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प्यार के लिए जाति-धर्म की दीवारें तोड़ रहे युवा

कस्बों में हो या शहरों में, आज युवा अपने मनचाहे साथी के लिए जाति, धर्म और दूसरे सामाजिक बंधन तोड़ रहे हैं. जरूरत पडऩे पर वे घर-परिवार छोड़कर भाग भी रहे.

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aajtak.in
सरोज कुमार 03 June 2015
प्यार के लिए जाति-धर्म की दीवारें तोड़ रहे युवा


दरार पड़ी दीवार, यह गिरेगी! इसे गिरने दो! यह समाज कब तक टिका रहेगा." आज से करीब 61 साल पहले फणीश्वरनाथ रेणु अपने कालजयी उपन्यास मैला आंचल में जब यह बयां कर रहे थे तो उन्हें आभास था कि समाज में जकड़ी हुईं कई तरह की बेडिय़ां ज्यादा वक्त तक टिकी नहीं रह पाएंगी. उनकी तीसरी पीढ़ी प्रेम के मामले में कुछ इसी जज्बे की मिसाल है. रेणु के पौत्र अनंत कुमार ने 29 अप्रैल को जाति के बंधन को एक और धक्का देते हुए दलित समुदाय की अमृता से विवाह कर लिया. रेणु की तीसरी शादी भी अंतरजातीय ही थी. लेकिन यह कहानी सिर्फ रेणु के परिवार की नहीं है. यह बदलते देश और समाज की कहानी है. बिहार में भी युवा ऐसी ही नजीर पेश कर रहे हैं. जाति हो, धर्म हो या रुतबा, सभी पारंपरिक बेडिय़ों को तोड़ते हुए आज युवाओं का प्यार परवान चढ़ रहा है.

गया में प्रमे विवाह करन वाले सन्नी और किरणस्टेटस नहीं, दिल का मामला
बिहार में पूर्वी चंपारण जिले के 29 वर्षीय अनुराग दुबे ने भी पिछले साल 30 दिसंबर को दिल्ली की नीमा चौरसिया से शादी कर ली. शादी में दोनों के परिवार खुशी-खुशी शामिल हुए. दिल्ली विश्वविद्यालय (डीयू) में पढ़ाई के दौरान दोनों में प्यार हुआ. अनुराग असम के केंद्रीय विद्यालय में अध्यापक हैं तो नीमा डीयू में लेक्चरर. पर हर किसी की कहानी इन दोनों की तरह नहीं है. यूपी के गाजीपुर में जन्मी लेकिन बिहार में पली-बढ़ी और दिल्ली के एक दैनिक अखबार में कार्यरत पूनम मिश्र को महाराष्ट्र के ओबीसी समुदाय के सचिन से शादी के लिए न सिर्फ सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा बल्कि उनके परिवार ने भी उनसे नाता तोड़ लिया.

ऐसा भी नहीं है कि यह हौसला बिहार से बड़े शहरों की ओर रुख करने वाले उच्च शिक्षित युवाओं में ही देखा जा रहा है. छोटे कस्बों की कहानी तो और भी हैरानी भरी है. बिहार में गया जिले के टिकारी थाना के मखपा गांव की तेली जाति की दसवीं पास खुशबू ने घर से भागकर कुर्मी जाति के उदय राउत के साथ शादी रचा ली. गया के बाल संरक्षण इकाई के सहायक निदेशक आलोक कुमार बताते हैं, "पिछले डेढ़ साल में गया में करीब 30 युवतियों ने अंतरजातीय विवाह प्रोत्साहन राशि के लिए आवेदन किया है." जाहिर है, छोटे कस्बों और गांवों में प्यार के प्रतिमान तेजी से बदल रहे हैं तथा इसमें शिक्षा या स्टेटस का भी कोई फर्क नहीं पड़ रहा.

सारण में प्रेम अंतरजातीय विवाह करने वाले अंकुरआग का दरिया है और डूब के जाना है
पर प्यार के लिए समाज के बंधनों को तोडऩा इतना आसान भी नहीं. गया के विवेक कुमार ने जब संजू से अंतरजातीय शादी की तो उन्हें न केवल परिवार से अलग होना पड़ा बल्कि पानी, बिजली और शौचालय जैसी सुविधाओं से भी वंचित कर दिया गया. समाज ने उनका बहिष्कार कर दिया. इस दर्द को वे कुछ यूं बयान करते हैं, "लोग कहते कि मैं आवारा निकल गया, बिरादरी की नाक कटा दी. आखिरी वक्त तक शादी तोडऩे की कोशिश की गई."

यहां तक कि बेटियों की आजादी पर भी बंदिश लगाई जाती है. 26 सितंबर, 2014 को अंतरजातीय शादी करने वाली किरण कुमारी बताती हैं, "मेरे परिवार वाले समाज के तानों से दुखी हैं. लोग कहते कि बेटी को ज्यादा छूट देने की वजह से उसने छोटी जाति के लड़के से शादी कर ली. मां-बाबूजी को तो यह भी फिक्र है कि अन्य बेटे-बेटियों की शादी कैसे होगी?"

लेकिन मिट रहीं दूरियां
विवेक अपने प्यार का राज खोलते हैं, "हम दोनों का संपर्क मोबाइल फोन के जरिए हुआ और उसी के जरिए परवान भी चढ़ा." जाहिर है, मोबाइल और अन्य तकनीकों तथा शिक्षा ने दूरियां मिटा दी हैं. दिल्ली विश्वविद्यालय में इतिहास की प्रोफेसर चारू गुप्ता इसी ओर इशारा करती हैं, "महिला-पुरुष के बीच समाज ने जो अलगाव गढ़े थे, वे खत्म हो रहे हैं. दोनों के बीच पारस्परिक मेल बढ़ा है. खासकर महिलाएं घर की दहलीज लांघ रही हैं."

'लव जिहाद' थ्योरी को ठेंगा
अंतरजातीय प्यार या शादी करने वालों को थोड़ी-बहुत रियायत तो मिल भी जाती है, लेकिन अंतरधार्मिक रिश्तों के लिए परिवार और समाज कतई तैयार नहीं होता. सारण जिले के बड़े तेलपा की 19 वर्षीया शाहीना खातून ने जब घर से भागकर 20 वर्षीय मिथलेश कुमार सिंह से शादी की तो उन्हें न केवल सामाजिक प्रताडऩा सहनी पड़ी बल्कि उनके परिजनों ने मिथिलेश और उसकी मां को जान से मारने और घर जलाने की धमकी तक दी. मजबूरन उन्हें आत्मसमर्पण करना पड़ा और शाहीना को अल्पावास पुनर्वास केंद्र भेज दिया गया. अदालत के आदेश के बाद नवंबर, 2014 से दोनों पति-पत्नी के बतौर रह रहे हैं. शाहीना मां बनने वाली हैं. उसके पिता अब बेहद बीमार हैं पर बेटी से मिलना तक नहीं चाहते. मिथलेश की मां भी शाहीना को लेकर सहज नहीं हैं.

लव जिहाद थ्योरी को ठेंगा दिखाया पूजा नेवहीं सारण जिले की ही पूजा की कहानी लव जिहाद की थ्योरी गढऩे वाले संघी समूहों के मुंह पर करारा तमाचा है. पिछले 2 अप्रैल को वे अपने प्रेमी मोहम्मद इश्तियाक के साथ घर से भाग गईं. भला समाज और परिवार को यह कैसे मंजूर होता. पूजा के पिता जगनारायण सिंह ने इश्तियाक और उसके पिता हसन इमाम के खिलाफ अपहरण की प्राथमिकी दर्ज कराई. इससे बचने के लिए पूजा और इश्तियाक ने अदालत में समर्पण कर दिया. बोधगया की मियां बिगहा निवासी 18 वर्षीया डॉली कुमारी की दास्तान भी ऐसी ही है. उन्हें बेलागंज प्रखंड के तौफीक आलम से प्यार हो गया, पर परिवार और समाज उनके रिश्ते का दुश्मन बना रहा. लिहाजा पिछले साल 29 अक्तूबर को दोनों ने भागकर मंदिर में शादी कर ली. डॉली के परिजनों ने तौफीक और उसके घरवालों पर अपहरण और बहला-फुसलाकर शादी करने का केस दर्ज करा दिया है. डॉली बताती हैं, "मैं अपने पति और उनके परिजनों को जेल जाने से बचाने के लिए पुलिस के समक्ष हाजिर हो गई." पिछले 18 अप्रैल से डॉली भी गया के पुनर्वास केंद्र में हैं. चारू गुप्ता कहती हैं, "समाज में जहां धर्म और जाति का राजनीतिकरण बढ़ा है, वहीं इनमें दरारें भी पैदा हो रही हैं. युवा उनको चुनौती दे रहे हैं, लिहाजा बांटने वाली ताकतों की प्रतिक्रिया भी बढ़ी है. लव जिहाद का झूठा मिथक इसकी मिसाल है."

आंकड़ों में भी जबरदस्त उछाल
समाज और परिवार का अडिय़ल रुख ही है कि ऐसे ज्यादातर प्रेमी युगलों को प्यार या शादी के लिए घर से भागना पड़ रहा है. लेकिन वे उनसे पीछा नहीं छुड़ा पाते क्योंकि परिजन उनके खिलाफ अपहरण और बहला-फुसलाकर शादी करने का मामला दर्ज करा देते हैं. लेकिन इससे युवाओं को कोई फर्क नहीं पड़ रहा. इस सिलसिले में बिहार पुलिस के आंकड़े चैंकाने वाले हैं. प्रेम-प्रसंग में घर छोड़कर भागने वाले युवाओं की संख्या में करीब आठ गुना बढ़ोतरी हुई है. पुलिस ने राज्य में अपहरण के दर्ज मामलों की जांच के बाद खुलासा किया है कि 2010 में जहां प्रेम की खातिर घर से भागने वालों की संख्या सिर्फ 82 थी, वह 2014 में 763 हो गई, तो इस साल सिर्फ पहले तीन माह में यह संख्या 277 पहुंच गई है. और यह संख्या सिर्फ अपहरण के दर्ज मामलों की है.

बिहार में प्रेम प्रसंग में घर से भागने वालों की संख्या बढ़ीडर के आगे जीत है
सारण की ब्राह्मण जाति की अंकिता और अतिपिछड़ी जाति से आने वाले उनके पति के परिवारों में रिश्ते सामान्य होने में तीन साल लग गए. इसके लिए अंकिता के भाई ने ही पहल की. दोनों के दो बच्चे भी हो गए हैं. तो डॉली और पूजा जैसी कई लड़कियां पुनर्वास केंद्र में अपने प्रेमी से मिलन के इंतजार में दिन काट रही हैं. तमाम दुखों के बावजूद उनका हौसला नहीं टूटा है. बेडिय़ां तोड़ते इस प्यार को पूजा के इस हौसले में देखा जा सकता है, "हमारे रिश्ते को जाति और धर्म के बंधन में नहीं बांधा जा सकता. कोई भी मुश्किल हमें डिगा नहीं सकती." आज अगर रेणु होते तो शायद समाज की बेडिय़ों को टूटता देख अपनी चिरपरिचित मुस्कान में खुश हो रहे होते.
(—साथ में अशोक कुमार प्रियदर्शी और जितेंद्र पुष्प)

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