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गोरेपन की सनक: खूबसूरती पागलपन बन गई

एक ओर भारत आधुनिक भी हो रहा है और दूसरी ओर गोरे रंग के प्रति हमारी सनक भी पैर पसारे बैठी हुई है. बॉलीवुड के सितारों से लेकर सांसद तक सब गोरेपन की सनक और दीवानगी के शिकार हैं.

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aajtak.in
सुहानी सिंह और ज्योति मल्होत्रा 13 April 2015
गोरेपन की सनक: खूबसूरती पागलपन बन गई

यह कहना क्या सही होगा कि बीजेपी के सांसद और केंद्रीय सूक्ष्म, लघु और मझोले उद्योग राज्य मंत्री गिरिराज सिंह शाहरुख खान से काफी प्रभावित हैं? नर्सों को धूप में बाहर न निकलने का सुझाव देने वाले गोवा के मुख्यमंत्री लक्ष्मीकांत पारसेकर का यह आत्मविश्वास ऐश्वर्य राय, दीपिका पादुकोण और कटरीना कैफ की गोरी चमड़ी से प्रेरित है? इसी बीच यह भी होता है कि पुराने लोहियावादी और जनता दल (यू) के शरद यादव भी कालिदास की काव्य विवेचना पर उतर आते हैं और उसमें भी खासतौर पर ''सांवली'' पर उनका खासा जोर होता है. इतना ही नहीं, राज्यसभा के सदन में बैठकर वे अपने हाथों से स्त्री देह के आकार का इशारा भी कर डालते हैं.

सवाल यह है कि ''लड़के तो लड़के ही रहेंगे'' जैसी बातों का ढोल पीटने वाले ही बड़े होकर बदजुबान मर्द नेता बन जाते हैं. निश्चित तौर पर गिरिराज सिंह, पारसेकर, शरद यादव, कांग्रेस के दिग्विजय सिंह और समाजवादी पार्टी के मुलायम सिंह यादव से लेकर गोवा के नेता दीपक धवलीकर तक को महिलाओं और गोरी चमड़ी के बारे में उनकी टिप्पणियों के कारण नस्लवादी से लेकर मर्दवादी तक तमाम विशेषणों से नवाजा गया है.

बहुत-से लोग यह तर्क देंगे कि सभी राजनैतिक धाराओं में सफेद रंग को लेकर जो सनक दिखाई देती है, जिसे गिरिराज सिंह बड़े आलंकारिक अंदाज में ''गोरी चमड़ी'' कहते हैं, वह दरअसल बॉलीवुड का फैलाया गोरेपन का जाल ही है. बॉलीवुड उनके सुर-में-सुर मिला रहा है. हिंदी फिल्म उद्योग के लगभग सभी बड़े सितारे बड़े आत्मविश्वास के साथ चमड़ी को गोरा बनाने वाली क्रीम बेच रहे हैं.

सिर्फ अमिताभ बच्चन और आमिर खान को छोड़कर, जिन्होंने इस हद तक जाने से इनकार कर दिया, हिंदी फिल्मी दुनिया के सभी बड़े सितारों का इस बात में यकीन है कि ''यह कोई बड़ी बात नहीं.''

शाहरुख खान या शाहिद कपूर, प्रियंका चोपड़ा या प्रिटी जिंटा, जूही चावला या जॉन अब्राहम और यहां तक कि आत्मविश्वास से भरे हुए विराट कोहली और अनुष्का शर्मा समेत बॉलीवुड के सभी नामचीन सितारे बिना थके-रुके लगातार ''गोरी चमड़ी'' सिंड्रोम का प्रचार करते रहते हैं. जैसा कि अफ्रीकी-अमेरिकी फ्रैंक हैरिस ने कनेक्टिकट (अमेरिका का एक राज्य) के अखबार हार्टफोर्ड कुरेंट्स में 14 नवंबर, 2014 के संस्करण में लिखा था कि भारतीय विज्ञापन उन्हें पुराने दिनों की याद दिलाते हैं. बहुत पहले, जब मिसीसिपी में उनके दादा, जिनकी त्वचा बहुत काली हुआ करती थी, उनके पिता को त्वचा गोरी बनाने वाली क्रीम खरीदने के लिए दुकान भेजते थे. हैरिस को आज फिर हिंदुस्तान आने की जरूरत है. उन्हें यहां आकर देखना चाहिए कि हम आज भी अफ्रीकियों के प्रति किस कदर नस्लभेदी हैं और ये कोई दबी-छिपी बात भी नहीं है. आज भी ब्राह्मण श्रेष्ठतावाद से ग्रस्त अधिकांश भारतीय और उसमें भी खासतौर पर उत्तर भारतीय उन लोगों को सख्त नापसंद करते हैं, जो उनके जैसे दिखते और व्यवहार नहीं करते. 

अखबारों में छप रहे ''गेंहुए रंग वाली छरहरी'' दुलहन की शादी के विज्ञापन बहुत थोड़े और मामूली हैं. दिल्ली यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर और इतिहासकार चारु गुप्ता ने स्त्री और यौनिकता पर काफी काम किया है. वे कहती हैं कि यूं तो सभी हिंदू देवता सांवली त्वचा वाले हैं, लेकिन ''ढाई सौ साल की औपनिवेशिक गुलामी ने सफेद रंग को सत्ता और ताकत के साथ इस कदर जोड़ दिया है कि सांवली देह हमारे लिए कुछ खास तरह के व्यवहार का प्रतीक हो गई है...असहाय, निरीह, कमजोर और गरीब. दूसरी ओर सफेद त्वचा शुद्धता, प्रगति और समृद्धि का प्रतीक है.''

रंग को लेकर हमारी चेतना में कहीं बहुत गहरे बैठा हुआ यह पूर्वाग्रह बहुत आश्चर्यजनक ढंग से हिंदी फिल्म उद्योग में भी छाया हुआ है. कई ऐक्टर ऐसे हैं, जो यूं तो काफी आधुनिक और प्रगतिशील हैं, लेकिन ''गोरेपन'' के बिजनेस का हिस्सा बनकर इस तरह की नस्लभेदी रूढ़ अवधारणाओं का प्रचार करने से उन्हें कोई गुरेज नहीं है.

सवाल यह है कि आखिर क्यों ''गोरेपन'' का यह बिजनेस दिन दूनी, रात चैगुनी गति से बढ़ रहा है?ड्ढ नवंबर, 2014 में हुए नीलसन के एक सर्वेक्षण के मुताबिक श्गोरेपन्य के उद्योग की कुल कीमत 2,088 करोड़ रु. है. 2010 में महज 43.20 करोड़ रु. के इस उद्योग में 2014 तक भारी उछाल आया और 2012 के 2,097 करोड़ रु. के मुकाबले मामूली सी कमी. गोरेपन के बिजनेस का आकार 1,900 करोड़ रु. के फेसवॉश और 2,100 करोड़ रु. के डिओड्रेंट के बिजनेस से भी काफी बड़ा है.

कुल मिलाकर गोरा बनाने वाले उत्पादों का बाजार स्थिर बना हुआ है. हालांकि स्त्रियों से जुड़े गोरेपन के उत्पादों में मामूली कमी आई है. 2012 में 1,844 करोड़ रु. का यह कारोबार 2014 में कम होकर 1,809 करोड़ रु. पर आ गया. लेकिन पुरुषों से जुड़े गोरेपन के उत्पादों में जबरदस्त बढ़ोतरी हुई है. 2012 में 253.17 करोड़ रु. का यह कारोबार 2014 में बढ़कर 279.71 करोड़ रु. हो गया. नीलसन की रिपोर्ट के मुताबिक गांवों में रहने वाले युवा इन उत्पादों के नए ग्राहक हैं. शायद वे शाहरुख खान की उस ''हमसफर'' वाली टैगलाइन पर भरोसा करते हैं, जो इमामी फेयर ऐंड हैंडसम के विज्ञापन में आती है, जब शाहरुख अपने एक प्रशंसक की ओर क्रीम उछालते हैं.

आज बाजार में जितने भी उत्पाद मौजूद हैं, उनमें सबसे दिलचस्प बात क्या है? त्वचा को गोरी बनाने वाली क्रीम के साथ-साथ नया तेजी से बढ़ता चलन वेजाइनल वॉश (जो योनि के आसपास की त्वचा को गोरा बनाने का काम करता है) का है. इसी के साथ त्वचा को गोरा बनाने वाली दवाइयां और इंजेक्शन ज्यादा उज्ज्वल भविष्य का वादा कर रहे हैं. 

मुंबई में रहने वाली जानी-मानी कॉस्मैटिक फिजिशियन जमुना पै कहती हैं, ''गोरा बनाने वाली क्रीमों में ऐसा तत्व होता है, जो त्वचा में मौजूद मेलेनिन को कम कर देता है. मेलेनिन तेज धूप के संपर्क में आने पर त्वचा की सुरक्षा का काम करता है. हम हिंदुस्तानी गोरेपन से इस कदर ग्रस्त हैं कि हम यह समझ ही नहीं पाते कि हम उस चीज को लेकर नाखुश हैं, जो न सिर्फ कैंसर जैसी बीमारियों से हमारा बचाव करती है, बल्कि हमें जवान भी बनाए रखती है.'' वे कहती हैं, ''हमारी त्वचा के मुकाबले गोरी नस्ल के या सफेद त्वचा वाले लोगों में त्वचा से जुड़े कैंसर के मामले ज्यादा होते हैं और विडंबना यह है कि इसी चीज को हम बदलना चाहते हैः हमारा खूबसूरत गेंहुआपन.''

इतिहासकार बताते हैं कि गोरी चमड़ी के प्रति हिंदुस्तानियों का दीवानापन यूरोपियनों के आने के साथ जुड़ा हुआ है. भारतीय साहित्य, खासतौर पर संस्कृत साहित्य (कालिदास, भर्तृहरि, अमरू) में ''सौंदर्य के प्रतीक'' के रूप में ''श्यामवर्ण'' का जिक्र मिलता है. वात्स्यायन के कामसूत्र और कालिदास के मेघदूत का नायक सांवला है. कई सदियों बाद गुलाम वंश के राजाओं ने दिल्ली में शासन किया. उसके बाद मुगलों का आगमन हुआ. इन सभी ने गोरी और सांवली सभी तरह की स्त्रियों से विवाह और अंतर्विवाह किए. लेकिन पुर्तगालियों, फ्रांसीसियों और अंग्रेजों के आने के बाद चीजें आमूल-चूल बदल गईं.

जनता दल (यूनाइटेड) के सांसद और लेखक पवन के. वर्मा कहते हैं, ''जैसे अमेरिका में ''द ब्लैक इज ब्यूटीफुल'' (काला खूबसूरत है) आंदोलन चला, उस तरह हिंदुस्तान में ''डार्क इज ब्यूटीफुल'' (सांवला खूबसूरत है) आंदोलन कभी तेजी नहीं पकड़ सका क्योंकि यहां कुलीन वर्ग ने बहुत मूर्खतापूर्ण तरीके से सफेद रंग को ताकत और सत्ता के साथ आत्मसात कर लिया है. भारत में जाति और धर्म की तरह नस्लभेद का सवाल सामाजिक संघर्ष के इलाकों में अपनी जगह नहीं बना पाया.''

पिछले महीने संसद में जब शरद यादव ने सांसद स्मृति ईरानी और सांवली महिलाओं पर असम्मानजनक टिप्पणी की (यादव ने ईरानी से कहा, ''मैं जानता हूं कि आप कौन हैं, '' और बाद में यह कहते रहे कि उनकी बात को गलत तरीके से पेश किया गया है) तो डीएमके पार्टी से राज्यसभा सांसद कनिमोलि ईरानी के बचाव में खड़ी हो गईं. कनिमोलि ने कहा कि गोरेपन को लेकर यह पागलपन दक्षिण के मुकाबले उत्तर भारत में कहीं ज्यादा है. उन्होंने कहा, ''मैं भौचक रह गई, जब शरद यादव जी ने वह टिप्पणी की. मुझे समझ में नहीं आता कि कैसे लोग इस तरह की बात कह सकते हैं और वह भी तब, जब देश ज्यादा आधुनिक हो रहा है. यह बहुत ही दुखद है कि जब खुद नीतियां और कानून बनाने वाले इतनी गैर-जिम्मेदार भाषा में बात करते हैं.''

उन्होंने आगे कहा कि पेरियार की तर्क और बुद्धिवादी राजनीति ने तमिलनाडु को बचा लिया. उन्होंने कहा कि बाकी पूरे देश में बहुत कम लोग यह जानते हैं कि डीएमके के अध्यक्ष एम. करुणानिधि हमेशा स्त्रीवादियों के पक्ष में और उनके साथ रहे हैः ''उन्होंने अक्सर कहा है कि मातृत्व तुम्हारी स्वतंत्रता की राह में दीवार हो सकता है.'' बारामती से राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) की सांसद सुप्रिया सुले ने कहा, ''क्या हमारी संसद सोलहवीं सदी की है...? इस संसद में बहस का स्तर बौद्धिक रूप से कितना नीचे गिरा हुआ है...जिस तरह से सरकार के मंत्री बात कर रहे हैं, वह बहुत दोहरे अर्थ और संकेत देने वाला है.''

लेकिन फिर भी, शायद कुछ चीजें बदल भी रही हैं. कोई सामाजिक सुधार आंदोलन न होने की स्थिति में कुछ नेताओं ने महसूस किया है कि वे इन रुढिय़ों के खिलाफ आवाज उठाने के लिए मीडिया का इस्तेमाल कर सकते हैं. इसलिए जब कनिमोलि और ईरानी शरद यादव के बयान के खिलाफ खड़ी हुईं तो अपनी-अपनी पार्टी और राजनीति की सीमाओं से ऊपर उठकर मित्रों और सहयोगियों ने उनका साथ दिया. बीएसपी के सतीश चंद्र मिश्र, तृणमूल कांग्रेस के डेरेक ओ ब्रायन, एनसीपी की वंदना चव्हाण, वामपंथी सांसद और कांग्रेस की कुमारी शैलजा और अन्य लोगों ने अनौपचारिक रूप से एक-दूसरे से बातचीत की कि यह संदेश कैसे लोगों तक पहुंचाया जाए कि इस तरह की टिप्पणियां बिल्कुल अस्वीकार्य हैं.

कई साल से सांसद शरद यादव को आखिरकार अगले दिन संसद में अपनी टिप्पणी के लिए स्मृति ईरानी से माफी मांगनी पड़ी. उन्होंने इससे पहले 2013 में आरक्षण बिल के दौरान ''पर कटी महिलाएं भी कहा था.'' कहा जाता है कि गिरिराज सिंह को किसी और ने नहीं, बल्कि खुद बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने माफी मांगने के लिए कहा.  

कनिमोलि और कई अन्य समान विचारधारा वाले सांसद कहते हैं कि वे लोकसभा में सामाजिक मुद्दों पर आम सहमति बनाना चाहते हैं. भूरी चमड़ी वाले नागरिकों के अधिकारों और सुविधाओं का मुद्दा वरीयता सूची में सबसे ऊपर होना चाहिए.

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