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लुट गए राम के नाम पर अयोध्यावासी

राम और अल्लाह की इबादत की जगह के झगड़े में इनकी जमीन रामजन्मभूमि परिसर के लिए सरकार ने ले ली. बदले में इन्हें मुआवजा नहीं, बदहाली मिली. राहत के नाम पर हो रही सिर्फ राजनीति.

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aajtak.in
आशीष मिश्रलखनऊ (उ.प्र.), 17 December 2013
लुट गए राम के नाम पर अयोध्यावासी

अयोध्या में विवादित राम जन्मभूमि परिसर के दक्षिणी ओर हाइ सिक्योरिटी ‘‘यलो जोन’’ से सटे काजियाना मोहल्ले में एक जर्जर मकान में रहने वाली 70 वर्षीय रामदुलारी की आंखें धुंधला चुकी हैं. बीमारी के कारण बायां हाथ काम नहीं करता.

लेकिन सात साल पहले उनके पति श्यामलाल जिस लड़ाई को अधूरा छोड़कर गए थे, उन्होंने अपनी वह लड़ाई जारी रखी है. रामदुलारी की एक एकड़ से ज्यादा जमीन को राम जन्मभूमि परिसर के लिए अधिग्रहीत हुए 24 साल से ज्यादा हो चुके हैं, लेकिन उन्हें वाजिब मुआवजे की जंग अब भी लडऩी पड़ रही है.

रामदुलारी ही नहीं इसी मोहल्ले के रामानंद मौर्य और राम जन्मभूमि अधिग्रहीत परिसर से पश्चिमी छोर वशिष्ठ कुंड में रहने वाले रजितराम, रामजीत, रंजीत, तसद्दुम हुसैन, अंसार हुसैन समेत सभी 23 परिवार जिनकी कीमती पैतृक जमीन परिसर के लिए अधिग्रहीत की जा चुकी है, दो दशक से ज्यादा समय से मुआवजे की जंग लड़ रहे हैं. लेकिन यह अंतहीन सिलसिला खत्म होने का नाम नहीं ले रहा.

पिछले डेढ़ वर्ष के दौरान कई बार फैजाबाद के अपर जिला एवं सत्र न्यायधीश के कोर्ट-द्वितीय-ने जिले के भूमि अध्याप्ति कार्यालय से राम जन्मभूमि के अधिग्रहण संबंधी मूल दस्तावेज पेश करने का आदेश दिया. कार्यालय के अनसुना करने पर इसी वर्ष 10 अक्तूबर को कोर्ट ने भूमि कार्यालय को मूल दस्तावेज उपलब्ध न कराने पर दंडात्मक कार्रवाई की चेतावनी दी. अगले ही दिन यानी 11 अक्तूबर को यह आदेश भूमि कार्यालय में रिसीव हो गया जिसकी कॉपी इंडिया टुडे के पास है.

कोर्ट के आदेश को कार्यालय पहुंचने के डेढ़ महीने बाद 27 नवंबर को इंडिया टुडे ने भूमि अध्याप्ति अधिकारी श्रीबसंता से दस्तावेज न भेजने के बाबत पूछा तो उनका जवाब था, ‘‘मैं पिछले एक साल से फैजाबाद में तैनात हूं. नेशनल थर्मल पावर कॉर्पोरेशन से जुड़े कार्यों में व्यस्त होने से मुझे इस राम जन्म भूमि परिसर के भूमि अधिग्रहण में मुआवजे से जुड़े किसी भी मुकदमे की जानकारी नहीं है.’’

फैजाबाद के जिलाधिकारी विपिन कुमार द्विवेदी ने भी इंडिया टुडे से ऐसे किसी प्रकरण की जानकारी होने से इनकार किया. उन्होंने कहा, ‘‘इसके बारे में भूमि अध्याप्ति अधिकारी से पूछकर ही बता पाएंगे.’’ पीड़ितों की लड़ाई लड़ रहे आरटीआइ एक्टिविस्ट विपिन कुमार मौर्य कहते हैं, ‘‘अधिकारियों ने शुरुआत से ही इस प्रकरण में भयंकर उपेक्षा दिखाई, जिससे यह मामला लटकता जा रहा है.’’

15 फीसदी ही मिला मुआवजा
1989 में यूपी सरकार के पर्यटन विभाग ने राम जन्मभूमि के आसपास की 60 एकड़ जमीन ‘‘राम कथा पार्क’’ के नाम से अधिग्रहीत की. इसमें 29 एकड़ उन 23 परिवारों की पैतृक जमीन थी. शेष जमीन नजूल की थी. अधिग्रहण के पहले पर्यटन विभाग ने एक सर्वे कराकर अधिग्रहीत जमीन पर 15 रु. प्रति वर्ग फुट के हिसाब से मुआवजा तय किया. इस हिसाब से पहले चरण में 29 एकड़ जमीन के लिए परिवारों को 1.97 करोड़ रु. मुआवजा स्वीकृत हुआ.

लेकिन जिलाधिकारी कार्यालय ने अपने स्तर पर जमीन की कीमत 2.40 रु. प्रति वर्ग फुट का हिसाब लगाकर सिर्फ 33 लाख रु. मुआवजा बांटा जो शासन से तय हुई राशि का सिर्फ 15 फीसदी था. कम मुआवजा की शिकायत शासन तक पहुंचने पर तत्कालीन संयुक्त भूमि व्यवस्था आयुक्त सी.एल. कुरील ने जांच की. उन्होंने अपनी रिपोर्ट में लिखा कि जमीन मालिकों को 15 रु. प्रति वर्ग फुट के हिसाब से मुआवजा मिलना चाहिए.

1985 से 1993 के बीच अयोध्या में तैनात रहे एक तहसीलदार पी.के. पाठक बताते हैं, ‘‘जिलाधिकारी कार्यालय के सर्वे में सभी पैतृक जमीन को कृषि योग्य मान लिया गया, जबकि ज्यादातर जमीन आबादी क्षेत्र में थी. इसी चूक ने मुआवजे में विसंगतियां पैदा कीं.’’ कुरील की रिपोर्ट के बाद भी सरकार ने ध्यान नहीं दिया तो पीड़ितों ने जिला कोर्ट में मुआवजे में गड़बड़ी के खिलाफ मुकदमा दर्ज कर दिया. 20 वर्ष से मुकदमा फैजाबाद कोर्ट में चल रहा है.

एक जमीन का दो बार अधिग्रहण
20 मार्च, 1992 को पर्यटन विभाग ने राम कथा पार्क के नाम से अधिग्रहीत की गई 43 एकड़ जमीन को रामजन्म भूमि न्यास को एक रुपए प्रतिवर्ष के हिसाब से 99 वर्ष के लिए लीज पर दे दिया. इसके बाद विभाग ने सभी भूमिधर परिवारों को पत्र भेजकर सूचित किया कि अब विभाग के पास कोई जमीन नहीं है.

इसी वर्ष 6 दिसंबर को बाबरी मस्जिद ढहा दी गई और एक माह बाद 7 जनवरी, 1993 को केंद्र सरकार ने ‘‘कतिपय क्षेत्र अयोध्या अधिनियम-1993’’ के नाम से एक अध्यादेश जारी कर रामकथा पार्क समेत कुल 67 एकड़ जमीन अधिग्रहीत कर ली. एक पीड़ित रजितराम बताते हैं, ‘‘एक ही जमीन का दूसरी बार अधिग्रहण होने के बाद हमारे सामने दुविधा आ पड़ी कि हम मुआवजा राज्य सरकार से लें कि केंद्र सरकार से.’’

मुआवजे के लिए दावा ठोंकने के बाद केंद्र सरकार ने जमीन का स्वामित्व तय करने के लिए एक आयुक्त कोर्ट का गठन किया. जनवरी, 1997 को आयुक्त कोर्ट ने कहा कि केंद्र सरकार ने अधिग्रहीत जमीन राज्य सरकार से ली है न कि किसी परिवार से. ऐसे में मुआवजे के मामले में केंद्र सरकार जिम्मेदार नहीं है.

कहां गए अधिग्रहण के दस्तावेज
मुकदमों की जल्दी सुनवाई न होने से पीड़ित परिवारों ने हाइकोर्ट की शरण ली. हाइकोर्ट ने फरवरी, 2011 को सुनवाई तेज करने का आदेश जिला कोर्ट को दिया. मुकदमे में सरकार का पक्ष रख रहे वकील गोपाल कृष्ण मिश्र बताते हैं, ‘‘पीड़ित परिवारों द्वारा सही ढंग से पैरवी न किए जाने से इस मुकदमे में देरी हो रही है.’’

वही भूमि अध्याप्ति अधिकारी ने कोर्ट को अब तक अधिग्रहण के दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए हैं. विपिन कुमार मौर्य ने मई में आरटीआइ के जरिए फैजाबाद के क्षेत्रीय पर्यटन अधिकारी कार्यालय और महानिदेशालय पर्यटन से अधिग्रहीत जमीन से जुड़े शासनादेशों की प्रति मांगी थी. जुलाई, 2013 में दोनों विभागों ने जानकारी दी कि उनके पास इससे जुड़ा कोई भी दस्तावेज नहीं है.

फैजाबाद के क्षेत्रीय पर्यटन अधिकारी ब्रजपाल सिंह कहते हैं, ‘‘सभी दस्तावेज केंद्र सरकार के पास हैं क्योंकि भूमि उन्हीं के कब्जे में है.’’ कोर्ट में पीड़ितों का पक्ष रख रहे दीनदयाल शर्मा कहते हैं, ‘‘मुआवजे से जुड़ा सरकारी पक्ष कमजोर होने की वजह से अधिकारी कोर्ट को दस्तावेज उपलब्ध कराने में आनाकानी कर रहे हैं.’’

राम मंदिर और बाबरी मस्जिद मुद्दा उछालकर अपनी सियासत चमकाने वाली पार्टियां भी जमीन देकर ‘‘कंगाल’’ हो चुके इन परिवारों के साथ खड़ी नहीं हैं. अयोध्या से सपा के विधायक पवन पांडेय और फैजाबाद के सांसद निर्मल खत्री को इस मामले की जानकारी नहीं है तो अयोध्या निवासी बीजेपी के फायरब्रांड नेता विनय कटियार जमीन के बदले, कहीं ज्यादा मुआवजा मिलने की बात कह पीड़ितों की नीयत पर ही सवाल खड़ा कर रहे हैं. शायद नेताओं को भरोसा हो गया है कि इनके वोट से उनका कुछ बिगडऩे वाला नहीं.

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