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सबको स्वास्थ्य पर ठिठके मोदी सरकार के कदम

बीजेपी ने सबको स्वास्थ्य का वादा तो कर दिया लेकिन मोदी सरकार ने स्वास्थ्य बजट में 20 फीसदी की कटौती कर आम आदमी को चिकित्सा सुविधा के सपने पर कर दी गहरी चोट.

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aajtak.in
संतोष कुमार 14 April 2015
सबको स्वास्थ्य पर ठिठके मोदी सरकार के कदम दिल्ली एम्स में मरीजों का हुजूम देश भर से उमड़ता है

बरेली (उ.प्र.) निवासी मोहित बिष्ट का जब 2006 में देश के प्रतिष्ठित अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) में इलाज शुरू हुआ तो उसकी उम्र महज 13 साल थी. हीमोफोलिया फैक्टर डी-10 का शिकार मोहित अब 22 साल का है, लेकिन इलाज के लिए देश की राजधानी से लेकर सुदूर दक्षिण में तमिलनाडु के वेल्लूर तक का फासला तय करने के बावजूद उसका इलाज नहीं हो पाया. इसमें एक हद तक दोषी प्रशासनिक तंत्र का मकडज़ाल भी है जिसने मदद देने में इतनी देर लगा दी कि रोग असाध्य हो गया. यह वाकया बीजेपी और मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी 'सबको स्वास्थ्य सुविधा' योजना के लिए आंखें खोलने वाला है.

मोहित के पिता की आंखें कमजोर हैं और घर के इस इकलौते युवा को तीन बहनों का सहारा है, जो ससुराल संभालने के साथ-साथ भाई की जिंदगी के लिए दर-दर भटक रही हैं. शुरू में एम्स ने उसके इलाज पर 19 लाख रु. खर्च का आकलन दिया था, लेकिन प्रधानमंत्री राहत कोष से तब सिर्फ 50,000 रु. की ही मदद मिली. लिहाजा, बहनों ने स्वास्थ्य मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय आरोग्य निधि में आवेदन किया. यहां भी गरीबी रेखा के नीचे वाला बीपीएल कार्ड होने के बावजूद कभी आय प्रमाण पत्र के लिए दौड़ाया गया तो कभी नया बीपीएल कार्ड लाने को कहा गया. आखिर में पता चला कि प्रधानमंत्री राहत कोष से मंजूर पैसा जब तक वापस नहीं दिया जाएगा, नया अनुदान नहीं मिल सकता. कागजी खानापूर्ति के झंझावातों से गुजरते हुए बहनों ने आरोग्य निधि से 19 लाख रु. मंजूर करा तो लिए, लेकिन मोहित की बड़ी बहन आशा बिष्ट के मुताबिक, "इन सभी प्रक्रियाओं में इतना लंबा समय बीत चुका था कि एम्स प्रशासन ने मोहित को भर्ती करने के बावजूद 90 फीसदी जोखिम बताकर इलाज से इनकार कर दिया और उसे लखनऊ के पीजीआइ में जनवरी 2015 से भर्ती करा रखा है. अब उसे वेल्लूर ले जाने को सोचा जा रहा है, जहां के डॉक्टरों ने 7 लाख रु. का खर्च बताया है. इसमें केंद्रीय कपड़ा मंत्री संतोष गंगवार की सिफारिश पर प्रधानमंत्री राहत कोष से तीन लाख रु. मंजूर हो चुके हैं और बाकी के इंतजाम में हमलोग लगे हैं, लेकिन कहीं से इतनी बड़ी रकम जुटने की उम्मीद नहीं दिख रही." प्रशासनिक बेरुखी का ही नतीजा है कि मोहित को हीमोफीलिया के बाद अब किडनी की डायलिसिस भी करानी पड़ रही है.

यह देश के स्वास्थ्य तंत्र को झकझोर देने वाली ऐसी कहानी है जिसकी हर परत देश के आम नागरिक को सबको स्वास्थ्य सुविधा (यूएचसी) मुहैया कराने के चुनावी वादों की धज्जियां उड़ाती है. पूर्व यूपीए सरकार हो या मौजूदा एनडीए की सरकार, स्वास्थ्य की मद में खजाना उस तरह नहीं खुलता, जैसे चुनाव में जबान खुलती है. मोदी सरकार ने इस साल स्वास्थ्य बजट में 20 फीसदी की कटौती कर दी है तो यूपीए के समय जब योजना आयोग ने सबको स्वास्थ्य सुविधा पर विशेषज्ञों की रिपोर्ट स्वास्थ्य मंत्रालय को सौंपी तो तत्कालीन मंत्री गुलाम नबी आजाद और योजना आयोग के बीच अहं का टकराव सामने आ गया.

क्या है यूनिवर्सल हेल्थ केयर
देश के हर नागरिक को प्राथमिक के साथ दूसरे और तीसरे स्तर की सभी जरूरी स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराना ही यूएचसी का मकसद है. इसके तहत सबको सहज, सुलभ और गुणवत्तापूर्ण स्वास्थ्य सुविधा मुहैया कराना है. इस मामले में भारत सरकार अंतरराष्ट्रीय प्रतिबद्धता से बंधी हुई है. 2012 में जेनेवा में आयोजित 65वीं विश्व स्वास्थ्य सभा में भारत की ओर से प्रतिबद्धता जताई गई थी कि "हर नागरिक को आवश्यक स्वास्थ्य सुविधा हासिल करने का हक है और देश की सरकार को इसका बंदोबस्त करना चाहिए." लेकिन सवाल है कि सरकार इस दिशा में कब कदम उठाएगी? यह अवधारणा दुनिया में नई नहीं है. इसकी शुरुआत 19वीं सदी में जर्मनी में हुई थी, जहां मजदूर अपने जीवन स्तर में सुधार के लिए आंदोलन कर रहे थे. तब जर्मनी के चांसलर बिस्मार्क ने दोहरी रणनीति अपनाई. युवाओं के स्वास्थ्य को प्राथमिकता दी, ताकि एक तो इससे अर्थव्यवस्था की उत्पादकता बढ़े और दूसरे, औपनिवेशिक इच्छाओं को पूरा करने के लिए मजबूत सैन्य बल मिले. इस नीति के साथ बिस्मार्क ने श्रम मंत्रालय के जरिए सरकारी वित्त पोषित स्कीम शुरू की जिससे श्रमिकों को संतुष्ट कर लिया गया. इसी तरह 1948 में ब्रिटेन ने जब नेशनल हेल्थ सर्विस की शुरुआत की तब निजी क्षेत्र वहां हावी था. लेकिन क्लीमेंट एटली की सरकार में स्वास्थ्य मंत्री एन्यूरिन बेवन ने सरकार और निजी क्षेत्र को साथ लाकर इस स्कीम की शुरुआत की. दरअसल ब्रिटेन का मकसद था कि बीमारी के डर से लोगों में परिवार के भविष्य को लेकर जो असुरक्षा का भाव रहता है, हेल्थ स्कीम से दूर हो जाएगा. इस योजना के लागू होने के बाद बेवन ने टिप्पणी की थी, "अब ब्रिटेन का हर नागरिक चैन की नींद सो पाएगा." उसके बाद पश्चिमी यूरोप और समाजवादी विचारधारा वाले देशों ने भी इसे अपना लिया. हालांकि इंडिया टुडे से बातचीत में केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा किसी अन्य देश से तुलना को देश की जनसंख्या और परिस्थिति के आधार पर गलत ठहराते हैं.

देश में स्वास्थ्य का हालअस्पताल के बेड से बनते बीपीएल
लेकिन भारत की तस्वीर इसके उलट है. राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति-2015 के मसौदे में केंद्र सरकार ने खुद कबूला है कि अपनी संपत्तियों को बेचकर बीमारी का इलाज कराने की वजह से सालाना 6.3 करोड़ लोग गरीबी रेखा के नीचे चले जाते हैं. एक अन्य रिपोर्ट के मुताबिक, हर पांच में से एक भारतीय इलाज का खर्च ज्यादा होने की वजह से स्वास्थ्य सुविधा से वंचित रह जाता है. यूएचसी पर 2010 में गठित उच्चस्तरीय विशेषज्ञ समूह के चेयरमैन रहे तथा पद्ब्रिलक हेल्थ फाउंडेशन ऑफ इंडिया के अध्यक्ष प्रोफेसर के. श्रीनाथ रेड्डी कहते हैं, "जब मैं 16 साल की उम्र में मेडिकल का छात्र बना तो अमीर-गरीब सभी सरकारी अस्पताल में ही इलाज के लिए आते थे और दवाइयां अस्पतालों में ही मिल जाती थीं. लेकिन आबादी बढ़ी तो सरकारों ने उसके हिसाब से स्वास्थ्य सुविधाओं के विस्तार पर फोकस नहीं किया और आज स्थिति यह है कि लोगों को स्वास्थ्य सुविधा के लिए 70 फीसदी खर्च अपनी जेब से करना पड़ रहा है." जेब से खर्च करने वाले देशों की सूची में देखें तो 190 देशों में भारत का स्थान 172वां है तो प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य पर खर्च करने वाले 191 देशों की सूची में भारत का स्थान 180वां है. निश्चित तौर पर भारत जैसे देश के लिए यह चिंता की बात है, जहां 65 फीसदी आबादी युवा है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी युवाओं के दम पर दुनिया भर में भारतीय अर्थव्यवस्था का परचम लहराना चाहते हैं. लेकिन यह भी सच है कि अगर युवा स्वस्थ नहीं होगा तो वह देश पर ही भारी पड़ेगा.

रिवर्स गियर में स्वास्थ्य की गाड़ी

1980 के दशक में जब निजी क्षेत्र तेजी से भारत के स्वास्थ्य क्षेत्र में निवेश करने लगा, तब भी स्वास्थ्य पर राज्यों की ओर से खर्च का शेयर 90 फीसदी था. लेकिन बाद में यह हिस्सेदारी घटने लगी और अब यह 60-65 फीसदी पर आ चुकी है. अब मोदी सरकार ने 14वें वित्त आयोग की सिफारिश को मंजूर कर राजस्व में राज्यों की हिस्सेदारी 32 फीसदी से बढ़ाकर 42 फीसदी कर दी है. राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन के मिशन डायरेक्टर सी.के. मिश्र कहते हैं, "इस मिशन में 18,000 करोड़ रु. की राशि आवंटित है, इससे मिशन की प्रमुख परियोजनाएं राज्य सरकार के साथ मिलकर पूरी तरह लागू की जा सकेंगी. इसमें मातृत्व-शिशु से संबंधित योजना, संक्रामक-गैर-संक्रामक बीमारियों के साथ स्वास्थ्य ढांचे में सुधार की जो नई परिकल्पनाएं हैं, उसमें अपेक्षा है कि राज्य सरकारें अपनी ओर से अधिक राशि लगाएंगी." मंत्रालय का साफ संकेत है कि अब केंद्र अपनी योजनाओं पर दबाव कम करके राज्यों पर भार डालने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है.

मंत्रालय ने यूएचसी को लेकर नौ राज्यों में पायलट प्रोजेक्ट चल रखे हैं और इसमें राज्यों को अपना मॉडल बनाकर काम करने को कहा गया है. लेकिन सवाल यह है कि अगर राज्यों पर छोड़ दिया गया तो एक राज्य में पंजीकृत व्यक्ति दूसरे राज्य में जाकर बीमार हुआ तो क्या होगा? नड्डा इसे ध्यान में रखने की बात कर रहे हैं और सबका साथ, सबका विकास के नारे के मुताबिक सबको स्वास्थ्य सुविधा की बात कर रहे हैं. लेकिन इसमें संशय है क्योंकि वित्त मंत्रालय ने जब बजट कटौती की तो स्वास्थ्य विभाग ने देश भर में मुफ्त दवाई-जांच के लिए अतिरिक्त 65,000 करोड़ रु. की मांग की. लेकिन वित्त मंत्रालय नहीं माना. साफ है कि स्वास्थ्य फिलहाल मोदी सरकार की प्राथमिकताओं में नहीं है.

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