एडवांस्ड सर्च

कांग्रेस-गुटबाजी से हलकान

सोनिया के हाथ जबसे कमान लौटी है, पार्टी के हर फैसले में उनकी पुरानी टीम की छाप और असर साफ-साफ देखी जा सकती है. उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र में जहां 21 अक्तूबर को चुनाव होने हैं, अपेक्षाकृत लो-प्रोफाइल वाले बालासाहेब थोराट को राज्य कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया और उसके बाद पार्टी इकाई की गुटबाजी सतह पर आ गई.

Advertisement
aajtak.in
कौशिक डेका नई दिल्ली, 15 October 2019
कांग्रेस-गुटबाजी से हलकान रास्ता किधर है? दिल्ली में 2 अक्तूबर को गांधी जयंती के कार्यक्रम में राहुल और सोनिया गांधी

इस साल 11 अगस्त की देर शाम सोनिया गांधी दूसरी बार कांग्रेस अध्यक्ष बनीं, तो उन्होंने एक पुराने कांग्रेसी नेता, जिन्हें वास्तव में उनका करीबी नहीं माना जाता है, से पूछा, ''क्या आप आगे की लड़ाई के लिए तैयार हैं? यह एक लंबी लड़ाई होने जा रही है.'' यह सवाल संकेत था कि उन्होंने बेटे राहुल गांधी के इस्तीफे के बाद अपनी दूसरी पारी के लिए क्या योजनाएं बनाई हैं. उनका पहला कार्यकाल दो दशकों तक चला और कांग्रेस ने दस साल तक केंद्र में राज किया.  

अपने भरोसेमंद सिपहसालार अहमद पटेल के साथ, सोनिया ने एक बार फिर से पार्टी में जान फूंकने का काम शुरू कर दिया है. पार्टी का देश के अधिकांश हिस्सों में सफाया हो चुका है इसलिए यह एक बड़ा काम होगा. अभी कांग्रेस सिर्फ पांच राज्यों में सत्ता में है और उनमें से दो—राजस्थान और मध्य प्रदेश—में मामूली बहुमत पर चल रही है. लगातार दो आम चुनावों में अपमानजनक पराजय के बाद, आपसी झगड़ा और असंतोष लगभग सभी राज्य इकाइयों में पनप रहा है. 23 मई के नतीजों के बाद से कई प्रभावशाली नेताओं ने कांग्रेस छोड़ दी है और कई अन्य सार्वजनिक रूप से पार्टी के खिलाफ बयानबाजी कर रहे हैं. सबसे ज्यादा कलह तो महाराष्ट्र और हरियाणा में दिख रही है जहां विधानसभा चुनाव आखिरी चरण में हैं.

कांग्रेस के भीतर तीन अलग-अलग टीमें उभर आई हैं, जो कई बार पार्टी लाइन से विपरीत उद्देश्यों पर काम करते हैं और इससे पार्टी के दीर्घकालिक अस्तित्व को लेकर अंदेशा होता है. पहली टीम में वे नेता हैं जिन्होंने अपने पहले कार्यकाल में सोनिया के साथ मिलकर काम किया था. दूसरी टीम उन लोगों की है जो गैर-राजनैतिक पृष्ठभूमि वाले पेशेवर हैं और जिन्होंने राहुल गांधी के कार्यालय में काम किया है. तीसरी टीम उन अन्य प्रमुख नेताओं की है जो या तो दोनों में से किसी भी खेमे में नहीं हैं या फिर जिन्होंने गांधी परिवार का भरोसा खो दिया है. और इस टीम की संख्या बढ़ रही है.

सोनिया के हाथ जबसे कमान लौटी है, पार्टी के हर फैसले में उनकी पुरानी टीम की छाप और असर साफ-साफ देखी जा सकती है. उदाहरण के लिए, महाराष्ट्र में जहां 21 अक्तूबर को चुनाव होने हैं, अपेक्षाकृत लो-प्रोफाइल वाले बालासाहेब थोराट को राज्य कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया गया और उसके बाद पार्टी इकाई की गुटबाजी सतह पर आ गई. मई के बाद से पूर्व मंत्री कृपाशंकर सिंह तथा हर्षवर्धन पाटील और विधायक नितेश राणे समेत करीब एक दर्जन नेताओं ने पार्टी को अलविदा कह दिया.

थोराट के नाम पर राहुल और सोनिया दोनों की हामी मिली थी, ताकि महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्रियों अशोक चव्हाण और पृथ्वीराज चव्हाण जैसे कद्दावर नेताओं की ओर से कम विरोध उठे. लेकिन केंद्रीय नेतृत्व ने मिलिंद देवड़ा के साथ कोई दया नहीं दिखाई जिन्होंने राहुल के इस्तीफे और सोनिया की वापसी के बीच के 90 दिनों की अवधि में कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में एक युवा कुशल नेता की खुलेआम मांग की थी. कांग्रेस के अंदरूनी सूत्रों का दावा है कि देवड़ा को पार्टी में अब कोई पूछता भी नहीं, जिन्होंने लोकसभा चुनाव के बाद मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष के पद से इस्तीफा दे दिया था.

अगर कांग्रेस के सूत्रों पर भरोसा करें तो पार्टी के लिए युवा अध्यक्ष की मांग से सोनिया के कान खड़े हो गए थे, जिसकी जरूरत सबसे पहले पंजाब के मुख्यमंत्री अमरिंदर सिंह ने बताई थी. हालांकि शुरुआती रणनीति पार्टी अध्यक्ष पद पर गांधी परिवार के एक लो-प्रोफाइल वफादार को बैठाना था—जो संभवत: तब तक रहता जब तक राहुल अपना विचार बदलकर अध्यक्ष के रूप में वापसी नहीं करते—लेकिन शशि थरूर जैसे नेताओं ने चुनाव की मांग की तो सोनिया फिर से सोचने पर मजबूर हुईं. कांग्रेस कार्यसमिति के एक सदस्य का कहना है, ''वे कभी अनिच्छुक नहीं थीं, वे चाहती हैं कि बागडोर गांधी परिवार के हाथों में ही रहे.

चुनाव होते और कोई गांधी चुनाव नहीं लड़ता, तो सत्ता किसी युवा और संभवत: अधिक कुशल व्यक्ति के हाथों में जा सकती थी. और हालांकि तीन गांधियों के राजनीति में सक्रिय रहने के कारण ऐसे कांग्रेस अघ्यक्ष के लंबे समय तक कुर्सी पर बने रहने की संभावना कम ही है, फिर भी वह कोई जोखिम नहीं लेना चाहती हैं. उन्हें थरूर, देवड़ा, ज्योतिरादित्य सिंधिया और सचिन पायलट की महत्वाकांक्षाओं पर संदेह होता जा रहा है.''

इससे सोनिया के वफादारों के लिए दरवाजे खुल गए. पार्टी प्रमुख के रूप में उनकी वापसी के साथ, जिन लोगों को राहुल के शीर्ष पद पर काबिज होने के बाद पद मिले थे, उन्हें भी अपने पद छोडऩे पड़े. 25 मई को सीडब्ल्यूसी की बैठक में आत्मनिरीक्षण और आत्म-आलोचना की एकमात्र आवाज मध्य प्रदेश कांग्रेस के नेता ज्योतिरादित्य सिंधिया का भविष्य अब अनिश्चित दिखता है. सिंधिया के लिए कभी मध्य प्रदेश कांग्रेस का अध्यक्ष पद पक्का माना जाता था, उस पर फिलहाल मुख्यमंत्री कमलनाथ काबिज हैं. लेकिन जब उनके समर्थकों ने कमलनाथ और राज्य के दूसरे दिग्गज दिग्विजय सिंह को निशाने पर लेना शुरू किया तो सिंधिया मजबूती से उनका साथ नहीं दे सके क्योंकि उन्हें दिल्ली से बहुत कम समर्थन था.

वे लोकसभा चुनाव हार गए थे, इससे उनकी स्थिति और कमजोर हुई. मुंबई कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष संजय निरुपम (जो मार्च तक राहुल के भरोसेमंद होने का आनंद ले रहे थे, लेकिन फिर राहुल के एक अन्य चहेते देवड़ा ने उनकी जगह ले ली थी) ने पुराने दिग्गजों के खिलाफ खुले तौर पर यह आरोप लगाते हुए विद्रोह कर दिया कि महाराष्ट्र विधानसभा चुनाव के लिए टिकट वितरण में उनकी अनदेखी की गई है. पुराने भरोसेमंद खेमे के एक नेता कहते हैं, ''मैं मानता हूं कि सिंधिया की कुछ वास्तविक शिकायतें हैं, लेकिन निरुपम वरिष्ठ नेताओं को क्यों निशाना बना रहे हैं? उन्हें राहुल ने हटाया था.''

राजस्थान में भी, ऐसी अटकलें हैं कि मुख्यमंत्री अशोक गहलोत जल्द ही कुछ और उप-मुख्यमंत्रियों की नियुक्ति कर सकते हैं. फिलहाल यह पद गहलोत के प्रतिद्वंद्वी सचिन पायलट के पास ही है. हालांकि कुछ कांग्रेसियों का तर्क है कि यह राज्य में प्रभावशाली जातियों को लुभाने के लिए एक कदम हो सकता है लेकिन बहुत से लोग इसे पायलट की हैसियत में कटौती करने के प्रयास के रूप में देखते हैं. राजस्थान कांग्रेस के 42 वर्षीय अध्यक्ष, जिन्होंने पार्टी को 2018 के विधानसभा चुनावों में पार्टी की अगुआई करके उसे जीत दिलाई, मुख्यमंत्री बनने की रेस में गहलोत से मात खा गए क्योंकि गांधी परिवार ने पुराने वफादारों पर दांव खेलने का फैसला किया. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता का कहना है, ''मुख्यमंत्री की कुर्सी पर नजर रखने की बजाए, उन्हें राजस्थान कांग्रेस अध्यक्ष की अपनी कुर्सी बचाए रखने पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए.''

वैसे, सिंधिया और निरुपम का अब भी पार्टी पर विश्वास बरकरार है, लेकिन कई अन्य लोगों ने पार्टी को अलविदा कह दिया है. पूर्वोत्तर में, शाही परिवार से आने वाले एक नेता प्रद्योत माणिक्य देबबर्मा, जिनका सिंधिया परिवार के साथ जुड़ाव भी है, ने त्रिपुरा कांग्रेस का अध्यक्ष पद छोड़ दिया है. देबबर्मा तत्कालीन महासचिव प्रभारी लुइजिन्हो फलेरो के 'हस्तक्षेप' से परेशान थे, जिन्होंने उन्हें विवादास्पद राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) पर अपना रुख बदलने को कहा था. देबबर्मा, जो त्रिपुरा की मूल आबादी का प्रतिनिधित्व करते हैं, और अपने गृह राज्य में एनआरसी की मांग कर रहे हैं और इसके लिए सुप्रीम कोर्ट में एक केस भी लड़ रहे हैं. उन्होंने कहा, ''कांग्रेस के कई नेता हैं जो भाजपा के परामर्श पर चल रहे हैं और पार्टी को नष्ट करने के लिए काम कर रहे हैं.'' देबबर्मा के इस्तीफे के बाद, फलेरो को भी 7 अक्तूबर को पद से हटा दिया गया. लेकिन पुराने सिपहसालारों ने भी अपना प्रभाव स्पष्ट रूप से दिखाया और 24 घंटों के भीतर, उन्हें अपने पद पर बहाल कर दिया गया.

लेकिन सबसे बड़े नुक्सान में हरियाणा कांग्रेस के पूर्व अध्यक्ष अशोक तंवर रहे हैं. पूर्व मुख्यमंत्री भूपेंद्र सिंह हुड्डा के कड़े विरोध के बावजूद तंवर को राहुल का वरदहस्त प्राप्त था और वे पांच साल से अधिक समय तक पद पर रहे. सितंबर में, सोनिया की वफादार कुमारी शैलजा ने तंवर की जगह ली, जबकि हुड्डा चुनाव प्रबंधन समिति के अध्यक्ष बने. एक महीने बाद, विधानसभा चुनाव के टिकट वितरण से नाखुश, तंवर ने पार्टी से इस्तीफा दे दिया. किसी का नाम लिए बगैर, उन्होंने कहा कि कांग्रेस में अच्छी तरह से अपनी जड़े जमाए बैठे कुछ लोगों को लगता है कि वे भगवान हैं लेकिन लोगों को नष्ट करने के लिए वे राक्षसों की तरह व्यवहार कर रहे हैं.

हालांकि इन लोगों ने राहुल और सोनिया के खिलाफ कुछ भी कहने से परहेज किया है, लेकिन बागियों को जो बात सबसे ज्यादा चोट पहुंचा रही है, वह है उनकी दुर्दशा के बावजूद गांधी परिवार की उदासीनता. जब पार्टी के नए निजाम ने उन्हें निशाना बनाया तो राहुल ने उनकी रक्षा के लिए कुछ खास नहीं किया.

असल में, 25 मई को पद छोडऩे के बाद राहुल ने अपने लोगों को किनारे लगाए जाने के किसी भी राजनैतिक फैसले में हस्तक्षेप नहीं किया है और खुद को अपने निर्वाचन क्षेत्र, वायनाड और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्मों पर मोदी सरकार को निशाना बनाने तक सीमित कर लिया है.

हरियाणा और महाराष्ट्र में चुनाव में दो सप्ताह से भी कम वक्त बचा है और वे अचानक विदेश यात्रा पर चले गए हैं जो पार्टी के मामलों के प्रति उनकी उदासीनता को दर्शाता है.

हालांकि, उनकी गैर-राजनैतिक नियुक्तियों पर कोई गाज नहीं गिराई गई है. मसलन, सोनिया ने पार्टी के डेटा एनालिटिक्स विभाग को 'टेक्नोलॉजी और डेटा सेल' के रूप में फिर से व्यवस्थित करने के प्रस्ताव को मंजूरी दी और प्रवीण चक्रवर्ती को सेल का प्रमुख बनाया है.

पुराने दिग्गजों ने लोकसभा चुनाव के बाद विशेष रूप से चक्रवर्ती पर निशाना साधा था. उन्होंने आरोप लगाया था कि चक्रवर्ती ने राहुल को नकली डेटा के साथ गुमराह किया था. इस कोप से राहुल के एक अन्य वफादार और पार्टी के संगठन सचिव (हालांकि कुछ अंदरूनी सूत्र दावा करते हैं कि केवल 'आधिकारिक पद' के कारण वे प्रासंगिक बने हुए हैं, और उनकी भूमिका अब पार्टी के भीतर नियुक्तियों को लेकर बयान जारी करने तक सीमित रह गई है) के.सी. वेणुगोपाल भी बचे हुए हैं.

हालांकि सभी युवा नेताओं को पार्टी में नई सत्ता का खामियाजा नहीं भुगतना पड़ा है. गांधी परिवार के प्रति पुरानी वफादारी की पारिवारिक विरासत अभी भी सबसे मूल्यवान संपत्ति है और असम से दो युवा तुर्क-गौरव गोगोई और सुष्मिता देव—यह साबित करते हैं. दो बार के सांसद गौरव, असम के पूर्व मुख्यमंत्री तरुण गोगोई के बेटे हैं. हालांकि बड़े गोगोई पुराने नेताओं के पसंदीदा नहीं हैं, लेकिन उन्हें गांधी परिवार में सभी का भरोसा प्राप्त है. सोनिया के कार्यभार संभालने के बाद गौरव को, जिनके पास पश्चिम बंगाल और अंडमान और निकोबार का कार्यभार है, दो और राज्यों सिक्किम और मणिपुर का अतिरिक्त प्रभार भी दिया गया है.

सुष्मिता दिवंगत केंद्रीय मंत्री संतोष मोहन देव की बेटी हैं, जो राजीव गांधी और सोनिया के बहुत करीबी थे. हालांकि सुष्मिता मई में चुनाव हार गईं, लेकिन वे महिला कांग्रेस की प्रमुख बनी रहीं और गांधी परिवार के बीच अपनी पैठ बढ़ाई. कांग्रेस के एक राज्यसभा सदस्य कहते हैं, ''युवा नेताओं के खिलाफ कोई विशेष एजेंडा नहीं है. परेशानी यह है कि इनमें से बहुत से लोगों को बहुत पहले पार्टी से बहुत कुछ मिल गया. यूपीए सरकारों में युवा मंत्रियों की संख्या गिन लें. उसने उन्हें बहुत महत्वाकांक्षी बना दिया.''

क अन्य वरिष्ठ नेता ने हाल ही में तीन कांग्रेसी नेताओं—पटेल, गुलाम नबी आजाद और हुड्डा के बीच हुई बातचीत के वायरल वीडियो की ओर इशारा करते हुए कहा, इससे यह बात साबित होती है कि दिग्गज हर चीज को नियंत्रित नहीं करते हैं. 2 अक्तूबर को संसद परिसर में शूट किए गए वीडियो में, हुड्डा को पटेल से शिकायत करते हुए सुना जा सकता है कि उनकी ओर से अनुशंसित उम्मीदवारों को टिकट नहीं दिए गए. दोनों पक्षों के बीच इस लड़ाई में, कई गुट-निरपेक्ष नेता तेजी से हाशिए पर चले गए हैं. दो शानदार उदाहरण हैं शशि थरूर और मनीष तिवारी. लोकसभा में पार्टी में किसी भी तरह का नेतृत्व प्रदान करने में दोनों पूर्व केंद्रीय मंत्रियों की अनदेखी की गई. थरूर ने कहा कि लगातार तीन लोकसभा चुनाव जीतने के बावजूद, पार्टी के हालिया चुनावी हार के कारणों का पता लगाने से जुड़ी किसी भी चर्चा में उन्हें शामिल नहीं किया गया.

एक अन्य पूर्व केंद्रीय मंत्री सलमान खुर्शीद ने स्वीकार किया कि पार्टी में एक नेतृत्व शून्य की स्थिति भी है. खुर्शीद कहते हैं, ''हम वास्तव में इसके विश्लेषण के लिए एक साथ नहीं बैठे कि आखिर हम क्यों हारे? हमारी सबसे बड़ी समस्या है हमारे नेता ने ही कदम पीछे खींच लिए. इससे एक तरह की शून्यता पैदा हो गई है.''

***

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay