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कहर की लहर आने का अंदेशा

स्वास्थ्य विशेषज्ञों का अनुमान है कि जुलाई के मध्य तक कोविड के मामले देश में चरम पर पहुंच जाएंगे और जांच के साथ-साथ संपर्कों की पहचान से ही संक्रमण के प्रसार और मृत्यु दर को कम रखा जा सकता है.

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aajtak.in
सोनाली आचार्जीनई दिल्ली, 24 June 2020
कहर की लहर आने का अंदेशा दिल्ली के निगमबोध घाट पर कोविड से मारे गए लोगों की अंत्येष्टि

मार्च के आखिर में लेडी हार्डिंग मेडिकल कॉलेज (एलएचएमसी) के निदेशक डॉ. एन.एन. माथुर को सूचित किया गया था कि मध्य दिल्ली में स्थित एलएचएमसी कोविड अस्पताल के रूप में काम करेगा, लेकिन मुख्य रूप से यह राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के दो प्रमुख कोविड अस्पतालों—झज्जर के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान (एम्स) और दिल्ली के लोक नायक जय प्रकाश नारायण (एलएनजेपी) अस्पताल—के परीक्षण और उपचार क्षमता के पूरक के रूप में ही काम करेगा. डॉ. माथुर की टीम को इस नई कोविड सुविधा के लिए 60 बेड और 17 वेंटिलेटर का इंतजाम करने में लगभग दो सप्ताह का समय लगा.

वे याद करते हैं, ‘‘लॉकडाउन की वजह से शुरुआत में हम इससे अधिक रोगियों का अनुमान नहीं लगा रहे थे.’’ लेकिन, 16 जून तक एलएचएमसी ने इससे दोगुने कोविड मरीजों का इलाज किया और पास के ही वाइएमसीए परिसर में 100 और बिस्तर स्थापित किए, 60 ‘कोविड संदिग्ध’ बेड जोड़े और 30 अन्य उपचार बेड जोडऩे की योजना बनाई है. कुल मिलाकर, वही स्टाफ जो कभी केवल 60 बेड के लिए काम करता था, अब 254 बेड की देखरेख कर रहा है. अस्पताल में एक भी कोविड बेड खाली नहीं है. डॉ. माथुर कहते हैं, ‘‘हमने अच्छी तैयारी की, लेकिन मई के मध्य में एक बदलाव दिखा.

अचानक, हमारे पास अधिक गंभीर मामले आने लगे जिनमें से अधिकांश अलक्षणी मामले थे.’’ लेकिन गंभीर मामलों की संख्या में उतनी वृद्धि नहीं हुई है जितनी सामान्य कोविड मामलों में रही है. जैसे-जैसे कोविड की संख्या में वृद्धि जारी है, देश भर के कई अन्य अस्पताल अपने कोविड बेड की संख्या में इजाफा कर रहे हैं. फिर भी लगता नहीं कि यह अपने आप में पर्याप्त होगा.

18 जून को कोविड संक्रमण के 3,66,945 मामलों के साथ भारत अब दुनिया का चौथा सबसे बुरी तरह प्रभावित देश है. 17.4 दिनों में संक्रमण के मामलों के दोगुना हो जाने की मौजूदा दर से हम जून के अंत तक कोविड से तीसरे सबसे अधिक प्रभावित देश रूस से आगे निकल जाएंगे जिसके यहां संक्रमण के मामले लगभग 30 दिनों में दोगुने हो रहे हैं. हालांकि इस तेज वृद्धि के बावजूद, भारत में संक्रमण मामलों की संख्या उस गति से दोगुनी नहीं हो रही जितनी तेजी से अमेरिका या स्पेन में हुई थी.

नीति आयोग के सदस्य डॉ. वी.के. पॉल कहते हैं, ‘‘अगर हमने लॉकडाउन लागू नहीं किया होता तो हम मार्च में बहुत कम समय में वहां पहुंच सकते थे, जहां अमेरिका और स्पेन हैं. हमारा संक्रमण कर्व (संक्रमण वृद्धि सूचक) बेशक ऊपर की ओर जा रहा है, लेकिन इसकी वृद्धि बहुत तीव्र नहीं है.’’ आइसीएमआर (इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च) के 21 राज्यों के 83 जिलों के 26,400 लोगों के सीरोलॉजी सर्वे से पता चलता है कि केवल 0.73 प्रतिशत मामलों में ही पूर्व में किसी प्रकार का कोविड संपर्क सामने आया था. इससे पता चलता है कि देश के रेड और ऑरेंज जोन में अधिक तेजी से फैलने के बावजूद संक्रमण अभी भी काफी हद तक काबू में है.

दरअसल, महाराष्ट्र, दिल्ली, तमिलनाडु, गुजरात और पश्चिम बंगाल जैसे पांच राज्यों में ही लगभग 70 फीसद मामले हैं. दिल्ली में संक्रमण में वृद्धि सबसे खतरनाक स्तर पर है. यहां परीक्षण की सकारात्मक दर (प्रति 100 लोगों के लिए पॉजिटिव मामलों की संख्या) 15 प्रतिशत (18 जून) है जबकि राष्ट्रीय औसत 5.8 प्रतिशत. 14 मई को दिल्ली में होने वाली पांच जांच में से जहां एक मामले में संक्रमण की पुष्टि होती थी, वहीं अब 13 जून को केवल 2.7 जांच में एक संक्रमण की पुष्टि हो रही थी जो कि संक्रमण के तीव्र गति से फैलने का संकेत है. हमारी राष्ट्रीय मृत्यु दर लगभग 3 प्रतिशत के आसपास ही है.

17 जून तक कोरोना से हुई 11,903 मौतों में से 83 प्रतिशत मौतें उपरोक्त पांच राज्यों से थीं. हालांकि मृत्यु दर की भविष्यवाणी नहीं की जा सकती पर पिछले सप्ताह इसमें उल्लेखनीय रूप से तेजी आई है—10 से 17 जून के बीच 2,500 मौतें दर्ज की गईं जबकि पहली 5,000 मौतों में 80 दिन और अगली 5,000 मौतों में 17 दिन का समय लगा था.

बढ़ती संख्या की चुनौती के साथ-साथ 1 जुलाई से शुरू होने वाले अनलॉक 2.0 के लिए रणनीति तैयार करने के वास्ते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 14 जून को 14 राज्यों के मुख्यमंत्रियों और जम्मू-कश्मीर के उप-राज्यपाल के साथ एक वीडियो-लिंक मीटिंग की अध्यक्षता की. मीटिंग में सबसे खराब स्थिति वाले पांच राज्य भी शामिल हुए. प्रधानमंत्री ने इन राज्यों पर जांच के अपने बुनियादी ढांचे का तत्काल उपयोग करने के लिए दबाव डाला और कोविड संक्रमण रोकने के लिए सबसे महत्वपूर्ण रणनीति के रूप में त्वरित निदान और संपर्कों की पहचान पर ध्यान केंद्रित करने को कहा.

उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि देश में नया लॉकडाउन नहीं होगा. मोदी ने कहा, ‘‘अनलॉक, अनलॉक और अनलॉक ही आगे का रास्ता है.’’ उनका संदेश स्पष्ट था कि कोविड के खिलाफ यहां से आगे की लड़ाई लॉकडाउन की बजाए अब सार्वजनिक जागरूकता बढ़ाकर, बुनियादी स्वास्थ्य ढांचे के विस्तार को प्राथमिकता देकर और सबसे महत्वपूर्ण रूप से परीक्षण, संपर्क पहचान और उपचार पर जोर देकर लड़ी जाएगी.

जांच की बड़ी जरूरत

भारत में कुल 901 कोविड जांच प्रयोगशालाएं हैं और रोज करीब 1,50,000 नमूनों की जांच हो रही है, जिसे जून के अंत तक दोगुना किया जाना है. हालांकि, सभी राज्यों में जांच की दर एक समान नहीं है. मई के अंत से जून की शुरुआत तक के आंकड़ों का विश्लेषण, पांच सबसे बुरी तरह प्रभावित राज्यों की परीक्षण संख्या में गिरावट और संक्रमण की कुल सकारात्मकता दर में वृद्धि को दर्शाता है (देखें: आगे विकट लड़ाई है). दिल्ली में 3 जून (6,543 जांच) और 9 जून (5,353 जांच) के बीच जांच में गिरावट देखी गई, जबकि इस दौरान शहर में मामलों में 41 प्रतिशत की वृद्धि हुई.

देश के हर तीन संक्रमित मामलों में से एक महाराष्ट्र में है. वहां दैनिक जांच में 29 मई और 9 जून के बीच 7 प्रतिशत की गिरावट आई. गुजरात और पश्चिम बंगाल ने कुल दैनिक जांच में नाममात्र परिवर्तन किया जबकि तमिलनाडु ने अपनी जांच संख्या में मामूली वृद्धि की. इससे सार्वजनिक स्वास्थ्य अधिकारियों को चिंता हुई है, क्योंकि जांच ही एकमात्र तरीका है जिससे संक्रमित लोगों को अलग किया जा सकता है.

इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आइएमए) के पूर्व प्रमुख डॉ. के.के. अग्रवाल कहते हैं, ‘‘राज्य इससे डर रहे हैं कि अगर वे जांच की संक्चया बढ़ाते हैं तो संक्रमण के मामले अधिक हो जाएंगे. वे उपलब्ध संसाधनों में पूलिंग पर काम ही नहीं कर रहे.’’ वे कहते हैं कि पूरी आबादी की जांच की जरूरत नहीं है लेकिन भारत ने अभी भी अपने 5 प्रतिशत लोगों को कवर नहीं किया है. जहां तक प्रति दस लाख लोगों पर जांच का प्रश्न है, भारत अभी प्रति दस लाख लोगों पर 3,800 जांच कर रहा है जबकि पाकिस्तान 3,600 अमेरिका 73,000 और ब्राजील 50,000 जांच कर रहा है.

पश्चिम बंगाल जहां 60,000 जांच नमूनों का एक बैकलॉग है, राज्य सरकार का कहना है कि 36 आरटी-पीसीआर (रिवर्स ट्रांसक्रिप्शन पॉलीमरेज चेन रिएक्शन) मशीनें होने के बावजूद, जांच क्षमता और प्रयोगशालाओं में स्टाफ की कमी की गंभीर समस्या है. प्रत्येक मशीन अपनी खासियत के मुताबिक एक दिन में 54 से लेकर 500 जांच कर सकती है.

कुछ राज्यों ने राह दिखाई है. किंग जॉर्ज मेडिकल कॉलेज, लखनऊ में माइक्रोबायोलॉजी की प्रमुख डॉ. अंजलि जैन कहती हैं, ''अगर पूलिंग (एक साथ कई नमूनों की जांच) करके जांच की जाए तो आरटी-पीसीआर मशीनों की क्षमता पांच गुना तक बढ़ जाती है. उत्तर प्रदेश देश में पूलिंग जांच करने वाले पहले राज्यों में से एक था और अप्रैल में यहां रोजाना 3,000 जांच होती थीं जो जून में बढ़कर 15,000 हो गईं.

आइसीएमआर ने एक नमूने में डीएनए परिवर्धित (एंप्लीफाइ) करने के लिए ट्रूनेट मशीनों (टीबी जांच के लिए प्रयुक्त) और कोबस 8,800 मशीनों (एचआइवी जांच के लिए प्रयुक्त) के उपयोग की भी अनुमति दी है, जो मानक आरटी-पीसीआर में नए कोरोना वायरस की उपस्थिति का पता लगाने में मदद करता है. ट्रूनेट मशीनें सस्ती हैं और अधिक व्यापक रूप से उपलब्ध हैं जबकि कोबास से 4,000 जांच हो सकती है. प्रयोगशालाओं में स्टाफ की कमी दूर करने के लिए राजस्थान और केरल जैसे राज्यों ने अंतिम वर्ष के छात्रों और प्रशिक्षित फील्ड वर्कर्स को इस काम में मदद की अनुमति दी है.

चिंता उन राज्यों को लेकर है जो जांच का बुनियादी ढांचा होने के बावजूद केवल लक्षण की निगरानी पर ध्यान केंद्रित कर रहे हैं. यह रणनीति जो मार्च में हवाई अड्डों पर अंतरराष्ट्रीय यात्रियों की जांच के लिए अपनाई गई थी और अप्रभावी साबित हुई. बिहार रोजाना केवल 500-600 आरटी-पीसीआर परीक्षण कर रहा है, लेकिन फ्लू जैसे लक्षणों के लिए 10 करोड़ से अधिक लोगों की जांच की गई है. तेलंगाना, जो रोज औसतन 250 आरटी-पीसीआर जांच कर रहा है, वह कोविड मरीजों के घरों के आसपास बुखार के लक्षणों का परीक्षण करने की योजना बना रहा है.

वायरोलॉजिस्ट डॉ. टी. जैकब जॉन कहते हैं, ''कोविड संक्रमण के लक्षण पांच दिनों या एक हफ्ते बाद उभर सकते हैं. केवल फ्लू के लक्षणों की जांच तक सीमित रहने से कोविड का सटीक आकलन नहीं हो सकता. इस बीमारी को रोकने के लिए कॉन्टैक्ट ट्रेसिंग या त्वरित जांच पर ध्यान देने की जरूरत है.’’ पश्चिम बंगाल, दिल्ली, गुजरात और महाराष्ट्र में कम जांच के कालखंड के कारण संक्रमण में साथ-साथ या बाद में वृद्धि देखी गई है.

आशा है कि रैपिड ऐंटीजन परीक्षणों की शुरुआत से सभी राज्यों में जांच में सुधार होगा. इस जांच में नेजल स्वैब से प्रोटीन या ऐंटीजन का पता लगाते हैं जो कोविड वायरस का हिस्सा हैं. रैपिड ऐंटीजन और रैपिड सीरोलॉजी जांच के बीच महत्वपूर्ण अंतर यह है कि रैपिड सीरोलॉजी जांच, रक्त के नमूने में किसी भी संक्रमण का मुकाबला करने के लिए बने मौजूद ऐंटीबॉडी का पता लगाता है, जबकि रैपिड ऐंटीजन जांच, रक्त में मौजूद एक ऐसे पदार्थ की तलाश करते हैं जो केवल कोविड वायरस से आते हैं.

आरटी-पीसीआर, जिसे सबसे अच्छी जांच माना जाता है, के उलट रैपिड ऐंटीजन जांच 30 मिनट से कम समय में परिणाम दे सकते हैं. आइसीएमआर से मंजूर इस टेस्ट किट की आपूर्ति दक्षिण कोरियाई फर्म एसडी बायोसेंसर की हरियाणा की फैक्ट्री से होती है. इसमें ट्रू नेगेटिव पता लगाने की वास्तविक क्षमता 99.3 और 100 प्रतिशत के बीच है—यह आंकड़ा जितना अधिक हो, जांच उतनी ही विश्वसनीय होगी.

बिना लक्षण वालों का पता लगाना

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) का अनुमान है कि लक्षणविहीन लोगों से दूसरों के संक्रमित होने का औसत 40 प्रतिशत तक हो सकता है. दिल्ली में आइएमए के अध्यक्ष डॉ. गिरीश त्यागी कहते हैं, ''जब किसी व्यक्ति का टेस्ट पॉजिटिव आता है तो हमारा ध्यान उसके परिवार के अन्य लोगों पर चला जाता है. उनका टेस्ट जरूर किया जाना चाहिए. लेकिन हम उन दूसरे लोगों की अनदेखी नहीं कर सकते हैं जो उस व्यक्ति के संपर्क में आए होंगे. अगर उनमें संक्रमण के लक्षण दिखते हैं तो वे खुद ही टेस्ट के लिए आएंगे लेकिन उनमें अगर संक्रमण के लक्षण नहीं हैं तो उन्हें पता ही नहीं चलेगा जबकि वे संक्रमित हो चुके होते हैं.

हालांकि आइसीएमआर की नीति केवल उन लक्षणविहीन लोगों का टेस्ट कराने की अनुमति देती है जो ज्यादा खतरे में हैं या जो संक्रमित व्यक्तियों के सीधे संपर्क में आए हैं लेकिन कौन ज्यादा खतरे में है, इस बारे में राज्यों की अपनी अलग-अलग नीतियां हैं. दिल्ली ने जून के शुरू में सभी लक्षणविहीन लोगों (उनको छोड़कर जिन्हें पहले से कोई बीमारी है) का टेस्ट नहीं कराने का फैसला किया था लेकिन 10 दिन में इसे वापस ले लिया. पश्चिम बंगाल में आइएमए के प्रमुख डॉ. उज्ज्वल कुमार सेनगुप्ता बताते हैं कि लक्षणविहीन संपर्कों का पता लगाने का काम लगभग ठप हो गया है.

वे कहते हैं, ''अप्रैल और मई में पॉजिटिव मामलों के संपर्कों का पता लगाने की एक प्रणाली थी. दफ्तरों और आवासीय भवनों में कोविड के मामले के सभी लोगों का टेस्ट किया जा रहा था और उन्हें एकांतवास में रखा जा रहा था पर अब यह नहीं हो रहा है.’’ महाराष्ट्र में सरकार अब अपनी पहल पर जोर दे रही है जिसमें किसी पॉजिटिव मरीज के निकट संपर्क में आने वाले 15 लोगों को अलग रखा जाएगा.

एक हफ्ते पहले मुंबई के प्रतीक्षा नगर में एक पॉजिटिव मरीज को अस्पताल में भर्ती कराया गया था जबकि उसके सत्तर वर्ष से अधिक उम्र वाले माता-पिता, पत्नी और बच्चों का टेस्ट भी नहीं कराया गया. स्वास्थ्य सेवा पर महाराष्ट्र सरकार की समिति के सदस्य डॉ. अनंग बांग मानते हैं, ‘‘लचर योजना, संसाधनों का गलत इस्तेमाल और संक्रमण की बढ़ती संख्या टेस्ट न कराए जाने या पूरी रिपोर्ट न दिए जाने का ही नतीजा है. कोई भी सरकार संक्रमण की ज्यादा संख्या नहीं दिखाना चाहती.’’

लक्षणविहीन लोगों का पता लगाने के मामले में सबसे अच्छा उदाहरण राजस्थान और केरल हैं. यहां आरोग्य सेतु ऐप के जरिए मोबाइल फोन और लोकेशन के रिकॉर्ड का इस्तेमाल कोविड के मरीज के संपर्क में आने वाले लोगों का पता लगाने के लिए किया जाता है. केरल स्वास्थ्य विभाग के नोडल अधिकारी डॉ. अमर फेटले कहते हैं, ''हमने संक्रमितों का सही पता लगाने के लिए टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया. अगर आप तेजी से संक्रमितों को बाकी लोगों से अलग कर सकें तो वायरस फैलाव काफी कम किया जा सकता है.’’

जन स्वास्थ्य के विशेषज्ञ अपने राज्यों को सलाह दे रहे हैं कि संक्रमण की संख्या को कम करने की जगह अब मौत की संख्या को नियंत्रित करना उनकी पहली प्राथमिकता होनी चाहिए. डॉ. जॉन कहते हैं, ‘‘आप वायरल संक्रमण को पूरी तरह खत्म नहीं कर सकते लेकिन आप उसके कारण लोगों को मरने से बचा सकते हैं.’’

केंद्रीय स्वास्थ्य और परिवार कल्याण मंत्रालय के मुताबिक, 9 जून तक देश में कोविड के 958 अस्पताल, 32,362 आइसीयू बेड और 1,20,104 ऑक्सीजनयुक्त बेड थे. कोविड के बिस्तरों के लिए करीब 21,494 वेंटिलेटर उपलब्ध थे.

इसके अलावा 60,848 वेंटिलेटरों का अतिरिक्त ऑर्डर भी दिया जा चुका है. इसके बावजूद, मुंबई में बिस्तरों की कमी हो रही है. बंगाल के अस्पतालों में बिस्तरों की मांग इतनी ज्यादा है कि मरीजों में लक्षण कम हो जाने पर ही उन्हें छुट्टी दे दी जा रही है. उनमें टेस्ट के नेगेटिव होने का भी इंतजार नहीं किया जा रहा. और अभी एक हफ्ता पहले दिल्ली में भी बिस्तरों की भारी कमी हो गई थी. खबरों के मुताबिक, अस्पताल मरीजों को भर्ती करने से मना कर रहे थे क्योंकि उनमें जगह ही नहीं रह गई थी. पड़ोसी राज्य राजस्थान, जहां 17,000 ऑक्सीजन युक्त बेड और 1,300 आइसीयू हैं, के विपरीत राष्ट्रीय राजधानी के पास 10,816 बेड से ज्यादा नहीं हैं (जिनमें से 5,770 बेड 18 जून तक भरे हुए थे).

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