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सीडीएसः सबसे बड़ा सेनापति

चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ का पद सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति की सहमति के साथ ही भारत में एक शक्तिसंपन्न और एकीकृत सैन्य कमान की ओर अग्रसर.

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aajtak.in
संदीप उन्नीथननई दिल्ली, 01 January 2020
सीडीएसः सबसे बड़ा सेनापति सबके लिए एक साल 2019 की स्वतंत्रता दिवस परेड के दौरान तीनों सेनाओं के प्रमुखों से मिलते प्रधानमंत्र

लगता है, स्वतंत्र भारत के सबसे बड़े सैन्य सुधार की रूपरेखा धीरे-धीरे उभरने लगी है. बीते 24 दिसंबर को सुरक्षा मामलों की मंत्रिमंडलीय समिति (सीसीएस) ने भारत के पहले चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ (सीडीएस) पद के सृजन तथा रक्षा मंत्रालय के अधीन एक नए और महत्वपूर्ण संगठन की स्थापना को मंजूरी दे दी. अपने पहले कार्यकाल में नरेंद्र मोदी सरकार ने रक्षा मंत्रालय में कोई फेरबदल नहीं किया था, लेकिन प्रधानमंत्री ने 2015 में उच्च रक्षा प्रबंधन में सुधारों की आवश्यकता पर बल दिया था. 2015 में उन्होंने विमानवाहक पोत आइएनएस विक्रमादित्य पर सैन्य कमांडरों के एक संयुक्त सम्मेलन में कहा था, ''यह दुखद है कि अतीत में प्रस्तावित कई रक्षा सुधार उपाय लागू नहीं किए गए हैं. मेरे लिए यह प्राथमिकता का क्षेत्र है.'' अपने दूसरे कार्यकाल में उन्होंने इस अधूरे एजेंडे को आगे बढ़ाया है.

सैन्य मामलों का विभाग (डीएमए) सुधार का दूसरा सबसे अहम पहलू है क्योंकि इसके जरिए ही वास्तविक शक्ति रक्षा बलों को दी जानी है. अभी तीनों सेना मुख्यालय रक्षा विभाग के 'संलग्न कार्यालयों' के रूप में कार्य करते हैं, जिसका मुखिया शक्तिशाली रक्षा सचिव (जो नौकरशाही का हिस्सा है) होता है. रणनीतिक विश्लेषक के. सुब्रह्मण्यम की अध्यक्षता में बनी करगिल समीक्षा समिति ने 2000 में टिप्पणी की थी, ''प्रमुख लोकतंत्रों में भारत शायद एकमात्र ऐसा देश है जहां सशस्त्र बल मुख्यालय शीर्ष शासकीय ढांचे का हिस्सा नहीं है.'' वर्तमान में रक्षा सचिव नीति और प्रशासन संबंधी सभी मामलों में रक्षा मंत्री का मुख्य सलाहकार होता है. वह रक्षा मंत्रालय में बराबरी के चार अन्य सचिवों के बीच पहला होता है.

सीडीएस पद के उम्मीदवारों में सबसे प्रमुख माने जाने वाले थल सेनाध्यक्ष जनरल बिपिन रावत, किसी संलग्नक कार्यालय के मुखिया के रूप में सैन्य प्रमुख की शक्तियों की सीमाएं जानते हैं. सैनिकों की संख्या घटाते हुए और नए विभागों का सृजन करके सेना को मौलिक रूप से पुनर्गठित करने की उनकी योजना पर अब तक काम नहीं शुरू हो सका है क्योंकि इसी साल रक्षा मंत्रालय की नौकरशाही ने उसे अटका दिया था.

इस महत्वपूर्ण पद के लिए सरकार ने जो औपचारिक स्वीकृति दी है उसमें इसे तीनों सेनाध्यक्षों के प्रोटोकॉल के बराबर एक चार सितारा जनरल के रूप में परिकल्पित किया गया है. इस पद की जिम्मेदारियों का दायरा इसे स्वतंत्र भारत का सबसे महत्वपूर्ण सैन्य अधिकारी पद बनाता है. ऐसे समझें कि सीडीएस तीन भूमिकाओं का निर्वाह करेगा—राजनैतिक नेतृत्व के लिए एकल-बिंदु सैन्य सलाहकार, सेनाध्यक्षों की समिति का स्थायी अध्यक्ष और गठित होने जा रहे सैन्य मामलों के विभाग (डीएमए) का प्रमुख.

सीडीएस के आने और डीएमए के गठन से सुधारों को गति मिलेगी. रक्षा मंत्रालय के अंतर्गत पांचवें विभाग के रूप में परिकल्पित डीएमए रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह के प्रति उत्तरदायी होगा. यह मौजूदा रक्षा, रक्षा उत्पादन, पूर्व सैनिक कल्याण तथा अनुसंधान और विकास के मौजूदा विभागों के अतिरिक्त होगा. इन सभी विभागों के प्रमुख भारत सरकार के सचिव के समकक्ष अधिकारी होते हैं (ग्राफिक देखें: नई तोप). यह तथ्य महत्वहीन नहीं है कि सीडीएस या उनके डिप्टी के पास भारत सरकार के सचिव के बराबर अधिकार होंगे. पूर्व नौसेना प्रमुख और रक्षा सुधारों पर नरेश चंद्र टास्क फोर्स के सदस्य रहे एडमिरल अरुण प्रकाश (सेवानिवृत्त) कहते हैं, ''यह एक ऐतिहासिक कदम है—सशस्त्र बलों ने संलग्नक कार्यालयों से आगे बढ़ कर भारत सरकार के केंद्रीय ढांचे में प्रवेश किया है, जिसकी मांग हम वर्षों से कर रहे थे.''

सरकार का मानना है कि 'केवल सैन्य मामलों से संबंधित काम डीएमए के कार्यक्षेत्र में आएंगे जबकि रक्षा सचिव की अध्यक्षता वाला रक्षा विभाग देश की रक्षा से संबंधित बड़े मुद्दों से निबटेगा.' इन दोनों विभागों के बीच जिम्मेदारियों का बंटवारा अभी किया जाना है. यह काम राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल की अध्यक्षता वाली कार्यान्वयन समिति को सौंपा गया है. हालांकि डीएमए को मिली एकीकरण, ज्वॉइंटमैनशिप और स्वदेशीकरण को बढ़ावा देने की जिम्मेदारी महत्वपूर्ण है.

रक्षा मंत्रालय के थिंक-टैंक, रक्षा अध्ययन और विश्लेषण संस्थान (आइडीएसए) के महानिदेशक सुजन चिनॉय कहते हैं, ''भारत के इतिहास में ऐसा पहली बार हो रहा है कि विशेष रूप से ज्वॉइंटमैनशिप और तीनों सेनाओं के एकीकरण को बढ़ावा देने के लिए आपके पास एक ढांचा है.'' 31 दिसंबर को सेवानिवृत्त होने वाले जनरल रावत, तीनों सेना प्रमुखों में वरिष्ठतम हैं और वर्तमान सेनाध्यक्षों की समिति के अध्यक्ष हैं. ऐसे में उनके सीडीएस बनने से वरिष्ठता और प्रोटोकॉल को लेकर संवेदनशील सेनाओं में कोई समस्या नहीं होगी. इससे संबंधित घोषणा नए थलसेना अध्यक्ष के चयन की प्रक्रिया समाप्त होने के बाद की जाएगी.

अंदरूनी सूत्रों का कहना है कि रक्षा मंत्रालय में नागरिक नौकरशाही और वर्दीधारियों के बीच रक्षा प्रमुख (सीडीएस) को सैन्य साजोसामान की खरीद से संबंधित शक्तियों के लिए मूक शक्तिसंघर्ष चल रहा था जिसमें सैन्य पृष्ठभूमि वाला पक्ष इन शक्तियों को पाने में जी-जान से लगा था. रक्षा मंत्रालय के एक विभाग के प्रमुख के रूप में अब सीडीएस का सरकार में काफी ज्यादा प्रभाव होगा.

सरकारी सूत्रों का कहना है कि डीएमए में हर स्तर पर नागरिक और सैन्य अधिकारियों का उपयुक्त मिश्रण होगा. ऐसा होने से सेनाओं के लिए खरीद, प्रशिक्षण और स्टाफिंग में संयुक्तता को बढ़ावा मिलेगा, संसाधनों के सर्वोत्कृष्ट उपयोग के लिए सैन्य कमानों का पुनर्गठन किया जा सकेगा और स्वदेशी उपकरणों के उपयोग को बढ़ावा मिलेगा.

तीनों सेनाओं के लिए हथियारों की उपलब्धता में सीडीएस की बात महत्वपूर्ण होगी, पर हथियार खरीद की वास्तविक भूमिका अभी भी रक्षा सचिव की अध्यक्षता वाले रक्षा विभाग के पास रहेगी.

रक्षा अधिकारियों का तर्क है कि यह कोई आवश्यक रूप से नकारात्मक बात नहीं है. एक रक्षा अधिकारी का कहना है, ''सीडीएस को सैन्य बलों के पुनर्गठन का जिम्मेदार बनाया गया है जो रणनीति से जुड़ी बात है, न कि अधिग्रहणों के लिए जो एक प्रक्रिया है और जिसका जिम्मा रक्षा विभाग पर रहना ही बेहतर है.''

सीडीएस जो करेगा वह है लंबी अवधि की योजनाओं का निर्धारण, जैसे कि पंचवर्षीय रक्षा पूंजी अधिग्रहण योजना (डीसीएपी) और द्विवार्षिक आधार पर आगे बढ़ते रहने वाली वार्षिक अधिग्रहण योजनाओं को लागू करना. वह रक्षा मंत्री के नेतृत्व वाली रक्षा अधिग्रहण समिति (डीएसी) और डोभाल के नेतृत्व वाली रक्षा नियोजन समिति (डीपीसी) का सदस्य होगा.

सीडीएस प्रत्याशित बजट के आधार पर पूंजी अधिग्रहण प्रस्तावों के लिए अंतर-सेवाओं को प्राथमिकता प्रदान करेगा—यह क्षेत्र सरकार का सिरदर्द होता है क्योंकि सशस्त्र बलों की दी जाने वाली खरीद सूचियों का बजटीय वास्तविकताओं से कोई संबंध नहीं होता. वर्तमान में यह काम हेडक्वार्टर्स इंटग्रेटेड डिफेंस स्टाफ (एचक्यू-आइडीएस) करता है, पर इसकी सिफारिशें सेनाओं पर बाध्यकारी नहीं हैं. उदाहरण के लिए, कोई सेना मुख्यालय किसी अधिग्रहण के बारे में एचक्यू-आइडीएस की सिफारिशों को पलट सकता है.

सीडीएस सैनिकों को सीधे नियंत्रित नहीं करेगा, बल्कि सिर्फ तीनों सेनाओं से जुड़े संगठनों जैसे सामरिक बल कमान, अंडमान और निकोबार कमान, रक्षा साइबर एजेंसी और अंतरिक्ष के लिए प्रस्तावित डिवीजनों का प्रबंधन करेगा. 2016 में सीडीएस के सृजन की सिफारिश करने वाले दल के प्रमुख रहे लेफ्टिनेंट जनरल डी.बी. शेकटकर (सेवानिवृत्त) कहते हैं कि नौकरशाही और सेना के लिए एक साथ काम करना अहम है. वे कहते हैं, ''नौकरशाही को सशस्त्र बलों की ऑपरेशनल मुस्तैदी में बाधा के रूप में देखने की धारणा को खत्म करने की जरूरत है.''

पहले सीडीएस से एक महत्वपूर्ण अपेक्षा होगी तीनों सेनाओं में 'संयुक्तता' लाने के लिए त्रिवर्षीय योजना बनाना. इसका मतलब होगा एकीकृत लॉजिस्टिक कमान और मेंटनेंस कमान जैसे संगठनों की स्थापना—जो तीनों सेवाओं के लिए राजस्व खरीद का जिम्मा उठाएंगे. सरकार ने सशस्त्र बलों को 'थियेटराइजेशन' के लिए किसी समय-सीमा का संकेत नहीं दिया है—उन्हें 17 अलग-अलग कमानों से केवल 3-4 कमानों में व्यवस्थित किया जाना है. रक्षा विश्लेषकों का मानना है कि ये सुधार दूसरे चरण में होंगे.

अगले कुछ महीनों में अपेक्षित कई सुधारों में सीडीएस और डीएमए सबसे पहले हैं. डीपीसी जल्द ही राष्ट्रीय सुरक्षा रणनीति पर श्वेतपत्र पेश करेगी जिसमें भविष्य के उन संघर्ष क्षेत्रों की पहचान होगी जिनसे निबटने के लिए सेना को सुसज्जित और प्रशिक्षित होना होगा. अपने 2015 के भाषण में मोदी ने भविष्य की कुछ चुनौतियों की पहचान की थी, ''हमें ऐसे बलों की जरूरत है जो न सिर्फ मानवीय साहस से लैस हों बल्कि चुस्त, गतिशील और तकनीक संचालित हों. हमें तेज गति के युद्ध जीतने की क्षमताओं की जरूरत है, क्योंकि हमारे पास लड़ाइयों को लंबा खींचने की सुविधा नहीं होगी.'' इस प्रक्रिया की शुरुआत करते हुए उन्होंने अंतत: रक्षा मंत्रालय में अहम सुधार करने का खतरा मोल ले लिया है. ठ्ठ

''सीडीएस एक ऐतिहासिक कदम है जिससे सेना आखिरकार शासन के केंद्रीय ढांचे का हिस्सा बन गई है''

एडमिरल अरुण प्रकाश (से.नि.)

पूर्व नौसेना प्रमुख

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