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गोदी में सूखती हैं जिसकी हजारों नदियां

देश की बारहमासी नदियों के बहाव में आ रही है कमी. मॉनसून के बदलते मिजाज, अनियंत्रित आबादी और भूजल के अंधाधुंध दोहन से आने वाले वर्षों में संकट के संकेत

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aajtak.in
मंजीत ठाकुर नई दिल्ली, 21 January 2020
गोदी में सूखती हैं जिसकी हजारों नदियां मरती नदियां

तमिलनाडु में पिछले दिसंबर में भारी बारिश और सैलाब से 25 मौतों और पुदुच्चेरी में संकरबरनी नदी पर विदुर बांध के लबालब भरने से पैदा हुए संकट से दक्षिण भारत में वैसे ही हालात बन गए थे जैसे उत्तर भारत में 2019 के अगस्त महीने में थे और इसके बीच अगर यह कहा जाए कि देश की नदियों में पानी घटता जा रहा है तो क्या आपको भरोसा होगा? पर यह सच है.

याद कीजिए, भारतीय मौसम विभाग (आइएमडी) और निजी एजेंसी स्काइमेट दोनों के मॉनसून के सामान्य से कम रहने के अनुमान के बाद 31 जुलाई, 2019 तक, जब आधा सीजन बीत चुका था, देशभर में सामान्य से 9 फीसद कम बारिश हुई थी. पर अगस्त और सितंबर में स्थिति उलट गई.

तब स्काइमेट के प्रबंध निदेशक जतिन सिंह ने कहा था, ''अगस्त तक बारिश की मात्रा सामान्य से अधिक हो गई और कुल बरसात सामान्य से 1 फीसद अधिक रही.'' मॉनसून ने ऐसा ढब 2017 और 2018 में भी दिखाया था. इसका मतलब है कि मॉनसून की चाल बीच रास्ते में थोड़ी बदलने और बहकने लगी है.

बारिश के मौसम में बादलों की बेरुखी और फिर धारासार बरसात का क्या नदियों की धारा में कमी से कोई रिश्ता है? पर्यावरणविद् सोपान जोशी कहते हैं, ''पिछले कुछ वर्षों में घमासान बारिश ज्यादा होने लगी है.

पिछले 20 साल में 15 सेंटीमीटर से ज्यादा बारिश वाले दिनों में बढ़ोतरी हुई है, लेकिन 10 सेमी से कम बारिश वाले दिनों की गिनती कम हो गई है.''

रांची विश्वविद्यालय में भूगर्भशास्त्र के प्रोफेसर और पठारी नदियों का अध्ययन करने वाले नीतीश प्रियदर्शी कहते हैं, ''नदियों में पानी बारिश से ही आता है.

मूसलाधार बरसात का पानी तो बहकर निकल जाता है. हल्की और रिमझिम बरसात का पानी ही जमीन के नीचे संचित होता है और नदियों को सालों भर बहने का पानी मुहैया कराता है.''

लेकिन नदियों के पानी में कमी से उनका चरित्र बदलने और उनके बारहमासी से मौसमी नदी बन जाने की यह घटना सिर्फ हिंदुस्तान में नहीं, पूरी दुनिया में देखी जा रही है. पुणे की संस्था फोरम फॉर पॉलिसी डायलॉग्स ऑन वॉटर कॉन्फ्लिक्ट्स इन इंडिया का एक अध्ययन बताता है कि सदानीरा नदियों में पानी कम होने का चलन दुनिया भर में दिख रहा है. अत्यधिक दोहन और बड़े पैमाने पर उनकी धारा मोडऩे की वजह से अधिकतर नदियां अब अपने मुहानों पर समंदर से नहीं मिल पातीं.

इनमें मिस्र की नील, उत्तरी अमेरिका की कॉलरेडो, भारत और पाकिस्तान में बहने वाली सिंधु, मध्य एशिया की आमू और सायर दरिया शामिल हैं. अब इन नदियों की औकात एक पतले नाले से अधिक की नहीं रह गई है. प्रियदर्शी कहते हैं, ''दुनिया की ज्यादातर नदियां जंगलों से बहती हैं. जिन नदियों के बेसिन में जंगल काटे गए हैं वहां नदियों में पानी कम हुआ है, उन्हें अविरल धारा के लिए पानी नहीं मिल रहा है. बरसात खत्म होते ही नदियां सूखने लगती हैं. भूजल ठीक से चार्ज नहीं हो रहा है. एक अहम मौसमी चक्र टूट गया है.''

वर्ल्ड वाइल्डलाइफ फंड ने पहली बार दुनिया की लंबी नदियों पर एक अध्ययन किया है और इसके निष्कर्ष खतरनाक नतीजों की तरफ इशारा करते हैं. मई, 2019 में प्रकाशित इस रिपोर्ट में कहा गया है कि धरती पर 246 लंबी नदियों में से महज 37 फीसदी अविरल बह पा रही हैं. नदियों पर काम करने वाले सामाजिक कार्यकर्ता सौमित्र रॉय कहते हैं, ''आर्कटिक को छोड़कर बाकी सभी नदी बेसिनों में जंगलों की बेतहाशा कटाई हुई है.

अमेजन के वर्षावनों का वजूद ही अब खतरे में है जहां 1,500 से अधिक पनबिजली परियोजनाएं हैं.'' इसकी मिसाल गंगा भी है. पिछले साल जून के दूसरे पखवाड़े में उत्तर प्रदेश के जलकल विभाग को एक चेतावनी जारी करनी पड़ी क्योंकि वाराणसी, प्रयागराज, कानपुर और दूसरी कई जगहों पर गंगा नदी का जलस्तर न्यूनतम बिंदु तक पहुंच गया था. इन शहरों में कई जगहों पर गंगा इतनी सूख चुकी थी कि वहां डुबकी लगाने लायक पानी भी नहीं बचा था. हैंडपंप या तो सूख गए या कम पानी देने लगे थे. पेयजल आपूर्ति के लिए भैरोंघाट पंपिंग स्टेशन पर बालू की बोरियों का बांध बनाकर पानी की दिशा बदलनी पड़ी.

वैज्ञानिकों का मानना है कि उत्तर भारत के तीन बड़े नदी बेसिनों में जल उपलब्धता में कमी आई है. केंद्रीय जल आयोग के लिए तैयार इसरो की दिसंबर, 2018 में जारी रिपोर्ट के अनुसार, सिंधु, गंगा और ब्रह्मपुत्र नदी बेसिनों में जल उपलब्धता में कमी दर्ज की गई है (टेबल). नेचर पत्रिका में प्रकाशित एक शोध में वैज्ञानिक अभिजीत मुखर्जी स्पष्ट लिखते हैं कि पिछले कुछ दशकों में गंगा के बहाव में मॉनसून पूर्व महीनों में कमी देखी गई है और कुछ दशक पहले के मुकाबले गर्मी में गंगा की धारा कम रहने लगी है. 1999-2013 के बीच किया गया यह शोध कहता है कि गंगा के बहाव में आ रही यह स्थायी कमी करीब 38 सेंटीमीटर सालाना तक है और यह इसके बेसिन में जलभरों (एम्विफर) की आधारधारा (बेसक्रलो) में आ रही कमी से जुड़ी है. शोध में अनुमान लगाया गया है कि 1970 के दशक में सिंचाई और ट्यूबवेल की क्रांति की वजह से तब से अब तक गंगा की धारा में करीबन पचपन फीसदी की कमी आ गई है और इससे भविष्य में घरेलू जलापूर्ति, सिंचाई, नदी परिवहन और पर्यावरण पर असर पड़ेगा.

नदियों की पारिस्थितिकी पर काम कर चुके और इंटरनेशनल रिवर्स संस्था (दक्षिण एशिया) के पूर्व समन्वयक रहे भरतलाल सेठ कहते हैं, ''अतिदोहन एक बड़ी वजह है. आबादी बढ़ी है तो प्रति व्यक्ति जल उपलब्धता कम होगी ही. हर नदी की अपनी सीमा होती है. जल उपलब्धता के बारे में कहना मुश्किल है, पर आंकड़े उलझाऊ होते हैं.'' शहरीकरण और औद्योगिकीकरण, कृषि और घरेलू इस्तेमाल के लिए हम नदियों से सीधे या भूमिगत जल के रूप में अप्रत्यक्ष रूप से पानी खींच रहे हैं. वे चेताते हैं, ''अब नदियों का पानी साझा करने के लिए पहले के मुकाबले कई गुना अधिक आबादी है.''

आंकडों के गड़बड़झाले पर साउथ एशिया नेटवर्क ऑन डैम्स, रिवर्स ऐंड पीपल के समन्वयक हिमांशु ठक्कर कहते हैं, ''सही आंकड़े न होना भारत की बड़ी त्रासदी है. देश में नदी की धारा के आंकड़े इकट्ठा करने की जिम्मेदारी केंद्रीय जल आयोग के हवाले है. यही संस्था बड़े बांध बनाने की अनुमति भी देती है, नीतियां बनाती है और शोध के साथ निगरानी भी करती है. इससे हित टकराते हैं.''

ठक्कर कहते हैं, ''आयोग के पास विश्वसनीय सूचना नहीं है इसलिए यह सूचनाएं साझा नहीं करता. लेकिन रिसर्च नदियों की दशा की ओर इशारा करते हैं.''

मुखर्जी के शोध में पहली बार गंगा के जलस्तर को नियमित तौर पर मापा गया. प्री-मॉनसून जलस्तर मापने के लिए रिमोट सेंसिंग का सहारा लिया गया और आंकड़े 28 स्थानों से हासिल किए गए.

वैसे इसरो की रिपोर्ट में पिछले कुछेक दशकों में गंगा, ब्रह्मपुत्र, गोदावरी, कृष्णा, कावेरी, माही, नर्मदा और तापी जैसी नदियों के बेसिन में सालाना बारिश की मात्रा में आई कमी का जिक्र भी है. क्या गंगा के घटते बहाव का कारण बेसिन में बारिश का कम होते जाना है? रॉय कहते हैं, ''बारिश में कमी एकमात्र वजह नहीं है. नदी को सींचने वाले प्राकृतिक जल ढांचों, तालाब, झीलों का सिकुडऩा या पूरी तरह से खत्म हो जाना और बड़ी नदियों में मिलने वाली सहायक नदियों का सिकुडऩा, इनकी भी बड़ी भूमिका है.''

असल में, मुखर्जी का शोध कहता है कि 1971 के बाद से ही गंगा बेसिन में मॉनसून से पहले बरसात में बढ़ोतरी हुई है और गंगा के औसत वार्षिक बहाव में ग्लेशियरों का हिस्सा 10 फीसद ही है और यह भी ज्यादातर ऊपरी गंगा में ही उपलब्ध होता है. इसलिए गंगा की धारा में आ रही कमी का सीधा असर भूमिगत जल के साथ है. नदियों के नजदीक के जलभरों से पानी के अधिक दोहन से नदियों की धारा कम होती है क्योंकि उनका पानी बेसफ्लो भरने में खर्च होने लगता है. मुखर्जी का पूर्वानुमान है कि भूजल के अत्यधिक इस्तेमाल के असर से 2050 तक गंगा की धारा मौजूदा धारा से करीबन 38 फीसद कम हो जाएगी.

रॉय कहते हैं, ''नदीतल के ऊपर बहने वाले पानी यानी रनऑफ और तल के नीचे बहने वाले पानी का अनुपात 38-1 होता है. नदी के सूखने के बावजूद नदी तल के नीचे पानी का प्रवाह बना रहता है. अगर कैचमेंट में अनियंत्रित भूजल दोहन होगा तो निश्चित रूप से नदी का बहाव भी कम होगा, खासकर तब जब नदी को सालभर जिंदा रखने वाले पानी के ढांचे उजड़ जाएं.'' ठक्कर कहते हैं, ''हम उस भूजल का अधिक उपयोग कर लेते हैं जो नदियों के साथ गतिशील संतुलन में होता है. इससे नदी में बहाव कम हो जाता है.''

डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की 2006 की एक रिपोर्ट गंगा के अस्तित्व के खत्म होने की चेतावनी देती है. रिपोर्ट के मुताबिक, गंगा की सहायक नदियों को बराज के जरिए नियंत्रित किया जाता है और इन नदियों के 60 फीसद पानी को सिंचाई के लिए भेज दिया जाता है. फरन्न्का बराज के बाद गंगा पहले की तुलना में महज 14 फीसद रह जाती है.

उधर उत्तर में, 2005 से चालू हुए दुनिया के पांचवें बड़े बांध टिहरी के जरिए उत्तर प्रदेश और दिल्ली को रोजाना 27 करोड़ गैलन पानी भेजा जाता है. यही नहीं, जिन पांच राज्यों, उत्तराखंड, उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड और पश्चिम बंगाल, से होकर गंगा गुजरती है, वहां की सरकारों ने ट्यूवबेल के लिए बिजली पर भारी सब्सिडी दे रखी है. इन राज्यों में सिंचाई के विस्तार की योजना है और सतही जल को इस्तेमाल के लिए मोडऩे के आंकड़े भी सार्वजनिक नहीं हैं. गंगा पर कई किताबें लिख चुके पर्यावरणविद् अभय मिश्र कहते हैं, ''मुद्रा योजना के तहत बिहार-यूपी में बोरिंग की मशीनों के रोजगार की बाढ़ आ गई है. अधिकतर आवेदन ऐसी ही मशीनें खरीदने के हैं क्योंकि इस क्षेत्र में पानी नया उभरता रोजगार है.'' गंगा की धारा में कमी से, बकौल डब्ल्यूडब्ल्यूएफ, मछलियों की 109 नस्लें और मिट्टी की उर्वरता खतरे में हैं.

उत्तर भारत के मशहूर उर्वर गंगा-सिंधु मैदान में डार्क जोन बन रहे हैं. अमेरिकी एजेंसी नासा का 2015 में अमेरिकी शोध पत्रिका वॉटर रिसोर्सेज रिसर्च में प्रकाशित सर्वे बताता है कि सिंधु बेसिन दुनिया के सर्वाधिक जलसंकट वाले बेसिनों में है और इसका जलस्तर सालाना 6 मिमी तक कम हो रहा है. पाकिस्तान सिंधु नदी का कोई 63 फीसद पानी इस्तेमाल करता है और 36 फीसद पानी भारत. डब्ल्यूडब्ल्यूएफ की रिपोर्ट के मुताबिक, सिंधु बेसिन में पानी के जोरदार दोहन (यहां 3 करोड़ हेक्टेयर कृषि भूमि सींची जाती है) और जलवायु परिवर्तन का नतीजा है कि सिंधु का बेहद कम पानी समुद्र में जाकर मिल पाता है.

जल वैज्ञानिक वी.एम. तिवारी और अन्य वैज्ञानिकों के 2009 में किए गए एक अध्ययन के मुताबिक, सिंधु बेसिन में पानी की मात्रा 10 खरब लीटर सालाना की दर से कम हो रही है. इस घटे हुए बहाव के नतीजतन सिंधु के डेल्टाई इलाके में मैंग्रोव वनस्पतियों और जैव विविधता पर बुरा असर पड़ा है. यहां झींगा और मछली का प्रजनन तकरीबन खत्म हो चुका है, पानी और मिट्टी में लवणता कई गुना अधिक बढ़ चुकी है. सूखती सिंधु के पेटे में समुद्र का खारा पानी घुस गया है जिससे 12 लाख हेक्टेयर जमीन नमकीन हो गई है.

उधर सिंधु के ठीक पूरब में तीस्ता नदी के बांग्लादेश के साथ जल बंटवारे के किसी समझौते की पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने कड़ी मुखालफत की थी. उनकी वजहें बहुत नाजायज भी नहीं थीं क्योंकि 'सिक्किम की जीवनरेखा' कही जाने वाली यह नदी उत्तरी बंगाल में लाखों लोगों को रोजगार देती है. पिछली कई गर्मियों में तीस्ता में पानी की मात्रा 100 क्युमेक (क्युबिक मीटर प्रति सकेंड) से नीचे चली गई थी. यानी नदी में उसकी पूरी क्षमता का महज छठा हिस्सा ही बचा रह गया था. मछलियों और धान के लिए मशहूर पश्चिम बंगाल और बांग्लादेश में लोगों की आजीविका पर इसका असर पड़ा है.

इधर दिल्ली में, मृत्यु के देवता यम की बहन कही जाने वाली यमुना धीमे-धीमे काल के गाल में समा रही है. जामिया मिल्लिया विश्वविद्यालय के विक्रम सोनी, दिल्ली विश्वविद्यालय के शशांक शेखर और नेचुरल हेरिटेज फस्र्ट के दीवान सिंह का संयुक्त शोध बताता है कि यमुना में सालाना कुल मात्रा का महज 20 फीसद पानी ही साल के गैर-मॉनसूनी आठ महीनों में उपलब्ध होता है और तब यह महज 80 मीटर चौड़ी और एक मीटर से भी कम गहरी रह जाती है. यमुना के जलभर तकरीबन खाली हो चुके हैं और पिछले दो दशकों में इन भूमिगत भंडारों में पानी का स्तर साढ़े सात मीटर से भी अधिक नीचे जा चुका है.

नदियों को ठीक करने के नाम पर जो योजनाएं बनीं, उसका एक प्रतीक साबरमती रिवर फ्रंट है, जो नदियों की सेहत सुधारने की बजाए उनका मेकअप करती रहीं. अध्ययन बताते हैं कि साबरमती बारहमासी होने के अपने रुतबे को बरकरार रखने के लिए नर्मदा से आई नहरों पर निर्भर हो गई है. नदियों को जोडऩे की परियोजना भी इसी सोच से निकली है कि नदियों का पानी जो समुद्र में जाकर मिल जाता है, वह बेकार हो जाता है और इसलिए नदियों के पानी की हर बूंद का इस्तेमाल कर लेना चाहिए.

भारत का पांचवां बड़ा नदी तंत्र कृष्णा दूसरी मिसाल है जो बताता है कि पर्यावरण के लिए नदियों का बहते रहना कितना जरूरी है. 1960 से पहले समुद्र में कृष्णा नदी अपना 57 अरब घनमीटर पानी छोड़ती थी पर अब यह बहाव मूल का मात्र बीस फीसद रह गया है और इसका असर तटीय पारिस्थितिकी पर साफ तौर पर दिखने लगा है. निचले कृष्णा बेसिन में मिट्टी और भूमिगत जल खारा होने लगा है और नम भूमि खत्म हो रही है. साथ ही, बड़े पैमाने पर मैंग्रोव वनस्पतियों का भी विनाश हुआ है.

देश की छोटी बारहमासी नदियां भी तेजी से अपने पानी से हाथ धोती नजर आ रही हैं. नेचुरल रिसोर्स डेटा मैनेजमेंट सिस्टम (एनआरडीएमएस) की एक रिपोर्ट के अनुसार, उत्तराखंड की बड़ी नदियों की 332 सहायक नदियां सूखकर बरसाती नदियों में तब्दील को चुकी हैं. कुमाऊं मंडल में कोसी, गगास, गोमती, रामगंगा तो गढ़वाल में नैय्यार सौंग, बाल गंगा, छिवानी, चंद्रभागा जैसी कई नदियां सूख चुकी हैं. अध्ययन के मुताबिक, इन पहाड़ी नदियों की लंबाई तेजी से कम होती जा रही है और उनका जलप्रवाह भी बुरी तरह सिकुड़ता जा रहा है.

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