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अर्थव्यवस्था-सरकार की सबसे कठिन परीक्षा

मोदी का नया मंत्रिमंडल निरंतरता के साथ बदलाव की इत्तिला देता है. मोदी ने आर्थिक लिहाज से अहम मंत्रालयों वित्त, वाणिज्य, उद्योग और बुनियादी ढांचा को उम्दा प्रदर्शन करने वालों—क्रमश: निर्मला सीतारमण, पीयूष गोयल और नितिन गडकरी को सौंपा है.

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aajtak.in
श्वेता पुंज/ एम.जी. अरुण नई दिल्ली, 20 June 2019
अर्थव्यवस्था-सरकार की सबसे कठिन परीक्षा उपेक्षित क्षेत्र कालाहांडी, ओडिशा में धान के खेत में काम करते लोग

नरेंद्र मोदी 31 मई को जब 57 केंद्रीय मंत्रियों के साथ दूसरे कार्यकाल के लिए प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे थे, उसके अगले ही दिन अर्थव्यवस्था को लेकर मायूस करने वाली खबर आई. देश का जीडीपी 2018-19 की जनवरी-मार्च तिमाही में महज 5.8 फीसद की दर से बढ़ा, जो बाजार की उम्मीदों से कम था और दो साल में पहली बार चीन से पीछे हो गया था. यह नई सरकार के लिए चेतावनी थी कि उसके लिए कितनी मुश्किल चुनौती मुंह बाए खड़ी है. 2018-19 में जीडीपी 6.8 फीसद बढ़ा, जो उससे पिछले वित्त वर्ष की 7.2 फीसद वृद्धि दर से कम था. इस तरह दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था का तमगा भारत ने अभी-अभी चीन को सौंप दिया था.

चुनौतीपूर्ण मुद्दे

मगर कइयों को इसके आसार पहले ही दिखाई दे रहे थे. तकरीबन तमाम आर्थिक संकेतक अर्थव्यवस्था में सुस्ती की तरफ इशारा कर रहे थे. वृद्घि की रफ्तार चिंताजनक हद तक कम हो गई थी—वित्त वर्ष 2019 की अप्रैल-जून तिमाही में 8 फीसद से घटकर अगली दो तिमाहियों में क्रमश: 7 फीसद और 6.6 फीसद. पूर्व मुफ्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम ने अपने एक शोधपत्र में कहा कि देश की जीडीपी वृद्घि दर 2011-12 के बाद से ही करीब 2.5 फीसद तक अधिक आंकी गई. इस तरह उन्होंने 7 फीसद से अधिक वृद्धि दर के देश के दावे पर सवालिया निशान लगा दिया. सुब्रह्मण्यम ने अपने शोधपत्र को अभी सार्वजनिक नहीं किया है, ताकि उसकी समीक्षा की जा सके. लेकिन सरकार ने अपनी जीडीपी गणना का बचाव किया है और कहा है कि उसके जीडीपी अनुमान मान्य प्रक्रियाओं पर आधारित हैं.

तमाम क्षेत्रों की आर्थिक गतिविधियों में सुस्ती साफ जाहिर है. कृषि, वानिकी और मछली पालन 2018-19 में 2.9 फीसद की दर से बढ़ा, जबकि एक साल पहले यह 5 फीसद की दर से बढ़ा था. खनन क्षेत्र पिछले साल के 5.1 फीसद के मुकाबले 1.3 फीसद की दर से बढ़ा. बिजली, गैस, जलापूर्ति और दूसरी उपयोगी सेवाएं पिछले साल के 8.6 फीसद के मुकाबले 7 फीसद की दर से बढ़ीं. औद्योगिक उत्पादन सूचकांक, जो औद्योगिक गतिविधियों का पैमाना है, दिसंबर 2018 में खत्म तिमाही में महज 3.7 फीसद की दर से बढ़ा, जो पांच तिमाहियों का सबसे निचला स्तर था. कॉर्पोरेट जगत की बिक्री और सकल अचल संपत्तियों के बढऩे की रफ्तार पांच साल में दूसरे निचले स्तर पर थी, खपत ने भी गोता लगा लिया.

मायूस करने वाली दूसरी खबरें भी सामने थीं. राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय के 2017-18 के सावधिक श्रम बल सर्वे के नतीजे भी उसी दिन जारी हुए, जिस दिन जीडीपी के आंकड़े आए. उनसे पता चला कि देश में बेरोजगारी दर 2017-18 में बढ़कर 6.1 फीसद पर पहुंच गई. इसने पहले 'लीक हुए' आंकड़ों की तस्दीक कर दी जिनमें बताया गया था कि यह 45 साल में सबसे ऊंची बेरोजगारी दर है. अलबत्ता सरकार ने यही कहा कि दो किस्म के आंकड़ों की तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि उन्हें इकट्ठा करने की पद्धति अलग-अलग थी.

बैंकिंग क्षेत्र, जिसने 'जोखिम भरे' क्षेत्रों को कर्ज देने पर पहले ही रोक लगा दी है, पहले की तरह साख और विश्वसनीयता के संकट से घिरा रहा जो नीरव मोदी और मेहुल चोकसी से जुड़े घोटलों के नतीजतन पैदा हुआ था. दूसरे, गैर-बैंकिंग वित्तीय क्षेत्र (एनबीएफसी) अगुआ कंपनी आइएलऐंडएफएस के धराशायी होने की मार से कराह रहा है, जो बैंकों के अपने एक के बाद एक भुगतानों से चूक गई और पूरी व्यवस्था में कर्ज के संकट की वजह बनी. नकदी के संकट तथा एक और एनबीएफसी दीवान हाउसिंग फाइनेंस कॉर्प में वित्तीय अनियमितताओं के आरोप के बाद हालात और बदतर ही हुए हैं.

मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस ने इस साल फरवरी में कहा था कि बहुत ज्यादा खर्च और राजस्व में कम बढ़ोतरी के चलते सरकार के लिए 2019-20 में राजकोषीय घाटे का 3.4 फीसद का लक्ष्य पूरा करना मुश्किल हो सकता है. अगर कच्चे तेल की कीमतें, जो मोदी के पहले कार्यकाल के ज्यादातर वक्त कम रही थीं, अमेरिका-ईरान के बीच तनाव बढऩे पर थोड़ी भी ऊपर जाती हैं, तो नाजुक राजकोषीय संतुलन दबाव में आ जाएगा. उधर, ग्रामीण संकट और 2014 से 2016 के बीच लगातार दो सूखों की मार झेल रही कृषि की खराब हालत चिंता के क्षेत्र बने हुए हैं. यहां तक कि 2019 के चुनाव भी इसी मायूसी भरी पृष्ठभूमि में लड़े गए, पर लोगों ने शायद इस उक्वमीद में मोदी को वोट दिया कि नई सरकार अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए ठोस कदम उठाए. लेकिन कहना आसान है, करना मुश्किल.

कार्रवाई डेस्क

मोदी का नया मंत्रिमंडल निरंतरता के साथ बदलाव की इत्तिला देता है. मोदी ने आर्थिक लिहाज से अहम मंत्रालयों वित्त, वाणिज्य, उद्योग और बुनियादी ढांचा को उम्दा प्रदर्शन करने वालों—क्रमश: निर्मला सीतारमण, पीयूष गोयल और नितिन गडकरी को सौंपा है. रोजगार और निवेश के मुद्दों से निबटने के लिए प्रधानमंत्री की अगुआई में समितियों का गठन भी किया है. निवेश पर कैबिनेट कमेटी की अध्यक्षता मोदी करेंगे और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, सीतारमण, गोयल और गडकरी इसके सदस्य होंगे. प्रधानमंत्री की ही अध्यक्षता में रोजगार पर बनाई गई कैबिनेट कमेटी में उनके अलावा 10 सदस्य होंगे, जिनमें शाह, राजनाथ सिंह, सीतारमण, गोयल, कृषि और पंचायती राज मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, एचआरडी मंत्री रमेश पोखरियाल 'निशंक', कौशल और उद्यमिता मंत्री महेंद्रनाथ पांडेय, शहरी विकास मंत्री हरदीप पुरी और श्रम राज्यमंत्री संतोष कुमार गंगवार शामिल हैं.

सबसे मुश्किल काम सीतारमण का है. उन्हें चार हफ्तों में बजट तैयार और पेश करना है, जबकि आम तौर पर इसमें तीन महीने या उससे ज्यादा वक्त लगता है. उनके साथ काम कर चुके कई लोग उन्हें मेहनती और बारीकियों पर ध्यान रखने वाली बताते हैं. वे तमाम फाइलों को पढऩे और  बारीक पूछताछ करने के लिए जानी जाती हैं. वाणिज्य मंत्री के पिछले कार्यकाल के दौरान उन्हें अंतर्मुखी माना जाता था, पर वे अपने नजरिए को साफगोई से रखतीं और अपनी असहमतियों को दो-टूक शब्दों में बता देती थीं.

उन्हें गोयल के साथ नजदीकी से मिलकर काम करना होगा, क्योंकि उत्पादन और निर्यात के क्षेत्रों में वृद्घि जरूरी है और फिलहाल ये दोनों ही क्षेत्र भारी चुनौतियों से घिरे हैं. वित्त मंत्री के नाते सीतारमण का पहला काम भरोसेमंद आंकड़े पेश करना होगा क्योंकि गोयल के अंतरिम बजट में जो हिसाब-किसाब पेश किया गया था, वह अब सही नहीं ठहरता. नाम जाहिर न करने की शर्त पर एक अर्थशास्त्री कहते हैं, ''उन संशोधित अनुमानों में 10 फीसद का फर्क आ चुका है. उन्हें बजट के आंकड़े फिर से तय करने होंगे, जो एक महीने में मुश्किल काम है.''

उद्योगों के नुमाइंदे गोयल और गडकरी से मिल चुके हैं, जिनके पास सड़क परिवहन, जहाजरानी और राजमार्ग के अलावा कुटीर, लघु और मझोले उद्योग (एमएसएमई) मंत्रालय भी है. इन दोनों ही मंत्रियों ने काम करवाने में महारत और आर्थिक तथा ढांचागत मुद्दों की गहरी समझ होने की प्रतिष्ठा हासिल की है. इसलिए उम्मीद है कि दो बेहद अहम मंत्रालयों में गडकरी और गोयल निवेश में इजाफे और रोजगार सृजन के उपाय ढूंढ लेंगे. गडकरी ने पिछली सरकार में सड़क मंत्री के तौर पर कई राज्यों और मंत्रालयों के साथ मिलकर मंत्रालयों के बीच में आने वाली अड़चनों को सुलझाया था और सरकारी फैसलों को रफ्तार दी थी. मसलन, रेलवे को जमीन अधिग्रहण के मामले निबटाने में पहले दो से तीन साल लग जाते थे, तो गडकरी ने रेल मंत्रालय के साथ बात करके ऑनलाइन मंजूरियां हासिल कर ली.

जब उन्होंने काम संभाला, तब 300 परियोजनाएं मंत्रालयों के बीच के विवादों की वजह से ठप पड़ी थीं. उन्होंने बुनियादी ढांचा समिति बनाई और विवादों के निबटारे के लिए हरेक मुख्यमंत्री से मिले. उनके एक करीबी सहयोगी कहते हैं, ''उनका (गडकरी का) तरीका यह रहा है कि 'या तो मुझे अपनी बात से सहमत करो या मेरी बात मान लो और फैसला लो''' उम्मीद है कि इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में रोजगार सृजन होगा और उत्पादन क्षेत्र में मंदी की भरपाई होगी. मोदी 2.0 के लिए भी गडकरी की बड़ी योजनाएं हैं जिसमें मुंबई-दिल्ली एक्सप्रेसवे को चालू करवाना भी है जिससे कुछ लोगों को पूरे इलाके की आर्थिक गतिविधियों में उछाल आने की उक्वमीद है. गडकरी कहते हैं, ''देश में जैसे बिजली का ग्रिड है, मेरा सपना है कि वैसे ही चार लेन की सड़कों और राजमार्गों का ग्रिड बने. दिल्ली से मुंबई जाने में तीन-चार दिन लगते हैं, मैं इसे 28-30 घंटे का सफर बनाना चाहता हूं. मैं यह काम ढाई से तीन साल में कर दूंगा.''

मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में सड़कों के निर्माण ने ज्यादातर पैसा सरकार ने ही लगाया. इसी राह पर आगे बढऩे के लिए मंत्रालय को बिल्कुल नए ढंग के निवेश मॉडल निकालने होंगे, ताकि निवेश को आकर्षित किया जा सके. इसमें बड़ी अड़चन जमीन अधिग्रहण की अंधाधुंध लागतें हैं. उधार देने को अनिच्छुक बैंक और उसके साथ एनबीएफसी का संकट, इन दोनों का नतीजा यह हुआ कि इतनी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं के लिए पूंजी के रास्ते बंद हो गए हैं और सरकार के पास इतनी राजकोषीय गुंजाइश नहीं है कि वह पहले की तरह खर्च करती रहे. गडकरी के कंधों पर देश के छोटे और मझोले उद्योगों  में फिर से जान फूंकने का भारी-भरकम काम भी होगा, जो नोटबंदी और जीएसटी की मार से तबाह हो गए हैं. इस वजह से सबसे ज्यादा इकाइयां बंद हुईं और रोजगार खत्म हुए.

अंतरिम वित्त मंत्री और रेलवे, कोयला तथा ऊर्जा मंत्री के तौर पर गोयल की भी प्रतिष्ठा कामों को अंजाम देने वाले की बनी है, जो अपने कान हमेशा जमीन से लगाए रखते हैं. वित्त मंत्री के अपने छोटे-से कार्यकाल में उन्होंने निवेशकों से न केवल मेलजोल बनाए रखा, बल्कि उनका भरोसा जीता और देश भर में बिजली पहुंचाने—यानी मोदी के एक सबसे अहम वादे को पूरा करने—में अहम भूमिका अदा की थी. गडकरी, सीतारमण और गोयल की तिकड़ी की अर्थव्यवस्था के संचालन और उम्मीदों को पूरा करने के बीच नाजुक संतुलन साधने में अहम भूमिका होगी. गोयल को निर्यात बढ़ाने के तरीके खोजने होंगे और पक्का करना होगा कि निर्यात बढ़ाने की जिन योजनाओं को अमेरिका ने चुनौती दी है, उनकी जगह कुछ वैकल्पिक योजनाएं लेकर आएं. साथ ही, अमेरिका के पसंदीदा व्यापार शुल्क वापस ले लेने से जिन वस्तुओं पर असर पड़ा है, देश को उनके लिए नए बाजार भी खोजने होंगे.

खपत को बढ़ावा दें

मोदी की नई टीम को कई मुश्किल रास्तों पर चढ़ाई करनी होगी, क्योंकि कई सारे मुद्दों पर ध्यान देना बेहद जरूरी है. उनमें से एक खपत में भीषण गिरावट है. देश आर्थिक वृद्धि के लिए एक ही इंजन पर भरोसा करता आ रहा है—वह है खपत—और उसमें भी गिरावट आ रही है. इसका सबसे अच्छा उदाहरण ऑटोमोबाइल और एफएमसीजी की बिक्री के आंकड़े हैं. सवारी वाहनों की बिक्री, जो आर्थिक मजबूती का अच्छा पैमाना है, अप्रैल में 21 फीसद गिर गई. इस क्षेत्र में अनिश्चितता की एक वजह जहां नए उत्सर्जन नियंत्रण नियम हैं जो अप्रैल 2020 से लागू हो जाएंगे, वहीं सुस्त आर्थिक वृद्धि, ग्रामीण संकट और खर्च की जा सकने वाली कम आमदनियों के चलते खरीदार पहले किसी भी वक्त से ज्यादा सतर्क और सावधान हो गया है. उधर, एफएमसीजी की दिग्गज कंपनी हिंदुस्तान लीवर ने जनवरी-मार्च 2019 में 7 फीसद की वृद्धि बताई है जो छह तिमाहियों में उसकी सबसे कम वृद्धि है. मार्केट रिसर्च कंपनी नीलसन ने देश में एफएमसीजी बाजार की वृद्धि का अपना अनुमान 2018 के 14 फीसद से घटाकर 2019 में 11-12 फीसद कर दिया है.

क्रिसिल के चीफ इकोनॉमिस्ट डी.के. जोशी कहते हैं, ''उपभोक्ता अपनी बचत खंगाल चुके हैं और उधार भी ले चुके हैं. घर-परिवारों की देनदारियां भी बढ़ती जा रही हैं.'' अर्थव्यवस्था को फिर से जिलाने की खातिर आगे बढऩे के लिए दो बड़े क्षेत्रों में कदम उठाने होंगे: खपत और निवेश. जोशी भविष्यवाणी करते हैं कि खपत अगली दो-एक तिमाहियों में बढऩे लगेगी, मगर निजी निवेश में इससे कहीं ज्यादा वक्त लगेगा. देश में नया निवेश 2019 के वित्त वर्ष की दिसंबर तिमाही में घटकर अपने 14 साल के सबसे निचले स्तर 1 लाख करोड़ रु. पर आ गया. नई निजी परियोजनाएं सितंबर की तिमाही के मुकाबले दिसंबर की तिमाही में गिरकर 62 फीसद पर आ गईं.

केयर रेटिंग्स के चीफ इकोनॉमिस्ट मदन सबनवीस मानते हैं कि जब खपत बढ़ेगी, केवल तभी क्षमताओं का इस्तेमाल किया जा सकेगा और उत्पादकों से ज्यादा निवेश का आग्रह किया जा सकेगा. वे कहते हैं, ''यही वजह है कि आरबीआइ हालांकि दरों में कटौती करता आ रहा है, पर इसके नतीजतन इसी के मुताबिक निवेश नहीं बढ़ा है.'' बैंक भी कम दरों का फायदा खुदरा उपभोक्ताओं को देने में आनाकानी कर रहे हैं. जोशी कहते हैं, ''दरों के व्यवहार में आने में अड़चनें बनी रहती हैं.'' दरअसल, ऊंची दरें तो फौरन व्यवहार में आ जाती हैं, मगर निचली दरें जल्दी व्यवहार में नहीं आ पातीं. बैंक ब्याज दरें घटाना तब तक मुश्किल पाते हैं, जब तक वे खुद अपनी लागतें कम होती न देख लें.

कर्ज के संकट से निबटें

कॉर्पोरेट मामलों के सचिव इंजेति श्रीनिवास ने हाल ही में न्यूज एजेंसी पीटीआइ से कहा था कि बढ़ती गैर-निष्पादित संपत्तियों (एनपीए) के डर ने जहां बैंकों से कर्ज दिए जाने पर रोक लगा दी है, वहीं गैर-बैंकिंग वित्तीय क्षेत्र के आसन्न संकट का नतीजा कर्ज के दबाव, बहुत ज्यादा लाभ लेने, जमा पूंजी-संपत्तियों और देनदारियों के बीच भारी असंतुलन और कुछ बहुत बड़ी कंपनियों के गड़बड़झाले की शक्ल में सामने आया है. उन्होंने कहा कि ये 'मुसीबत के पक्के रास्ते' हैं. क्रेडिट रेटिंग एजेंसी इंडिया रेटिंग्स ऐंड रिसर्च के मुताबिक, बैंक अगले एक साल में 1.5-2 लाख करोड़ रु. के नए खोटे कर्जों का सामना कर सकते हैं.

कुछ अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, सरकार को पहली चीज तो यह करनी चाहिए कि वह एनबीएफसी के संकट पर अपना रुख साफ करे. नाम न जाहिर करने की शर्त पर एक अर्थशास्त्री कहते हैं, ''हम टाइम बम पर बैठे हैं. आपको बहुत तेजी से फैसला लेना होगा कि आप किस रास्ते जाना चाहते हैं.'' सरकार के सामने दो विकल्प हैं. एक यह कि एनबीएफसी को नाकाम होने दे, जिन्हें जिंदा रखना मुमकिन नहीं है उन्हें मरने दे, मगर बहुत तेजी से आगे बढ़कर उसके नतीजों पर लगाम लगाए. दूसरा विकल्प यह है कि राहत देकर उन्हें उबारे. वृद्धि के नजरिए से अलबत्ता एनबीएफसी के संकट का समाधान करने की जरूरत है.

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