एडवांस्ड सर्च

गीता प्रेस: मौन क्रांति का अहम मुकाम

चाय और चपाती की कीमत में गीता और उपनिषद् उपलब्ध कराता आया गीता प्रेस श्रमिक विवाद से उबरकर फिर से पटरी पर लौटने की कोशिश में. बदले परिवेश में बुद्धिजीवियों के बीच भी इसके उद्देश्यों और भूमिका को लेकर बहस शुरू.

Advertisement
aajtak.in
शिवकेश 11 August 2015
गीता प्रेस: मौन क्रांति का अहम मुकाम

अभी पिछले दिनों गुजरात का एक युवक गोरखपुर स्थित गीता प्रेस के प्रबंधक के पास पहुंचा. चेकबुक निकालते हुए उसने कहा कि दिवंगत पिता की अंतिम इच्छा के अनुरूप वह एक करोड़ रु. से ज्यादा की राशि चंदे में देना चाहता है. उसके पिता मानते आए थे कि उनके जीवन को दिशा देने में इस प्रेस की किताबों का अहम रोल रहा है. लेकिन प्रेस के लोगों ने चंदा लेने से साफ मना कर दिया. वजहः प्रेस चलाने के लिए चवन्नी की भी बाहरी मदद न लेना इसकी नीति रही है. पिछले दिसंबर में इस प्रेस में कर्मचारियों की एक दिन की हड़ताल देश भर के अखबारों और बाकी मीडिया में भी सुर्खियां बनी, जबकि ऐसे बीसियों प्रकाशनों/मीडिया संस्थानों में कर्मचारियों को अरसे से उचित मेहनताना न मिलने की खबरें चर्चा में नहीं आ रहीं. इतिहासकार रामचंद्र गुहा और आइटी एक्सपर्ट नंदन नीलेकणी जैसी शख्सियतों के बेंगलूरू स्थित न्यू इंडिया फाउंडेशन नाम के बौद्धिक जगत में चर्चित न्यास ने गीता प्रेस की भूमिका पर आलोचनात्मक शोध करवाया है. यह गीता प्रेस ऐंड द मेकिंग ऑफ हिंदू इंडिया नाम से किताब की शक्ल में बाजार में बस पहुंच ही रहा है. पिछले साल आम चुनावों से पहले प्रचार के लिए गोरखपुर पहुंचे (अब प्रधानमंत्री) नरेंद्र मोदी ने रैली के शुरू में ही कहाः “ये गोरखपुर की धरती ऐसी है, जहां हमारी महान सांस्कृतिक विरासत, हमारे ऋषियों-मुनियों का चिंतन, हमारे ज्ञानियों की सांस्कृतिक रचनाएं, इन सबको अक्षरदेह देने का काम, गीता प्रेस, गोरखपुर के द्वारा एक बहुत बड़ी सेवा हुई है. एक प्रकार से यह ज्ञान की उपासना का काम हुआ है.”

यह गीता प्रेस आखिर है क्या बला? ऐसा क्या छपता है यहां, जिसके चलते राजधानी दिल्ली से करीब 750 किमी पूर्वोत्तर में नेपाल की सीमा से लगे, गोरखपुर जैसे दूरदराज के पारंपरिक शहर में होने के बावजूद बार-बार एक मिथ की तरह इसका जिक्र आता है? अपना हर लम्हा सोशल मीडिया पर साझा करने को उतारू आज की पीढ़ी को तो खैर इसके बारे में बहुत जानकारी नहीं ही है, 40-60 की उम्र वाले भी यहां से छपी किताबें सस्ती होने के अलावा ज्यादा कुछ नहीं बता पाते.

गीता प्रेस के शुरू होने की कहानी और इसका अब तक का सफर असल में बड़ा ही दिलचस्प है. बात 1920 के दशक की है. कलकत्ता (अब कोलकाता) के एक मारवाड़ी सेठ जयदयाल गोयंदका रोज गीता पढ़ते थे. अठारहवें अध्याय में गीता सार के रूप में लिखी यह बात उनके दिल को छू गई कि -जो इस परम रहस्ययुक्त गीताशास्त्र को मेरे भक्तों में कहेगा, वह मुझको प्राप्त होगा.” सो वे उसकी व्याख्या भी करने लगे. बाद में लोगों के कहने पर अपनी व्याख्या एक प्रेस से छपवाई लेकिन उसमें भयंकर भूलें देखकर वे दुखी हो गए. यहीं आया खुद के प्रेस का ख्याल. गोरखपुर के अपने एक श्रद्धालु घनश्यामदास जालान के सुझाव पर उसी शहर में दस रु. किराए में एक मकान में शुरू हो गया गीता प्रेस.

आज गोरखपुर शहर के हिंदी बाजार में इसकी इमारत में सहेजकर रखी आगंतुक पुस्तिका में धर्म, समाज, शासन, प्रशासन, सेना और यहां तक कि न्यायपालिका की सैकड़ों शख्सियतों की टिप्पणियां पढ़कर तो यही लगता है कि यह प्रेस एक तीर्थस्थल का दर्जा पा चुका है. फरवरी 2007 में यहां आए सुप्रीम कोर्ट के पूर्व न्यायाधीश दोरैस्वामी राजू ने लिखा कि “आज गीता प्रेस आना मेरे लिए नितांत सौभाग्य की बात है...यहां के लोग आध्यात्मिकता की बुनियादी सेवा कर रहे हैं और भारतीय विरासत की कुछ इस तरह से हिफाजत कर रहे हैं, जिसकी दुनिया के इतिहास में मिसाल मिलनी मुश्किल है.” प्रवाही परंपरा के रामकथा गायक, संत मोरारी बापू ने अभी हाल ही में कहा कि “सत्साहित्य के प्रकाशन के लिए राष्ट्रीय सम्मान का सबसे बड़ा कोई हकदार है तो वह है गीता प्रेस.” कुछ घटनाएं इसकी अहमियत को पुख्ता करती हैं. 1992 में 6 दिसंबर जैसे घटनाप्रधान दिन की पूर्व संध्या पर उत्तर प्रदेश के राज्यपाल बी. सत्यनारायण रेड्डी राजधानी लखनऊ छोड़कर गीता प्रेस के एक कार्यक्रम में थे. वहां लोगों को उन्होंने माचिस के आकार की गीता दिखाते हुए कहा कि यह 38 वर्षों से लगातार मेरे साथ है.

इस साल 29 अप्रैल को 92 वर्ष के हो चुके इस प्रकाशन का छपाई का आंकड़ा देखकर सिर चकरा जाए. पिछले साल इसने करीब 5,000 टन कागज पर भगवद्गीता, रामचरित मानस और दूसरे ग्रंथ छापे, जो दूसरे किसी भी बड़े प्रकाशन में कागज की सालाना खपत से बीसियों गुने से भी ज्यादा है. राम और कृष्ण के देश भारत में गीता, मानस और उपनिषद् सरीखे हिंदुओं के प्रमुख धार्मिक-आध्यात्मिक ग्रंथों के प्रकाशन की तो यह जैसे पर्याय संस्था बन चुकी है. गीता और मानस इसके अगुआ ग्रंथ हैं. अब तक यहां से छपीं 2,000 पुस्तकों की कुल 61 करोड़ प्रतियों में से 21 करोड़ तो गीता और मानस की ही हैं. इसमें भी गीता की 100 से ज्यादा आकार-प्रकार और कई तरह की टीकाओं में 11.50 करोड़ से ज्यादा प्रतियां छपी हैं.

गोयंदका को धार्मिक मकसद में अपने से भी ज्यादा समर्पण वाले हनुमान प्रसाद पोद्दार मिल गए थे, जो उस समय के एक प्रकांड विद्वान थे और गीता प्रेस के पहले संपादक तथा उसकी मासिक पत्रिका कल्याण के संपादक बने. प्रेस का खर्च गोयंदका की ही कपड़े वगैरह बनाने वाली संस्था गोविंद भवन से मिलता था. आज भी वही व्यवस्था है. इसके परंपरावादी संस्थापकों ने इसकी मूल्य नीति शुरू में ही स्पष्ट कर दीः किताबों की कीमत उनकी लागत से कम रखी जाए. ज्यादा उपयोगी किताबों की कीमत तो नाममात्र की ही रखी जाए. उसी का नतीजा है कि गीता और मानस के कई संस्करण आज भी 10-100 रु. के भीतर मिल जाएंगे. शंकराचार्य की टीका वाला कठोपनिषद् एक मिस्सी रोटी (20 रु.) के दाम में उपलब्ध है. और चाय से भी आधी कीमत (2 रु.) में मिलने वाले हनुमान चालीसा की हर साल यहां से 50 लाख प्रतियां बिकती हैं. छपाई पूरी तरह निर्दोष हो, इसके लिए गलतियां पकड़ने पर पाठकों को इनाम देने की योजनाएं चलाई गईं.

प्रेस का मकसद न तो मुनाफा कमाना था, न है. तभी तो साल-दर-साल यह छपाई के अपने ही रेकॉर्डों को ध्वस्त करने लगा. मानस कभी व्यंकटेश्वर प्रेस, निर्णय सागर प्रेस और लखनऊ के मुंशी नवल किशोर प्रेस से छपा करता था लेकिन अखंड पाठ की परंपरा को बढ़ावा तो सही मायने में इसके गीता प्रेस से छपने के बाद ही मिल पाया. गौर तलब है कि यह मानस 1930 में नंददुलारे वाजपेयी समेत कई विद्वानों के सहयोग से तैयार करवाया गया. पहले इसमें कई पाठभेद थे. यह मानस कल्याण मासिक के पांचवें वार्षिकांक के रूप में छपा था.

गोयंदका के रहते ही यह भी तय हो चुका था कि प्रेस के लिए किसी से चवन्नी का भी चंदा नहीं लिया जाएगा. साथ ही प्रेस का पैसा प्रेस में ही लगेगा. संस्था के एक बुजुर्ग न्यासी, चार्टर्ड एकाउंटेंट विष्णु प्रसाद चांदगोठिया स्पष्ट करते हैं, “गोयंदका जी के समय से ही प्रेस का मानना रहा है कि मदद करने वाले व्यक्ति, संस्थाएं कब क्या करने को कह दें, इसलिए यह झंझट ही खत्म कर दिया गया.”

छपाई के लिए कागज खुले बाजार से खरीदा जाता है. इस तरह के प्रेस की किताबें ग्राहकों तक भेजने में डाक या किसी तरह के रेल व्यय में “गो, गंगा, गीता” वाली राष्ट्रवादी नरेंद्र मोदी सरकार भी धेले भर की रियायत नहीं देती.

गीता प्रेस पर बात करते वक्त गोयंदका और पोद्दार के दिलचस्प रिश्तों को एक वाकए से समझा जा सकता है. दोनों में एक बार श्रीमद्भागवत के दसवें स्कंध के पांच अध्याय छापने को लेकर विवाद हो गया. 29वें से 33वें अध्याय को रास पंचाध्यायी कहा जाता है क्योंकि इसमें भगवान कृष्ण के रास का वर्णन है. गोयंदका इसे अश्लील कहकर निकाल देने के पक्ष में थे, लेकिन पोद्दार का कहना था कि इससे तो भागवत ही निष्प्राण हो जाएगी. लंबी चली बहस के बाद अंत में पोद्दार ने तर्क रख दिया कि लिखते वक्त अगर वेदव्यास ने इसे अश्लील नहीं माना तो अब हम क्यों मान रहे हैं? फिर भी गोयंदका के आग्रह पर वे पांच अध्याय पोद्दार की टिप्पणी के साथ छापे गए.
पोद्दार ही वे शख्स थे, जिनके बताए अनुसार प्रेस के तीन चित्रकारों ने हिंदू देवी-देवताओं के चित्र बनाए. कमोबेश उन्हीं चित्रों के आधार पर पाठकों में इन देवी-देवताओं की छवि बनी. अब वे हजारों चित्र प्रेस की लाइब्रेरी में सुरक्षित हैं. इसके अलावा भी वहां विभिन्न भाषाओं की 300 से ज्यादा दुर्लभ पांडुलिपियां मौजूद हैं, जिन्हें एक अपील पर लोगों ने इस उम्मीद से गीता प्रेस के पास भेज दिया कि यहां वे ज्यादा महफूज रहेंगी. एक नए बने हिस्से में शिफ्ट लाइब्रेरी में इसके इंचार्ज हरिराम त्रिपाठी लाल कपड़ों में जतन से लपेटकर रखी गई इन पांडुलिपियों की देखभाल करते हैं. इन्हीं में 1852 का वार्षिक पूजन भी है तो बांग्ला में महाभारत का विराट पर्व भी. गीता का हिंदी अनुवाद करने वाले हरिवंश राय बच्चन की जनगीता भी लाइब्रेरी की आलमारी की शोभा बढ़ा रही है.

खैर, अलग-अलग तबके के बुद्धिजीवी भी गीता प्रेस के काम से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके हैं. देश में संस्कृत के आधुनिक नजरिए वाले शीर्ष विद्वानों में से एक डॉ. राधा वल्लभ त्रिपाठी मानते हैं कि “दुनिया में ऐसा कोई संस्थान शायद ही मिले, जिसने इतने बड़े पैमाने पर धार्मिक-आध्यात्मिक साहित्य इतनी ऊंची गुणवत्ता और बेहद कम कीमत में उपलब्ध कराया हो. भारत में तो ऐसा नहीं ही है.” पौराणिक विषयों को उपन्यास की शैली में लाने वाले लेखक अमीश त्रिपाठी की राय में, “बहुत सारे धर्मशास्त्रों को एक दर्जन से ज्यादा भारतीय भाषाओं में लाने का गीता प्रेस का काम कहीं बड़ा है.” फिल्मकार डॉ. चंद्र प्रकाश द्विवेदी एक और मजेदार पहलू जोड़ते हैं, “आज जो युवा हैं, कल जब वे 50-60 में पहुंचेंगे और उनकी बातों, उनके मतों का खंडन होगा, उन्हें संसार की नश्वरता का बोध होगा तो उन्हें गीता प्रेस और वहां की धरोहर रूपी पुस्तकों की याद आएगी. गीता प्रेस अपने समय का एक बड़ा सच है.” मार्क्सवादी आलोचक डॉ. नामवर सिंह इसे मौन क्रांति बताते रहे हैं.

इस प्रकाशन ने धर्म को ज्यादा लोकतांत्रिक बनाया है. मराठी के दलित साहित्यकार शरण कुमार लिंबाले कहते हैं, “गीता प्रेस ने गीता और मानस बड़े पैमाने पर छापकर इसे सबको उपलब्ध करवा दिया. हिंदू धर्म की बुरी बातों को हम उसके शास्त्रों को पढ़कर ही तो पकड़ सकेंगे.”

पर हाल के कुछेक महीनों में यह प्रेस यहां के 200 से ज्यादा स्थायी श्रमिकों के असंतोष की वजह से लगातार चर्चाओं में रहा. पिछले साल 15 दिसंबर को श्रमिक विवाद भड़क जाने के बाद पहली बार प्रेस में तालाबंदी हुई. हालांकि इसकी प्रतिष्ठा और इतिहास के मद्देनजर श्रमिक नेताओं, प्रेस प्रबंधन और प्रशासनिक अधिकारियों ने इसे लंबा नहीं खिंचने दिया लेकिन कर्मचारियों के “ग्लो-स्लो” आंदोलन के चलते महीनों तक दो शिफ्टों की बजाए एक शिफ्ट में ही काम होता रहा. आखिरकार प्रशासनिक हस्तक्षेप के बाद 22 मई को जाकर दोनों शिफ्टों में काम शुरू हो पाया. प्रिंटिंग मशीन पर रामचरित मानस के उत्तर कांड के एक फर्मे की छपाई में जुटे एक कर्मचारी के शब्दों में, “बकाए का मामला अब भी नहीं सुलझा है.” गीता प्रेस में एक बार फिर हड़ताल हो गई है और यहां तीन दिन से काम बंद है. मामला श्रम न्यायालय के अधीन चला गया है.

गीता प्रेस की इस करीब-करीब उजली कहानी में वरिष्ठ पत्रकार अक्षय मुकुल की शोध पुस्तक गीता प्रेस ऐंड द मेकिंग ऑफ हिंदू इंडिया एक आलोचनात्मक पहलू जोड़ती है. करीब पांच साल के शोध के बाद मुकुल ने यह किताब लिखी है, जिसे गुहा और अरुंधती रॉय सरीखे बुद्धिजीवियों ने बहुत सराहा है. उन्होंने लिखा है कि आक्रामक हिंदुत्व को गढ़ने में इसका अहम रोल रहा. चालीस के दशक और आजादी के बाद के तमाम दस्तावेजों को खंगालने के बाद मुकुल इस निष्कर्ष पर पहुंचे हैं कि उस दौरान इस प्रेस के मुख्य प्रकाशन कल्याण ने हिंदू कोड बिल, गोरक्षा और ऐसे ही दूसरे मुद्दों पर जबरदस्त प्रोपेगैंडा किया. उन्हीं के शब्दों में, “सेकुलर घरों में भी जाने वाली कल्याण इसमें बड़ा हथियार बनी.” पर भारत में प्राच्य विद्या की शीर्ष विदुषी डॉ. कपिला वात्यास्यन कहती हैं, “गीता प्रेस ने मुख्यतः मूल, मौलिक ग्रंथ और उनके अनुवाद बेहतरीन ढंग से छापे हैं. कोई टीका-टिप्पणी तो की नहीं है. ऐसे में उस पर यह आरोप ठीक नहीं.” साफ है कि इस प्रेस की भूमिका पर एक नई बहस शुरू होने को है.

और इसका योगदान? चार साल पहले कतर की राजधानी दोहा शिफ्ट हुए, पत्रकार से प्रशासक-प्रबंधक बने उदयपुर के त्रिलोक शर्मा के मुंह से सुनिएः “कतर, दुबई, बहरीन, कुवैत जैसे इस्लामी राष्ट्रों में मेरे जैसे तमाम प्रवासी भारतीय अपने दफ्तर और बैग में गीता प्रेस से छपे ग्रंथों के छोटे-छोटे गुटखे हमेशा साथ रखते हैं. इसकी किताबें हमारे लिए धर्मगुरु और उपदेशक हैं. इन्होंने हमें बचा रखा है.” और एक अकूत भारतीय विरासत को भी.
(साथ में कुमार हर्ष)

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay