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''जेल की कोठरी के मुकाबले बाहर की दुनिया एक बड़े कैदखाने की तरह है''

कन्हैया कहते हैं, ''हमारी लड़ाई इस राज्य से छुटकारा पाने की नहीं, बल्कि इसके भीतर रहकर आजादी पाने की है."

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aajtak.in
सरोज कुमार 16 August 2016
''जेल की कोठरी के मुकाबले बाहर की दुनिया एक बड़े कैदखाने की तरह है'' कन्हैया कुमार

यह तो मैं ठीक-ठीक नहीं बता सकता कि राजनीति से मेरा परिचय कब हुआ. मैं उस वंचित तबके से आता हूं, जहां बचपन से ही भेदभाव के प्रति जागरूकता आ जाती है. हो सकता है यह तब की बात हो, जब मैं हॉफ पैंट पहनता था और उन लड़कों की तरह होना चाहता था जो फुल पैंट पहनते हैं. या यह भी हो सकता है कि जब मैंने लोगों को सैलून में जाते देखा हो, जहां उन्हें राजा की तरह सिंहासन पर बैठाया जाता था जबकि मैं अपने बाल पेड़ के नीचे कटवाता था. यह भी हो सकता है कि इसका पता मुझे मां के गर्भ में ही चल गया हो और वह जो खाना खाती थी, उसका पता समाज में उसके सामाजिक-आर्थिक दर्जे से लगता था. मेरी राजनैतिक चेतना मेरी पैदाइश से पहले ही तय हो चुकी थी.

लोग मुझसे पूछते हैं कि क्या जेल में बिताए दिनों के बाद मुझे एहसास हो गया है कि वास्तव में आजादी क्या होती है. लेकिन मैंने पाया है कि जेल की जिस कोठरी से मैं बाहर निकलकर आया, उसके बाहर की दुनिया एक बड़े कैदखाने की तरह है. भारतीय होने के नाते आजादी की हमारी धारणा संविधान से आती है. उसके मूल में एक प्रस्तावना है, जो संप्रभुता, समानता, न्याय और बंधुत्व के दिशा-निर्देशक सिद्धांतों को सूचीबद्ध करती है जिनके सहारे राजकाज चलाया जाना चाहिए. हमारा संघर्ष राज्य के भीतर रहते हुए आजादी की लड़ाई है. बहुत साधारण मांगें हैं जैसे रोजगार के अवसर, स्त्री-पुरुष, शिक्षा के अधिकार, न्याय वगैरह में समानता हो और यह सबको सुलभ हो, न कि किसी एक के हाथ से छीनकर दूसरे के हाथ में रख दिया जाए. भेदभाव से मुक्ति मिले और उन लोगों को दूसरों के बराबर स्तर तक लाने के लिए सकारात्मक कार्रवाई की जाए, जिनके साथ इतिहास में लंबे समय से भेदभाव बरता गया है.

सामाजिक ऊंच-नीच हमारे समाज का शायद सबसे बड़ा अभिशाप है. पेशे के हिसाब से बनी पहचान पर आधारित इस ऊंच-नीच का स्रोत मनुस्मृति है. मनुवाद का मतलब यह आस्था है कि आपके पिछले कर्म आपके पुनर्जन्म को प्रभावित करते हैं. यही वह अटपटा विचार है जिसके हिसाब से माना जाता है कि कुछ लोग तो राज करने के लिए हैं, जबकि दूसरे उनकी गुलामी करने के लिए पैदा हुए हैं. हम लोग इसी के खिलाफ लड़ रहे हैं. आज हमें विचारधाराओं का टकराव दिखाई दे रहा है—हिंदुस्तान बनाम संघिस्तान का टकराव. आज राष्ट्र के सामने सबसे समस्याग्रस्त चुनौती धर्म की राजनैतिक व्याख्या की है. इस पर सिर्फ सूचना, समझदारी और ज्ञान से जीत हासिल की जा सकती है. आज यह लड़ाई सबकी है.                

(उर्सिला अली से बातचीत पर)

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