंत्र या नीति के क्रियान्वयन की व्यवस्थित निगरानी के अभाव में यह संभव कैसे होगा? सरकारी रिकॉर्ड की पूर्ति भले हो जाए लेकिन सही व्यापारियों को इसका लाभ मिला या नहीं इसकी जवाबदेही किसकी है?

नोटबंदी का झटका

''नोटबंदी पैर में फ्रैक्चर की तरह थी. नकदी चली जाने से व्यापार एक दम बैठ गया. धीरे-धीरे बाजार में नकदी वापस आ गई और चीजें पहले जैसी होने लगीं.'' तमिलनाडु लेदर टैनर्स एक्सपोर्टर्स ऐंड इम्पोर्टर्स एसोसिएशन के सचिव पी.एम.आर. शम्सुद्दीन की यह टिप्पणी नोटबंदी के बाद व्यापार के पटरी पर लौटने की कहानी बयान करती है. वे बताते हैं कि नकदी की किल्लत के समय बहुत से छोटे कसाई जो रोजाना चार-पांच जानवरों की खाल देते थे, उनका जीवन मुश्किल हो गया था क्योंकि नकदी न रहने पर मझोले व्यापारी उनको रोजाना भुगतान नहीं कर पा रहे थे. लेकिन नकदी का प्रवाह सामान्य होने से चीजें पटरी पर लौटी हैं.

वहीं भारद्वाज कहते हैं, ''नोटबंदी के असर को सीजन के हिसाब से समझना बेहतर होगा.'' वे उदाहरण देकर समझाते हुए कहते हैं, नवंबर में नोटबंदी के बाद ऊनी कपड़ों से जुड़े छोटे उद्योग प्रभावित हुए. असर छोटे व्यापारियों पर ज्यादा हुआ क्योंकि ब्रांडेड कपड़े या तो आयात होते हैं या बड़ी फैक्ट्रियों में बनते हैं. लेकिन स्थानीय अर्थव्यवस्था जो छोटे व्यापारियों पर टिकी होती है उनके लिए पूरा सीजन बर्बाद हो गया. इसका असर केवल उनके व्यापार तक सीमित नहीं था. यह पूरी शृंखला थी. ऊनी कपड़े नहीं बने तो लोगों को काम नहीं मिला, ट्रकों से माल नहीं गया, व्यावसायिक गतिविधियां प्रभावित हुईं तो लोगों की क्रय क्षमता खत्म हो गई. जिसके कारण सोना, गाड़ी नहीं बिकीं. ऐसे व्यापारी जो एक सीजन से कमाकर दूसरे सीजन की तैयारी करते थे, उनके पास पूंजी नहीं बची. यानी नोटबंदी में जो पिछड़ गए उन्हें संभलने में एक दो सीजन नहीं बल्कि लंबा समय लगेगा.   

जीएसटी का दर्द

जुलाई 2017 में जीएसटी लागू होने के बाद करीब दो वर्ष का समय बीत चुका है. लेकिन अभी भी जीएसटी किसी भी मोर्चे पर पूरी तरह दुरुस्त नजर नहीं आ रहा है. चार्टर्ड एकाउंटेंट गोपाल केडिया कहते हैं, ''जीएसटी का रिफंड अभी भी एक बड़ी समस्या बना हुआ है. कई  व्यावहारिक दिक्कतें हैं जिनका अनुभव यह बताता है कि अभी न तो सिस्टम, न अधिकारी और न ही व्यापारी पूरी तरह जीएसटी को लेकर आश्वस्त नहीं हैं.''

बीते 20 साल से चेन्नै में प्रैक्टिस कर रहे चार्टर्ड एकाउंटेंट रविशंकर कहते हैं, ''जीएसटी के मोर्चे पर छोटे उद्योगों की सबसे बड़ी समस्याएं हैं. पहली, व्यापारी को कच्चे माल पर एक साथ टैक्स भरना होता है. भले वह उसमें से कुछ ही हिस्से का इस्तेमाल आगे उत्पाद बनाने में करे. इससे उसकी परिचालन पूंजी कम होती है. दूसरी बड़ी समस्या बड़ी कंपनियों से मिलने वाले पेमेंट में देरी की है. छोटे व्यापारियों को बिल देने के बाद जीएसटी भरना जरूरी होता है, भले उनका भुगतान देरी से क्यों न मिले.''  

 नीति के साथ नीयत भी जरूरी

एमएसएमई क्षेत्र से जुड़े अलग-अलग उद्योगों की अपनी समस्याएं हैं, जिनका सामधान एक समान नीति बनाकर नहीं किया जा सकता. मसलन, चमड़ा उद्योग को ले लीजिए. शम्सुद्दीन कहते हैं, ''चमड़ा उद्योग से जुड़े लाखों लोगों के हितों का फैसला केवल 20-21 सदस्यों वाली काउंसिल कैसे ले सकती है? छोटे कारोबारियों की कई ऐसी दिक्कतें हैं जो काउंसिल के परिदृश्य से ही बाहर हैं.'' सरकार चाहती है कि छोटे कारोबारियों का भला हो लेकिन अगर काउंसिल में बैठे लोग सरकार को सही बात बताएंगे ही नहीं, तो यह कैसे संभव होगा? काउंसिल में बैठे लोग अपने हितों को देखते हुए नीतियों में बदलाव करवाते हैं, जिससे लाखों छोटे कारोबारी अछूते रह जाते हैं.

वहीं कपड़ा क्षेत्र में त्रिपुर और लुधियाना क्रमश: हॉजरी और गर्म कपड़ों के सबसे बड़े हब हैं. लेकिन दोनों ही क्लस्टर श्रमिकों की कमी से जूझ रहे हैं. त्रिपुर एक्सपोर्ट एसोसिएशन के कार्यकारी सचिव एस. सक्तिवेल कहते हैं, ''उद्योगों के पास ऑर्डर की कमी नहीं है, लेकिन लेबर की कमी यहां हमेशा बनी रहती है.'' प्रधानमंत्री रोजगार प्रोत्साहन योजना के तहत त्रिपुर में 2,14,000 लोगों के पीएफ खाते खोले गए और दो वर्ष के अंदर ही 80,000 से ज्यादा खाते बंद हो गए. ये आंकड़े दर्शाते हैं कि नौकरी छोड़कर जाने वाले श्रमिकों की दर कितनी ऊंची है. कारीगरों के काम छोड़ कर जाने की मुख्य वजह मुक्रत सरकारी सुविधाएं और गांव में मिलने वाले मौसमी रोजगार हैं.

तमिनाडु के अंबातूर इंडस्ट्रियल एस्टेट में ऑटो उपकरण बना रहे एक कारोबारी ने बताया, ''ऑटो उपकरण निर्माता के लिए जीएसटी के ढांचे में बदलाव की जरूरत है.'' उद्योग जो माल खरीदता है, उस पर 18 फीसद जीएसटी लगता है जबकि जैसे ही यह ऑटो उपकरण में बदलता है इस पर 28 फीसदी जीएसटी लग जाता है. कर की गणना करने पर कारोबारियों को परिचालन पूंजी का नुक्सान होता है. लेकिन दिक्कत वही समझ सकता है जो इस क्षेत्र को भलीभांति समझता हो.

बजट में सोने पर2.5 फीसदी सीमा शुल्क बढ़ाए (दस से बढ़ाकर 12.5 फीसद) जाने के कदम को व्यापारी नोटबंदी और जीएसटी की मार झेल रहे रत्न और आभूषण उद्योग के लिए एक और झटका मान रहे हैं. द बुलियन ऐंड जूलर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष योगेश सिंघल कहते हैं, ''इस कदम से चोरी के बाजार को बढ़ावा मिलेगा और अवैध सोने की आपूर्ति बढ़ेगी.'' सोना महंगा होने पर बिक्री में और कमी आएगी और निर्यात को भी चोट पहुंचेगी, जो रोजगार भी घटाएगी.   

वर्ल्ड एसोसिएशन फॉर स्मॉल ऐंड मीडियम एंटरप्राइजेज (वासमे) के कार्यकारी सचिव संजीव लायेक कहते हैं, ''एमएसएमई क्षेत्र के लिए सरकार की ओर से लाई गई स्कीमों का प्रचार ज्यादा है लेकिन जमीन पर काम कम दिखता है.'' इसकी एक बड़ी वजह स्कीमों के प्रति जागरूकता की कमी है. लायेक यह भी कहते हैं, ''जीएसटी को ही ले लीजिए, आप चाहते हैं कि छोटे व्यापारी भी इसके दायरे में आएं लेकिन इसके लिए उस तक सरकार को पहुंचना होगा.'' वह व्यापारी अपना व्यापार छोड़कर जाए यह मुश्किल है. दरअसल, जरूरत हर क्षेत्र के विशेषज्ञों के साथ छोटी-छोटी टीमें बनाकर छोटे व्यापारियों तक पहुंचने की है, जो सरकार के प्रयासों को व्यापारियों तक पहुंचा सकें और उनकी समस्याएं सरकार तक पहुंच सकें.    

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