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कश्मीर की कतर-ब्योंत

पाकिस्तानी घुसपैठिए कश्मीर घाटी में उग्रवाद शुरू करते हैं. मकबूल भट और अमानुल्ला खान ने जम्मू-कश्मीर लिबरेशन फ्रंट के तहत रायशुमारी मोर्चा खोला. ऑपरेशन जिब्राल्टर अभियान छेड़ा गया. भारत और पाकिस्तान के बीच जंग छिड़ी. जनवरी 1966 में, ताशकंद समझौता. दोनों पक्ष वापस.

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उदय माहूरकर और कौशिक डेका, साथ में अभिषेक भल्ला, श्रीनगर में श्वेता पुंजनई दिल्ली, 12 August 2019
कश्मीर की कतर-ब्योंत युद्ध क्षेत्र 5 अगस्त को श्रीनगर में कर्फ्यू लगा दिया गया

पांच अगस्त की सुबह, जम्मू-कश्मीर के लोगों की नींद खुली तो उन्हें पता चला कि कर्फ्यू लगाया जा चुका है और संचार व्यवस्था ठप है. जब वे नींद में थे तभी उनके मोबाइल फोन के सिग्नल गायब हो गए थे और इंटरनेट बंद हो चुका था. हाल के वर्षों में पहली बार ऐसा हुआ कि लैंडलाइनें भी बंद कर दी गई थीं. ऐसा लगा कि देश के उत्तरी छोर का राज्य पुराने दौर में लौट चुका है.

हजारों की संख्या में अर्धसैनिक बलों के जवान कर्फ्यू लगाने के लिए सड़कों पर उतर गए, जिनमें अधिकांश को पिछले कुछ दिनों में कई दौर में वायु सेना के आइएएफ सी-7 विशाल विमान से घाटी में पहुंचाया गया था. देश के 'नियति के साथ साक्षात्कार' की 72वीं वर्षगांठ से दस दिन पहले, एक और ऐतिहासिक बदलाव के लिए मंच तैयार किया जा रहा था. यह था संविधान के अनुच्छेद 370 को 'कमजोर करना' और जम्मू-कश्मीर का दो केंद्रशासित प्रदेशों—जम्मू और कश्मीर तथा लद्दाख में विभाजन. 6 अगस्त को संसद में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक पारित होने का मतलब है कि देश में अब 28 राज्य और नौ केंद्र शासित प्रदेश हैं. पहली दफा देश में कोई राज्य केंद्रशासित प्रदेश में बदल दिया गया.

17 अक्तूबर, 1949 को संविधान में शामिल अनुच्छेद 370 'अस्थायी प्रावधान' था. इसने जम्मू-कश्मीर को भारतीय संविधान के दायरे से बाहर रहने की छूट दी और राज्य को अपना संविधान तैयार करने की अनुमति दी. इसके कमजोर पडऩे से राज्य को पहले से प्राप्त सभी विशेषाधिकार छिन गए हैं, जिसमें राज्य विधानमंडल को संचार, रक्षा, वित्त और विदेशी मामलों को छोड़कर अन्य सभी विषयों पर अपने स्वयं के कानूनों का बनाने का अधिकार भी शामिल है. जम्मू-कश्मीर का अपना संविधान, अपना ध्वज और अपनी दंड संहिता सब अब बीते दौर की बात हो चुकी है.

पिछले कई दिनों से कश्मीर को लेकर अटकलों का बाजार गर्म था. 4 अगस्त को, अमरनाथ यात्रा अचानक रोक दी गई और तीर्थयात्रियों और पर्यटकों को फौरन घाटी छोडऩे को कहा गया था. कहा गया कि सेना को अमरनाथ तीर्थयात्रियों पर हमले की आतंकवादियों की एक बड़ी साजिश का पता चला है. पत्रकारों को अमेरिका में बनी एक स्नाइपर राइफल, एक आइईडी और हैंड ग्रेनेड को इसके साक्ष्य के रूप में दिखाया गया. नियंत्रण रेखा पर भारी गोलाबारी शुरू हो गई और भारतीय सेना ने 155-मिमी बोफोर्स होवित्जर तोपों से गोले दागे. 1999 के करगिल युद्ध के बाद से भारी तोपों का इस्तेमाल कभी-कभार ही हुआ है. एक मुठभेड़ भी हुई, जिसमें दावा किया गया कि केरन सेक्टर में पाकिस्तान बॉर्डर ऐक्शन टीम या बैट के पांच जवानों के शव पाकिस्तान ले जाए गए.

जानकारी के स्रोत व्हाट्सऐप मैसेज बच गए थे. कुछ मैसेज बड़े आतंकवाद विरोधी अभियान की बातें कह रहे थे तो एक मैसेज राज्य के तीन हिस्से करने की तैयारियों के बारे में था. सरकार ने सभी पर्यटकों को कश्मीर छोडऩे का अल्टीमेटम जारी किया और पुलिसवाले होटलों को खाली करवा रहे थे. हठी पर्यटकों को श्रीनगर हवाई अड्डे पर भेजा गया और कुछ को वायु सेना के परिवहन विमानों से राज्य से बाहर निकाला गया.

22 जुलाई को, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के इस दावे से नई दिल्ली का सत्ता-प्रतिष्ठान सन्न रह गया था कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने उनसे कश्मीर में मध्यस्थता का अनुरोध किया था. यह बयान दौरे पर गए पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान की मौजूदगी में दिया गया था, जिसका भारत के विदेश मंत्रालय ने फौरन खंडन किया. नई दिल्ली में शक था कि अमेरिका, नवंबर, 2020 में अमेरिकी चुनावों से पहले अपने सैनिकों को अफगानिस्तान से बाहर निकालने में पाकिस्तानी सहायता के बदले, कश्मीर कार्ड खेल रहा है. इसलिए सरकार जम्मू-कश्मीर के विशेषाधिकार को कमजोर करने की जल्दबाजी में थी.

राज्यसभा में भले ही भाजपा बहुमत से आठ सीटें पीछे है, लेकिन सदन ने जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक को दो-तिहाई बहुमत से पारित कर दिया. भाजपा को आप, तेलुगु देशम और बसपा जैसे धुर विरोधी दलों का भी समर्थन मिला. सहयोगी जद (यू) ने बिल का विरोध किया लेकिन, मतदान का बहिष्कार करके. इससे भाजपा को परोक्ष मदद मिली.

जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति के समाप्त होने की खबर जब घाटी पहुंची, तो लोग हैरान और गुस्से में थे. ज्यादातर लोग तो अवाक् थे. श्रीनगर के व्यापारी रईस अहमद ने कहा, ''जो हुआ है, उसे बस मंजूर ही करना है. वक्त ही बताएगा कि कश्मीर के लोगों पर क्या असर पड़ेगा.''

संसद में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के 5 अगस्त के भाषण के कुछ ही घंटों के भीतर, पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती और उमर अब्दुल्ला को हिरासत में ले लिया गया, जो पिछली रात से घर में नजरबंद थे. शॉल का कारोबार करने वाले मुजफ्फर अहमद कहते हैं कि इस कदम से कश्मीरी नेताओं की राजनीति खत्म हो गई है. वे कहते हैं, ''लोग हैरान हैं. हर कोई डरा हुआ है; क्या मालूम कि आगे क्या होगा.'' उधर, भाजपा में उत्साह चरम पर है. उसके पार्टी दफ्तरों में 'अब देश में एक विधान, एक संविधान और एक निशान' का नारा खूब गूंजा.

मिशन कश्मीर

राज्यसभा में जम्मू-कश्मीर पुनर्गठन विधेयक पारित होने के तुरंत बाद प्रधानमंत्री मोदी अपने गृह मंत्री के पास पहुंचे. शाह श्रद्धापूर्वक झुके और प्रधानमंत्री का हाथ अपने माथे से लगाया. प्रधानमंत्री ने दो बार उनकी पीठ थपथपाई. यह इस बात की सार्वजनिक स्वीकृति थी कि ऐतिहासिक कदम की पूरी पटकथा शाह ने लिखी थी.

जम्मू-कश्मीर की बात आई तो शाह अपनी योजना के साथ तैयार थे. उन्होंने इंडिया टुडे से 2017 में कहा था, ''जम्मू-कश्मीर की समस्या का एकमात्र हल (अनुच्छेद) 370 को हटाना है. यह कड़वी गोली होगी, लेकिन एक ही झटके में कई बीमारियों को दूर कर देगी.'' उन्होंने तब भविष्यवाणी की थी, भाजपा में ऐसा करने की इच्छाशक्ति है और वह 'भविष्य में' यह करेगी. वे तब समझ रहे थे कि भाजपा जम्मू-कश्मीर में पीपल्स डेमोक्रेटिक पार्टी (पीडीपी) के साथ गठबंधन की सरकार चला रही थी, जो ऐसी किसी कोशिश की जोरदार विरोधी है.

सरकार बनाने के लिए पीडीपी के साथ भाजपा का 2015 का समझौता इसकी आधी तैयारी जैसा था. शाह ने पहले ही विवादास्पद अनुच्छेद 370 का अध्ययन शुरू कर दिया था क्योंकि वे समझने लगे थे कि इसी विवादास्पद प्रावधान के कारण कश्मीरियों और गैर-कश्मीरियों, दोनों के सामने कई समस्याएं आती हैं. अनुच्छेद 370 को खत्म करना आरएसएस की मूल राजनैतिक विचारधारा के तीन प्रमुख मुद्दों में से एक है. अन्य दो देश में समान नागरिक संहिता लागू करना और अयोध्या में राम मंदिर का निर्माण है.

भाजपा केंद्र में अपने लगातार दूसरे कार्यकाल के पहले दो महीनों में सभी तीन मुद्दों पर आगे बढ़ चुकी है. 31 मई को गृह मंत्री के रूप में पदभार संभालने वाले शाह ने अनुच्छेद 370 पर काम करना शुरू कर दिया. उनकी नजर में चाहे आतंकवाद हो या राज्य का कथित पिछड़ापन, समाधान का यही एकमात्र तरीका है. शाह ने बात समझाने के अपने हुनर से सरकार के दो सबसे ताकतवर लोगों—प्रधानमंत्री मोदी और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह को इसके लिए राजी कर लिया.

शाह को एहसास था कि लोहा गरम है तभी चोट की जानी चाहिए. लोकसभा चुनाव में भाजपा की 303 सीटों पर जीत का जलवा अभी कायम है. गृह मंत्री के प्रस्ताव की मंजूरी प्रधानमंत्री को दिलाए गए उस विश्वास पर टिकी थी कि इस कदम के परिणामों से निपटने की तैयारी पूरी है. इसके बाद राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार (एनएसए) अजीत डोभाल और कानून मंत्री रविशंकर प्रसाद से परामर्श किया गया.

शाह जानना चाहते थे कि सरकार अपनी योजना को किस प्रकार आगे लेकर जा सकती है. छत्तीसगढ़ कैडर के एक आइएएस अधिकारी बी.वी.आर. सुब्रह्मण्यम एक अन्य प्रमुख व्यक्ति थे जिन्हें इस लूप में रखा गया था. उन्हें जून में जम्मू-कश्मीर के मुख्य सचिव के रूप में तैनात किया गया था ताकि वे जमीनी हालात का मूल्यांकन करके सही-सही अनुमान लगा सकें और इसके संभावित असर के बारे में बताएं.  

जिस दिन सरकार ने अलगाववादी नेताओं को नजरबंद करना शुरू कर दिया, उसी दिन से अनुच्छेद 370 की उलटी गिनती शुरू हो गई थी. 22 जून को हुर्रियत नेता मीरवाइज उमर फारूक और अन्य की गिरफ्तारी को आतंकी बुरहान वानी की हत्या की तीसरी बरसी से पहले की गई एहतियातन कार्रवाई के रूप में बताया गया. सरकार के करीबी सूत्रों का कहना है कि यह सरकार के 'मिशन कश्मीर' की शुरुआत थी. मोदी सरकार के गोपनीय तौर-तरीकों से किसी को भनक नहीं लग सकी कि क्या चल रहा है. हालांकि कुछ संकेत थे. 20 जुलाई को खुफिया ब्यूरो (आइबी) के एक वरिष्ठ अधिकारी ने एक इवेंट ऑर्गेनाइजर को कहा था कि कश्मीर समस्याओं पर प्रस्तावित सेमिनार को फिलहाल मुल्तवी कर दें क्योंकि ''एक पखवाड़े के भीतर कुछ होने वाला है.''

जुलाई के अंत तक, जब सरकार ने अपनी योजना को अंतिम रूप दिया, इसकी खबर रखने वालों की तादाद लगभग दो दर्जन हो गई थी. इसमें केंद्रीय गृह सचिव, रॉ और आइबी के प्रमुख, सेना के तीनों अंगों के प्रमुख, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, प्रधानमंत्री के प्रधान सचिव, कैबिनेट सचिव, राष्ट्रपति के साथ-साथ विधेयक को ड्राफ्ट करने और संसद में पारित होने के प्रस्ताव से जुड़े अधिकारियों को भी खबर थी.

शाह की तैयारियां बहुत सधी हुई थीं. जैसे-जैसे फैसले का दिन करीब आता गया, अमरनाथ यात्रियों को लौटने का आदेश जारी किया गया, जो अब एक बहाना लगता है. सेना ने कहा कि उसने तीर्थयात्रियों को निशाना बनाने के लिए सीमा पार से रची गई एक साजिश का भंडाफोड़ किया है. एलओसी पर भारी गोलाबारी की गई. सूत्रों ने कहा कि एलओसी को धधकाए रखने के कई मतलब थे. उनमें एक था पाकिस्तान को किसी भी दुस्साहस के खिलाफ कड़ी चेतावनी देना. एक अन्य बात यह थी कि भारत की सीमा में मौजूद आतंकवादियों के साथ-साथ पाकिस्तानियों को भी भारत के इरादों की हवा तक न लगने देना. इस बात की संभावना नहीं थी कि भारत नियंत्रण रेखा पर हमला और घाटी में कड़ी कार्रवाई, दोनों एक साथ शुरू करेगा.

आगे जो होना था, उसमें डोभाल ने अहम भूमिका निभाई. अर्धसैनिक बल के 45,000 से अधिक जवानों को घाटी में उतारा गया (वास्तविक संख्या इससे कहीं अधिक मानी जाती है). इसके साथ पाकिस्तान से लगी सीमा पर और आतंकवाद-रोधी अभियानों के लिए पहले से ही तैनात लगभग 3,00,000 फौजियों को तैनात किया गया. 12 राज्यों को सांप्रदायिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों पर नजर रखने के लिए जारी की गई सलाह का दायरा बढ़ाकर सभी राज्यों को भेजा गया. कश्मीर घाटी में ज्यादा संवेदनशील इलाकों की ड्रोन से निगरानी शुरू हुई.

जयशंकर ने जम्मू-कश्मीर से जुड़े प्रस्तावित कदम को लेकर भारतीय रवैये की कई देशों के राजदूतों को जानकारी दी. रणनीति में शामिल एक वरिष्ठ सरकारी अधिकारी का कहना है कि विदेश नीति के लिहाज से यह आवश्यक था. उस अधिकारी ने कहा, ''पिछले 70 वर्षों के इतिहास से पता चलता है कि पश्चिमी देशों और इस्लामी देशों ने अक्सर जम्मू-कश्मीर पर पाकिस्तान समर्थक रुख अपनाया है.'' दुनिया काफी हद तक संतुष्ट दिखी और इस्लामिक देशों के प्रमुख संगठन ऑर्गेनाइजेशन ऑफ इस्लामिक कोऑपरेशन (ओआइसी) के सदस्य यूएई ने इस कदम को भारत का 'आंतरिक मामला' बताया है.

जबकि पाकिस्तान की ओर से आई तीखी प्रतिक्रिया को वैश्विक स्तर पर कोई समर्थन नहीं मिल रहा है. 6 अगस्त को संयुक्त राष्ट्र ने दोनों देशों से संयम बरतने का आग्रह किया. पाकिस्तान के प्रधानमंत्री इमरान खान ने पुलवामा जैसे आत्मघाती हमलों और भारत-पाकिस्तान युद्ध की चेतावनी दी. शायद उनका यह बयान अपने देश के लोगों के लिए है. 7 अगस्त को पाकिस्तान ने घोषणा की कि वह भारत के साथ द्विपक्षीय व्यापार को रोक रहा है और नई दिल्ली से अपने कार्यवाहक उच्चायुक्त को वापस बुला रहा है.

यही नहीं, मोदी-शाह-डोभाल की तिकड़ी ने अनुच्छेद 370 के कमजोर पडऩे के बाद कश्मीर-समर्थक रवैया जाहिर करने की योजना बनाई. भाजपा और आरएसएस के नेताओं से कहा गया कि अपने जश्न में संयम बरतें. पार्टी ने यह लाइन ली कि कैसे अनुच्छेद 370 ने कश्मीर के विकास को रोक दिया, लोगों को पिछड़ा रखा और केवल कुछ राजनैतिक परिवारों को समृद्ध बना रहा था. गौरतलब है कि राज्य में आर्थिक विकास दर अस्थिर है और प्रति व्यक्ति आय राष्ट्रीय औसत से नीचे है, जबकि जम्मू-कश्मीर में गरीबी दर राष्ट्रीय औसत से आधी और राज्य का मानव विकास सूचकांक राष्ट्रीय औसत से ऊपर था.

अपनी 2017 की जम्मू यात्रा के दौरान, शाह ने कहा था कि भारतीय जनसंघ (भाजपा के पूर्व अवतार) के संस्थापक श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मृत्यु की घटना बताती है कि अनुच्छेद 370 अनुचित है और निरस्त करने योग्य है. मुखर्जी को राज्य को प्रदान किए गए विशेष दर्जे के खिलाफ विरोध प्रदर्शन करते हुए मई 1953 में जम्मू-कश्मीर पुलिस ने गिरफ्तार किया था और एक महीने बाद पुलिस हिरासत में उनकी मौत हो गई थी. भाजपा नेताओं के दिलों में अब भी उस बात की टीस बनी हुई है.

मुश्किल आगे की राह

शाह का अगला कदम जम्मू-कश्मीर विधानसभा का परिसीमन है, जिसमें आकार और आबादी दोनों ही लिहाज से जम्मू से छोटा होने के बावजूद विधानसभा में सीटों की संख्या घाटी के पक्ष में झुकी दिखती है. एक सरकारी अधिकारी का कहना है कि इससे राज्य की सबसे बड़ी पार्टी के घाटी से ही होने के कारण आम तौर पर मुख्यमंत्री भी घाटी से ही होने की मौजूदा प्रथा खत्म हो जाएगी. इससे हिंदू बहुल जम्मू क्षेत्र की ओर ध्यान केंद्रित होगा.

घाटी के लोग इस कदम और इतनी बड़ी संख्या में सुरक्षा बलों की मौजूदगी से स्तब्ध हैं. लेकिन क्या यह तूफान से पहले की खामोशी है? कश्मीर में तैनात सुरक्षा बलों को डर है कि एक ज्वालामुखी फटने का इंतजार कर रहा है. जम्मू-कश्मीर पुलिस के एक जवान ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, ''अगर इन परिस्थितियों में उग्रवाद को बढ़ावा मिलता है तो मुझे आश्चर्य नहीं होगा. लोग ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं. युवा असुरक्षित हैं और कभी भी उनके गुस्से का गुबार फट सकता है.'' वह याद दिलाता है कि 2016 में वानी की हत्या के बाद आतंकवाद कैसे भड़क गया था. 2016 और 2019 के बीच, सुरक्षा बलों ने 1,747 आतंकवादियों को मार गिराया और 6,000 से अधिक को गिरफ्तार कर लिया. चिंता की बात यह है कि घाटी में मौजूदा उग्रवादियों में से 80 फीसद से अधिक अब स्थानीय युवा हैं.

आइबी के एक पूर्व अधिकारी का कहना है, ''अनुच्छेद 370 का कमजोर पडऩा युवाओं को भड़काने में बड़ा कारक होगा, जो इसे अपनी पहचान के मिट जाने के रूप में देखते हैं.'' अगले सप्ताह ईद के आसपास प्रतिबंधात्मक आदेश हटा दिए जाएंगे, तब स्थिति स्पष्ट हो जाएगी. पहले से ही ऐसी खबरें हैं कि जैश-ए-मोहम्मद के पांच आतंकवादियों ने एक पखवाड़े पहले घाटी में घुसपैठ की थी.

भाजपा का कहना है कि अनुच्छेद 370 के कमजोर पडऩे से लोगों को बाहर से आकर राज्य में बसने का मौका मिलेगा और इससे राज्य में निवेश आएगा लेकिन इस बात की बहुत कम संभावना है कि इनमें से कोई भी बात निकट भविष्य में सही साबित होगी. अब तक, सभी पहाड़ी राज्य बाहरी लोगों द्वारा अपने राज्य में भूमि के स्वामित्व पर प्रतिबंध लगाते रहे हैं, इसलिए जम्मू-कश्मीर से इस व्यवस्था को समाप्त कर देने से अव्यवस्था का पिटारा खुल सकता है. हालांकि व्यवसायी अब तक बाहरी लोगों द्वारा भूमि की खरीद पर प्रतिबंध और सुरक्षा से जुड़े खतरे को राज्य में निवेश के रास्ते की प्रमुख बाधाएं बताते रहे हैं, लेकिन जम्मू-कश्मीर के पूर्व वित्त मंत्री हसीब द्राबू का तर्क है कि समस्या विवादास्पद अनुच्छेद 370 और 35ए से नहीं है—बल्कि संयुक्त राष्ट्र द्वारा 'कश्मीर को दिए विवादित टैग' से है.

द्राबू राज्य में केंद्रीय सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों (सीपीएसई) के न होने की ओर भी इशारा करते हैं. वे कहते हैं, ''सीपीएसई के निवेश और जम्मू-कश्मीर के विकास के स्तर के बीच रैंक का स्तर 0.87 है. निजी निवेश भी सार्वजनिक निवेशों की तरफ देखता है. 23 लाख करोड़ रुपए के निवेश और 10.08 लाख कर्मचारियों वाले 339 सीपीएसई में से केवल तीन जम्मू-कश्मीर में हैं.'' उन्होंने कहा कि राज्य के तीन सीपीएसई का कुल संयुक्त निवेश 165 करोड़ रुपए है और इससे सिर्फ 21 लोगों को रोजगार मिलता है.

हालांकि, व्यापारिक नेताओं के एक समूह ने ट्वीट करके केंद्र के इस कदम के लिए समर्थन जताया है लेकिन जब तक कश्मीर में राजनैतिक स्थिरता नहीं आ जाती, तब तक उनकी ओर से बड़े निवेश की संभावना नहीं है. हालांकि राज्य में सूचना का अधिकार (आरटीआइ) और आरक्षण लागू होना व्यवसायियों के लिए कोई प्रोत्साहन वाला कदम नहीं है लेकिन यह तथ्य कि सुप्रीम कोर्ट के फैसले अब कश्मीर पर लागू होंगे, इससे उनका भरोसा बढ़ेगा कि वे अनुबंधों की शर्तों को लागू कराने का दबाव बना सकते हैं. अक्तूबर में बिजनेस समिट आयोजित करने की बात चल रही है. हालांकि, अनुभव तो यही कहता है कि घोषणाओं और जमीनी हकीकत के बीच भारी अंतर रहता है, इसलिए इस शिखर सम्मेलन का जमीनी अर्थशास्त्र पर बहुत कम असर पडऩे की संभावना है.

फर्क पड़ेगा राज्य में केंद्र के बड़े आर्थिक पैकेज की घोषणा से. पिछली बार केंद्र में वाजपेयी सरकार ने कश्मीर के लिए बड़े पैकेज की घोषणा की थी और इससे घाटी की अर्थव्यवस्था को बड़ा सहारा मिला था. मोदी सरकार के लिए इस क्षेत्र के लिए आइआइटी, आइआइएम और एक बड़ी बिजली परियोजना की घोषणा करना महत्वपूर्ण होगा, क्योंकि इससे निजी क्षेत्र निवेश के लिए उत्साहित हो सकता है. और अनुच्छेद 370 के हटने के बावजूद, सुरक्षा अधिकारियों को लगता है कि घाटी में तनाव और आतंकियों की सक्रियता को देखते हुए कश्मीरी पंडितों को शीघ्र वापसी मुश्किल होगी. ज्यादा से ज्यादा यही हो सकता है कि उन्हें प्रतिकात्मक रूप में कड़ी सुरक्षा के बीच कुछ खास स्थानों पर बसाया जाए.

इन तकनीकी बदलावों के अलावा, जम्मू-कश्मीर की राजनीति में जिस चीज का बड़ा असर दिख सकता है, वह सरकार का जम्मू-कश्मीर में परिसीमन की कवायद शुरू करने के लिए एक आयोग गठित करने का निर्णय है. परिसीमन जनसांख्यिकी में परिवर्तन के आधार पर निर्वाचन क्षेत्रों की सीमाएं तय करने की प्रक्रिया है. 2002 में, जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने 2026 तक सीटों के नए परिसीमन पर रोक लगाने का कानून पारित किया था. कई लोगों का मानना है कि परिसीमन से घनी आबादी वाले और हिंदू बहुल जम्मू क्षेत्र में निर्वाचन क्षेत्रों की संख्या बढ़ जाएगी, जिससे भाजपा को लाभ होगा. पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती का कहना है, ''केंद्र सरकार की मंशा साफ और डरावनी है. यह देश के एकमात्र मुस्लिम बहुल राज्य की जनसांख्यिकी को बदलना चाहती है, और मुसलमानों को इस हद तक लाचार कर देने को आमादा है कि वे अपने ही राज्य में दोयम दर्जे के नागरिक बनकर रह जाएं.''

कानूनी पेच

कांग्रेस प्रवक्ता अभिषेक मनु सिंघवी ने अनुच्छेद 370 को कमजोर करने को ''कानूनी रूप से दोषपूर्ण और राजनैतिक रूप से आश्चर्यजनक कदम'' कहा. मोदी के नेतृत्व वाली भाजपा सरकार ने अनुच्छेद 370 को निरर्थक बना देने के लिए 'किल स्विच' का उपयोग किया है. इसलिए 5 अगस्त को जब गृह मंत्री शाह जम्मू-कश्मीर की स्वायत्तता को सबसे निर्णायक झटका देने के लिए राज्यसभा में खड़े हुए, तो उन्होंने संविधान में संशोधन के लिए कोई विधेयक नहीं रखा, बल्कि उन्होंने राष्ट्रपति के एक आदेश से हासिल उपलब्धि को रखा. यह संविधान (जम्मू और कश्मीर पर लागू) आदेश, 2019 है, जो (जम्मू और कश्मीर के लिए), 1954 के संवैधानिक आदेश का स्थान लेता है.

राष्ट्रपति के आदेश से तत्काल प्रभाव से संविधान में अनुच्छेद 370 के तहत जम्मू-कश्मीर राज्य को प्रदान किए गए विशेष दर्जे को खत्म कर दिया गया है. इसी के साथ अनुच्छेद 35ए भी निरस्त हो गया है, क्योंकि यह अनुच्छेद 370 से ही उपजा है जिसे 1954 में राष्ट्रपति के एक आदेश के माध्यम से प्रभावी किया गया था.

लेकिन क्या अनुच्छेद 370 सिर्फ राष्ट्रपति का एक आदेश से निष्क्रिय हो जाएगा? मोदी सरकार को यह बखूबी अंदाजा था कि इसे अदालत में चुनौती दी जाएगी. अनुच्छेद 370 की तीसरी धारा भारत के राष्ट्रपति को अनुच्छेद को निष्क्रिय या सक्रिय घोषित करने की शक्ति देती है, बशर्ते जम्मू-कश्मीर संविधान सभा उसका अनुमोदन करे. लेकिन जम्मू-कश्मीर संविधान सभा राज्य के संविधान का मसौदा तैयार करने के बाद 1956 में भंग हो चुकी है.

इससे यह राय बनी कि इस अनुच्छेद को कभी भी रद्द या संशोधित नहीं किया जा सकता क्योंकि संविधान सभा अब मौजूद नहीं है. सुप्रीम कोर्ट ने अप्रैल 2018 में कहा कि 'अस्थायी' शीर्षक के तहत होने के बावजूद, अनुच्छेद 370 अस्थायी नहीं है. 1969 के एक मामले में भी, शीर्ष अदालत ने अनुच्छेद 370 को अस्थायी मानने से इनकार कर दिया था और कहा था कि ''इसे कभी भी खत्म नहीं किया जा सकता.''

इस अवरोध को दूर करने के लिए राष्ट्रपति का आदेश पहले अनुच्छेद 367 में एक नया खंड जोड़ता है, जो जम्मू-कश्मीर के संबंध में व्याख्या से संबंधित है. यह 'राज्य की विधानसभा' को 'राज्य की संविधान सभा' बना देता है. विधानसभा स्थगित है, इसलिए आदेश कहता है कि विधानसभा के किसी भी संदर्भ को राज्यपाल के संदर्भ में माना जाएगा. राज्यपाल केंद्र द्वारा नियुक्ति होते हैं और इसलिए अब संसद को विधानसभा के अधिकार प्राप्त हैं. पीएमओ में राज्य मंत्री जितेंद्र सिंह कहते हैं, ''कानूनी राय ली गई है. वर्तमान में, संसद राज्य विधानसभा की भूमिका निभा रही है.''

संविधान विशेषज्ञ इस पैंतरेबाजी की कानूनी वैधता को लेकर बंटे हुए दिखते हैं. ए.जी. नूरानी का कहना है, ''यह पूरी तरह से असंवैधानिक है. 1956 में संविधान सभा के विघटन के बाद, अनुच्छेद 370 को निरस्त करने की शक्ति समाप्त हो गई.'' हालांकि, महाराष्ट्र नेशनल लॉ यूनिवर्सिटी में कानून की सहायक प्रोफेसर श्रेया मिश्र और सुप्रीम कोर्ट के वकील राकेश द्विवेदी का मानना है कि सरकार के फैसले के खिलाफ कोई भी दलील टिकेगी नहीं क्योंकि राष्ट्रपति के आदेश में तकनीकी खामियां नहीं हैं. लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप का मत भी यही है. कश्यप कहते हैं, ''राज्य, केंद्रीय शासन के अधीन है, संसद की व्याख्या जम्मू-कश्मीर की विधायिका के रूप में की जा सकती है. इसलिए किसी बदलाव के लिए राज्य सरकार की सहमति की आवश्यकता नहीं है.''

शाह ने राज्यसभा में एक वैधानिक प्रस्ताव भी पारित किया है जिसमें सिफारिश की गई थी कि राष्ट्रपति एक अधिसूचना जारी करके—अनुच्छेद 370 की धारा 3 का उपयोग करते हुए—यह घोषणा करते हैं कि अनुच्छेद 370 के सभी प्रावधान निष्क्रिय हो जाएंगे और जम्मू-कश्मीर राज्य के लिए भारतीय संविधान के सभी प्रावधान लागू होंगे. यह अनुच्छेद 370 को सभी व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए निरर्थक और शून्य बना देता है, भले ही वह निरस्त न होता हो.

जबकि ऐसा प्रतीत होता है कि सरकार ने ''जम्मू और कश्मीर की गैर-मौजूद संविधान सभा की सहमति'' से निपटने की दिशा में पुख्ता प्रयास तो किए हैं पर संविधान के विशेषज्ञों ने अनुच्छेद 367 में एक नया क्लॉज डालने की वैधता पर सवाल उठाया है क्योंकि यह संविधान संशोधन की प्रक्रिया है. यह अनुच्छेद 368 का उल्लंघन करता है, जिसमें उल्लेख किया गया है कि संसद में एक विधेयक पेश करके और इसे दोनों सदनों के दो-तिहाई सदस्यों के बहुमत से पारित और मतदान कराकर ही संविधान में संशोधन किया जा सकता है.

 शाह ने संसद में कहा, ''हमें पांच साल दे दो, और हम जम्मू-कश्मीर को देश का सबसे विकसित राज्य बना देंगे. मैं कश्मीर घाटी के युवाओं से कहना चाहता हूं, नरेंद्र मोदी सरकार में विश्वास रखो. कोई नाइंसाफी नहीं होगी.''

लेकिन क्या कश्मीरियों को गृह मंत्री की बातों पर यकीन होगा? फिलहाल, घाटी में पुलिस की तैनाती से खामोशी पसरी है. लेकिन यह टूटेगी भी तो! 5 अगस्त, 2019 की तारीख को भारतीय इतिहास में किस रूप में याद किया जाएगा, यह आने वाला वक्त बताएगा.

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