एडवांस्ड सर्च

सीएएः बंटवारे की घंटी

नागरिकता संशोधन कानून के पास होते ही देशभर में विरोध प्रदर्शनों की झड़ी लग गई. तो, क्या भाजपा अपनी कहानी में खुद ही उलझती जा रही है?

Advertisement
aajtak.in
कौशिक डेकानई दिल्ली, 24 December 2019
सीएएः बंटवारे की घंटी पंकज नागिया

दिल्ली में सोमवार की हड्डियां कंपाने वाली सर्द सुबह जामिया मिल्लिया इस्लामिया के छात्रों का एक समूह विश्वविद्यालय के गेट पर अपनी कमीजें तक उतारकर बैठा था. यह असामान्य-सा प्रदर्शन एक दिन पहले (15 दिसंबर) को दिल्ली पुलिस की मनमानी कार्रवाइयों के खिलाफ था, जो नागरिकता (संशोधन) कानून (सीएए), 2019 के विरोध के एक मार्च के दौरान हिंसा के बाद जबरन विश्वविद्यालय परिसर में घुस गई और छात्रों को बेरहमी से मारा-पीटा.

इसके फौरन बाद देश भर के 30 से अधिक प्रमुख शिक्षण संस्थानों के छात्र जामिया के छात्रों के साथ एकजुटता दिखाने और विवादास्पद कानून के विरोध में सड़कों पर उतर आए. इस कानून के मुताबिक पाकिस्तान, अफगानिस्तान और बांग्लादेश से भारत आए अवैध हिंदू, ईसाई, बौद्ध, जैन, सिख और पारसी अप्रवासी, नागरिकता के पात्र हैं, बशर्ते वे 31 दिसंबर, 2014 को या उससे पहले भारत में आए हों और यहां छह साल से रह रहे हों. लेकिन इसके दायरे से मुस्लिम समुदाय को बाहर रखा गया है और यही विवाद की मुख्य वजह है. प्रदर्शनकारियों में समाज के हर क्षेत्र और वर्ग के लोग हैं. उनका मानना है कि यह संविधान और देश के धर्मनिरपेक्ष आचरण की मूल भावना का उल्लंघन करता है.

पूर्वोत्तर के आठ अन्य संस्थान इस कानून के खिलाफ पहले से ही सड़कों पर उतर चुके हैं, हालांकि विरोध की उनकी वजहें पूरी तरह अलग हैं. उन्हें डर है कि यह कानून बांग्लादेश के अवैध बांग्लाभाषी हिंदू प्रवासियों को वैध नागरिक बना देगा, जो असम के स्थानीय मूलवासियों की पहचान, संस्कृति और राजनैतिक अधिकारों के लिए एक गंभीर खतरा है.

राज्य में 1980 के दशक में बांग्लादेश से आए अवैध प्रवासियों—हिंदू और मुस्लिमों की लगातार आमद के खिलाफ छह साल लंबा आंदोलन 1985 में असम समझौते के साथ खत्म हुआ.

उस समझौते से अंतत: इस वर्ष असम में सुप्रीम कोर्ट की निगरानी में राष्ट्रीय नागरिकता रजिस्टर (एनआरसी) तैयार हुआ जिससे 19 लाख लोग बाहर हो गए. इनमें से 50 फीसद से अधिक हिंदू हैं. राज्य और केंद्र दोनों ही जगहों पर सत्तारूढ़ भाजपा को अपना वोट बैंक गंवाने का खतरा दिखा इसलिए उसने एनआरसी को फौरन खारिज कर दिया.

इस बीच, नरेंद्र मोदी की अगुआई वाली सरकार हिंदू प्रवासियों को वैध बनाने के लिए नागरिकता कानून लेकर आई. इससे चिंतित असम के मूल निवासियों ने उस कानून को लेकर जोरदार विरोध शुरू कर दिया.

असम के लोगों ने कथित प्रवासियों को अपनी संस्कृति पर एक खतरे की तरह देखा, तो दूसरी ओर देश भर में एनआरसी (केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह 2024 से पहले इसे लागू करने की बात कर चुके हैं) की बात ने देश में हर जगह के मुसलमानों को सीएए को लेकर असहज कर दिया है.

इस कानून के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दे चुके हैदराबाद के सांसद तथा एआइएमआइएम (ऑल इंडिया मजलिस-ए-इत्तेहाद-उल-मुस्लिमीन) के प्रमुख असदुद्दीन ओवैसी का कहना है कि सीएए और एनआरसी का एकमात्र उद्देश्य मुसलमानों को अलग-थलग करना है.

असम के वित्त मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा के सार्वजनिक बयानों के मद्देनजर ओवैसी की आशंकाएं गलत नहीं दिखती हैं. सरमा ने कहा, ''नागरिकों के रूप में हिंदू प्रवासियों को शामिल करने से हमें असम के 17 विधानसभा क्षेत्रों में मुस्लिम वोटों के प्रभाव को बेअसर करने में मदद मिलेगी.

हम बदरुद्दीन अजमल को राज्य का मुख्यमंत्री नहीं बनने दे सकते.'' गौरतलब है कि एआइयूडीएफ (ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट) के प्रमुख अजमल पक्के नागरिक हैं और तीन बार के सांसद हैं.

बंगाल की बाजी

भाजपा का एक बड़ा राजनैतिक उद्देश्य पश्चिम बंगाल में है, जहां 2021 में असम के साथ-साथ चुनाव होंगे. पार्टी को उम्मीद है कि वह अपने अंतिम मोर्चे बंगाल पर भी विजय हासिल करेगी और अप्रवासी हिंदू वोटों पर उसकी पूरी आस टिकी है. राज्य के 294 विधानसभा क्षेत्रों में 70-80 सीटों पर उसकी पर्याप्त उपस्थिति है.

2019 के आम चुनाव में, सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) जिसने 42 में से 22 सीटें जीती थीं और भाजपा (18 सीटें) के बीच वोट शेयर का अंतर, केवल 3.3 प्रतिशत या 21 लाख वोटों का ही था. सीएए के जरिए हिंदू बांग्लादेशी शरणार्थियों को नागरिकता प्रदान करना और ऐसा एनआरसी लेकर आना, जो अंतत: केवल 'अवैध' प्रवासियों का पता लगाए, जो मुसलमान ही होंगे, भाजपा के लिए वोटों के इस अंतर को पाटने में मददगार हो सकता है.

इस बीच, ममता बनर्जी की अगुआई वाली टीएमसी 1.9 करोड़ मुस्लिम मतदाताओं (कुल 6.98 करोड़ वोटरों में से) के समर्थन पर निर्भर करती है, क्योंकि 88 प्रतिशत मुस्लिम वोटरों ने लोकसभा चुनाव में उसे वोट दिया था. विभिन्न अनौपचारिक अनुमानों में राज्य में अवैध मुस्लिम प्रवासियों की संख्या 1 से 2 करोड़ के बीच बताई जाती है.

ढाका विश्वविद्यालय के बांग्लादेशी अर्थशास्त्री अबुल बरकत के अनुमान के अनुसार, 1972 में जब तक भारत सरकार ने शरणार्थियों के आवेदनों पर विचार नहीं करने का फैसला किया, तब तक 80 लाख से एक करोड़ हिंदू शरणार्थी पश्चिम बंगाल में पहुंच चुके थे.

राज्य भाजपा शरणार्थी सेल के संयोजक मोहित राय कहते हैं, ''वे लोग जो पंजीकरण से नागरिकता हासिल नहीं कर पाए, जैसा 1971 के बांग्लादेश युद्ध से पहले आने वालों के लिए हुआ था, उनके पास मतदाता पहचान पत्र, आधार कार्ड और अन्य दस्तावेज मौजूद हैं. वे अब आधिकारिक रूप से भारतीय नागरिक बनना चाहते हैं.

यह मांग 40 वर्षों से उठ रही है, लेकिन भाजपा से पहले किसी भी दल ने उन्हें नागरिकता देने की दिशा में कोई कदम नहीं उठाया. हमने शुरुआत की है.'' इन प्रवासियों में से लगभग 70 लाख मटुआ समुदाय के हैं और 51 विधानसभा क्षेत्रों (कुल 295 में से) में, जहां वे प्रभावशाली हैं, वहां सीएए के पारित होने का जश्न मनाया जा रहा है.

भाजपा नेता दीप्तिमान सेनगुप्ता कहते हैं, ''अगर ये 70 लाख वोटर हमारे साथ खड़े हो जाते हैं तो टीएमसी को 45 सीटों का नुक्सान हो जाएगा.''

जल्द ही, पश्चिम बंगाल की सड़कों पर हिंसक विरोध शुरू हो गया. सीएए को लेकर टीएमसी दुविधा में थी क्योंकि संसद में इसके पारित होने पर कोई प्रतिक्रिया देने में मुख्यमंत्री बनर्जी को 48 घंटे लगे. हालांकि पार्टी मुस्लिम वोटों पर बहुत अधिक निर्भर करती है, लेकिन वह हिंदू वोटों को भाजपा के पक्ष में लामबंद होते नहीं देखना चाहती. हिंसक विरोध प्रदर्शन और एनआरसी के डर ने ममता को अपनी चुप्पी तोडऩे और मोदी सरकार के खिलाफ गरजने की हिम्मत दी और उन्होंने ऐलान कर दिया कि वे अपने राज्य में सीएए या एनआरसी लागू नहीं होने देंगी.

टीएमसी के एक वरिष्ठ नेता ने कहा, ''2019 के लोकसभा चुनाव में, हमने 166 विधानसभा क्षेत्रों में जीत हासिल की, जिनमें से 98 पर मुस्लिम आबादी का प्रभुत्व था. हमें अपने मुस्लिम वोट बैंक को अपने साथ पक्का करके रखना है क्योंकि राज्य के कई दल और राज्य के बाहर के कई दल, हमारे इस वोट बैंक में सेंध लगाने की जी-तोड़ कोशिशें कर रहे हैं.''

पिछले कुछ महीनों में, ओवैसी को टीएमसी एक मजबूत प्रतियोगी के रूप में देखने लगी है जो राज्य के मुस्लिम वोटों में सक्रिय रुचि ले रहे हैं. इन चुनौतियों को देखते हुए, मुख्यमंत्री सीएए और एनआरसी के खिलाफ तीन-दिवसीय मैराथन मार्च में हिस्सा लेने सड़कों पर उतरीं.

इस विरोध के दौरान अपने एक तरफ भगवा वस्त्रधारी एक बौद्ध भिक्षु और दूसरी तरफ टोपी पहने एक मुस्लिम के साथ मार्च कर रही ममता ने कुछ प्रतीकात्मक संदेश देने की भी कोशिश की. टीएमसी नेताओं को लगता है कि पार्टी का मौजूदा स्टैंड उन 100 सीटों पर बहुत मददगार होगा, जहां अल्पसंख्यकों की आबादी अच्छी-खासी है. ममता को यह भी एहसास है कि हिंदू वोटरों खासकर मटुआ लोगों को साधा जाए.

भाजपा की रणनीति

अगर भाजपा सूत्रों की मानें तो उनके पास पहले से ही सीएए के नकारात्मक प्रभाव का मुकाबला करने की योजना है. असम में, भाजपा तीन-स्तरीय रणनीति अपना रही है—लोगों को सीएए के बारे में जागरूक करके उनका समर्थन पाने के लिए सार्वजनिक रैलियां, असम समझौते के खंड 6 (असम के मूल निवासियों के सामाजिक-राजनैतिक अधिकारों और संस्कृति की रक्षा करने का प्रावधान) के कार्यान्वयन को गति देना और सीएए के तहत आवेदन की अवधि को कम करना.

दिसंबर के अंतिम सप्ताह और जनवरी के अंत के बीच, राज्य भाजपा ने कानून के समर्थन में शक्ति प्रदर्शन के रूप में 10 रैलियों की योजना बनाई है. सरमा कहते हैं, ''मैं गारंटी देता हूं कि गुवाहाटी और असम में किसी और जगह पर प्रदर्शनकारियों की तुलना में कहीं ज्यादा लोग हमारी रैलियों में पहुंचेंगे.'' सरमा और मुख्यमंत्री सर्बानंद सोनोवाल सभी रैलियों को संबोधित करेंगे, भाजपा के एक सूत्र का कहना है कि शाह और प्रधानमंत्री मोदी जनवरी की अंतिम दो रैलियों में शामिल होंगे.

लेकिन इससे पहले कि दोनों नेता असम के लोगों का सामना करने जाएं, उन्हें असमियों को दिखाना होगा कि वे असम समझौते के खंड 6 के कार्यान्वयन को लेकर बहुत गंभीर हैं. 11 दिसंबर को, जब संसद में सीएए के पारित होने के विरोध में असम में ब्रह्मपुत्र घाटी उबल पड़ी, तो प्रधानमंत्री मोदी ने जोर देकर कहा कि कोई भी, यहां उनका तात्पर्य हिंदू बंगाली अप्रवासियों से था, जिसे सीएए के तहत भारत की नागरिकता प्राप्त होगी—उस सुरक्षा को कम नहीं कर सकता है जो खंड-6 के तहत असमियों को मिली है.

उसी दिन, शाह ने संसद में यह भी कहा कि खंड 6 असम के लोगों के हितों की रक्षा के लिए एक पहरेदार के रूप में काम करेगा. खंड 6 कहता है, ''असमिया लोगों की सांस्कृतिक, सामाजिक, भाषाई पहचान और विरासत की रक्षा, संरक्षण और प्रोत्साहन के लिए असमिया लोगों को संवैधानिक, विधायी और प्रशासनिक सुरक्षा, जिसकी भी जरूरत हो, प्रदान की जाएगी.''

इस साल जनवरी में, मोदी सरकार ने 1985 के बाद पहली बार, खंड 6 के कार्यान्वयन के लिए रोडमैप सुझाने के लिए एक समिति का गठन किया.

हालांकि इसके अध्यक्ष और पूर्व केंद्रीय पर्यटन सचिव एम.पी. बेजबरुआ और पांच अन्य सदस्यों ने 2016 के नागरिकता संशोधन विधेयक के विरोध में पैनल छोड़ दिया था. जुलाई में, गृह मंत्रालय ने एक नए अध्यक्ष- गुवाहाटी हाइकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश जस्टिस बिप्लब कुमार सरमा के साथ समिति का पुनर्गठन किया. सोनोवाल ने नए पैनल को 15 जनवरी, 2020 तक अपनी रिपोर्ट देने को कहा है.

स्थानीय असमियों की आशंकाओं को दूर करने के लिए, सरकार अपेक्षाकृत 'कम संख्या वाले अप्रवासियों' पर अपनी उम्मीदें लगा रही है जो असम में सीएए के तहत आवेदन करेंगे. केंद्रीय गृह मंत्रालय के एक अधिकारी का कहना है, ''बाकी राज्यों के विपरीत, जहां अप्रवासी अगले साल 1 जनवरी से 31 दिसंबर के बीच आवेदन कर सकते हैं, असम में आवेदन की खिड़की केवल 30 अप्रैल तक ही खुली रहेगी. तनावपूर्ण माहौल को देखते हुए, हमें 3,00,000 से अधिक लोगों से आवेदन की उम्मीद नहीं है और उनमें से ज्यादातर बराक घाटी में होंगे, जहां सीएए का बहुत स्वागत किया गया है.''

कई स्रोतों से संकेत मिलता है कि भाजपा, असम और पश्चिम बंगाल में 2021 के विधानसभा चुनावों के लिए मतदाता सूची तैयार होने से पहले अप्रवासियों को नागरिकता प्रमाण पत्र जारी करने की जल्दी में है.

नागरिकता के पात्र सबसे हालिया अप्रवासियों को 31 दिसंबर, 2020 के बाद ही नागरिकता दी जा सकती है, क्योंकि भारत में छह साल पूरे करने की उनकी शर्त तभी पूरी हो सकेगी. इस पर सरकार कितना समय लेगी, इस पर कोई आधिकारिक बयान नहीं आया है, लेकिन भाजपा के एक शीर्ष मंत्री का दावा है कि जनवरी 2021 में असम और बंगाल की मतदाता सूचियों में संशोधन होना है और उससे पहले दोनों राज्यों में अधिकतम हिंदू प्रवासियों को वैध बनाने के हर संभव प्रयास किए जाएंगे.

उलटा न पड़ जाएं दांव

हालांकि सारी कवायद उस वैचारिक प्रतिबद्धता—सीएए 2014 और 2019 दोनों में भाजपा के घोषणापत्र में थी—को पूरा करने और चुनावी सपने को साकार करने के लिए की गई है लेकिन भाजपा को यह अंदाजा नहीं था कि देशभर में इसके खिलाफ इतना तीव्र विरोध प्रदर्शन होगा. मोदी सरकार का अनुच्छेद 370 को खत्म करने का फैसला इससे बहुत बड़ा था, लेकिन राष्ट्रीय स्तर पर उसे स्वीकार्यता मिली. सीएए को लेकर उसे अपने राजनैतिक विरोधियों और सड़क पर उतरे आम आदमी, दोनों के प्रतिरोध का सामना करना पड़ा है. ममता के अलावा, पंजाब, छत्तीसगढ़ और सिक्किम के मुख्यमंत्री जबकि प्रेम सिंह तमांग का सिक्किम क्रांतिकारी मोर्चा भाजपा का सहयोगी है, ने सीएए को लागू करने से इनकार कर दिया है, हालांकि संवैधानिक विशेषज्ञों का कहना है कि वे संसद द्वारा पारित कानून का पालन करने के लिए कानूनी रूप से बाध्य हैं. इस कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती भी दी गई है और इसे खत्म करने के संदर्भ में 59 याचिकाएं दायर की गई हैं.

अर्थव्यवस्था के डांवांडोल होने, जम्मू-कश्मीर में गतिरोध और महाराष्ट्र तथा हरियाणा विधानसभा चुनावों में झटके के बाद, सीएए को लेकर विरोध ने मोदी सरकार के लिए मुश्किलें बढ़ाई ही हैं. झारखंड विधानसभा चुनाव में अगर परिणाम भाजपा के खिलाफ जाते हैं, जैसा कि कई विशेषज्ञों ने भविष्यवाणी भी की है, तो भाजपा विरोधी ताकतों को एकजुट होने का अवसर मिलेगा, जैसा महाराष्ट्र में देखा गया था. भाजपा के एक अंदरूनी सूत्र ने कहा, ''अमित शाह ने एक पिटारा खोल दिया है और मुझे नहीं लगता कि उनके पास इसके प्रभाव को बेअसर करने की कोई योजना है.'' हालांकि, कुछ अन्य लोग इसे पार्टी के लिए एक तात्कालिक अवसर के रूप में देखते हैं, खासकर दिल्ली में, जहां बड़ी संख्या में पाकिस्तान से आए शरणार्थी रहते हैं. राष्ट्रीय राजधानी में अगले साल की शुरुआत में चुनाव होने हैं.

देश के कई हिस्सों में सीएए के खिलाफ स्वत:स्फूर्त विरोध प्रदर्शन ने विपक्षी दलों को उत्साहित कर दिया है. कांग्रेस ने दिल्ली में एक विशाल भारत बचाओ रैली का आयोजन किया जिसमें पार्टी के पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी का आक्रामक अवतार सामने आया. जामिया के छात्रों के साथ एकजुटता दिखाने के लिए दिल्ली के प्रतिष्ठित इंडिया गेट पर कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी धरने पर बैठीं और उन्होंने मोदी सरकार पर संविधान को कमजोर करने का आरोप लगाते हुए तीखे हमले किए.

भाजपा के मुखर हिंदू एजेंडे के परिणामस्वरूप जहां कुछ विचित्र गठजोड़ हुए हैं और यहां तक कि अजीबोगरीब यू-टर्न भी देखे गए हैं. 26 प्रतिशत मुस्लिम आबादी वाले राज्य केरल में, सत्तारूढ़ वाम मोर्चा और उसका कट्टर प्रतिद्वंद्वी, कांग्रेस के नेतृत्व वाला यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट, इस कानून का विरोध करने के लिए एक साथ खड़े दिखे. असम में, भाजपा की सहयोगी अगप ने संसद में सीएए के पक्ष में मतदान किया लेकिन अब उसने घोषणा की है कि वह इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देगी. पूर्व भाजपा सहयोगी शिवसेना ने लोकसभा में बिल के पक्ष में मतदान किया, लेकिन राज्यसभा में उसने मतदान का बहिष्कार किया और अब पार्टी कह रही है कि यह सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद ही अपनी स्थिति स्पष्ट करेगी. बीजद ने भी इसी तरह सीएए का समर्थन किया लेकिन नवीन पटनायक ने एनआरसी का विरोध करने का ऐलान किया.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay