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वायरस की अबूझ पहेली

कोविड केवल वायरल न्यूमोनिया भर नहीं है, यह शरीर की रोग प्रतिरोधक शक्ति को प्रभावित कर रहा है और जो लोग पहले से ही दूसरी बीमारियों से ग्रसित हैं उनके जीवन को सर्वाधिक जोखिम में ला देता है.

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aajtak.in
सोनाली आचार्जीनई दिल्ली, 11 May 2020
वायरस की अबूझ पहेली दिल्ली के एलएनजेपी अस्पताल में बचाव के परिधान पहनकर तैनात एक नर्सिंग स्टाफ

सोनाली आचार्जी

ओम प्रकाश गुप्ता को 22 अप्रैल को खांसी के साथ बुखार की शिकायत हुई. उनके जांच नतीजों में कुछ गड़बडिय़ां हो गई थीं. फिर 27 अप्रैल को उनके पास फोन आया जिसमें उन्हें बताया गया था कि कोरोना की जांच में वे संक्रमित पाए गए हैं और अगली सुबह एंबुलेंस आएगी जो उन्हें कोलकाता के राजकीय एमआर बांगुर अस्पताल ले जाएगी. तब तक वे घर पर रहे, आराम से चल-फिर रहे थे, बातें कर रहे थे और उन्हें सांस लेने में कोई कठिनाई भी नहीं थी. 28 अप्रैल को एंबुलेंस उन्हें लेने आई और अस्पताल में भर्ती भी कराया गया लेकिन उसी शाम 68 वर्षीय गप्ता की मौत हो गई. उनके बेटे राज गुप्ता सभी से यह पूछते हैं कि एक दिन पहले तक एकदम सामान्य दिख रहा इनसान अचानक कैसे मर सकता है.

दुनियाभर में लोग अब स्वीकारने लगे हैं कि कोविड-19 सिर्फ वायरल न्यूमोनिया नहीं है. यह केवल फेफड़ों को संक्रमित करके मृत्यु का कारण नहीं बनता बल्कि रोग प्रतिरोधक तंत्र को ध्वस्त करके भी संक्रमित व्यक्ति की जान ले लेता है. वायरस और प्रतिरक्षा प्रणाली के बीच भीषण संग्राम के कोई भी लक्षण दिखाई नहीं देते हैं. संक्रमण का स्तर मध्यम से गंभीर स्तर पर अचानक बिना किसी उल्लेखनीय लक्षण के पहुंच सकता है.

जयपुर के एसएमएस अस्पताल में फिलहाल 558 मरीजों को संभाल रहे उसके निदेशक डॉ. सुधीर भंडारी इसे काफी हद तक स्वीकार करते हैं. उनके शब्दों में, ''कोविड को लेकर राय बदल रही है.

यह श्वसन मार्ग में प्रवेश करता है, लेकिन फेफड़ों का संक्रमण मृत्यु का कारण नहीं है.'' वे साइटोकिन स्टॉर्म को संक्रमित व्यक्ति के मौत की बड़ी वजह मानते हैं. वे बताते हैं, ''जब आपका शरीर महसूस करता है कि एक वायरल सेल का प्रवेश हो चुका है जो फेफड़ों की स्वस्थ कोशिकाओं को नुक्सान पहुंचा रहा है तो यह प्रतिरक्षा कोशिकाओं का उत्पादन शुरू कर देता है.

ये कोशिकाएं एक रसायन का उत्पादन करती हैं जिसे साइटोकिन्स कहा जाता है जो बुखार या सूजन के माध्यम से शरीर को ऐसा बनाने की कोशिश करता है कि वायरस वहां टिक न सकें.''

लेकिन कोविड कुछ लोगों के शरीर को बहुत अधिक प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया के लिए प्रेरित करता है, जिससे शरीर में साइटोकिन्स का अतिप्रवाह शुरू हो जाता है. ऐसा क्यों होता है? इसके कारण अभी तक ज्ञात नहीं हैं.

बुखार को तो नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन अतिसक्रिय साइटोकिन्स न केवल संक्रमण को बल्कि अन्य महत्वपूर्ण अंगों में मानव कोशिकाओं को नुक्सान पहुंचाना शुरू कर देता है.

डॉ. भंडारी कहते हैं, ''जिन मरीजों में इंटरल्यूकेन (आइएल-1 और आइएल-6) जैसे प्रो-इन्क्रलेमेटरी साइटोकिन्स बहुत बढ़े हुए हैं उन्हें वेंटिलेटर या ऑक्सीजन सपोर्ट पर रखना पड़ता है.'' इंटरल्यूकेन बुखार, सूजन और कुछ मामलों में आघात या मृत्यु का कारण भी बनता है. गंभीर रोगी के रक्त में प्रोटीन के डी-डिमर और एफडीपी (फाइब्रिनोजेन डिग्रेडेशन प्रोडक्ट) के स्तर में वृद्धि हो जाती है, जिससे थ्रोंबोसिस हो सकता है.

थ्रोंबोसिस में शरीर रक्त के थक्कों को घुलाने में असमर्थ हो जाता है. थक्के घातक होते हैं, जब वे फेफड़े, हृदय, गुर्दे (किडनी) या यकृत (लिवर) में पहुंचते हैं. भारत में कोविड से मरे 50 रोगियों के शव परीक्षण में से अनेक के फेफड़ों में छोटे-छोटे रक्त के थक्के पाए गए. डॉ. भंडारी कहते हैं, ''मरीज बुखार या खांसी से नहीं मरते, वे पल्मोनरी थ्रोंबोसिस और ऊतकों में सूजन के चलते अंगों के निष्क्रिय होने से मर रहे हैं. यह साइटोकिन स्टॉर्म के रसायनों और उससे हुए बदलावों के कारण हो रहा है.''

खतरे की जद में कौन

हल्के, मध्यम और गंभीर लक्षणों वाले लोगों का औसत क्रमश: 80, 15 और 5 प्रतिशत के वैश्विक औसत जैसा ही है (जिनमें से 2 प्रतिशत को आइसीयू में देखभाल की आवश्यकता होती है). साइटोकिन स्टॉर्म के कारण सबसे ज्यादा खतरा उन लोगों को होता है जिनकी प्रतिरक्षा प्रणाली कमजोर है या फिर सेहत खराब है. 30 अप्रैल को स्वास्थ्य मंत्रालय से मिली जानकारियों में भारत में संक्रमण के कारण मृत्यु दर को 3.2 प्रतिशत बताया गया.

मरने वालों में से चौदह प्रतिशत की आयु 45 वर्ष से कम, 34.8 प्रतिशत की 45 और 60 के बीच, 51.2 प्रतिशत की 60 से अधिक, 42 प्रतिशत की 60 और 75 के बीच और 9.2 प्रतिशत की आयु 75 वर्ष से ऊपर है. भारत में हुई मौतों में बड़ी संख्या (78 प्रतिशत) उन लोगों की है जो उच्च रक्तचाप, मधुमेह और यकृत की बीमारियों से पहले से ही ग्रस्त रहे हैं.

29 अप्रैल को कर्नाटक में 73 वर्षीय एक व्यक्ति की मृत्यु हो गई जिन्हें पहले से ही सांस की बीमारी थी; 30 अप्रैल को महाराष्ट्र के नांदेड़ में 64 वर्षीय व्यक्ति की मृत्यु हई जिन्हें पहले से ही कोई बीमारी थी जिसे जाहिर नहीं किया गया; और 3 मई को अंबाला में उच्च रक्तचाप के साथ डायलिसिस वाले 65 वर्षीय रोगी की मृत्यु हो गई.

ऐसे कम ही लोग मरे हैं जो युवा थे और जो पहले से ही किसी घातक बीमारी से ग्रस्त नहीं थे. दिल्ली में 50 से कम उम्र के एकमात्र व्यक्ति की मौत की सूचना है जो पहले से किसी बीमारी से ग्रस्त नहीं था.

मुंबई में 35 साल से कम उम्र के 14 लोगों की मौत हुई है लेकिन क्या वे पहले से किसी बीमारी से ग्रस्त थे, इसके बारे में कोई जानकारी नहीं है. डॉक्टर कम उम्र में मौतों के लिए ज्यादातर खराब जीवनशैली (धूम्रपान, शराब पीने या कम पोषण) या बहुत दुर्लभ मामलों में जींस को जिम्मेदार मानते हैं.

पश्चिम बंगाल की 12 सदस्यीय कोविड स्वास्थ्य समिति के कोलकाता के आंतरिक चिकित्सा विशेषज्ञ डॉ. सुकुमार मुखर्जी कहते हैं, ''मधुमेह और उम्र प्रतिरक्षा प्रतिक्रिया को सीमित कर देते हैं.'' राज्य में 4 मई को मौतों का आंकड़ा 35 था जो 6 मई को बढ़कर 140 पहुंच गया, जिससे पश्चिम बंगाल में मृत्यु दर देश में सर्वाधिक 7.57 प्रतिशत पहुंच गई. मरने वालों में 85 फीसद की उम्र 50-60 वर्ष थी.

डॉ. मुखर्जी कहते हैं, ''कोरोना में मौजूद स्पाइक प्रोटीन बहुत खतरनाक है. यह वायरल कोशिकाओं को अपनी संख्या तेजी से बढ़ाने में मदद करता है. लेकिन पूर्व रोगों से ग्रस्त लोगों की प्रतिरक्षा प्रणाली अलग प्रतिक्रिया दिखाती है, वह यह नहीं निर्धारित कर पाती कि उन कोशिकाओं का उत्पादन कब रोकना है जो सूजन को बढ़ाते हैं.'' हाल ही में एक ऑडिट में पाया गया कि राज्य में कोविड के कारण हुई 39 मौतों में रोगियों में पहले से रोग रहे हैं.

लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि सभी बुजुर्ग लोग या पहले से किसी रोग से ग्रस्त लोग कोविड के कारण गंभीर जोखिम में हैं. महाराष्ट्र में 6 मई को मरने वालों की संक्चया 617 हो गई. यहां के इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आइएमए) के अध्यक्ष डॉ. अविनाश भोंडवे बताते हैं, ''कोविड का तीखा असर बुजुर्गों और पहले से मौजूद बीमारियों वाले लोगों में अधिक देखा गया है. लेकिन इसका दीर्घकालिक स्वास्थ्य के साथ भी संबंध है. पहले से कई बीमारियों से ग्रसित काफी लोग जो कोरोना संक्रमित भी हुए लेकिन वे ठीक होकर घर गए. अगर आपने अपने संपूर्ण स्वास्थ्य को नियत्रंण में रखा है तो आपकी प्रतिरक्षा प्रणाली अत्यधिक प्रतिक्रिया नहीं देगी और स्थिति नियंत्रण में रहेगी.''

गुजरात में, जहां से 6 मई तक 368 लोगों के मरने की खबर मिली थी, वहां रोग की गंभीरता को वायरस के कारण तनाव और निदान के चरण से भी जोड़ा जा रहा है. गुजरात 4.6 प्रतिशत कोविड मृत्यु दर के साथ देश में दूसरे स्थान पर है. गुजरात आइएमए के अध्यक्ष डॉ. चंद्रेश जरदोश कहते हैं, ''हम इसके कारणों का अध्ययन कर रहे हैं, यह वायरस की बढ़ती तीक्ष्णता के कारण हो सकता है. लेकिन प्रारंभिक रिपोर्टों से यह संक्रमण के देर से पता चलने का मामला भी लगता है.''

डर के कारण लोग खुद से इलाज कर रहे हैं. बदकिस्मती से संक्रमण के लक्षण हल्के होने से लगभग हमेशा ही संक्रमण के कारण हो रही आंतरिक क्षति का पता नहीं चलता और रोगियों में कोविड की जांच अक्सर देर से होती है, जैसे कि दिल्ली की 42 वर्षीय नेहा भसीन (बदला हुआ नाम) बुखार और खांसी के बावजूद कोविड जांच कराने के लिए लगभग 10 दिन इंतजार करती रहीं. वे बताती हैं, ''मैं बिल्कुल भी बीमार महसूस नहीं कर रही थी. अचानक एक दिन मुझे सांस लेने में बहुत ज्यादा तकलीफ होने लगी. वे मुझे सीधे वेंटिलेटर पर ले गए. एक हफ्ते बाद मैं ठीक हो पाई.''

पिछले महीने, सीडीसी (सेंटर फॉर ग्लोबल हेल्थ ऐंड प्रिवेंशन) और आइसीएमआर (इंडियन काउंसिल ऑफ मेडिकल रिसर्च) ने कोविड के कुछ और लक्षण बताए हैं जो संक्रमण और उसकी जल्द पहचान के संकेत दे सकते हैं. कोविड का इलाज कर रहे एक प्राइवेट अस्पताल मुंबई के जसलोक अस्पताल में संक्रामक रोग विभाग के प्रमुख डॉ. ओम श्रीवास्तव कहते हैं, ''केवल बुखार या खांसी ही इसके लक्षण नहीं हैं. नसों में सूजन के कारण त्वचा पर हल्के चकत्ते भी दिख सकते हैं. कोविड में ठंड लगना और कंपकंपी होना, साथ ही मांसपेशियों में दर्द या स्वाद या गंध का एहसास न होना भी इसके लक्षण हो सकते हैं.''

मुंबई जिले में 6 मई तक 9,945 मामले और 387 मौतें हुईं जो देश में सबसे अधिक है. वे कहते हैं, ''कोविड जैसे आरएनए वायरस बहुत चालाक होते हैं. बस जब कोई व्यक्ति सोचता है कि वे बेहतर हो रहे हैं या कोई लक्षण नहीं है तो वायरस मानव कोशिकाओं पर अपना हमला करता है. कोविड की आंतरिक प्रगति को समझना महत्वपूर्ण है क्योंकि बाहरी लक्षण बहुत अलग होते हैं. हमें साइटोकिन स्टॉर्म की शुरुआत से पहले के गोल्डन पीरियड में वायरस को पकडऩा होगा. कोविड का सटीक गोल्डन पीरियड किसी को पता नहीं है, लेकिन पांचवें दिन से लेकर दसवें दिन का समय महत्वपूर्ण होता है.''

रणनीति इलाज की

एक मियाद पूरी करने के बाद कोविड अपने आप खत्म हो जाता है. इस प्रकार, कई यूरोपीय देशों में प्रारंभिक चरणों में ऐंटीबायोटिक्स या ऐंटीवायरल नहीं, बल्कि केवल पैरासिटामॉल और आइवी फ्लूइड दिए जाते हैं. भारत में फ्लू के लक्षणों के इलाज के लिए अब तक ऐंटीबायोटिक्स जैसे एजिथ्रोमाइसिन या ऑगमेंटिन दिए जाते रहे हैं.

गंभीर अवस्था में साइटोकिन स्टॉर्म को सीमित करने और वायरस के अपनी संख्या बढ़ाने की क्षमता को सीमित करने के लिए ऐंटी-एचआइवी और मलेरियारोधी दवा दी जा रही हैं. हालांकि, बीमारी के अचानक गंभीर हो जाने के चलते चिकित्सा निदेशक अब रक्त के थक्कों को नियंत्रित करने, सूजन और साइटोकिन प्रतिक्रिया के प्रबंधन के साथ शुरू में ही जांच, ऑक्सीजन और अंगों की निगरानी कर जान बचाने की कोशिश कर रहे हैं.

भोपाल के चिरायु अस्पताल के प्रमुख डॉ. अजय गोयनका कहते हैं, ''मौत की एक बड़ी वजह संक्रमण की देर से सूचना भी रही है. जब तक मरीज डॉक्टरी निगरानी में आते हैं, उससे पहले साइटोकिन हमले शुरू हो चुके होते हैं, और व्यक्ति की सेहत के आधार पर फेफड़ों की क्षति, अंगों में सूजन या रक्त के थक्के को नियंत्रित करने की संभावना कम होने लगती है.'' ऑक्सीजन स्तर में गिरावट और अंगों में नुक्सान दिखना शुरू हो जाता है. वे कहते हैं, ''मरीज के भर्ती होने के छह घंटे के भीतर, हम हृदय, यकृत, गुर्दे, फेफड़े और रक्त की जांच करा लेते हैं. अगर पहले से ही किसी अंग में क्षति के संकेत हैं तो हम तत्काल उपचार शुरू करते हैं.'' फिर एक पल्स ऑक्सीमीटर से ऑक्सीजन की निगरानी होती है.

जयपुर के एसएमएस अस्पताल के डॉ. भंडारी कहते हैं, ''कई बार व्यक्ति में ऑक्सीजन के स्तर की गिरावट तत्काल नहीं पकड़ में आती, इसे साइलेंट हाइपोक्सिया कहा जाता है. यह एक संकेत है कि स्थिति बिगड़ रही है.'' साइटोकिन स्टॉर्म पर आइसीएमआर शोध कर रहा है. लेकिन कोविड उपचार की खोज होने तक लक्षणों की पहचान और निगरानी ही इस लड़ाई में सबसे विश्वसनीय हथियार हैं.

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