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महाराष्ट्र-लहर पर सवार

आत्मविश्वास से भरे मुख्यमंत्री देवेंद्र फडऩवीस विधानसभा चुनाव में भाजपा-शिवसेना सरकार के दूसरे कार्यकाल के लिए जनादेश मांगने निकले

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aajtak.in
किरण डी. तारे मुंबई, 25 September 2019
महाराष्ट्र-लहर पर सवार मंदार देवधर

देवेंद्र फडऩवीस जब राज्य भर की अपनी 4,232 किलोमीटर लंबी महाजनादेश यात्रा के अंतिम चरण में प्रवेश कर रहे हैं, इस बात के पर्याप्त संकेत हैं कि उन्होंने अपनी राजनैतिक यात्रा में काफी लंबा पड़ाव तय कर लिया है. अब वे संकोची राजनैतिक नौसिखुए नहीं रहे, जिन्होंने 2014 में (शरद पवार के बाद) राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री के तौर पर कमान संभाली थी. आज 2019 में फडऩवीस पूरे दबदबे के साथ आगे बढ़ते दिखाई देते हैं; उनकी कथनी और करनी में आत्मविश्वास झलकता है; एक ऐसे राजनेता, जिसने दिखा दिया है कि उनमें राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के शरद पवार और शिवसेना के उद्धव ठाकरे सरीखे ज्यादा तपे-तपाए विरोधियों से लोहा लेने की क्षमता है.

पांच साल पहले राज्य भाजपा के एकनाथ खडसे, प्रकाश मेहता, गिरीश बापट, रावसाहेब दानवे और विनोद तावड़े सरीखे वरिष्ठ नेता फडऩवीस को जूनियर मानकर बर्ताव करते थे. आज कोई संदेह नहीं रह गया है कि पार्टी की दशा-दिशा कौन तय कर रहा है. फडऩवीस को पार्टी अध्यक्ष तथा केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह के साथ ही साथ प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का विश्वास भी हासिल है. उन्होंने खुलेआम उनमें अपना विश्वास जताया है. शाह ने उनकी यात्रा को हरी झंडी दिखाई थी, जबकि मोदी इसके समापन पर उनके साथ होंगे. शाह ने 1 सितंबर को ऐलान किया कि फडऩवीस चुनाव के बाद भी मुख्यमंत्री बने रहेंगे.

महाराष्ट्र में विधानसभा चुनाव को जब एक महीना बाकी रह गया है, फडऩवीस जानते हैं कि वे और भाजपा राज्य में इससे मजबूत पायदान पर पहले कभी नहीं थे. मई में लोकसभा चुनाव में मिले भारी जनादेश ने पार्टी की संभावनाओं को बढ़ाया ही है. कांग्रेस के सफाए और उसके बाद राहुल गांधी के पार्टी अध्यक्ष पद से इस्तीफे के नतीजतन मची अफरा-तफरी से राज्य इकाई भौचक और परेशान है. पवार की पारिवारिक तकरार भी भाजपा को फायदा पहुंचा रही है. कांग्रेस और एनसीपी के कम से कम 20 शीर्ष नेता पिछले कुछ महीनों में पाला बदलकर बीजेपी और सेना में आ चुके हैं.

दिग्गजों का मानमर्दन

शरद पवार ने फडऩवीस की जाति का हवाला देकर उन्हें नीचा दिखाने का कोई मौका नहीं गंवाया. फडऩवीस ने 2017 में जब छत्रपति शिवाजी के वंशज संभाजी राजे को राज्यसभा में मनोनीत करने के लिए प्रधानमंत्री मोदी को राजी कर लिया था, तब पवार ने कहा था, ''पहले छत्रपति (मराठा) पेशवा (ब्राह्मण) को नियुक्त किया करता था. अब पेशवा ने छत्रपति को नियुक्त किया है.'' फडऩवीस का प्रतिशोध अब इस तरह पूरा हो रहा है कि अपने बच्चों को लेकर पवार और उनके भाइयों की टकराती महत्वाकांक्षाएं खुले में आ गई हैं. पवार के भाई और मीडिया के ताकतवर उद्योगपति अभिजीत असल में फडऩवीस के करीब बताए जाते हैं.

फडऩवीस की दूसरी उपलब्धि यह है कि उन्होंने शिवसेना और उसके नेता उद्धव ठाकरे को सरकार के खिलाफ खुलेआम बयानबाजी करने के बावजूद अपनी तरफ बनाए रखा है. उन्होंने समझ लिया था कि उद्धव को राजनीति से इतर तरीकों से जीतना होगा.

लिहाजा फडऩवीस खुद अपनी तरफ से आए दिन सेना प्रमुख से मिलने चले जाते और राजनीति के साथ-साथ गैर-राजनैतिक मुद्दों पर उनसे चर्चा करते थे. एक बार तो वे अपनी पत्नी अमृता को भी साथ ले गए और तब ठाकरे परिवार ने फडऩवीस दंपती के लिए रात्रिभोज की मेजबानी की.

यहां तक कि उस रात वहां परोसी गई मछली और झींगा खाने की वजह से जब उनकी तबीयत बिगड़ गई तब भी उन्होंने एक शब्द नहीं कहा.

वे फडऩवीस ही थे जिन्होंने दोनों पार्टियों के बीच जबानी जंग के बावजूद साथ मिलकर चुनाव लडऩे के लिए शिवसेना प्रमुख उद्धव और शाह, दोनों को राजी किया. फडऩवीस कहते हैं, ''हिंदुत्व हमारा साझा आधार है. मैं उसे कमजोर नहीं होने देना चाहता.'' इस हद तक कि राजनैतिक पर्यवेक्षकों का मानना है कि उद्धव भाजपा की शर्त पर गठबंधन में बने रहने को राजी हो जाएंगे.

संकट में तारणहार

गंभीर राजनेता के तौर पर फडऩवीस का आगमन 2017 के आखिर में हुआ जब उनके मातहत भाजपा ने 60 फीसद स्थानीय निकायों में सत्ता हासिल कर ली. उनकी साख तब और बढ़ गई जब उन्होंने मुख्यमंत्री के तौर पर अपने कार्यकाल के दौरान तीन बड़े संकटों को कुशलता से संभाला. जब एक के बाद एक राज्य कर्ज माफी का ऐलान कर रहे थे, फडऩवीस शुरुआत में राज्य के खजाने पर इतना भारी बोझ डालना नहीं चाहते थे.

आखिर में उन्होंने किसानों के 1.5 लाख रुपए तक के कर्ज माफ करने की घोषणा की, मगर चतुराई से सरकारी कर्मचारियों, राजनीतिकों और आयकर दाताओं को इससे बाहर रख दिया. साथ ही, कर्ज माफी को आधार से जोडऩे के उनके फैसले ने फर्जी खातों की पहचान में मदद की. लिहाजा कर्ज माफी के लाभार्थियों की संख्या 89 लाख से घटकर सीधे 52 लाख पर और कर्ज माफी की कुल रकम 32,000 करोड़ रुपए से घटकर सीधे 21,000 करोड़ रुपए पर आ गई.

उनका अगला बड़ा इम्तिहान तब हुआ जब 2018 में कोरेगांव-भीमा की हिंसा के बाद दलित समुदाय में विरोध का उफान आ गया. फडऩवीस पर हिंदुत्व के नेता और दंगों के कथित कर्ताधर्ता संभाजी भिडे को गिरफ्तार करने के लिए भारी दबाव था. मगर अंत में इसे माओवादियों की साजिश करार दिया गया और पांच एक्टिविस्ट—वरवरा राव, सुधा भारद्वाज, वर्नन गोंसाल्वेज, अरुण फरेरा और गौतम नवलखा—को माओवादियों के साथ जुड़े होने के संदेह में गिरफ्तार कर लिया गया. लेकिन यह यहीं खत्म नहीं हुआ. इस प्रसंग का नतीजा राज्य में बी.आर. आंबेडकर के पोते प्रकाश आंबेडकर की अगुआई में एक तीसरे मोर्चे—वंचित बहुजन आघाड़ी (वीबीए)—के उदय में हुआ.

आखिर में फडऩवीस ने मराठा समुदाय की आरक्षण की मांग को संभालने के साथ अपना राजनैतिक लोहा मनवा लिया. उन्होंने समझ लिया कि अल्पसंख्यक ब्राह्मण होने के नाते वे मराठा समुदाय के आंदोलन का निशाना बन सकते हैं और तब इस आग को बुझाने के लिए उन्होंने निर्णायक कदम उठाए. उन्होंने निष्क्रिय पड़े महाराष्ट्र पिछड़ा आयोग का पुनर्गठन किया जिसने आखिरकार राज्य की आबादी के 32 फीसदी मराठा समुदाय के सामाजिक और आर्थिक पिछड़ेपन का नए सिरे से आकलन किया. इसी से इस साल जून में मराठा समुदाय के लिए शिक्षा में 13 फीसद और सरकारी नौकरियों में 12 फीसद आरक्षण का रास्ता साफ हुआ. फडऩवीस ने मराठा छात्रों के लिए होस्टलों के निर्माण तथा उनकी 50 फीसद फीस वापस लौटाने का भी ऐलान किया.

यही वजह है कि कमजोर विपक्ष किसी भी मुद्दे पर फडऩवीस को घेरने में नाकाम रहा, बावजूद इसके कि किसानों की कर्ज माफी की रकम चुकाने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने में देरी हुई. यहां तक कि वे किसी मंत्री को भी घेरने में नाकाम रहे, जबकि कुछ मंत्रियों के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोप थे.

आने वाले चुनाव में उम्मीद है कि भाजपा विधानसभा की कुल 288 में से 120 सीटें शिवसेना को देगी और खुद 150 पर अपने उम्मीदवार उतारेगी. बाकी 18 सीटें रिपब्लिकन पार्टी ऑफ इंडिया, राष्ट्रीय समाज पक्ष और शिव संग्राम सरीखी छोटी पार्टियों को दी जाएंगी.

कांग्रेस और एनसीपी 125-125 सीटों पर चुनाव लडऩे और बाकी 38 सीटें छोटी पार्टियों के लिए छोडऩे पर राजी हो गई हैं. महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के नेता राज ठाकरे भी इस गठबंधन का हिस्सा थे, पर कथित 78 करोड़ रुपए के धनशोधन के मामले में उनके खिलाफ प्रवर्तन निदेशालय की जांच ने उन्हें दौड़ से बाहर कर दिया है. हो सकता है कि इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन को लेकर अपने विरोध के बहाने एमएनएस चुनाव में ही न उतरे. विपक्ष को इतने कमजोर विकेट पर देखकर ही फडऩवीस ने नांदेड़ में यह कहने से खुद को रोक नहीं पाए, ''विपक्ष का अगला नेता वीबीए से होगा.''

शायद न भी हो. वीबीए गठबंधन का शीराजा 6 सितंबर को उस वक्त बिखर गया जब गठबंधन की साझेदार ऑल इंडिया इत्तेहादुल-ए-मुस्लिमीन ने सीट बंटवारे में मतभेदों की वजह से दलित भारिप बहुजन महासंघ से किनारा कर लिया. इस गठबंधन ने लोकसभा चुनाव में 14 फीसद वोट हासिल करके और कांग्रेस-एनसीपी के 10 उम्मीदवारों की हार में योगदान देकर एक किस्म की सनसनी मचा दी थी. उनकी फूट ने अब भाजपा के आत्मविश्वास में जबरदस्त इजाफा किया है. भाजपा के राज्य अध्यक्ष चंद्रकांत पाटील कहते हैं, ''पहले हमने 220 सीटों का लक्ष्य तय किया था. अब हम 250 तक जीत सकते हैं.'' ऐसे में नतीजों का बेसब्री से इंतजार रहेगा.

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