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नीतीश कुमार की राह के रोड़े मांझी और लालू!

नीतीश कुमार ने सत्ता की कमान थामने का इरादा तो जाहिर कर दिया लेकिन जीतन राम मांझी और लालू यादव ही उनके लिए चुनौती बन गए हैं.

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aajtak.in
अमिताभ श्रीवास्तव 20 October 2014
नीतीश कुमार की राह के रोड़े मांझी और लालू!

अपनी वापसी के इरादों के ऐलान के लिए बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री नीतीश कुमार इससे बेहतर दिन नहीं चुन सकते थे. 10 अक्तूबर को पटना में पूर्व राष्ट्रपति वी.वी. गिरि की 120वीं सालगिरह पर आयोजित एक कार्यक्रम में उन्होंने फरमाया कि वे जिम्मेदारी से भाग नहीं रहे. उन्होंने कहा, ''हम काम करने को तैयार हैं." गिरि ने 1969 का राष्ट्रपति चुनाव न सिर्फ निर्दलीय लड़ा, बल्कि कांग्रेस के आधिकारिक उम्मीदवार नीलम संजीव रेड्डी को हरा इतिहास रच दिया था. बिलाशक गिरि हर उस शख्स के लिए प्रेरणा हैं जो वापसी की उम्मीद कर रहा हो. आखिर 1969 में शिखर पर वापसी करने वाले गिरि को भी 1954 में नेहरू मंत्रिमंडल से हटना पड़ा था.

लेकिन इसके साथ एक विडंबना भी नजर आती है. यह कार्यक्रम गिरि की वास्तविक जन्मतिथि से ठीक दो माह बाद आयोजित हुआ. ठीक इसी तरह नीतीश ने भी अपनी वापसी की इच्छा के ऐलान में शायद थोड़ी देर कर दी है. आरजेडी और कांग्रेस के साथ महागठबंधन बनाए उन्हें दो माह से ज्यादा समय हो चुका है. इस गठबंधन से उनकी चुनावी स्थिति जरूर मजबूत हुई है, पर इसने उनकी निजी हैसियत को कमजोर कर दिया है. वे महागठबंधन को अपने इशारों पर उस तरह नहीं चला सकते, जैसे अपनी पार्टी को चलाते आए हैं.
नीतीश ने जब कहा कि 'हम इससे भाग नहीं रहे हैं', तो स्वाभाविक ही उनकी पार्टी में हलचल मच गई. लेकिन तीन दिन के भीतर ही मुख्यमंत्री जीतन राम मांझी के बयान ने इसकी हवा निकाल दी. 13 अक्तूबर को  जनता दरबार के बाद मीडिया से बात करते हुए मांझी ने कहा कि जेडी(यू), आरजेडी और कांग्रेस का महागठबंधन सामूहिक रूप से तय करेगा कि 2015 के विधानसभा चुनाव के बाद मुख्यमंत्री कौन हो. इससे राजनैतिक हलकों में माना गया कि मांझी यह मानने से इनकार कर रहे हैं कि नीतीश मुख्यमंत्री पद के लिए महागठबंधन की स्वाभाविक पसंद होंगे. राजनैतिक तापमान बढ़ाते हुए मांझ्ी ने कहा, ''कोई भी पार्टी अकेले मुख्यमंत्री उम्मीदवार का फैसला नहीं कर सकती." उनका बयान ऐसे वक्त पर आया जब हाल ही में आरजेडी के उपाध्यक्ष रघुवंश प्रसाद सिंह ने भी ऐसी ही बात कही थी, ''मुख्यमंत्री का फैसला जेडी (यू) अकेले नहीं कर सकता."

इस बयानबाजी के साथ ही प्रदेश की राजनीति रफ्तार पकड़ चुकी है. मई में जब नीतीश ने मुख्यमंत्री पद के लिए मांझी का चयन किया था, तब मानो हर कोई पटकथा के हिसाब से भूमिका निभा रहा था. मांझी को आज्ञाकारी और कठपुतली माना जा रहा था. मांझी ने भी उसी तरह बगैर ना-नुकुर किए नीतीश की पसंद के लोगों को अपने मंत्रिमंडल में जगह दी और कुबूल किया कि नीतीश ही उनके सुप्रीम लीडर हैं. लिहाजा धारणा बन गई कि वे थोड़े-से वक्त के लिए महज एक कामचलाऊ मुख्यमंत्री हैं.

लेकिन पिछले एक माह में मांझी ने अपने लौह इरादों की झ्लक देनी शुरू कर दी है. दशहरे के हादसे के बाद उन्होंने पटना के आइएएस और आइपीएस अधिकारियों को हटाने के साथ ही पटना मेडिकल कॉलेज और अस्पताल के मेडिकल सुपरिंटेंडेंट के निलंबन तथा चार वरिष्ठ डॉक्टरों के तबादले का फरमान जारी कर दिया. उन्होंने दवा खरीद घोटाले में चिकित्सा विभाग के आरोपी 10 अधिकारियों को भी निलंबित कर दिया. इन फैसलों से उन्होंने दिखा दिया कि वे सख्त प्रशासक हैं. इस तरह वे निर्णायक नेता के तौर पर उभरे. चर्चा है कि उन्होंने नीतीश के कुछ फैसलों को लागू करने से भी मना कर दिया था.
लालू प्रसाद यादव
साफ है, मांझी अब अपनी ताकत और अधिकार जता रहे हैं. वे समझ गए हैं कि नीतीश और जेडी(यू) उन्हें दरकिनार नहीं कर सकते क्योंकि ऐसा करने से महादलित समर्थक नाराज हो जाएंगे और उनके संख्याबल को अनदेखा करने का जोखिम कोई नहीं उठा सकता. अपने पांच माह के कार्यकाल में मांझी न सिर्फ नीतीश से नाखुश जेडी(यू) नेताओं के केंद्रबिंदु बन गए हैं, बल्कि महागठबंधन के दलों के बीच असरदार जोड़ बनकर भी उभरे हैं. बताया जाता है कि वे आरजेडी प्रमुख लालू प्रसाद के भी लगातार संपर्क में हैं. जाहिर है, उन्होंने यह सुनिश्चित कर लिया है कि अगर उन्हें सत्ता के शिखर से बेदखल करने की कोशिश होती है तो इसकी अच्छी-खासी राजनैतिक कीमत चुकानी पड़ सकती है.

एक लिहाज से इस मोड़ पर नीतीश की वापसी की कोशिश सांप्रदायिक ताकतों को रोकने की उनकी प्रतिबद्धता पर सवालिया निशान लगा सकती है. यह पूछा जाएगा कि उनके लिए क्या मुख्यमंत्री की कुर्सी प्रतिबद्धता से बढ़कर है. जेडी(यू) और आरजेडी के शीर्ष सूत्र इस पर सहमत हैं कि नीतीश के दोबारा राज्य की कमान संभालने की चाबी लालू के हाथ में हो सकती है. नीतीश की तत्काल वापसी के लिए लालू संभवत: राजी न हों क्योंकि इस वक्त उन्हें मुख्यमंत्री के तौर पर स्वीकार करने का मतलब होगा 2015 के विधानसभा चुनाव के लिए महागठबंधन की कमान उनके हाथों में देना. लालू नहीं चाहते कि सत्ता की कमान फिर नीतीश के हाथों में हो.

243 सदस्यों की विधानसभा में जेडी(यू) सरकार को बने रहने के लिए आरजेडी के 24 सदस्यों का समर्थन बेहद महत्वपूर्ण है. जेडी(यू) के पास 118 विधायक हैं, जो सामान्य बहुमत से पांच कम हैं. आरजेडी का समर्थन इस सामान्य गुणा-भाग से कहीं ज्यादा जरूरी है, खासकर तब जब राज्यसभा के चुनाव में जेडी(यू) के 20 से ज्यादा विधायकों ने पार्टी के आधिकारिक उम्मीदवारों के खिलाफ वोट दिया हो.

हालांकि जेडी(यू) का एक हिस्सा मांझी के खिलाफ आलोचना और असहमतियों को हवा देकर नीतीश की वापसी के लिए पूरा जोर लगा रहा है. लेकिन लगता नहीं कि इससे नीतीश को कोई मदद मिलेगी. अलबत्ता नीतीश ने पार्टी मामलों की कमान अपने हाथ में ले ली है. वे पार्टी कार्यकर्ताओं का नेतृत्व भी कर रहे हैं. पर खुद जेडी(यू) के भीतरी लोग स्वीकार करते हैं कि यह सिर्फ लालू ही हैं जो 2015 के विधानसभा चुनावों के पहले या बाद में नीतीश को मुख्यमंत्री बनने दे सकते हैं.

जेडी(यू) नेताओं का एक धड़ा लालू को यह समझने की कोशिश कर रहा है कि महागठबंधन को विधानसभा चुनाव नीतीश के नेतृत्व में लडऩा चाहिए. पर आरजेडी नेता इससे सहमत नहीं हैं. वे जवाब में दावा करते हैं कि गठबंधन का नेतृत्व आरजेडी के हाथों में होना चाहिए क्योंकि लोकसभा चुनाव और विधानसभा उपचुनाव में आरजेडी को कहीं ज्यादा वोट मिले हैं. नेतृत्व का यह अकेला मुद्दा नहीं है जिस पर आरजेडी और जेडी(यू) नेताओं के बीच मतभेद हैं. कई दूसरे मुद्दों पर भी दोनों में सर्वानुमति नहीं है. यही वजह है कि मांझ्ी के मंत्रिमंडल में आरजेडी और कांग्रेस के शामिल होने का मुद्दा भी टलता आ रहा है. हालांकि अभी इस विचार को पूरी तरह दफनाया नहीं गया है. आपसी विरोध की जड़ें व्यक्तित्वों के टकराव में भी हैं. नीतीश ने लोकसभा चुनाव में पार्टी की हार की जिम्मेदारी स्वीकार करते हुए मुख्यमंत्री पद से इस्तीफा दिया था. लिहाजा वे स्वाभाविक रूप से बीजेपी के खिलाफ लड़ाई का नेतृत्व करने के लिए ज्यादा 'ऊंचे नैतिक आधार' पर विराजमान हैं.

दूसरी ओर लोकसभा चुनाव में आरजेडी ने 22 फीसदी वोट हासिल किए थे जबकि जेडी(यू) को 15.8 फीसदी वोट ही मिले थे. साफ तौर पर नीतीश की तुलना में लालू लोकप्रिय वोटों के ज्यादा बड़े अंबार पर काबिज हैं. इतना ही नहीं, लालू यहां यादवों के निर्विवाद नेता हैं, जो राज्य में सबसे बड़ी आबादी वाली जाति है. 15 फीसदी मतदाता भी इसी जाति से आते हैं.  
इस रस्साकशी के चलते मांझी को और मजबूत होकर उभरने के लिए कुछ मोहलत जरूर मिल गई है. यही वजह है कि वे अब ज्यादा निर्णायक और आक्रामक दिखाई दे रहे हैं.

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