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भारत-अमेरिका 2+2 डायलॉग में दोतरफा रिश्तों को ऊंचाइयां देने की होगी कोशिश

इस समझौते से भारत के मिलिटरी प्लेटफॉर्म पर सिक्योर कम्युनिकेशन डिवाइस लगाने का रास्ता साफ हो जाएगा जिससे यूएस प्लेटफॉर्म्स पर बातचीत मुमकिन हो सकेगी. मौजूदा भारतीय प्लेटफॉर्म पर इसका उपयोग नहीं होता. 2$2 डायलॉग के दौरान समझौते पर हस्ताक्षर मुमकिन हैं.
भारत-अमेरिका 2+2 डायलॉग में दोतरफा रिश्तों को ऊंचाइयां देने की होगी कोशिश अमेरिका का प्रतिनिधित्व वहां के विदेश मंत्री माइक पोम्पियो और रक्षा मंत्री जिम मैटिस करेंगे जबक
संदीप उन्नीथननई दिल्ली, 05 September 2018

भारत और अमेरिका 6 सितंबर को अपने सबसे अहम दोतरफा शिखर सम्मेलन की शुरुआत करने जा रहे हैं जब अमेरिकी विदेश मंत्री माइक पोक्विपयो और रक्षा मंत्री जिम मैटिस अपने भारतीय समकक्षों विदेश मंत्री सुषमा स्वराज और रक्षा मंत्री निर्मला सीतारमण के साथ अपने पहले "टू प्लस टू संवाद (2+2 डायलॉग)'' की नींव रखेंगे.

2+2 संवाद दोनों देशों के बीच उच्च स्तर का भरोसा कायम करने के लिए है और इसमें बारी-बारी से दोनों देशों में आयोजित होने वाले संवाद की सालाना शृंखला की पहली कड़ी होने की उम्मीद और संभावना छिपी है. अमेरिका के साथ भारत की यह जुगलबंदी ऐतिहासिक भारत-अमेरिका असैन्य परमाणु समझौते की 10वीं सालगिरह पर हो रही है.

अलबत्ता इस मौके पर मुस्कराते चेहरे इस हकीकत पर शायद ही परदा डाल पाएं कि भारत और अमेरिका के रिश्ते 2006 में दोनों देशों के बीच परमाणु समझौते पर दस्तखत होने और रणनीतिक भागीदार बनने के बाद से ही बीते एक दशक में अपने सबसे बदतरीन दौरों में से एक से गुजर रहे हैं.

अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की दिसंबर 2017 की राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति ने हिंदुस्तान को "अमेरिका का बड़ा रक्षा भागीदार'' कहा था और उसके साथ "अपना रक्षा और सुरक्षा सहयोग बढ़ाने'' का वादा किया था. साथ ही इसमें इस्लामी दहशतगर्दों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करने के लिए 1.8 अरब डॉलर की आर्थिक सहायता रोककर पाकिस्तान पर नकेल डालने का वादा भी किया गया था.

हालांकि राष्ट्रपति के हाल के कदमों ने भारत को मायूस ही किया है. पूर्व भारतीय विदेश सचिव कंवल सिब्बल कहते हैं, "2+2 संवाद उस वक्त हो रहा है जब राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियों ने अंतरराष्ट्रीय मामलों में अनिश्चितता पैदा कर दी है, अमेरिका के सहयोगी और विरोधी, दोनों देशों के सुविधाजनक क्षेत्र में और साथ ही भारत सरीखे भागीदारों के पूर्वानुमानों में हलचल मचा दी है.''

ये तमाम सहमतियां एक भीषण कानून जिसे सीएएटीएसए (प्रतिबंधों के जरिये अमेरिका के विरोधियों का मुकाबला करने का कानून) की मंडराती छाया में उद्घाटित होने जा रही हैं. सीएएटीएसए इस साल अप्रैल में लागू हुआ था.

यह रूस और ईरान पर पाबंदियां आयद करता है—जो दोनों ही भारत के रणनीतिक भागीदार हैं. एक, उसका सबसे बड़ा हथियार सप्लायर है और दूसरा, उसका तीसरा सबसे बड़ा ऊर्जा सप्लायर. सीएएटीएसए अमेरिका को रूस के साथ अच्छा-खासा कारोबार करने वाले देशों पर "दूसरे दर्जे की पाबंदियां'' आयद करने का अधिकार देता है.

पिछले महीने यूएस कांग्रेस ने नेशनल डिफेंस ऑथराइजेशन ऐक्ट (एनडीएए) का बदला हुआ संस्करण पारित किया, जो अमेरिकी राष्ट्रपति को भारत को प्रतिबंधों से छूट देने का अधिकार देता है. इसकी बदौलत भारत रूस से एस-400 लंबी दूरी की पांच एयर डिफेंस मिसाइलें खरीदने के लिए 5 अरब डॉलर के सौदे पर दस्तखत कर सकेगा. यह बदला हुए कानून नहीं होता तो भारत के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंध लगा दिए जाते. मगर यह राहत अस्थायी राहत ही है.

यह कोई खुली छूट नहीं, सशर्त छूट है, जिसमें अमेरिका को यह प्रमाणित करना होगा कि भारत, रूस के हथियारों पर निर्भरता से अपने को अलग करने के लिए पर्याप्त कदम उठा रहा है. इससे अमेरिका को भारी गुंजाइश मिल जाती है जिसका इस्तेमाल वह भारत से रियायतें हासिल करने के लिए कर सकता है.

फिर भारत के ईरान से 10 अरब डॉलर के तेल का आयात करने का मुद्दा है. ईरान वह देश है जिस पर अमेरिका ने प्रतिबंध लगा दिए हैं. अमेरिका चाहता है कि नवंबर तक ईरान से तेल का आयात पूरी तरह बंद कर दिया जाए. कूटनीतिज्ञों ने इसकी तुलना जोर-जबरदस्ती और बल प्रयोग से की है. जब अमेरिका ने पिछली बार 2012 में प्रतिबंध लगाए थे, तब भारत ने उसकी बात मानी थी और ईरान से अपने तेल आयात में जबरदस्ती कटौती की थी.

इस बार वह ऐसा नहीं कर सकता क्योंकि उसने ईरान में साथ मिलकर रणनीतिक चाबहार बंदरगाह का विकास किया है जो पाकिस्तान को बाइपास करके भारत को अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंचने का रास्ता मुहैया करता है और साथ ही उसने अंतरराष्ट्रीय उत्तर-दक्षिण यातायात गलियारे का निर्माण किया है, जो माल जहाजों के यूरोप तक पहुंचने के समय में जबरदस्त कटौती कर देता है.

विवाद का एक और मुद्दा है जिसके 2+2 संवाद में उभरकर आने की संभावना है. वह है अमेरिका का एच-1बी वर्क वीजा देने के नियमों को सक्चत बनाना. अब यह उन्हें बनिस्बतन कम वन्न्त के लिए दिया जा रहा है, जिससे कर्मचारियों के लिए ग्रीन कार्ड की अर्जी देना मुश्किल हो गया है. जुलाई में अमेरिका स्थित एक गैर-मुनाफाई संस्था नेशनल फाउंडेशन फॉर अमेरिकन पॉलिसी ने कहा कि भारतीयों के लिए एच-1बी वीजा नामंजूर कर देने की तादाद में 42 फीसदी का इजाफा हुआ है.

भारत ने देश से इस्पात और एल्यूमिनियम के अमेरिकी आयात पर शुल्क लगाने को स्थगित किया है. 2+2 संवाद की उम्मीद में भारत ने बदले में लगाए जाने वाले टैरिफ लागू करने को स्थगित कर दिया है और इस तरह बातचीत की गुंजाइश बनाए रखी है.

अच्छी बातें भी हैं. इस साल दो बार स्थगित किए जा चुके मंत्री स्तरीय 2$2 संवाद में 5 अरब डॉलर से ज्यादा कीमत की मिसाइलों, ड्रोन और हेलिकॉप्टरों के लिए रक्षा सौदों पर बातचीत की संभावना है.

अमेरिका के साथ दो अहम समझौतों की शुरुआत भी संभावित है—इनमें से एक सीओएमसीएएसए या कम्युनिकेशंस कॉम्पैटिबिलिटी ऐंड सिक्योरिटी एग्रीमेंट है जिनसे भारत के अमेरिका निर्मित सैन्य प्लेटफॉर्म विशेष संचार डिवाइसों की स्थापना के बाद अमेरिका और नाटो प्लेटफॉर्मों के साथ संचार कर पाएंगे; दूसरा बीएसीए या बुनियादी आदान-प्रदान और सहयोग समझौता है, जो ऐसी सूचनाओं की अदला-बदली की इजाजत देगा.

भारतीय रक्षा अधिकारियों का कहना है कि गोपनीयता की चिंताओं की वजह से सीओएमसीएएसए के—कुछ निश्चित बदलावों के साथ - "सशर्त'' होने की संभावना है.

रक्षा में बढ़ते कदम

भारत-अमेरिका संबंध सैन्य अञ्जयासों और हथियारों की बिक्री के मामले में हैरतअंगेज रफ्तार से आगे बढ़े हैं. भारत और अमेरिका की सेनाएं किसी भी दूसरे देश की सेना के साथ जितने सैन्य अभ्यास करती हैं, उससे कहीं ज्यादा सैन्य अभ्यास वे एक दूसरे के साथ करती हैं. इस साल वे पहली संयुक्त सेनाओं का अभ्यास करेंगी. अगले साल संयुक्त सेनाओं का आतंकवाद से मुकाबले का अभ्यास होगा.

भारत और अमेरिका को अपने पहले न्यूक्लियर रिएक्टर के सौदे पर अभी दस्तखत करने हैं, पर 2010 और 2018 के बीच हिंदुस्तान 15 अरब डॉलर मूल्य के विमान, होवित्जर, हेलिकॉप्टर और मिसाइलें अमेरिका से खरीद चुका है.

अमेरिका डिफेंस हार्डवेयर का भारत का दूसरा सबसे बड़ा सप्लायर है और उसने चिनूक मीडियम लिक्रट हेलिकॉप्टर, अपाचे हेलिकॉप्टर गनशिप, पी-8आइ पोसाइडन लांग-रेंज मेरिटाइम सर्विलांस एयरक्राफ्ट, सी-130 मीडियम ट्रांसपोर्ट एयरक्राफ्ट और सी-17 हेवी लिफ्ट एयरक्राफ्ट सप्लाई किए हैं.

इनमें से कम से कम तीन प्लेटफॉर्म के लिए भारत ने दोबारा ऑर्डर दिया और इस तरह भारत को रूसी उपकरणों पर निर्भरता से अलग करके अमेरिकी हार्डवेयर की तरफ लाने के रणनीतिक मकसद को पूरा करने में अमेरिका की मदद की.

इस्लामाबाद में भारत के पूर्व उच्चायुक्त जी. पार्थसारथी कहते हैं, "समूचा रिश्ता, खासकर ट्रंप के जमाने में, तकरीबन पूरा का पूरा लेनदेन का है. 2$2 अच्छा विचार है. इसकी कामयाबी इस बात पर निर्भर करेगी कि पहली बैठक कितनी फलदायी रहती है. जैसा कि हम इशारा कर रहे हैं, अगर हम अमेरिकी मिसाइलें और नौसैन्य हेलिकॉप्टर खरीदने पर विचार कर रहे हैं, तो वह साथ आएगा.''

पिछले साल अमेरिका ने अपने सैन्य बजट एनडीएए 2017 के तहत भारत को प्रमुख रक्षा भागीदार घोषित किया था. 1 अगस्त को ट्रंप प्रशासन ने भारत को स्ट्रैटजिक ट्रेड ऑथराइजेशन-1 (एसटीए-1) की सूची में रख दिया, जिसका मतलब है कि भारत अमेरिका से महंगी और ऊंची टेक्नोलॉजी खरीद सकता है.

इस अमेरिकी कानून का अर्थ है कि भारत को अंतरिक्ष और रक्षा उपयोगों में दोहरे इस्तेमाल वाली संवेदनशील टेक्नोलॉजी के निर्यात के लिए अलग-अलग लाइसेंस लेने की जरूरत नहीं है.

यह संवेदनशील टेक्नोलॉजी तक पहुंच के मामले में हिंदुस्तान को दक्षिण कोरिया और जापान सरीखे अमेरिका के सहयोगी देशों के बराबर खड़ा कर देता है.

अमेरिका एसटीए-1 का दर्जा केवल उन्हीं देशों को देता है जो सभी चारों—वासेनार अरेंजमेंट, मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम (एमटीसीआर), न्यूक्लियर सप्लायर्स ग्रुप (एनएसजी) और ऑस्ट्रेलिया ग्रुप—के सदस्य हैं. (भारत चीन के विरोध की वजह से अभी तक एनएसजी का सदस्य नहीं बन सका है.)

जब भारत के रक्षा मंत्रालय ने पिछले हफ्ते सरकार से सरकार के बीच एक सौदे में अमेरिका से 1.8 अरब डॉलर के 24 एमएच-60आर मल्टी-रोल हेलिकॉप्टर खरीदने को मंजूरी दे दी है तो रिश्तों का जारी रहना तय ही है.

एमएच-60आर भारतीय जंगी जहाजों से ऑपरेट करेंगे और हेलिकॉप्टरों की भारी कमी को पूरा करेंगे. जंगी जहाज फिलहाल हेलिकॉप्टरों के बगैर सेवा में लिए जा रहे हैं. जिस एक और अहम सौदे पर बातचीत चल रही है, वह एमक्यू-9 "गार्डियन'' हाइ एल्टीट्यूड लांग एंड्यूरेंस (एचएएलई) ड्रोन का सौदा है.

अमेरिका ने पिछले साल इसकी बिक्री की मंजूरी दी थी. गार्डियन एचएएलई न केवल 40,000 फुट से भी ज्यादा की ऊंचाई पर उड़ान भर सकते हैं, जो नौसेना के मौजूदा इज्राएली हेरोन मीडियम एल्टीट्यूड लांग एंड्यूरेंस ड्रोन की ऊंचाई से तकरीबन दोगुनी है, बल्कि 24 घंटे तक हवा में तैरते भी रह सकते हैं.

चूंकि इन्हें उपग्रह से नियंत्रित किया जाता है, इसलिए इन ड्रोन का जहाज की या तट पर स्थित नियंत्रण कक्षों की नजर की सीध के भीतर होना जरूरी नहीं है. एक बड़े रक्षा अधिकारी कहते हैं, "गार्डियन गेमचेंजर हैं और हिंद महासागर से गुजरने वाले जंगी जहाजों का पता लगाने के लिए हमारी अहम पूंजी होंगे.''

अमेरिका-भारत डिफेंस ट्रेड ऐंड टेक्नोलॉजी इनिशिएटिव (डीटीटीआइ) के तहत कार्यक्रमों की धीमी रफ्तार गहरी चिंता का विषय है. 2012 में तब के अमेरिकी रक्षा सचिव एश्टन कार्टर ने इसे पेश किया था. डीटीटीआइ के छह संयुक्त कार्यसमूह साल में दो बार मिलते हैं.

भारत-अमेरिका संयुक्त उद्यम अभी उड़ान भरना शुरू भी नहीं कर सके हैं, क्योंकि या तो वे निचले पायदान पर हैं—या फिर वे बेहद महंगे हैं. नौसेना के पूर्व चीफ एडमिरल अरुण प्रकाश कहते हैं, "दोनों गेंद हमारे पालों में है. लगता है, हमने सही डिफेंस टेक्नोलॉजी के बारे में पूछा नहीं और अमेरिका ने हमें खास मतलब की किसी चीज की पेशकश नहीं की.''

वाशिंगटन साफ तौर पर भारत को आगे बढ़ते चीन के बरअक्स एक क्षेत्रीय ताकत के तौर पर और चार लोकतांत्रिक देशों अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया और भारत के अनौपचारिक समूह "क्वाड्रीलैटरल'' (चतुर्भुज) के अनिवार्य हिस्से के तौर पर देख रहा है. लेकिन भारत चीन को लेकर चौकस है, जिसके साथ उसकी 4,400 किलोमीटर लंबी विवादित सीमा है.

भारत चीन की एशिया से होकर गुजरने वाली भारी भरकम ढांचागत परियोजना बेल्ट और रोड पहल (बीआरआइ) का विरोध कर रहा है, जो जम्मू-कश्मीर के विवादित क्षेत्र से भी होकर गुजरने वाली है.

हाल का कोई और घटनाक्रम भारत के राजनयिक संतुलन साधने की कोशिश को दर्शा नहीं सकता, जैसा कि 24 अगस्त को मध्य रूस के चेबारकुल में मिलिटरी मैनूवर एक्सरसाइज पीस मिशन में नजर आया, जिसमें भारत, चीन, पाकिस्तान और रूस सहित शंघाई सहयोग संगठन (एससीओ) के सभी आठ सदस्य देशों की सेनाओं ने हिस्सा लिया. इनमें से एक सबसे पुराना रणनीति साझेदार है, तो एक अन्य रणनीतिक रूप से चुनौती है तो तीसरा पुराना दुश्मन.

इन तीनों के पास अमेरिका के खिलाफ एकजुट होने की वजहें हैं. राजनयिक कहते हैं कि वुहान बैठक चीन की वैश्विक आकांक्षाओं और भारत की बढ़ती क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय भूमिका के बीच के बुनियादी अंतरविरोधों को दूर नहीं कर सकी. सिब्बल कहते हैं, वुहान तो इस अंतरविरोध को समायोजित करने की सिर्फ एक कड़ी था.

भारत-अमेरिका-जापान-ऑस्ट्रेलिया संबंध खुद को द्विपक्षीय और त्रिपक्षीय तथा चतुर्थपक्षीय रूप में प्रदर्शित कर रहे हैं, जिसकी आधिकारिक रूप से दो बार बैठक हो रही है. भारत-प्रशांत क्षेत्र में जब तक इन चारों देशों के हित चीन की चुनौती के मद्देनजर कायम रहेंगे, क्वाड की अहमियत बनी रहेगी.

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