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सूखे की मार से इस साल 3,000 किसानों की मौत

गोवध, सांप्रदायिक गुंडागर्दी और बिहार चुनाव के शोर में क्या देश में पड़े भयानक सूखे और सिर्फ खरीफ सीजन में 3,000 किसानों की आत्महत्याओं को हाशिए पर डाला जा सकता है?

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aajtak.in
पीयूष बबेले 16 December 2015
सूखे की मार से इस साल 3,000 किसानों की मौत

गोवध, सांप्रदायिक गुंडागर्दी और बिहार चुनाव के शोर में क्या देश में पड़े भयानक सूखे और सिर्फ खरीफ सीजन में 3,000 किसानों की आत्महत्याओं को हाशिए पर डाला जा सकता है?

पांच हजार मौतें हमारी स्मृति में धुएं के एक कश से ज्यादा की अहमियत नहीं रखतीं. अगर इन मौतों को महसूस करना हो तो 10 सिनेमाघरों से लोगों को लाकर एक चैराहे पर उनकी लाशें रख दी जाएं, तो हमें पता चलेगा कि ये मौतें असल में क्या हैं. ''—आल्वेयर कामू
(1947 में प्रकाशित उपन्यास प्लेग से)

नया तेलंगाना राज्य बनने के बाद से 1,269 किसान खुदकुशी कर चुके हैं. कर्नाटक में इसी खरीफ सीजन में 625 किसानों ने मौत को गले लगा लिया. सिर्फ इसी खरीफ सीजन की तबाही में कृषि प्रधान भारत के मुकुट पंजाब के मालवा क्षेत्र में 60 से ज्यादा किसान मौत को गले लगा चुके हैं. उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में लगातार तीसरे फसल सत्र में आत्महत्या का सिलसिला जारी है और अप्रैल से अब तक 60 से ज्यादा किसान मर चुके हैं. मध्य प्रदेश के 51 में से 35 जिले सूखा प्रभावित मान लिए गए हैं और अब तक 42 किसानों की आत्महत्या की पुष्टि हो चुकी है. ओडिसा, आंध्र प्रदेश और महाराष्ट्र से भी किसानों की आत्महत्या का अंतहीन सिलसिला मोटे आंकड़ों की शक्ल में सामने आ रहा है. अब तो इसी खरीफ सीजन में करीब 3,000 किसानों की लाशें गिर जाने के बावजूद देश 65 फीसदी आबादी की जीवनरेखा खेती को छोड़ हर मुद्दे पर चर्चा करने को आतुर है.

इस कृषि संकट के संकेत उसी समय मिल गए थे, जब अप्रैल में मौसम विभाग ने मानसून में 88 फीसदी बारिश का पूर्वानुमान जताया था. पिछले साल भी मानसून की बारिश कम हुई थी. ऐसे में देश में लगातार दूसरी बार सूखा पडऩा तय दिख रहा था. इन दो मानसूनों के बीच रबी की फसल को पहले ही बेमौसम बरसात और ओलावृष्टि ने खत्म कर दिया था. यह बात शीशे की तरह साफ थी कि किसान लगातार तीसरी फसल तबाह होने के दहाने पर है. फिर क्या वजह रही कि मौसम विभाग की भविष्यवाणी आने के छह महीने बाद भी किसानों को कोई मदद नहीं पहुंच पाई? दीवाली के मौके पर किसान घर के बुझ गए चिरागों पर मातम मना रहे हैं.

किसान आत्महत्याकपास का मारा पंजाब
बेमौत मरने वालों में पंजाब के बठिंडा जिले के भगवानगढ़ गांव के 61 वर्षीय जगदेव सिंह भी थे. परिवार के पास यही कोई साढ़े पांच एकड़ जमीन थी. 7 एकड़ जमीन उन्होंने ठेके पर ली थी. परिवार पर 3 लाख रु. बैंक का, करीब इतना ही कोऑपरेटिव सोसाइटी का और करीब दो लाख रु. बनिये का कर्ज था. लेकिन जब उनकी कपास की खड़ी फसल पर व्हाइट फ्लाइ ने हमला किया तो 13 बार कीटनाशक छिड़कने के बावजूद फसल बच न सकी. दरअसल, बठिंडा के ज्यादातर किसानों की तरह वे भी जो कीटनाशक इस्तेमाल कर रहे थे, वह नकली था. आगे की व्यथा उनके बेटे सुखदीप सुनाते हैं: 5 अक्तूबर को गुरुद्वारे में मत्था टेकने के बाद पिताजी ने पड़ोसियों से रस्सी मांगी. उनकी मनोदशा देखकर किसी ने रस्सी नहीं दी. उन पर नजर भी रखी जाने लगी. पर 11 अक्तूबर को मौका पाकर उन्होंने खेत पर पगड़ी से ही फांसी लगा ली.

पंजाब के बठिंडा, मानसा, बरनाला और तकरीबन पूरे मालवा इलाके में हर रोज किसान आत्महत्या की खबरें आ रही हैं. देश को इसकी भनक तब मिली जब अक्तूबर के शुरू में किसानों ने रेल रोको आंदोलन किया. किसानों की 40,000 रु. प्रति एकड़ मुआवजे की मांग के उलट राज्य सरकार 8,000 रु. एकड़ दे रही है. रेल रोको आंदोलन तो रुक गया है पर मौतों का सिलसिला जारी है. पंजाब में किसान आत्महत्या पर सर्वेक्षण कर रहे पंजाब कृषि विश्वविद्यालय के प्रोफेसर डॉ. सुखपाल सिंह कहते हैं, ''खुदकुशी तक पहुंचने की वजहें जटिल हैं.'' खेती की लागत बढऩा और फसल का मूल्य घटना, उनके मुताबिक, पहली वजह है. महंगा कर्ज किसान के ताबूत में आखिरी कील साबित होता है. पंजाब के किसानों पर इस समय 35,000 करोड़ रु. के कर्ज में से 38 फीसदी निजी साहूकारों का है. यह कर्ज 21 से 26 फीसदी सालाना ब्याज पर मिलता है. ये दरें एक ही फसल तबाह होने पर किसान को जमीन पर लाने के लिए काफी हैं.

दक्षिण में हाहाकार
दक्षिणी राज्य कर्नाटक में किसानों की मौत पिछले तीन साल से बड़ी समस्या है. पिछले वर्षों के मुकाबले इस साल मई तक तुलना में किसान आत्महत्या का ग्राफ गिरने से राज्य सरकार राहत की सांस ले रही थी लेकिन जब बारिश नहीं हुई तो जून-जुलाई में ये आत्महत्या महामारी की तरह आ पहुंचीं. अगस्त में मुख्यमंत्री सिद्धरामैया ने आत्महत्या पर किसान परिवारों को दिया जाने वाले मुआवजे को एक लाख से बढ़ाकर दो लाख रु. कर दिया. राज्य कृषि विभाग के मुताबिक, अक्तूबर मध्य तक 625 किसान आत्महत्या कर चुके हैं. यहां का संकट गन्ना, कपास और तंबाकू की फसल के सूखे से तबाह होने से पैदा हुआ.

आंध्र प्रदेश और तेलंगाना में हालात और विकट हैं. बाकी देश में सामान्य से 14 फीसदी कम बारिश हुई है, तो तेलंगाना के महबूबनगर और निजामाबाद और आंध्र प्रदेश के अनंतपुर में 70 फीसदी कम पानी बरसा है. दोनों राज्यों में आधी फसल नष्ट हो गई है. तेलंगाना में किसानों ने बड़े पैमाने पर कपास की नकदी फसल की ओर रुख किया था. अब यह उनकी सबसे बड़ी समस्या बन गई है. मेडक, वारंगल, करीमनगर, आदिलाबाद और नलगोंडा में कपास कहर बन गई है. हैदराबाद के सेंटर फॉर सस्टेनेबल एग्रीकल्चर (सीएसए) के कार्यकारी निदेशक जी.वी. रामनजेयुलु के मुताबिक, इस साल फसल खराब होने से हर किसान को औसतन 40,000 से 60,000 रु. का नुक्सान हुआ है. सीएसए के एक सर्वेक्षण के मुताबिक, 1995 से 2014 के बीच आंध्र प्रदेश और हैदराबाद में 38,000 किसान मौत को गले लगा चुके हैं. कृषि वैज्ञानिक मानते हैं कि किसान आत्महत्या का सीधा संबंध कपास, गन्ना या मक्का की नकदी फसलों के बर्बाद होने से है. पंजाब की तरह इन राज्यों में भी कर्ज किसान की मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण है.

लेकिन अध्ययन बताते हैं कि सूखा, आर्थिक नीतियों का किसान-विमुख होना और ब्याज के दुष्चक्र के अलावा रहन-सहन में आया बदलाव भी आत्महत्या की वजह है. 2002 में किसान आत्महत्या का अध्ययन करने के लिए कर्नाटक में गठित सरकारी समिति के अध्यक्ष रहे जी.के. वीरेश के मुताबिक, मूलभूत वजहों के अलावा जब कोई किसान आत्महत्या करता है तो समाज में एक किस्म का हिस्टीरिया फैलता है और दूसरे पीड़ित किसानों को भी उकसाता है. आत्महत्या पर जैसी राजनीति होती है, उसमें भी एक विद्रूप भरा ही सही महिमामंडन होता है.

पूरब से पश्चिम तक मरता किसान
देश के पश्चिमी राज्य महाराष्ट्र का जिक्र आते ही अगर मुंबई की चकाचैंध वाली छवि उभरती है तो पूर्वी राज्य ओडिसा की चर्चा आने पर अकाल से जूझते कालाहांडी का पुराना बिंब सामने आता है. लेकिन इस साल पड़े सूखे और किसान आत्महत्या ने दोनों को एक ही श्मशान पर लाकर खड़ा कर दिया है. ओडिसा में कटक से 60 किमी दूर बांकी ब्लॉक के गांव ब्रह्मपुर में चुप्पी पसरी है.

कर्ज से डूबे किसान बांकेबिहारी राउत ने 23 अक्तूबर को कीटनाशक पीकर जान दे दी. आधे एकड़ का यह काश्तकार राज्य के बाकी किसानों की तरह पारंपरिक खेती में ही मारा गया. राज्य के कर्ज में डूबे 57.5 फीसदी किसानों की तरह उस पर भी एक सेल्फहेल्प ग्रुप का 2.70 लाख रु. का कर्ज था. कुछ कर्ज उसने खेती के लिए और कुछ बेटी की शादी के लिए लिया था. आत्महत्या के बाद राउत के परिवार को बीजू कृषि कल्याण योजना के तहत मिलने वाले 1 लाख रु. का लाभ भी नहीं मिलेगा क्योंकि योजना में आत्महत्या करने वालों को मुआवजे का प्रावधान नहीं है. पश्चिम ओडिसा किसान संगठन के संयोजक अशोक प्रधान के मुताबिक, इस साल जून से अब तक राज्य में 59 किसानों ने खुदकुशी की है. मरने वाले ज्यादातर किसान छोटी जोत वाले या फिर भूमिहीन हैं. ओडिसा के 55 लाख किसानों में से 60 फीसदी भूमिहीन हैं. मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने वित्त मंत्री अरुण जेटली से सूखा पीड़ित किसानों के लिए 3,500 करोड़ रु. की राहत मांगी है.

उधर महाराष्ट्र में मानसून में सामान्य से 39 फीसदी कम बारिश हुई. वहीं सूखे से सर्वाधिक प्रभावित विदर्भ, मराठवाड़ा और उत्तर महाराष्ट्र में सामान्य से 75 फीसदी कम बारिश ने तबाही मचा दी है. सामाजिक कार्यकर्ता और महाराष्ट्र सरकार की ओर से नियुक्त कृषि संकट आयोग के चेयरमैन किशोर तिवारी के मुताबिक, इस साल महाराष्ट्र में 2,000 से ज्यादा किसान खुदकुशी कर चुके हैं. इनमें से 1,000 मौतें विदर्भ में हुई हैं. महाराष्ट्र सरकार ने अक्तूबर में राज्य के 43,000 गांवों में से 14,708 गांवों को सूखाग्रस्त घोषित कर दिया है. इनमें से सबसे ज्यादा 8,500 गांव मराठवाड़ा के हैं. सरकार इस बार 5,000 करोड़ रु. के राहत पैकेज की सोच रही है. पिछले साल दिसंबर में खरीफ चौपट होने पर महाराष्ट्र में 7,000 करोड़ रु. का पैकेज घोषित किया गया था. पहला पैकेज किसानों तक पहुंच जाता तो दूसरे साल इतनी आत्महत्याएं होतीं और नए पैकेज की बातें उठतीं? बकौल तिवारी, ''मूलभूत योजनाओं में बदलाव किए बिना यह संभव नहीं है.''

विभिन्न राज्यों में किसान आत्महत्यामध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश
मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल से सटे रायसेन जिले के डिलावर गांव में 13 अक्तूबर को रामप्रसाद लोधी ने खेत में फांसी लगाकर जान दे दी. उनकी 5 एकड़ सोयाबीन की फसल पूरी तरह बर्बाद हो चुकी थी. उन पर दो लाख रु. का कर्ज था और पांच बच्चों के बाप रामप्रसाद को बेटी की शादी करनी थी. इस किसान की मौत देश का 53 फीसदी सोयाबीन पैदा करने वाले मध्य प्रदेश के किसानों की विवशता का नमूना है. सरकार ने शुरू में 60 लाख हेक्टेयर जमीन में 90 लाख टन सोयाबीन पैदा करने का लक्ष्य रखा था, लेकिन अब शायद इसका आधा ही पैदा हो. सोयाबीन पर हुए सितम और कर्ज की मार से दबे 40 से ज्यादा किसान मध्य प्रदेश में इस खरीफ सत्र में आत्महत्या कर चुके हैं. राज्य के 51 में से 35 जिले सूखा प्रभावित घोषित हुए हैं. 32,283 गांवों के 48 लाख किसान इस बार सूखे की चपेट में हैं. मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने किसान संकट पर इंडिया टुडे को बताया, ''सरकारी कर्ज वसूली पर तो रोक लगाई ही गई है, अगर कहीं साहूकार भी किसान से कर्ज वसूली करते पाए गए तो उन पर भी सख्त कार्रवाई होगी.''

उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड इलाके में भी कृषि संकट चरम पर है. स्थानीय अखबार किसान आत्महत्या की खबरों से पटे हैं. कोई किसान डाई पीकर मर रहा है, कोई फांसी पर लटक रहा है तो कुछ किसान रेल के आगे कूदकर जान दे रहे हैं. मौजूदा खरीफ सीजन में ही 68 किसान खुदकुशी कर चुके हैं. इससे पहले के रबी सीजन में ओला वृष्टि और बेमौसम बरसात के बाद भी यहां 60 से ज्यादा किसानों ने जान दी थी. पिछले खरीफ सीजन में 100 से ज्यादा किसानों ने मौत को गले लगाया था. स्थानीय किसान नेता शिवनारायण परिहार कहते हैं, 'हर जिले के अखबारों में किसान आत्महत्या की 3-4 खबरें रोज छप रही हैं.'' तीन साल पहले तहसील और कलेक्टरेट पर किसान मुद्दों को उठाना शुरू करने पर उन्होंने सोचा भी न था कि इस धारावाहिक कहानी में कहीं ब्रेक ही नहीं आएगा. उनका तो अंदेशा है कि बुंदेलखंड का इलाका अगले रबी सत्र में भी अकाल की तैयारी कर रहा है.

उधर प्रदेश के प्रमुख सिंचाई सचिव दीपक सिंहल के शब्दों में, ''बुंदेलखंड के ज्यादातर जलाशयों में नवंबर के लिए पानी बचा है. नवंबर में बारिश न हुई तो भगवान से प्रार्थना करने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचेगा.'' झांसी जिले के सिजार, लखेरी और बड़वार बांधों में सिर्फ 10 दिन का पानी बचा है. ललितपुर जिले के 7 प्रमुख बांधों में सिंचाई के लिए पानी नहीं है. यहां के दो सबसे बडे बांधों माताटीला और राजघाट की हालत भी पस्त है. बेतवा प्रखंड के अधिशासी अभियंता एम.एल. अग्रवाल के मुताबिक, राजघाट में 62 टीएमसी और मातटीला में 17 टीएमसी पानी बचा है. इन बांधों का आधा पानी मध्य प्रदेश के लिए आरक्षित है. नवंबर में नहर में पानी छोड़ा गया तो जनवरी के बाद बांध में पानी नहीं बचेगा. यानी रबी की फसल के लिए बुंदेलखंड में पानी नहीं है. पर प्रशासन की सोच इससे बिल्कुल अलग है.

रबी गोष्ठी में मंडलायुक्त राममोहन राव ने संकट से निबटने की रणनीति इस तरह बताई, ''खरीफ संकट से निबटने के लिए हमें रबी में फसल पैदावार का लक्ष्य बढ़ा देना चाहिए.'' सिंचाई विभाग के अफसरों ने मीटिंग में ही कहा, यह नामुमकिन है, पर टारगेट बढ़ा दिया गया. सिंचाई परियोजनाओं के लिए केंद्र से अब तक 2,600 करोड़ रु. का बकाया नहीं मिला है. उधर, मुख्यमंत्री कार्यालय के एक वरिष्ठ अफसर कहते हैं, ''पिछले रबी सीजन में सरकार ने अपनी तरफ से 4,500 करोड़ रु. मुआवजा बांटा. केंद्र से 7,000 करोड़ रु. मांगे गए थे पर 2,800 करोड़ रु. ही मिले. मुख्यमंत्री ने प्रधानमंत्री को बार-बार चिट्ठी लिखी पर जवाब तक नहीं मिला.''

देश भर में किसान आत्महत्यामौतें रोकने का कोई रास्ता भी है
लेकिन इस नीतिगत क्रूरता का तोड़ निकाला जा सकता है. पीएयू के प्रो. सुखपाल सिंह की राय है, ''खेती का रकबा बहुत छोटा हो गया है. अब सांझी खेती (कोऑपरेटिव फार्मिंग) के बारे में सोचना होगा. या कम से कम कृषि यंत्रों के उपयोग में तो सहकारिता लाई जाए.'' 2010-11 की कृषि सेंसस के मुताबिक, देश में किसान की औसत जोत महज 1.25 एकड़ ही बची है. इतनी छोटी जोत के किसान के लिए खेती के दम पर जीवन चलाना नामुमकिन है. इसके अलावा किसान अपने कृषि यंत्र का उपयोग साल में मुश्किल से 30 दिन करता है. इससे उसकी लागत और बढ़ जाती है. सहकारिता से यह बोझ कुछ कम हो जाता है.

यानी कृषि वैज्ञानिक कृषि संकट का पहला हल उस सहकारिता में देख रहे हैं, जिसका जिक्र आजाद भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू 1948 में ही कर रहे थे. नेहरू का साफ मानना था कि छोटी जोत से किसान सफल नहीं हो पाएगा. लेकिन छह दशक बाद भी भारत में बड़े पैमाने पर यह काम नहीं हो पाया. हालांकि इस बारे में मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री चैहान बड़ा कदम उठा सकते हैं. वे बताते हैं, ''मौजूदा कानून में खेती किराए, ठेके या बंटाई पर देना गैरकानूनी है जबकि बहुत-से छोटे किसान दूसरों की खेती किराए पर लेकर काम करते हैं. हम जल्द ही इस विषय में कानून लाएंगे.'' उनकी मंशा है कि किराए पर पैसा लेकर खेती करने को कानूनी बनाने से वास्तविक खेती करने वाले को मुआवजा और बीमा का लाभ मिल पाएगा. व्यावहारिक संदर्भ में एक किसान ज्यादा रकबे में खेती कर रहा होगा. इस तरह छोटी जोत और ज्यादा कृषि लागत दोनों समस्याओं से उबरने में किसान को मदद मिलेगी, जो आत्महत्या के बड़े कारण हैं.

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