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अर्थव्यवस्था-सरकार की सबसे कठिन परीक्षा

मोदी का नया मंत्रिमंडल निरंतरता के साथ बदलाव की इत्तिला देता है. मोदी ने आर्थिक लिहाज से अहम मंत्रालयों वित्त, वाणिज्य, उद्योग और बुनियादी ढांचा को उम्दा प्रदर्शन करने वालों—क्रमश: निर्मला सीतारमण, पीयूष गोयल और नितिन गडकरी को सौंपा है.

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श्वेता पुंज और एम. जी. अरुणनई दिल्ली, 20 June 2019
अर्थव्यवस्था-सरकार की सबसे कठिन परीक्षा उपेक्षित क्षेत्र कालाहांडी, ओडिशा में धान के खेत में काम करते लोग

नरेंद्र मोदी 31 मई को जब 57 केंद्रीय मंत्रियों के साथ दूसरे कार्यकाल के लिए प्रधानमंत्री पद की शपथ ले रहे थे, उसके अगले ही दिन अर्थव्यवस्था को लेकर मायूस करने वाली खबर आई. देश का जीडीपी 2018-19 की जनवरी-मार्च तिमाही में महज 5.8 फीसद की दर से बढ़ा, जो बाजार की उम्मीदों से कम था और दो साल में पहली बार चीन से पीछे हो गया था. यह नई सरकार के लिए चेतावनी थी कि उसके लिए कितनी मुश्किल चुनौती मुंह बाए खड़ी है. 2018-19 में जीडीपी 6.8 फीसद बढ़ा, जो उससे पिछले वित्त वर्ष की 7.2 फीसद वृद्धि दर से कम था. इस तरह दुनिया की सबसे तेज बढ़ती अर्थव्यवस्था का तमगा भारत ने अभी-अभी चीन को सौंप दिया था.

चुनौतीपूर्ण मुद्दे

मगर कइयों को इसके आसार पहले ही दिखाई दे रहे थे. तकरीबन तमाम आर्थिक संकेतक अर्थव्यवस्था में सुस्ती की तरफ इशारा कर रहे थे. वृद्घि की रफ्तार चिंताजनक हद तक कम हो गई थी—वित्त वर्ष 2019 की अप्रैल-जून तिमाही में 8 फीसद से घटकर अगली दो तिमाहियों में क्रमश: 7 फीसद और 6.6 फीसद. पूर्व मुफ्य आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रह्मण्यम ने अपने एक शोधपत्र में कहा कि देश की जीडीपी वृद्घि दर 2011-12 के बाद से ही करीब 2.5 फीसद तक अधिक आंकी गई. इस तरह उन्होंने 7 फीसद से अधिक वृद्धि दर के देश के दावे पर सवालिया निशान लगा दिया. सुब्रह्मण्यम ने अपने शोधपत्र को अभी सार्वजनिक नहीं किया है, ताकि उसकी समीक्षा की जा सके. लेकिन सरकार ने अपनी जीडीपी गणना का बचाव किया है और कहा है कि उसके जीडीपी अनुमान मान्य प्रक्रियाओं पर आधारित हैं.

तमाम क्षेत्रों की आर्थिक गतिविधियों में सुस्ती साफ जाहिर है. कृषि, वानिकी और मछली पालन 2018-19 में 2.9 फीसद की दर से बढ़ा, जबकि एक साल पहले यह 5 फीसद की दर से बढ़ा था. खनन क्षेत्र पिछले साल के 5.1 फीसद के मुकाबले 1.3 फीसद की दर से बढ़ा. बिजली, गैस, जलापूर्ति और दूसरी उपयोगी सेवाएं पिछले साल के 8.6 फीसद के मुकाबले 7 फीसद की दर से बढ़ीं. औद्योगिक उत्पादन सूचकांक, जो औद्योगिक गतिविधियों का पैमाना है, दिसंबर 2018 में खत्म तिमाही में महज 3.7 फीसद की दर से बढ़ा, जो पांच तिमाहियों का सबसे निचला स्तर था. कॉर्पोरेट जगत की बिक्री और सकल अचल संपत्तियों के बढऩे की रफ्तार पांच साल में दूसरे निचले स्तर पर थी, खपत ने भी गोता लगा लिया.

मायूस करने वाली दूसरी खबरें भी सामने थीं. राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण कार्यालय के 2017-18 के सावधिक श्रम बल सर्वे के नतीजे भी उसी दिन जारी हुए, जिस दिन जीडीपी के आंकड़े आए. उनसे पता चला कि देश में बेरोजगारी दर 2017-18 में बढ़कर 6.1 फीसद पर पहुंच गई. इसने पहले 'लीक हुए' आंकड़ों की तस्दीक कर दी जिनमें बताया गया था कि यह 45 साल में सबसे ऊंची बेरोजगारी दर है. अलबत्ता सरकार ने यही कहा कि दो किस्म के आंकड़ों की तुलना नहीं की जा सकती क्योंकि उन्हें इकट्ठा करने की पद्धति अलग-अलग थी.

बैंकिंग क्षेत्र, जिसने 'जोखिम भरे' क्षेत्रों को कर्ज देने पर पहले ही रोक लगा दी है, पहले की तरह साख और विश्वसनीयता के संकट से घिरा रहा जो नीरव मोदी और मेहुल चोकसी से जुड़े घोटलों के नतीजतन पैदा हुआ था. दूसरे, गैर-बैंकिंग वित्तीय क्षेत्र (एनबीएफसी) अगुआ कंपनी आइएलऐंडएफएस के धराशायी होने की मार से कराह रहा है, जो बैंकों के अपने एक के बाद एक भुगतानों से चूक गई और पूरी व्यवस्था में कर्ज के संकट की वजह बनी. नकदी के संकट तथा एक और एनबीएफसी दीवान हाउसिंग फाइनेंस कॉर्प में वित्तीय अनियमितताओं के आरोप के बाद हालात और बदतर ही हुए हैं.

मूडीज इन्वेस्टर्स सर्विस ने इस साल फरवरी में कहा था कि बहुत ज्यादा खर्च और राजस्व में कम बढ़ोतरी के चलते सरकार के लिए 2019-20 में राजकोषीय घाटे का 3.4 फीसद का लक्ष्य पूरा करना मुश्किल हो सकता है. अगर कच्चे तेल की कीमतें, जो मोदी के पहले कार्यकाल के ज्यादातर वक्त कम रही थीं, अमेरिका-ईरान के बीच तनाव बढऩे पर थोड़ी भी ऊपर जाती हैं, तो नाजुक राजकोषीय संतुलन दबाव में आ जाएगा. उधर, ग्रामीण संकट और 2014 से 2016 के बीच लगातार दो सूखों की मार झेल रही कृषि की खराब हालत चिंता के क्षेत्र बने हुए हैं. यहां तक कि 2019 के चुनाव भी इसी मायूसी भरी पृष्ठभूमि में लड़े गए, पर लोगों ने शायद इस उक्वमीद में मोदी को वोट दिया कि नई सरकार अर्थव्यवस्था में जान फूंकने के लिए ठोस कदम उठाए. लेकिन कहना आसान है, करना मुश्किल.

कार्रवाई डेस्क

मोदी का नया मंत्रिमंडल निरंतरता के साथ बदलाव की इत्तिला देता है. मोदी ने आर्थिक लिहाज से अहम मंत्रालयों वित्त, वाणिज्य, उद्योग और बुनियादी ढांचा को उम्दा प्रदर्शन करने वालों—क्रमश: निर्मला सीतारमण, पीयूष गोयल और नितिन गडकरी को सौंपा है. रोजगार और निवेश के मुद्दों से निबटने के लिए प्रधानमंत्री की अगुआई में समितियों का गठन भी किया है. निवेश पर कैबिनेट कमेटी की अध्यक्षता मोदी करेंगे और केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह, रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह, सीतारमण, गोयल और गडकरी इसके सदस्य होंगे. प्रधानमंत्री की ही अध्यक्षता में रोजगार पर बनाई गई कैबिनेट कमेटी में उनके अलावा 10 सदस्य होंगे, जिनमें शाह, राजनाथ सिंह, सीतारमण, गोयल, कृषि और पंचायती राज मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, पेट्रोलियम मंत्री धर्मेंद्र प्रधान, एचआरडी मंत्री रमेश पोखरियाल 'निशंक', कौशल और उद्यमिता मंत्री महेंद्रनाथ पांडेय, शहरी विकास मंत्री हरदीप पुरी और श्रम राज्यमंत्री संतोष कुमार गंगवार शामिल हैं.

सबसे मुश्किल काम सीतारमण का है. उन्हें चार हफ्तों में बजट तैयार और पेश करना है, जबकि आम तौर पर इसमें तीन महीने या उससे ज्यादा वक्त लगता है. उनके साथ काम कर चुके कई लोग उन्हें मेहनती और बारीकियों पर ध्यान रखने वाली बताते हैं. वे तमाम फाइलों को पढऩे और  बारीक पूछताछ करने के लिए जानी जाती हैं. वाणिज्य मंत्री के पिछले कार्यकाल के दौरान उन्हें अंतर्मुखी माना जाता था, पर वे अपने नजरिए को साफगोई से रखतीं और अपनी असहमतियों को दो-टूक शब्दों में बता देती थीं.

उन्हें गोयल के साथ नजदीकी से मिलकर काम करना होगा, क्योंकि उत्पादन और निर्यात के क्षेत्रों में वृद्घि जरूरी है और फिलहाल ये दोनों ही क्षेत्र भारी चुनौतियों से घिरे हैं. वित्त मंत्री के नाते सीतारमण का पहला काम भरोसेमंद आंकड़े पेश करना होगा क्योंकि गोयल के अंतरिम बजट में जो हिसाब-किसाब पेश किया गया था, वह अब सही नहीं ठहरता. नाम जाहिर न करने की शर्त पर एक अर्थशास्त्री कहते हैं, ''उन संशोधित अनुमानों में 10 फीसद का फर्क आ चुका है. उन्हें बजट के आंकड़े फिर से तय करने होंगे, जो एक महीने में मुश्किल काम है.''

उद्योगों के नुमाइंदे गोयल और गडकरी से मिल चुके हैं, जिनके पास सड़क परिवहन, जहाजरानी और राजमार्ग के अलावा कुटीर, लघु और मझोले उद्योग (एमएसएमई) मंत्रालय भी है. इन दोनों ही मंत्रियों ने काम करवाने में महारत और आर्थिक तथा ढांचागत मुद्दों की गहरी समझ होने की प्रतिष्ठा हासिल की है. इसलिए उम्मीद है कि दो बेहद अहम मंत्रालयों में गडकरी और गोयल निवेश में इजाफे और रोजगार सृजन के उपाय ढूंढ लेंगे. गडकरी ने पिछली सरकार में सड़क मंत्री के तौर पर कई राज्यों और मंत्रालयों के साथ मिलकर मंत्रालयों के बीच में आने वाली अड़चनों को सुलझाया था और सरकारी फैसलों को रफ्तार दी थी. मसलन, रेलवे को जमीन अधिग्रहण के मामले निबटाने में पहले दो से तीन साल लग जाते थे, तो गडकरी ने रेल मंत्रालय के साथ बात करके ऑनलाइन मंजूरियां हासिल कर ली.

जब उन्होंने काम संभाला, तब 300 परियोजनाएं मंत्रालयों के बीच के विवादों की वजह से ठप पड़ी थीं. उन्होंने बुनियादी ढांचा समिति बनाई और विवादों के निबटारे के लिए हरेक मुख्यमंत्री से मिले. उनके एक करीबी सहयोगी कहते हैं, ''उनका (गडकरी का) तरीका यह रहा है कि 'या तो मुझे अपनी बात से सहमत करो या मेरी बात मान लो और फैसला लो''' उम्मीद है कि इन्फ्रास्ट्रक्चर परियोजनाओं में रोजगार सृजन होगा और उत्पादन क्षेत्र में मंदी की भरपाई होगी. मोदी 2.0 के लिए भी गडकरी की बड़ी योजनाएं हैं जिसमें मुंबई-दिल्ली एक्सप्रेसवे को चालू करवाना भी है जिससे कुछ लोगों को पूरे इलाके की आर्थिक गतिविधियों में उछाल आने की उक्वमीद है. गडकरी कहते हैं, ''देश में जैसे बिजली का ग्रिड है, मेरा सपना है कि वैसे ही चार लेन की सड़कों और राजमार्गों का ग्रिड बने. दिल्ली से मुंबई जाने में तीन-चार दिन लगते हैं, मैं इसे 28-30 घंटे का सफर बनाना चाहता हूं. मैं यह काम ढाई से तीन साल में कर दूंगा.''

मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में सड़कों के निर्माण ने ज्यादातर पैसा सरकार ने ही लगाया. इसी राह पर आगे बढऩे के लिए मंत्रालय को बिल्कुल नए ढंग के निवेश मॉडल निकालने होंगे, ताकि निवेश को आकर्षित किया जा सके. इसमें बड़ी अड़चन जमीन अधिग्रहण की अंधाधुंध लागतें हैं. उधार देने को अनिच्छुक बैंक और उसके साथ एनबीएफसी का संकट, इन दोनों का नतीजा यह हुआ कि इतनी महत्वाकांक्षी परियोजनाओं के लिए पूंजी के रास्ते बंद हो गए हैं और सरकार के पास इतनी राजकोषीय गुंजाइश नहीं है कि वह पहले की तरह खर्च करती रहे. गडकरी के कंधों पर देश के छोटे और मझोले उद्योगों  में फिर से जान फूंकने का भारी-भरकम काम भी होगा, जो नोटबंदी और जीएसटी की मार से तबाह हो गए हैं. इस वजह से सबसे ज्यादा इकाइयां बंद हुईं और रोजगार खत्म हुए.

अंतरिम वित्त मंत्री और रेलवे, कोयला तथा ऊर्जा मंत्री के तौर पर गोयल की भी प्रतिष्ठा कामों को अंजाम देने वाले की बनी है, जो अपने कान हमेशा जमीन से लगाए रखते हैं. वित्त मंत्री के अपने छोटे-से कार्यकाल में उन्होंने निवेशकों से न केवल मेलजोल बनाए रखा, बल्कि उनका भरोसा जीता और देश भर में बिजली पहुंचाने—यानी मोदी के एक सबसे अहम वादे को पूरा करने—में अहम भूमिका अदा की थी. गडकरी, सीतारमण और गोयल की तिकड़ी की अर्थव्यवस्था के संचालन और उम्मीदों को पूरा करने के बीच नाजुक संतुलन साधने में अहम भूमिका होगी. गोयल को निर्यात बढ़ाने के तरीके खोजने होंगे और पक्का करना होगा कि निर्यात बढ़ाने की जिन योजनाओं को अमेरिका ने चुनौती दी है, उनकी जगह कुछ वैकल्पिक योजनाएं लेकर आएं. साथ ही, अमेरिका के पसंदीदा व्यापार शुल्क वापस ले लेने से जिन वस्तुओं पर असर पड़ा है, देश को उनके लिए नए बाजार भी खोजने होंगे.

खपत को बढ़ावा दें

मोदी की नई टीम को कई मुश्किल रास्तों पर चढ़ाई करनी होगी, क्योंकि कई सारे मुद्दों पर ध्यान देना बेहद जरूरी है. उनमें से एक खपत में भीषण गिरावट है. देश आर्थिक वृद्धि के लिए एक ही इंजन पर भरोसा करता आ रहा है—वह है खपत—और उसमें भी गिरावट आ रही है. इसका सबसे अच्छा उदाहरण ऑटोमोबाइल और एफएमसीजी की बिक्री के आंकड़े हैं. सवारी वाहनों की बिक्री, जो आर्थिक मजबूती का अच्छा पैमाना है, अप्रैल में 21 फीसद गिर गई. इस क्षेत्र में अनिश्चितता की एक वजह जहां नए उत्सर्जन नियंत्रण नियम हैं जो अप्रैल 2020 से लागू हो जाएंगे, वहीं सुस्त आर्थिक वृद्धि, ग्रामीण संकट और खर्च की जा सकने वाली कम आमदनियों के चलते खरीदार पहले किसी भी वक्त से ज्यादा सतर्क और सावधान हो गया है. उधर, एफएमसीजी की दिग्गज कंपनी हिंदुस्तान लीवर ने जनवरी-मार्च 2019 में 7 फीसद की वृद्धि बताई है जो छह तिमाहियों में उसकी सबसे कम वृद्धि है. मार्केट रिसर्च कंपनी नीलसन ने देश में एफएमसीजी बाजार की वृद्धि का अपना अनुमान 2018 के 14 फीसद से घटाकर 2019 में 11-12 फीसद कर दिया है.

क्रिसिल के चीफ इकोनॉमिस्ट डी.के. जोशी कहते हैं, ''उपभोक्ता अपनी बचत खंगाल चुके हैं और उधार भी ले चुके हैं. घर-परिवारों की देनदारियां भी बढ़ती जा रही हैं.'' अर्थव्यवस्था को फिर से जिलाने की खातिर आगे बढऩे के लिए दो बड़े क्षेत्रों में कदम उठाने होंगे: खपत और निवेश. जोशी भविष्यवाणी करते हैं कि खपत अगली दो-एक तिमाहियों में बढऩे लगेगी, मगर निजी निवेश में इससे कहीं ज्यादा वक्त लगेगा. देश में नया निवेश 2019 के वित्त वर्ष की दिसंबर तिमाही में घटकर अपने 14 साल के सबसे निचले स्तर 1 लाख करोड़ रु. पर आ गया. नई निजी परियोजनाएं सितंबर की तिमाही के मुकाबले दिसंबर की तिमाही में गिरकर 62 फीसद पर आ गईं.

केयर रेटिंग्स के चीफ इकोनॉमिस्ट मदन सबनवीस मानते हैं कि जब खपत बढ़ेगी, केवल तभी क्षमताओं का इस्तेमाल किया जा सकेगा और उत्पादकों से ज्यादा निवेश का आग्रह किया जा सकेगा. वे कहते हैं, ''यही वजह है कि आरबीआइ हालांकि दरों में कटौती करता आ रहा है, पर इसके नतीजतन इसी के मुताबिक निवेश नहीं बढ़ा है.'' बैंक भी कम दरों का फायदा खुदरा उपभोक्ताओं को देने में आनाकानी कर रहे हैं. जोशी कहते हैं, ''दरों के व्यवहार में आने में अड़चनें बनी रहती हैं.'' दरअसल, ऊंची दरें तो फौरन व्यवहार में आ जाती हैं, मगर निचली दरें जल्दी व्यवहार में नहीं आ पातीं. बैंक ब्याज दरें घटाना तब तक मुश्किल पाते हैं, जब तक वे खुद अपनी लागतें कम होती न देख लें.

कर्ज के संकट से निबटें

कॉर्पोरेट मामलों के सचिव इंजेति श्रीनिवास ने हाल ही में न्यूज एजेंसी पीटीआइ से कहा था कि बढ़ती गैर-निष्पादित संपत्तियों (एनपीए) के डर ने जहां बैंकों से कर्ज दिए जाने पर रोक लगा दी है, वहीं गैर-बैंकिंग वित्तीय क्षेत्र के आसन्न संकट का नतीजा कर्ज के दबाव, बहुत ज्यादा लाभ लेने, जमा पूंजी-संपत्तियों और देनदारियों के बीच भारी असंतुलन और कुछ बहुत बड़ी कंपनियों के गड़बड़झाले की शक्ल में सामने आया है. उन्होंने कहा कि ये 'मुसीबत के पक्के रास्ते' हैं. क्रेडिट रेटिंग एजेंसी इंडिया रेटिंग्स ऐंड रिसर्च के मुताबिक, बैंक अगले एक साल में 1.5-2 लाख करोड़ रु. के नए खोटे कर्जों का सामना कर सकते हैं.

कुछ अर्थशास्त्रियों के मुताबिक, सरकार को पहली चीज तो यह करनी चाहिए कि वह एनबीएफसी के संकट पर अपना रुख साफ करे. नाम न जाहिर करने की शर्त पर एक अर्थशास्त्री कहते हैं, ''हम टाइम बम पर बैठे हैं. आपको बहुत तेजी से फैसला लेना होगा कि आप किस रास्ते जाना चाहते हैं.'' सरकार के सामने दो विकल्प हैं. एक यह कि एनबीएफसी को नाकाम होने दे, जिन्हें जिंदा रखना मुमकिन नहीं है उन्हें मरने दे, मगर बहुत तेजी से आगे बढ़कर उसके नतीजों पर लगाम लगाए. दूसरा विकल्प यह है कि राहत देकर उन्हें उबारे. वृद्धि के नजरिए से अलबत्ता एनबीएफसी के संकट का समाधान करने की जरूरत है.

एनबीएफसी कंपनियां कई छोटे और बड़े कारोबारों के कर्ज की जीवनरेखा हैं. टोयोटा किर्लोस्कर मोटर के वाइस-चेयरमैन और भारतीय उद्योग परिसंघ (सीआइआइ) के प्रेसिडेंट विक्रम किर्लोस्कर कहते हैं कि मोटर गाडिय़ों की बिक्री में आई सुस्ती के लिए कुछ हद तक एनबीएफसी के संकट को जिम्मेदार ठहराया जा सकता है.

केयर रेटिंग्स के सबनवीस कहते हैं कि एनबीएफसी जिस मॉडल पर चल रही थीं, उसे संकट के आने तक किसी ने एतराज के लायक नहीं पाया था. वे कहते हैं, ''उन्होंने छोटे वक्त की उधारियां लीं और लंबे वक्त के लिए उधार दे दी.ÓÓ अब जब रोकड़े के रास्ते बंद हो गए हैं, यह क्षेत्र डर के मनोविज्ञान की चपेट में आ गया है और जोखिम उठाने से बच रहा है. सबनवीस यह भी कहते हैं, ''आश्वासन (एनबीएफसी के लिए) सरकार और आरबीआइ की तरफ से आना चाहिए.'' बदकिस्मती से इसका कोई संकेत उस मौद्रिक नीति में नहीं था जिसका ऐलान आरबीआइ ने 6 जून को किया.

आरबीआइ के गवर्नर शक्तिकांत दास ने केवल इतना ही कहा, ''हम एनबीएफसी और आवासीय वित्तीय कंपनियों के फलक पर बड़ी संस्थाओं की निगरानी कर रहे हैं. आरबीआइ यह पक्का करने के लिए प्रतिबद्ध है कि हमारे यहां मजबूत और सुचारु ढंग से काम करने वाला एनबीएफसी क्षेत्र हो.'' मानक रेपो दर में लगातार तीसरी बार 25 आधार अंकों की कटौती की गई और केंद्रीय बैंक का नीतिगत रुख 'तटस्थ' से बदलकर 'उदार' कर दिया गया. इस कदम से व्यवस्था में रोकड़े की सप्लाइ में सुधार आने की उम्मीद है. बैंकों के लीवरेज अनुपात में भी ढील दी गई है ताकि वे ज्यादा उधार दे सकें.

गिरती मांग एक और मुद्दा है जिससे सरकार को ताबड़तोड़ निबटना होगा. कुछ अर्थशास्त्रियों ने तो अतिरिक्त राजकोषीय खर्चों को भी सही ठहराया है, मगर उसके इर्दगिर्द काफी 'झालरें और घंटियां' भी  हैं. यहां तक कि प्रत्यक्ष कर ढांचे पर फौरन नए सिरे से नजर डालने की जरूरत है; कॉर्पोरेट कंपनियां बहुत लंबे वक्त से निचली कर दर और रियायतों को खत्म करने की मांग करती आ रही हैं. एक अर्थशास्त्री कहते हैं, ''निवेश केवल तभी आएगा जब उस पर प्रोत्साहन लाभ और प्रतिफल मिलेंगे. निवेशकों को तो पैसा बनाना होता है.''

निर्यात में तेजी लाएं

हमारे निर्यात में अभी तेजी आनी शुरू हुई ही थी कि चीन के साथ व्यापार युद्ध में लिप्त अमेरिका ने भारत की निर्यात प्रोत्साहन योजनाओं को चुनौती दी और 5.6 अरब डॉलर मूल्य के निर्यात के लिए उस तरजीही व्यापार सुविधा को समाप्त कर दिया, जिसके तहत उन वस्तुओं को शुल्क मुक्त का दर्जा दिया गया था. वैश्विक विकास दर में लगातार मंदी और जीडीपी में सेवाओं में बढ़ती हिस्सेदारी का मतलब है कि भारत के व्यापारिक निर्यात में वृद्धि लगातार धीमी रही है. इसके अलावा हमारा निर्यात पिछले पांच वर्षों में हर साल करीब 1.7 प्रतिशत की दर से गिरता रहा है.

नतीजतन, निर्यातोन्मुख फर्मों के प्रदर्शन और यहां तक कि नए रोजगार के सृजन पर भी खासा असर पड़ा है. निर्यात इकाइयों, विशेष रूप से छोटे और मध्यम उद्यमों, को जिन समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है उनमें से एक प्रमुख समस्या है वित्त. यह ऐसा क्षेत्र है जहां सीतारमण और गोयल को एक साथ काम करने की आवश्यकता होगी, और जीएसटी भुगतान से उत्पन्न होने वाली तरलता पर दबाव को कम करना होगा. इसके लिए, जीएसटी परिषद को ई-वॉलेट (इलेक्ट्रॉनिक वॉलेट) योजना को लागू करना है, जिसे विदेश व्यापार महानिदेशालय (डीजीएफटी) की काल्पनिक (नोशनल) या आभासी (वर्चुअल) मुद्रा के साथ क्रेडिट किया जाएगा.

निर्यातक इस आभासी मुद्रा का उपयोग उन वस्तुओं पर जीएसटी का भुगतान करने के लिए कर सकते हैं जो वे आयात करते हैं या खरीदते हैं ताकि उनका धन अवरुद्ध न हो. व्यापार में मंदी से निबटने के लिए, गोयल ने कार्यभार संभालने के कुछ दिनों बाद जापान के त्सुकुबा में आयोजित व्यापार और डिजिटल अर्थव्यवस्था पर जी-20 देशों की मंत्रीस्तरीय बैठक के दौरान विभिन्न देशों के प्रतिनिधियों के साथ कई द्विपक्षीय बैठकें भी कीं. लेकिन देखना है कि इसे किस पैमाने पर लागू कर पाना संभव होगा क्योंकि भारतीय बाजार में नकदी का प्रचलन घटने के बजाए बढ़ता गया है.

विनिवेश और कल्याणकारी योजनाएं

यह एक ऐसा क्षेत्र है जहां सरकार को सख्त नजर रखने की जरूरत है क्योंकि विनिवेश से सरकार के पास बिना राजकोषीय घाटे को बढ़ाए कल्याणकारी योजनाओं पर खर्च करने के लिए पर्याप्त पैसा उपलब्ध हो सकता है. पिछले वित्त वर्ष में सरकार ने कहा था कि विनिवेश से उसने 5,000 करोड़ रु. अधिक जुटा लिए हैं क्योंकि प्राप्तियों ने 80,000 करोड़ रु. के मुकाबले 85,000 करोड़ रु. का आंकड़ा छू लिया है. वित्त वर्ष 2018-19 की समाप्ति से ठीक पहले, सरकारी स्वामित्व वाले पावर फाइनेंस कॉर्पोरेशन ने आरईसी लिमिटेड में 14,500 करोड़ रु. में 52 प्रतिशत हिस्सेदारी हासिल कर ली और इसने विनिवेश के लक्ष्य को और बढ़ा ही दिया. हालांकि, आलोचकों का कहना है कि विनिवेश ने वास्तविक सरकारी स्वामित्व को कम नहीं किया है, क्योंकि एक सार्वजनिक क्षेत्र से पैसा निकलकर दूसरे सार्वजनिक क्षेत्र के पास चला गया है. 2020 के लिए, मोदी सरकार ने 90,000 करोड़ रुपए का लक्ष्य तय किया है.

एयर इंडिया के विनिवेश के सरकार के प्रयासों को अब तक निवेशकों से ठंडी प्रतिक्रिया मिली है. 2007 में इंडियन एयरलाइंस के विलय के बाद से एयर इंडिया घाटे में चल रही है और हर साल 5,000 करोड़ रु. का घाटा हो रहा है. केंद्र सरकार ने पुरानी नीतियों में संशोधन करके एयरलाइन में 76 प्रतिशत प्रत्यक्ष विदेशी निवेश को आकर्षित करने की जगह बना दी, फिर भी कोई इसके अधिग्रहण को आगे नहीं आया. यह सरकार के विनिवेश अभियान के लिए बड़ी शर्मिंदगी का विषय है, क्योंकि वह इस संबंध में एयर इंडिया को विनिवेश के एक शानदार नमूने के रूप में प्रस्तुत करने की योजना बना रही थी.

एक वरिष्ठ नौकरशाह और एक अर्थशास्त्री का कहना है कि सरकार को सरकारी स्वामित्व वाली संपत्तियों के मुद्रीकरण की दिशा में तेजी से आगे बढऩे की जरूरत है और निजी निवेश के जरिए अर्थव्यवस्था को तेज करने के लिए विनिवेश का एक आक्रामक एजेंडा रखा जाना चाहिए. वे कहते हैं, ''आपको हवाई अड्डों के एक समान फौरन निजीकरण की आवश्यकता है. सरकार को होटलों, स्टेडियम या फिर भारत संचार निगम लिमिटेड जैसी फर्म चलाने की कोई जरूरत नहीं है. आपको बहुत सारा निजी निवेश मिलेगा. सरकार को कई ऐसे क्षेत्रों से बाहर निकलना चाहिए, जिनमें वह बड़ी संपत्ति पर बैठी है.

खनन को निजी क्षेत्रों के लिए खोला जाना चाहिए और राष्ट्रीय फाइबर ऑप्टिक नेटवर्क के भारतनेट का निजीकरण करना चाहिए.'' वे कहते हैं कि भारत को पारदर्शी तरीके से बोली लगाओ की नीति के तहत आगे बढऩा चाहिए. मीडिया रिपोर्टों में कहा गया है कि भारत रणनीतिक बिक्री को गति देने के लिए जल्द ही एक 'वैकल्पिक तंत्र' सक्रिय करेगा. इस तंत्र में कुछ चुनिंदा मंत्रियों को राज्य-संचालित कंपनी की बिक्री के लिए समयावधि, शेयरों की कीमत और राशि तय करने का अधिकार दिया गया है. कई दूसरे जानकारों का भी मानना है कि इसमें और देरी नहीं करनी चाहिए. इससे निजी निवेश की आमद के लिए भरोसा बढ़ेगा और रोजगार का संकट भी हल होने की दिशा में बढ़ेगा.

औद्योगिक वृद्घि तेज करें  

कारोबारी इस बात से बहुत चिंतित रहे हैं कि मोदी सरकार की नीतियां विनाशकारी होने के स्तर तक आक्रामक रही हैं और कम कर दरों का वादा कभी भी पूरा नहीं हुआ. मोदी सरकार के न्यूनतम सरकार के वादे के विपरीत, स्टार्ट-अप्स कर अधिकारियों की ओर से आतंकित किए जाने की शिकायत करते रहे हैं. जबकि छोटे व्यवसाय के मालिक इस बात को दोहराते रहे हैं कि कैसे नोटबंदी और जीएसटी ने उन पर दोहरी चोट की है, बड़े व्यवसायों का कहना है कि निवेश तभी बढ़ेगा जब उन्हें बेहतर रिटर्न की संभावनाएं नजर आएंगी. उम्मीद है कि देश में इस समय वृद्घि दर 7 से 8 फीसद की होगी. उद्योग और सरकार के बीच विश्वास की कमी है और ऐसा कोई दूरदर्शी एजेंडा या भूमि मुद्रीकरण योजना नहीं दिखती जिससे सरकार की योजनाओं के प्रति विश्वसनीयता बढ़े और अर्थव्यवस्था में उछाल आए.

हालांकि, व्यापार करने में सहूलियत की दिशा में कुछ प्रयास किए गए हैं. उद्योग और आंतरिक व्यापार संवर्धन विभाग में सचिव रमेश अभिषेक, वल्र्ड बैंक के ईज ऑफ डूइंग बिजनेस (कारोबारी सहूलियत) रिपोर्ट के शीर्ष 50 देशों में भारत का नाम शुमार कराने के मिशन पर हैं. राज्य और जिला-स्तरीय व्यापार सुधारों के लिए एक कार्य योजना है. अभिषेक, राज्यों के बीच की भारी प्रतियोगिता का जिक्र करते हुए कहते हैं कि कुछ राज्य जो शुरू में रुचि नहीं ले रहे थे, वे भी इस पहल में जुडऩे लगे हैं. वे कहते हैं, ''तेलंगाना और आंध्र प्रदेश हमेशा एक दूसरे के साथ प्रतिस्पर्धा करते रहे हैं. लेकिन अब हरियाणा जैसे राज्य भी बहुत अच्छा कर रहे हैं. इन रैंकिंग के जरिए, हम राज्यों पर अपनी नीतियां दुरुस्त करने का दबाव भी डाल रहे हैं. लगभग दो-तिहाई सुधार राष्ट्रीय चरित्र के हैं जबकि एक तिहाई राज्यस्तर पर होने हैं.'' जोशी कहते हैं, ''सरकार की औद्योगिक नीति का प्राथमिक ध्यान प्रतिस्पर्धा में सुधार पर होना चाहिए. लॉजिस्टिक, बुनियादी ढांचे और भूमि व श्रम कानूनों के सरलीकरण में महत्वपूर्ण सुधार की आवश्यकता है.''

इसमें कोई दो राय नहीं कि ऐसी कोई जादू की छड़ी नहीं है, जो अर्थव्यवस्था में रातोरात चमत्कार कर दे. लेकिन निजी क्षेत्र को कुछ प्रलोभन देने की जरूरत है और ये प्रलोभन कुछ सरकारी प्रोत्साहनों के माध्यम से स्पष्ट दिखाई देने चाहिए. उदाहरण के लिए, सॉफ्टवेयर क्षेत्र में उछाल 10 साल के कर अवकाश के बाद आई थी. हालांकि इस तरह का कर अवकाश सभी क्षेत्रों के लिए संभव नहीं है, फिर भी सरकार उच्च विकास और रोजगार सृजन क्षेत्रों की पहचान कर सकती है और उन क्षेत्रों में प्रोत्साहन की पेशकश कर सकती है.

भ्रष्टाचार के खिलाफ युद्ध जारी रखा जाना चाहिए लेकिन अतिउत्साह में व्यवसाय को नहीं मारना चाहिए. 'सूट-बूट की सरकार' की छवि वाली आंच से खुद को दूर रखने के लिए सरकार ने शायद अपने पहले कार्यकाल में, बहुत संदेह के साथ कारोबार किया. बड़े निवेशों की सलाह देते हुए एक अर्थशास्त्री कहते हैं, '' वित्त मंत्री सीतारमण को यह आश्वस्त करना होगा कि सरकार की कोई भी उद्योग नीति उद्योग को नुक्सान नहीं पहुंचाएगी. व्यवसाय करने में आसानी का अर्थ केवल कंप्यूटर पर क्लिक करके काम पूरा करा लेना नहीं होता.''

 किर्लोस्कर कहते हैं, ''इक्विटी की लागत अधिक है. लोग बहुत अधिक ऋण का उपयोग कर रहे हैं और कोई अर्थव्यवस्था उच्च ऋण के साथ नहीं बढ़ सकती.'' कॉर्पोरेट टैक्स में कभी कोई गिरावट नहीं हुई. उन्होंने कहा कि सरकार को छूट हटा देनी चाहिए और फिर कॉर्पोरेट कर की दर को घटाकर 18 फीसद कर देना चाहिए.

उत्पादन क्षेत्र को गति दें

इस बीच, उत्पादन क्षेत्र अब भी उपेक्षित है. वित्त वर्ष 2018-19 में जीडीपी में इसकी हिस्सेदारी 18.2 प्रतिशत थी, जो यूपीए-2 के अंत में 17.2 थी. पांच साल में महज एक प्रतिशत की वृद्धि से पता चलता है कि अगर भारत को चीन, अमेरिका, जापान, दक्षिण कोरिया जैसे देशों के साथ प्रतिस्पर्धा में खड़े होना है और जीडीपी में इसकी हिस्सेदारी को 2022 तक 25 प्रतिशत तक पहुंचाना है तो उत्पादन क्षेत्र को कितनी तेजी से बढऩे की जरूरत है. तभी देश के युवाओं के लिए पर्याप्त नौकरियां पैदा हो पाएंगी.

सरकार को कारोबार करने में आसानी के वादे को धरातल पर निभाने की जरूरत है, खासकर भूमि अधिग्रहण के क्षेत्रों में, तेजी से और सरल मंजूरी और सुधारों में राज्यों के लिए एक प्रमुख भूमिका आश्वस्त करनी होगी. उदाहरण के लिए, केवल आठ राज्यों ने भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनस्र्थापन (एलएआरआर) अधिनियम 2013 को लागू किया है. यह केंद्र सरकार की ओर से राज्यों को उनकी विशिष्ट आवश्यकताओं के अनुसार एलएआरआर में संशोधन करने की अनुमति देने के बावजूद है. सरकार को वैश्विक बाजारों में विकास के प्रमुख क्षेत्रों की पहचान करनी चाहिए और ऐसी इकाइयों की स्थापना करनी चाहिए जो उत्पाद की गुणवत्ता और लागत-प्रभावशीलता को लेकर वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धा कर सकें. तभी उत्पादन क्षेत्र में तेजी आएगी.

मारुति सुजुकी के अध्यक्ष आर.सी. भार्गव का कहना है कि न केवल सरकार, बल्कि उद्योग भी उत्पादन बढ़ाने में मदद कर सकते हैं. वे कहते हैं, ''जिस तरह से हमने भारत में अपने प्रबंधन की रूपरेखा तैयार की है वह हमारी जनसांख्यिकीय स्थिति के अनुरूप नहीं है. हमने पश्चिमी मॉडल का पूरी तरह से पालन किया है. हमें जापानी मॉडल का पालन करना चाहिए.'' उन्होंने कहा कि सरकार को सभी प्रकार के लेनदेन की लागत को कम करना होगा और एक ऐसा माहौल बनाना होगा जहां उद्योग को अधिक समतावादी होने की ओर बढ़ाया जाए.

इसके अलावा, कौशल विकास के उद्देश्य से निजी-सार्वजनिक भागीदारी पर जोर होना चाहिए, क्योंकि कुशल कार्यबल की कमी इस क्षेत्र की सबसे बड़ी कमियों में से एक है. आधुनिक उत्पादन में नई प्रौद्योगिकी को शामिल करना विकास के लिए अनिवार्य है. सरकार को उत्पादन क्षेत्र में कार्यरत सार्वजनिक क्षेत्र के उद्यमों पर भी कड़ी नजर रखने की जरूरत है, जहां उन्हें अधिक कामकाजी स्वायत्तता दिए जाने की आवश्यकता है, वहीं उन्हें अपने हितधारकों के प्रति जवाबदेह बनाया जाना चाहिए. सार्वजनिक क्षेत्र की कई फर्में घाटे, आवश्यकता से अधिक कार्यबल और उत्पादकता को लेकर ढुलमुल रवैये के कारण समस्याग्रस्त हैं.

कृषि संकट दूर करें  

कृषि एक अन्य क्षेत्र है जिसकी जिम्मेदारी मोदी ने मध्य प्रदेश के एक सांसद नरेंद्र सिंह तोमर को सौंपी है जिनके पास ग्रामीण विकास और पंचायती राज मंत्रालय भी है जिसे वे पिछली सरकार में संभाल रहे थे. कृषि विकास दर-2014 से 2019 तक औसतन 2.7 प्रतिशत—यूपीए के वर्षों की तुलना में एनडीए शासन में बहुत कम है. ग्रामीण मजदूरी में कम वृद्धि (दिसंबर 2018 में 3.8 प्रतिशत सालाना) और कृषि उपज की कम कीमतों ने ग्रामीण अर्थव्यवस्था में बड़ी परेशानियां खड़ी की हैं और इस क्षेत्र में भी रोजगार का अभाव है और किसानों की आत्महत्या अब भी जारी है.

विशेषज्ञों का कहना है कि सुधारों ने कृषि को पूरी तरह से खत्म कर दिया है. अर्थशास्त्री सुरजीत भल्ला कहते हैं, ''हमने कृषि सुधारों की तरफ कभी ध्यान ही नहीं दिया. 1991 के सुधारों ने इस क्षेत्र के लिए कुछ नहीं किया और यूपीए ने तो सुधारों को बेपटरी कर दिया था. हमें आवश्यक वस्तु अधिनियम की आवश्यकता क्यों है? एपीएमसी अधिनियम कहता है कि किसान केवल लाइसेंस प्राप्त मंडी में ही अपनी उपज बेच सकता है. मंडी में पैसा कौन बनाता है?'' एपीएमसी अधिनियम को समाप्त करना राजनैतिक रूप से तब बहुत विवादास्पद बन गया जब महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडऩवीस को इस अधिनियम को रद्द करने के तीन हक्रते के भीतर फिर से लागू करना पड़ा. कृषि क्षेत्र के संकट ने भाजपा को बहुत क्षति पहुंचाई और दिसंबर में हुए राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ तीन हिंदी प्रदेशों के विधानसभा चुनावों में भाजपा को हुए नुक्सान ने मोदी सरकार के सामने एक बड़ी चुनौती पेश की थी. लोकसभा चुनाव में पार्टी ने इन राज्यों में हुए नुक्सान की भरपाई कर ली है और ऐसी उम्मीद जताई जा रही है कि सरकार 2022 तक किसानों की आय दोगुनी करने के अपने वादे को निभाने की दिशा में काम करेगी.

अंतरराष्ट्रीय आर्थिक संबंधों पर भारतीय आर्थिक अनुसंधान परिषद के इन्फोसिस चेयर प्रोफेसर अशोक गुलाटी कहते हैं कि ग्रामीण क्षेत्र में कृषि उत्पादकता को बढ़ाना, ग्रामीण क्षेत्र में मांग बढ़ाने की दिशा में एक कदम हो सकता है. इसे प्राप्त करने के लिए, भारत को अपनी कृषि-जीडीपी वृद्धि को संशोधित करने की आवश्यकता है जो 4 प्रतिशत के वांछनीय स्तर से नीचे है. गुलाटी कहते हैं, ''भारत में कभी भी कृषि सुधार नहीं हुए और किसानों की आय बहुत कम रही है.''

सुधार प्रक्रिया पूरी करें

पहले से शुरू किए गए सुधार ठीक-ठीक होने चाहिए और समाप्त होने चाहिए. जोशी कहते हैं, ''जीएसटी और दिवाला तथा दिवालियापन संहिता (आइबीसी) को दुरुस्त करने की आवश्यकता है. इन दोनों को ठीक करने से नए सुधारों की तुलना में अधिक परिणाम मिलेंगे.'' दोनों ने प्रणाली की दक्षता को बढ़ाया है और अगले कुछ वर्षों में लाभ दिखाई देगा.

हालांकि जीएसटी ने विभिन्न केंद्रीय और राज्य करों को एक एकल कराधान की छतरी के नीचे ला दिया है लेकिन व्यापार जगत के फीडबैक के बाद लगातार संशोधन करके जीएसटी के चार समूहों—5 प्रतिशत, 12 प्रतिशत, 18 प्रतिशत और 28 प्रतिशत के चार स्लैब के तहत वर्गीकरण किया गया. 5 जुलाई को बजट प्रस्तुत होने से पहले जीएसटी परिषद की 20 जून को बैठक की उम्मीद है, जहां उच्चतम स्लैब में वस्तुओं की एक और छंटाई हो सकती है. परिषद ने दिसंबर में 23 वस्तुओं पर दरों में कटौती की थी जो 1 जनवरी, 2019 से प्रभावी हुई और उच्च जीएसटी वाले स्लैब में मुख्य रूप से लग्जरी और स्वास्थ्य के लिए हानिकारक वस्तुएं ही—ऑटोमोबाइल और सीमेंट के अलावा—इस श्रेणी में रहीं.

आइबीसी पर भी अभी काम चल ही रहा है. हालांकि इसके जरिए खराब ऋणों के समाधान और कॉर्पोरेट परिदृश्य में तत्काल महत्वपूर्ण बदलाव की उम्मीद है लेकिन इसकी प्रगति धीमी है और मुकदमेबाजी चरम पर है. कंपनियों में कर्ज के समाधान पर 12 फरवरी के आरबीआइ के सर्कुलर को एक डरावने कानून के रूप में देखा गया और सुप्रीम कोर्ट ने इसे अल्ट्रा वाइरस (आरबीआइ की कानूनी शक्ति से परे) के रूप में रखा. 7 जून को, केंद्रीय बैंक ने नए दिशानिर्देश जारी किए, जिसमें कहा गया था कि बैंकों को एक दिन पहले की बजाए 30 दिनों के भीतर डिफॉल्ट कंपनियों की ऋण समाधान प्रक्रिया शुरू करने की आवश्यकता है.

क्रिसिल के वरिष्ठ निदेशक कृष्णन सीतारमन कहते हैं, ''नया विवेकपूर्ण ढांचा विवादास्पद खातों के लिए राहत है, जहां रिजॉल्यूशन की योजनाएं लागू हो रही थीं लेकिन 180 दिनों में समाधान नहीं होने पर आइबीसी के तहत मामला लाना था. इसके प्रमुख लाभार्थियों में से एक तो बिजली क्षेत्र की कंपनियां हैं जो आइबीसी के तहत दिवाला कार्रवाई को संदर्भित किए जाने के कगार पर थीं. इसकी अनुमानित राशि लगभग 1 लाख करोड़ रुपए बताई जाती है और बैंकों की कई संपत्तियों पर नजर थी जिससे वे अपना बकाया वसूलने की उम्मीद लगाए थे.''

श्रम और भूमि सुधार  

विशेषज्ञ जीएसटी और आइबीसी जैसे दो प्रमुख सुधारों की दिशा में तत्काल कार्रवाई करने की बात करते हैं जैसा कि मोदी सरकार के पहले कार्यकाल में हुआ था. श्रम सुधारों में लचीलापन होना चाहिए लेकिन ट्रेड यूनियनों ने बदलावों का विरोध किया है. वर्तमान में, श्रम के विभिन्न पहलुओं जैसे मजदूरी, बोनस, काम करने की स्थिति और औद्योगिक विवादों को नियंत्रित करने वाले 40 राज्यस्तरीय और केंद्रीय कानून मौजूद हैं. इन कानूनों को मजबूत करने के लिए कई सिफारिशें की गई हैं; अगस्त 2017 में लोकसभा में मजदूरी पर एक कोड पेश किया गया था. यह कोड मजदूरी, औद्योगिक संबंधों, सामाजिक सुरक्षा और कल्याण, व्यावसायिक सुरक्षा और स्वास्थ्य और कामकाजी परिस्थितियों पर चार कानूनों या श्रम कोड को समेकित करता है.

विधेयक को श्रम संबंधी स्थायी समिति को संदर्भित किया गया है. 2019 में, उम्मीद है कि सरकार इन सुधारों को तेज करने की कोशिश करेगी. 2013 में एग्जिम बैंक के एक अध्ययन में पाया गया कि भारतीय श्रम कानूनों के प्रावधान एक कारण हो सकते हैं कि जिनके कारण भारत में उद्यमों के आकार छोटे रहते हैं. यहां तक कि जब देश को एक बड़ी रोजगार चुनौती का सामना करना पड़ रहा है, फिर भी यहां की फर्मों में काम करने वाले श्रमबल की औसत संक्चया 75 ही है, जो चीन के 191 और इंडोनेशिया के 178 की तुलना में बहुत कम है. और यह तब है जब भारत का उत्पादन आधार काफी हद तक श्रम सघन है. विश्व आर्थिक मंच की वैश्विक प्रतिस्पर्धा रिपोर्ट में भारतीय श्रम बाजार में संवेदनशीलता को भी उजागर किया गया है.

श्रम कानूनों के कठोर होने के कारण, कंपनियां श्रमिकों की भरपाई पूंजी के उपयोग यानी ऑटोमेशन से कर रही हैं. जोशी कहते हैं, ''श्रम कानून को अधिक लचीला बनाएं ताकि कंपनियां श्रमबल की पूर्ति के लिए स्वचालन (ऑटोमेशन) की ओर जाने को बाध्य न हों.'' वे बताते हैं कि स्वास्थ्य एक श्रम सघन क्षेत्र है और आयुष्मान भारत जैसे सबके लिए स्वास्थ्य बीमा योजना को धरातल पर उतारने के लिए भारत को अधिक मानव शन्न्ति की आवश्यकता होगी.

इसी तरह, भूमि अधिग्रहण एक कठिन और बहुत महंगी प्रक्रिया है. यूपीए सरकार के पारित कानून ने शहरी क्षेत्रों के लिए मुआवजे को बाजार मूल्य पर और ग्रामीण क्षेत्रों के लिए बाजार मूल्य से दोगुना निर्धारित कर दिया, जिसके कारण भूमि अधिग्रहण व्यवसायों के लिए अनुपयुक्त हो गया. विपक्ष के विरोध के बाद संसद के ऊपरी सदन यानी राज्यसभा में मोदी सरकार का संशोधित भूमि अधिग्रहण विधेयक पारित नहीं हो सका. अब राज्यों को अपने-अपने राज्यों में स्वयं के भूमि सुधारों को लागू करने को कह दिया गया है, जो निवेशकों को भ्रमित कर रहा है.

श्रम और भूमि सुधारों के लिए विशेषज्ञ सलाह देते हैं कि केंद्र सरकार को एक व्यापक रूपरेखा तैयार करके राज्यों के साथ सहमति बनाने के लिए काम करना होगा. देश में कुछ अल्पकालिक सुधार और दीर्घकालिक संरचनात्मक सुधारों की आवश्यकता है. जैसा भाजपा के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष विनय सहस्रबुद्धे कहते हैं, ''इस सरकार के सामने जो बड़ी चुनौतियां है उनमें एक ऐसा दोषरहित मॉडल बनाना जिसे हर जगह दोहराया जा सके और रोजगार के क्षेत्र में आ रही चुनौतियों का सामना करने की तैयारी करनी है. इसकी बुनियादी तैयारी हो चुकी है और यह भी स्पष्ट है कि लोग कठोर निर्णय स्वीकार कर सकते हैं बशर्ते निर्णयकर्ता की नीयत अच्छी हो. यह सरकार को मजबूत फैसले लेने के लिए प्रेरित करता है.'' नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी, अमिताभ कांत ने कड़े फैसलों की आवश्यकता पर विस्तार से बताते हुए कहते हैं, ''हमें कोयला, ऊर्जा, तेल और गैस जैसे बड़े क्षेत्रों को निजी क्षेत्रों के लिए खोलने की आवश्यकता है.''

सबनवीस कहते हैं, ''इस बात को स्वीकार करना होगा कि आर्थिक विकास में मंदी है और यह इसलिए हुआ है क्योंकि खपत और निवेश, दोनों उस स्तर तक नहीं बढ़े हैं, जितना होना चाहिए था.'' सबनवीस कहते हैं कि सरकार को खपत को फिर से बढ़ाना होगा. इसने 87,000 करोड़ रु. के नकद हस्तांतरण की शुरुआत की है. इसे मध्यम वर्ग को कुछ आयकर रियायतें भी देनी चाहिए, ताकि उन्हें पैसा खर्च करने के लिए प्रोत्साहन मिले. इसके अलावा, सरकार को सभी कंपनियों के लिए कॉर्पोरेट कर की दर कम करनी चाहिए और इसे निवेश से जोडऩा चाहिए. व्यय के लिए उनका मानना है कि सरकार को राजकोषीय घाटे के लक्ष्य को पार करने से बचना चाहिए. इसके अलावा उसके पास ज्यादा कुछ करने को कुछ है नहीं. जीएसटी को युक्तिसंगत करने से कर संग्रह में कमी आई है. यह व्यापार के लिए संतुलन की स्थिति भी है, क्योंकि जीएसटी के कारण बेशक कर संग्रह की दर में कमी आई हो लेकिन खपत में वृद्धि के साथ जीडीपी में वृद्धि हो सकती है जैसा कि डोनाल्ड ट्रंप अमेरिका में करने का दावा करते हैं.

इस बात पर सर्वसम्मति है कि भारत को नौ प्रतिशत से अधिक की वृद्धि पर ले जाने के लिए साहसिक और आक्रामक उपायों की जरूरत है. प्रधानमंत्री को अब मजबूत और स्थिर सरकार का जनादेश मिला है, इसलिए निर्णायक और प्रभावी कदम की उम्मीद की जानी चाहिए.

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