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दलितों के लिए अब भी अंधा युग

हरियाणा में दो दलित बच्चों को जिंदा जलाए जाने की घटना ने देश को झकझोरा, कई राज्यों में दलितों के खिलाफ अपराध में इजाफा.

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aajtak.in
सरोज कुमारनई दिल्ली, 30 October 2015
दलितों के लिए अब भी अंधा युग हरियाणा के सुनीपेड़ में जलाकर मारी गईं दलित बच्चियों के शव के साथ परिजन

हरियाणा में दलितों के खिलाफ अपराधअक्तूबर की 24 तारीख को देश की राजधानी दिल्ली से 40 किमी दक्षिण में हरियाणा के सुनपेड़ गांव में गांववाले कम, पुलिसवाले ज्यादा नजर आ रहे थे. जहां-तहां पुलिस की गाडियां खड़ी थीं. तकरीबन दो हजार की आबादी वाले इस गांव को मुख्य सड़क बीचोबीच काटती है. दाईं गली के पक्क मकान में दाखिल होते ही धुएं से काली हो गई दीवार और दरवाजा नजर आता है. 19-20 अक्तूबर की रात इस घर में इंसानियत को जला देने का यह सबूत है. उस रात, जब लोग भगवती जागरण के कार्यक्रम में मशगूल थे, कथित तौर पर राजपूत समुदाय के कुछ लोगों ने पुलिस सुरक्षा वाले दलित जितेंद्र के मकान की चारदीवारी फांदकर उस कमरे में आग लगा दी, जिसमें वे अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ सोए हुए थे. इसमें झुलसकर एक साल की मासूम दिव्या और दो साल के वैभव की मौत हो गई, जबकि जितेंद्र की पत्नी रेखा दिल्ली के सफदरजंग अस्पताल में गंभीर हालत में भर्ती हैं. इस घटना ने देश को ऐसा झकझोरा कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी से लेकर हरियाणा के मुख्यमंत्री मनोहर लाल खट्टर को भी पीडि़त परिवार से मिलने आना पड़ा. चौतरफा दबाव के बाद मामले की सीबीआइ जांच की सिफारिश की जा चुकी है.

सुनपेड़ की इस दर्दनाक घटना को अभी दो दिन भी नहीं हुए थे कि 22 अक्तूबर को प्रदेश के गोहाना में 14 साल के दलित लड़के गोविंदा को कथित तौर पर पुलिस कस्टडी में मार दिया गया. बाद में स्थानीय थाने के दो सब-इंस्पेक्टरों पर मामला दर्ज कर लिया गया. लेकिन हिसार के भगाणा से लेकर सुनपेड़ और गोहाना की घटनाओं ने 'एक वर्ष-सर्वत्र हर्ष' वाली सरकार की पोल खोल कर रख दी है.

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में दलित उत्पीड़नप्रधानी की लड़ाई या कुछ और?
आगे बढऩे से पहले यह भी जान लें कि सुनपेड़ कांड की जड़ें कहां तक जाती हैं. दरअसल, सुनपेड़ की सरपंची पहले आरोपी राजपूत बलवंत के परिवार के पास थी, लेकिन 2010 में सीट दलितों के लिए सुरक्षित हो जाने के बाद जितेंद्र के चाचा जगमाल गांव के सरपंच बने. दोनों परिवारों की माली हालत ठीक है. 2014 में दोनों परिवारों में विवाद हुआ और इस घटना में राजपूत परिवार के तीन लोगों की हत्या कर दी गई. हत्या के आरोप में जितेंद्र के परिवार के 9 लोग अब तक जेल में हैं. इस हत्याकांड के बाद जितेंद्र के परिजन बदले की कार्रवाई के भय से गांव छोड़कर चले गए थे. जितेंद्र का परिवार डेढ़ माह पहले ही गांव लौटा था और उसके बाद यह वारदात हो गई. हालांकि जितेंद्र के चचेरे भाई विजय 2014 के हत्याकांड की वजह कुछ इस तरह बताते हैं, ''राजपूत युवक न केवल दलित महिलाओं के साथ छेडख़ानी कर रहे थे, बल्कि अपना फोन नाली में गिर जाने पर जातिसूचक टिप्पणी करते हुए एक दलित युवक से जबरन नाली से फोन निकलवा रहे थे." उनका कहना है कि 2014 के हत्याकांड में उनके परिवार का हाथ नहीं था. जितेंद्र का आरोप है कि वापस लौटने से राजपूत उन्हें लगातार धमकी दे रहे थे. वहीं बलवंत का परिवार साफ इनकार करता है, ''इस आगजनी में हमारा कोई हाथ नहीं है. हम तो खुद पीडि़त हैं, हमारे लोग मारे गए हैं."

मध्य प्रदेश में दलित उत्पीड़नबहुजन समाज पार्टी (बीएसपी) के नेता और स्थानीय विधायक टेक चंद शर्मा कहते हैं, ''यह घटना बेहद शर्मनाक है. लेकिन इसे जातिगत चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए. दोनों परिवारों में 10-15 साल से रंजिश है." प्रशासन भी इसे पारिवारिक रंजिश का मामला बता रहा है. लेकिन रंजिश के अलावा मामले की हकीकत और जड़ें उस सामाजिक तानेबाने में छुपी हुई हैं, जो राज्य में रह-रहकर कभी दलित-जाट तो कभी दलित और अगड़ी जाति की लड़ाई के रूप में फूट पड़ती हैं. फरीदाबाद जिले के बीएसपी कार्यालय सचिव कमल दत्त गौतम कहते हैं, ''दरअसल, दलितों के पास जमीन-संसाधन नहीं हैं. अधिकतर कथित ऊंची जातियों के यहां मजदूरी करते हैं या फिर आसपास की कंपनियों में काम करने लगते हैं. वे चुपचाप रहें तो ठीक लेकिन ज्यों ही वे उनके अत्याचारों का प्रतिरोध करते हैं या इस कुव्वत में आते हैं, ऊंची जातियों की ओर से रिएक्शन होता है." भगाणा से लेकर सुनपेड़ तक प्रतिरोध की यही प्रक्रिया नजर आती है. भगाणा में दलितों की जमीन पर जाटों के कब्जे का मामला हो या दलित लड़कियों के साथ कथित बलात्कार, दलितों ने स्थानीय स्तर से लेकर दिल्ली तक प्रदर्शन किया है.

राजस्थान में दलित उत्पीड़नराष्ट्रीय शर्म
दलितों के खिलाफ जुल्म का ऐसा हाल केवल हरियाणा में नहीं है. राजस्थान के नागौर जिले के डांगावास में इसी साल 14 मई को जाट समुदाय के लोगों ने एक दलित की जमीन पर कब्जे के विवाद को लेकर दलितों को ट्रैक्टर से कुचल दिया. पंजाब के संगरूर जैसे इलाकों में दलितों के लिए आरक्षित जमीन पर पुलिस की मिलीभगत से सवर्णों के कब्जे की कहानी भी पुरानी नहीं है. एनसीआरबी के मुताबिक, ऐसे अपराधों में 2013 के मुकाबले 2014 में राष्ट्रीय स्तर पर 19 फीसदी की वृद्धि हुई है. सबसे अधिक वृद्धि साझा तौर पर आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में हुई है, तो हरियाणा वृद्धि के मामले में दूसरे और मध्य प्रदेश तीसरे नंबर पर है. ऐसी घटनाओं की संख्या के मामले में उत्तर प्रदेश अव्वल है तो उसके बाद राजस्थान और चुनावी माहौल में डूबा बिहार है. कई मामले तो ऐसे हैं जो आधुनिक युग के नहीं लगते. मसलन, इस साल मई में महाराष्ट्र के शिरडी में मोबाइल पर डॉ. भीमराव आंबेडकर की रिंटोन बजाने पर एक 21 वर्षीय दलित की हत्या कर दी गई. तमिलनाडु में तिरुथंगल में सितंबर 2014 में घड़ी पहनने पर 16 साल के लड़के का उसके स्कूल के सवर्ण छात्रों ने हाथ काट डाला. इसी तरह इस साल फरवरी में यूपी के जालौन के माधोगढ़ में कथित तौर पर उंची जाति के लोगों ने विवाह समारोह में अपने साथ खाना खाने पर एक दलित की नाक काट दी.

बिहार में दलितों के खिलाफ अपराधमहज सियासी वोट बैंक?
सुनपेड़ की घटना पर प्रतिक्रिया पूछे जाने पर केंद्रीय मंत्री वी.के. सिंह ने विवादास्पद टिप्पणी करते हुए कहा कि अगर कोई कुत्ते को भी पत्थर से मार दे तो क्या उसके लिए सरकार को जिम्मेदार ठहराया जाएगा. इस बयान पर उन्हें बरखास्त करने की मांग करने वालों में अरविंद केजरीवाल से लेकर खुद बिहार में बीजेपी के सहयोगी जीतनराम मांझी भी हैं. बिहार के सीएम नीतीश कुमार ने तो राज्य में विधानसभा के चौथे दौर के प्रचार के मद्देनजर मुजफ्फरपुर में कहा, ''बिहार में जंगलराज का नाम लेकर डराने वाली बीजेपी बताए कि क्या हरियाणा में दलित बच्चों को जलाया जाना ही मंगलराज है?" लेकिन वे चुनाव से करीब दो माह पहले अपने प्रदेश के खगड़िया में दलित बस्ती पर भूमिहार समुदाय के हमले पर चुप्पी साधे रहे. वहीं प्रदेश में एक-एक कर भीषण दलित नरसंहारों के आरोपियों का बरी होना भी कोई मुद्दा नहीं बन पाता. बिहार में दलितों के वोट को अपने पाले में करने की पुरजोर कोशिश में जुटे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने भी बीजेपी शासित हरियाणा के सुनपेड़ कांड पर अब तक कुछ कहा नहीं है.

उत्तर प्रदेश में दलित उत्पीड़नबीएसपी प्रमुख मायावती के निर्देश पर सुनपेड़ पहुंचे पार्टी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष राजाराम ने हरियाणा में दलित उत्पीडऩ के खिलाफ पार्टी की ओर से संघर्ष चलाने की बात कही. लेकिन स्थानीय दलितों ने स्थानीय बीएसपी विधायक पर ही उंगली उठाते हुए कहा, ''टेक चंद शर्मा दलितों के वोट की बदौलत ही यहां से जीते और वे ही अब दलितों की बजाए प्रशासन और बीजेपी सरकार के साथ खड़े नजर आ रहे हैं." राजाराम ने भी इस तथ्य को सबके सामने कबूल किया और कार्रवाई का आश्वासन दिया. तो क्या दलितों की अहमियत सिर्फ उनके वोट हासिल करने तक रह गई है?

राजस्थान के डांगावास में दलितों पर जाटों के हमले के बाद का दृश्यइंसाफ की धुंधली आस
भगाणा मामले में इंसाफ न मिलने पर दलितों ने धर्म परिवर्तन का रास्ता चुना, तो बिहार में दलित नरसंहारों के आरोपी सबूत के अभाव में छूटते जा रहे हैं. ऐसे में कोई दो राय नहीं कि दलितों को इंसाफ मिलने की आस धुंधली ही नजर आती है. प्रशासन का दामन भी पाक-साफ नहीं दिखता. सुनपेड़ मामले में भले ही सात आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया हो, पर जितेंद्र के परिवार को डर है कि पुलिस कहीं उसे ही इस मामले में न फंसा दे. हालांकि हरियाणा के डीजीपी यशपाल कहते हैं, ''इस मामले की सीबीआइ जांच की सिफारिश कर दी गई है, सो इसकी जांच पर हमारा कुछ कहना उचित नहीं है." लेकिन हरियाणा में दलितों के खिलाफ अपराध के 68 फीसदी बढऩे की बात पूछने पर वे एनसीआरबी के आंकड़े पर ही संदेह जता देते हैं. वहीं सुनपेड़ और गोहाना के बाद अब हिसार में एक दलित ने पुलिस पर ज्यादती का आरोप लगा आत्महत्या कर ली है.

तो क्या एक मामला सीबीआइ को सौंपकर सरकार इन विस्फोटक हालात संभाल पाएगी जो सामाजिक गैरबराबरी के ज्वालामुखी से फूटते रहते हैं? दलित उत्पीडऩ की घटनाएं हर सरकार में होती आई हैं, ज्यादातर मामलों में उन्हें मुआवजा भी मिला है, पर न्याय कब मिलेगा?

(आंकड़ों का स्रोत: एनसीआरबी, 2014, वृद्धि: 2013 से 2014 में कुल अपराधों में वृद्धि)

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