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सूत्रधार और रणनीतिकार- चुनावी रणनीति के माहिर खिलाड़ी और कर्णधार

निर्णायक, लक्ष्य पर नजर गड़ाए और विरोधियों को साधने का कौशल, ये हर चुनावी दांव-पेच में महारत रखते हैं. जानिए राजनैतिक दलों के सूत्रधारों और कर्णधारों के बारे में...

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aajtak.in
संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर 07 March 2019
सूत्रधार और रणनीतिकार- चुनावी रणनीति के माहिर खिलाड़ी और कर्णधार इलेस्ट्रेशन-सिद्धांत जुमड़े

दिसंबर 2016 की एक सुबह, समाजवादी पार्टी (सपा) की सांसद और उत्तर प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की पत्नी, डिंपल यादव को रायबरेली से कांग्रेस विधायक अदिति सिंह का फोन आया. अदिति ने अपनी दोस्त डिंपल से अनुरोध किया—प्रियंका गांधी वाड्रा आपसे मिलना चाहती हैं. डिंपल ने खुशी-खुशी प्रियंका को न केवल अखिलेश बल्कि सपा संरक्षक मुलायम सिंह यादव से भी मिलवाया. एक महीने बाद सपा और कांग्रेस ने 2017 के विधानसभा चुनाव के लिए अपने गठबंधन की घोषणा की—एक ऐसा सौदा जो मुख्य रूप से प्रियंका और डिंपल के प्रयासों से आकार ले सका.

अब आपको 2019 के लोकसभा चुनावों की ओर लिए चलते हैं.

हालांकि कांग्रेस की अनदेखी करते हुए सपा ने बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के साथ आधिकारिक तौर पर गठबंधन कर लिया है फिर भी डिंपल और प्रियंका, जो अब पूर्वी यूपी की प्रभारी कांग्रेस महासचिव हैं, इस महीने की शुरुआत में लखनऊ में फिर से मिलीं. दोनों अपने-अपने दलों को संभावित चुनावी नुक्सान कम से कम करने के लिए एक दूसरे के साथ रणनीतिक तैयारी और आपसी समझौते पर काम कर रही हैं.

हालांकि लोकसभा चुनावों में महज चंद हफ्तों का समय ही बाकी है, भारतीय राजनीति के इन सूत्रधारों और कर्णधारों के पास सांस लेने की भी फुर्सत नहीं है. उन्हें रणनीति बनाने के लिए ओवरटाइम काम करना पड़ रहा है, जनता का मिजाज भांपना है, उनके केंद्रीय नेतृत्व को महत्वपूर्ण डेटा व सूचनाएं भेजनी हैं और 'करो या मरो' जैसी सीटों के लिए लड़ाई को धार देनी है. वे अपनी-अपनी पार्टियों या धुर समर्थकों या खामोशी के साथ नेपथ्य में रहकर काम करने वाली चुनावी फौज के बीच सबसे अधिक खोजे जाने वाले चेहरे हो सकते हैं. लेकिन उन सभी में कुछ समानताएं भी हैं. वे सभी बड़ी बाधाओं के बीच रास्ते बनाते हुए हर दल के साथ संबंध साधने की कुव्वत रखने वाले, कड़ी सौदेबाजी के बीच आगे बढ़कर प्रयास करते हुए अपने दल के लिए भी फायदे के मौके बनाने का माद्दा रखने वाले और लक्ष्य को पूरा करने के लिए पारंपरिक रास्ते को छोड़कर कोई नया रास्ता अपनाने का साहस दिखाने वाले लोग हैं.

केंद्रीय मानव संसाधन विकास मंत्री प्रकाश जावेडकर भाजपा के लिए एक ऐसे ही भरोसेमंद सेनापति हैं.

हालांकि शिवसेना और भाजपा के बीच तालमेल की घोषणा के दौरान मुख्य चेहरों के तौर पर पार्टी अध्यक्ष अमित शाह, महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडऩवीस और शिवसेना प्रमुख उद्धव ठाकरे ही सामने नजर आए हैं, लेकिन वे जावडेकर ही थे जिन्होंने परदे के पीछे से सारा काम किया और गठबंधन को अंजाम तक पहुंचाया.

उन्हें शिवसेना के साथ भाजपा का वार्ताकार नियुक्त किया गया क्योंकि उनके पास दिवंगत भाजपा नेता प्रमोद महाजन के दाहिने हाथ के रूप में कार्य के अपने दिनों से ही शिवसेना नेताओं से बातचीत का पुराना अनुभव था.

जावडेकर ने फडऩवीस के वार्ता में शामिल होने से तीन महीने पहले, ठाकरे और महाराष्ट्र में शिवसेना के एक वरिष्ठ मंत्री सुभाष देसाई के साथ पांच बैठकें कीं. मीडिया की निगाह से बचने के लिए जावडेकर एक निजी वाहन से ठाकरे के मुंबई स्थित घर मातोश्री गए.

ठाकरे की एक मुख्य शिकायत यह थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमित शाह तक उनकी पहुंच आसान नहीं रह गई है.

शिवसेना नेतृत्व ने स्पष्ट कर दिया था कि वह गठबंधन की बात भाजपा के राज्य नेतृत्व के साथ नहीं करेगा तो फडऩवीस ने पिछले साल जून में शाह को इस बात के लिए मनाया कि वे ठाकरे से उनके मुंबई स्थित घर पर जाकर मिलें.

शाह को समझ में आ गया कि ठाकरे 48 वर्षीय फडऩवीस के साथ बातचीत की बजाए भाजपा के किसी वरिष्ठ नेता के साथ ही बातचीत जारी रख सकते हैं तो उन्होंने जावडेकर को काम पर लगाया. भाजपा के एक नेता कहते हैं, ''जावडेकर खुद को बहुत लो प्रोफाइल रखते हैं. शिवसेना के नेताओं के साथ उनका पुराना मेल-जोल रहा है. साथ ही, वे सहज स्वभाव के व्यक्ति हैं जो दूसरे की बात भी सुनते-समझते हैं. यह सब काम आया.''

हालांकि, जावडेकर की बड़ी चुनौती कर्नाटक में भाजपा की बढ़त को अधिकतम करना है, जहां पार्टी पिछले साल सबसे बड़े दल के रूप में उभरने के बावजूद सरकार बनाने में विफल रही. भाजपा कतई नहीं चाहेगी कि कर्नाटक में कांग्रेस और जनता दल (सेकुलर) के बीच चुनाव पूर्व गठबंधन हो, क्योंकि इससे भाजपा को नुक्सान हो सकता है. भाजपा ने 2014 के लोकसभा चुनावों की प्रदेश में 17 सीटें जीती थीं. कर्नाटक में पार्टी के चुनाव प्रभारी के रूप में जावडेकर की चुनौती जद (एस) के संरक्षक एच.डी. देवेगौड़ा और मुख्यमंत्री  एच.डी. कुमारस्वामी का भरोसा जीतने की होगी.

हालांकि भाजपा ने दक्षिण में कुछ अदृश्य सेंध भी लगाई है. पार्टी के राष्ट्रीय सचिव राम माधव ने आंध्र प्रदेश में वाइएसआर कांग्रेस (वाइएसआरसी) प्रमुख जगनमोहन रेड्डी और तेलंगाना में तेलंगाना राष्ट्र समिति (टीआरएस) प्रमुख के. चंद्रशेखर राव से संवाद के चैनल खोले हैं. भाजपा दोनों राज्यों में छोटी खिलाड़ी है. रेड्डी और राव ने स्पष्ट रूप से किसी भी चुनाव पूर्व गठबंधन के लिए मना नहीं किया है लेकिन ऐसा माना जाता है कि भाजपा को लोकसभा चुनाव के बाद बहुमत से पीछे रह जाने पर दोनों दलों से उनके समर्थन का आश्वासन लगभग मिल गया है.

कुछ परिस्थितिजन्य घटनाक्रमों ने भाजपा की मदद की. चुनावी रणनीतिकार प्रशांत किशोर, जिन्होंने 2014 में मोदी की लोकसभा चुनाव की रणनीति में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी और बाद में अलग हो गए और फिर जनता दल (यूनाइटेड) में शामिल होकर एक तरह से उसके नंबर-2 बन गए, की भी भूमिका रही है. किशोर का संगठन इंडियन पॉलिटिकल ऐक्शन कमेटी या आइ-पैक ही पिछले तीन वर्षों से वाइएसआरसी की चुनावी रणनीति तैयार कर रहा है और हाल ही में शिवसेना ने भी उसे ही चुना था.

यह माना जाता है कि 5 फरवरी को ठाकरे के साथ किशोर की बैठक ने भाजपा-शिवसेना गठबंधन में भी बड़ी भूमिका निभाई थी. ठाकरे के बेटे आदित्य ने मुलाकात करवाई और किशोर ने पिता-पुत्र की जोड़ी को समझाया कि कैसे दोनों दलों के बीच गठबंधन का गणित फायदेमंद रहेगा.

तमिलनाडु में अखिल भारतीय अन्ना द्रविड़ मुनेत्र कडग़म (अन्नाद्रमुक) को चुनाव पूर्व गठबंधन के लिए भाजपा की झोली में लाने वाले रेल मंत्री पीयूष गोयल हैं. राज्य में पार्टी के चुनाव प्रभारी के रूप में गोयल के सामने शुरुआत में कई बड़ी बाधाएं आईं. अन्नाद्रमुक नेताओं के साथ उनका कोई पुराना समीकरण नहीं था. भाषा भी एक बड़ी बाधा थी.

केंद्रीय वित्त राज्यमंत्री पोन राधाकृष्णन ने भाषाई अवरोध को दूर करने में गोयल की मदद की. दोनों ने मिलकर तमिलनाडु के मुख्यमंत्री  ई.के. पलानीस्वामी और उनके डिप्टी ओ. पन्नीरसेल्वम को समझाया कि 2021 में तमिलनाडु की सत्ता में अन्नाद्रमुक की वापसी के लिए आवश्यक चुनाव-पूर्व लोक-लुभावन घोषणाओं के लिए केंद्र सरकार बजटीय आवंटन के जरिए पूरा सहयोग करेगी.

सके अलावा, उन्होंने यह भी समझाया कि कांग्रेस-द्रमुक द्रविड़ मुनेत्र कडग़म (द्रमुक) गठबंधन मजबूत हो गया है और अगर केंद्र में कांग्रेस के नेतृत्व वाली सरकार बनती है तो उसमें अन्नाद्रमुक के लिए कोई जगह नहीं होगी. गोयल ने महागठबंधन में पट्टाली मक्कल काची (पीएमके) और देसिया मुरपोक्कु द्रविड़ कझगम (डीएमडीके) को भी शामिल कराके इस सौदे को और दमदार बना दिया है. इन दोनों दलों के आने से उत्तरी तमिलनाडु और पश्चिमी व दक्षिणी जिलों के कुछ हिस्सों में गठबंधन की संभावनाओं को और मजबूती मिलने की उम्मीद है.

हालांकि सबसे महत्वपूर्ण राज्य यूपी (80 लोकसभा सीटें) और पश्चिम बंगाल (42 सीटें) में भाजपा के सामने कई चिंताएं हैं. यूपी में सपा-बसपा गठबंधन, पिछड़ी जातियों और दलित वोट के साथ और कांग्रेस के उच्च जाति के मतदाताओं को अपनी ओर आकर्षित करने के कारण भाजपा को 2014 के मुकाबले इस बार भारी नुक्सान की आशंका है. 2014 में भाजपा ने 71 सीटें जीती थीं. यहां पार्टी के प्रमुख व्यक्ति संगठन सचिव सुनील बंसल हैं, जो जिताऊ उम्मीदवारों के चयन के लिए प्रत्येक निर्वाचन क्षेत्र की मैपिंग में व्यस्त हैं. पिछले दरवाजे की बातचीत भी जारी है. केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली बसपा में दूसरे नंबर की हैसियत रखने वाले सतीश मिश्र के साथ संपर्क में बने हुए हैं. इस बात की कोशिशें चल रही हैं कि मिश्रा मायावती को गठबंधन से बाहर आने को राजी कर लें. कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि मायावती को अपने खिलाफ 'सीबीआइ जांच के खतरे' का डर था जिसके कारण उन्होंने सपा-बसपा गठबंधन में कांग्रेस को शामिल किए जाने का विरोध किया.

पश्चिम बंगाल में भाजपा को दो मोर्चों तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) और कांग्रेस-माकपा गठबंधन से चुनौतियां हैं. शाह ने प्रदेश से 23 लोकसभा सीटों का लक्ष्य रखा है जबकि आंतरिक सर्वेक्षण में भाजपा के लिए ज्यादा से ज्यादा 8-15 सीटों के संकेत मिले हैं. मोदी और शाह के नेतृत्व में एक जोरदार अभियान चलाने के अलावा, भाजपा प्रतिद्वंद्वी दलों के मजबूत उम्मीदवारों को साधने की कोशिश कर रही है. ममता बनर्जी के पूर्व भरोसेमंद सिपहसालार मुकुल रॉय पश्चिम बंगाल में भाजपा के गेम प्लान के एक प्रमुख खिलाड़ी के रूप में उभरे हैं तो केंद्रीय पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद प्रधान ने टीएमसी सांसद सौमित्र खान को जनवरी में टीएमसी से झपटकर भाजपा में शामिल करा लिया.

कांग्रेस में अहमद पटेल सचमुच रणनीतियां बनाने में अपनी रात काली कर रहे हैं. कांग्रेस के कोषाध्यक्ष देर रात तक या तो फोन पर अपने काम में जुटे रहते हैं या फिर पार्टी के नेताओं के साथ नई दिल्ली के अपने आवास 23, विलिंगडन क्रीसेंट रोड पर बैठकें करते हैं. कई विपक्षी नेताओं के लिए कांग्रेस में संपर्क के पसंदीदा बिंदु पटेल ही हैं. पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की भले ही सोनिया गांधी तक सीधी पहुंच हो, पर वे नियमित रूप से पटेल के संपर्क में रहती हैं. कांग्रेस अध्यक्ष राहुल गांधी के साथ बेहतर समीकरण के बावजूद आंध्र प्रदेश के मुख्मंत्री एन. चंद्रबाबू नायडू पटेल के साथ अधिक सहज हैं.

हालांकि गांधी परिवार के अनुभवी वफादार पटेल को दो संभावित सहयोगियों से निराशा हाथ लगी है. मायावती के साथ बढिय़ा तालमेल बनाए रखने के बावजूद वे हालिया चुनावों में उन्हें कांग्रेस के साथ मिलकर लडऩे के लिए राजी करने में विफल रहे हैं. दिसंबर के विधानसभा चुनाव में मायावती ने राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में पार्टी के साथ तालमेल से इनकार कर दिया था. लोकसभा चुनावों के लिए उत्तर प्रदेश में सपा के साथ गठबंधन से भी मायावती ने कांग्रेस को बाहर ही रखा है. मायावती का मानना है कि कांग्रेस के वोट बसपा को ट्रांसफर नहीं होते.

पटेल को दूसरी नाकामी मेघालय में मिली जहां वे भाजपा की सहयोगी पार्टी नेशनल पीपल्स पार्टी (एनपीपी) को नहीं मना सके थे. जब मेघालय के मुख्यमंत्री और एनपीपी प्रमुख कॉनराड संगमा ने अफगानिस्तान, बांग्लादेश और पाकिस्तान से आए गैर-मुस्लिम अवैध प्रवासियों को नागरिकता प्रदान करने के प्रावधान वाले नागरिकता संशोधन विधेयक, 2016 को पारित करने के केंद्र के प्रयासों का मुखर विरोध किया, तो पटेल उनके पास पहुंचे. कॉनराड के पिता और पूर्व कांग्रेसी नेता पी.ए. संगमा, पटेल के करीबी थे और उनकी बहन अगाथा संगमा यूपीए सरकार का हिस्सा थीं. फिर भी, कॉनराड ने कांग्रेस के साथ लोकसभा चुनाव पूर्व गठबंधन से इनकार कर दिया.

कॉनराड के इस इनकार के पीछे बड़ा कारण, पूर्वोत्तर के लगभग सभी गैर-कांग्रेसी दलों पर असम के वित्त मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा की मजबूत पकड़ को माना जाता है. पटेल के पूर्व वफादार सरमा ने 2015 में कांग्रेस का हाथ छोड़ा और भाजपा में शामिल हो गए. उत्तर-पूर्व के आठ प्रमुख राज्यों में से छह पर भाजपा का दबदबा कायम होने के पीछे उनकी ही प्रमुख भूमिका मानी जाती है. सरमा के लिए इस क्षेत्र के सभी दलों के नेता बस फोन कॉल की दूरी पर हैं. अगर अरुणाचल प्रदेश में कांग्रेस के टेकाम संजॉय सरमा के करीबी दोस्त हैं, तो नागालैंड के मुख्यमंत्री  नीफिउ रियो और रियो के पूर्ववर्ती व प्रतिद्वंद्वी टी.आर. जेलियांग के साथ भी सरमा की गहरी छनती है. भाजपा ने सरमा को पूर्वोत्तर की 25 सीटों में से कम-से-कम 15 सीटें जीतने की जिम्मेदारी सौंपी है.

इन्हीं 25 सीटों की वजह से पटेल, ममता की सलाह पर मार्च में गुवाहाटी में विपक्षी दलों की रैली करने का मंसूबा बना रहे हैं ताकि इस इलाके के संभावित सहयोगी दलों को आकर्षित किया जा सके. एक बड़े कांग्रेसी नेता कहते हैं, ''ममता बनर्जी मानती हैं कि विपक्षी पार्टियों को देश के तमाम हिस्सों में ऐसी रैलियां करनी चाहिए ताकि न सिर्फ माहौल बनाया जा सके बल्कि पसोपेश में पड़ी पार्टियों में भरोसा पैदा किया जा सके.'' पटेल के अलावा इस माथापच्ची के साथ जुड़े कांग्रेस के दूसरे नेता हैं के. राजू, अशोक गहलोत, रणदीप सिंह सुरजेवाला और के.सी. वेणुगोपाल. आंध्र प्रदेश के पूर्व नौकरशाह और अभी राहुल गांधी के दफ्तर के प्रभारी राजू अपने को चकाचैंध से दूर रखते हैं, बावजूद इसके कि वे राहुल को मुद्दों पर अहम जानकारियां मुहैया करवाते हैं. उनकी भूमिका को अक्सर सोनिया गांधी के राजनैतिक सचिव के तौर पर अहमद पटेल की भूमिका की तरह माना जाता है. मगर राजू अपना काम ज्यादा औपचारिक और पारदर्शी तरीके से और पटेल के साथ तालमेल बिठाकर करते हैं. कांग्रेस के एक महासचिव कहते हैं, ''राजू-पटेल के समीकरण ने कांग्रेस में पुराने बनाम नए की चर्चा पर तकरीबन लगाम लगा दी है.''

पटेल के करीबी विश्वासपात्र अशोक गहलोत राहुल के मुख्य राजनैतिक सलाहकार के तौर पर उभरे हैं. गहलोत के रसूख में तब इजाफा हुआ जब गुजरात के प्रभारी महासचिव के तौर पर उन्होंने मोदी और शाह के घरेलू मैदान में भाजपा को तगड़ी टक्कर देने में कांग्रेस की मदद की. कर्नाटक में, जहां भाजपा सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी थी, गहलोत ने सत्ता छोडऩे वाले मुख्यमंत्री सिद्धरामैया को मुख्यमंत्री  का ओहदा जूनियर पार्टनर जद (एस) को देने की कांग्रेस की पेशकश के लिए राजी करने में अहम भूमिका अदा की थी. साथ ही, कर्नाटक में पटेल के शिष्य डी.के. शिवकुमार ने यह पक्का किया कि कांग्रेस के विधायकों में भाजपा सेंध नहीं लगा पाए. शिवकुमार को उन विधायकों पर नजर रखने का काम सौंपा गया था जो असंतुष्ट थे और भाजपा जिन्हें रिझा रही थी. उन्होंने पिछले साल संसदीय उपचुनावों में भी कर्नाटक में अहम भूमिका अदा की थी और बेल्लारी सीट 14 साल बाद भाजपा के शिकंजे से छुड़ा ली थी. उन्होंने रामनगर विधानसभा सीट के उपचुनाव में, जिसमें दोनों पार्टियों के बीच चुनाव पूर्व गठबंधन था, कांग्रेस के वोट जद (एस) के उम्मीदवार को मिलना भी पक्का किया था. शिवकुमार को लोकसभा के मुकाबले के लिए भी कांग्रेस-जद (एस) के बीच गठबंधन कायम कर पाने का भरोसा है. उन्होंने इंडिया टुडे से कहा, ''यह गठबंधन कामयाब होगा और हम कम से कम 20-22 सीटें जीतेंगे.''

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