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उत्तराखंड: लुटी साख लौटाने की कोशिश में बीजेपी

उत्तराखंड में भद पिटवा चुकी बीजेपी अब चुनाव में हिसाब करने को तैयार, लेकिन अंदरूनी कलह भारी.

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aajtak.in
संतोष कुमारनई दिल्ली, 05 October 2016
उत्तराखंड: लुटी साख लौटाने की कोशिश में बीजेपी राष्ट्रपति राज की मुहिम में नाकामी के बाद बद्रीनाथ की शरण में शाह

राष्ट्रपति शासन के दौरान हरीश रावत यह संदेश देने में सफल हो गए थे कि उनके साथ गलत हुआ है और जनता में भी हमारे बारे में गलत धारणा बनी थी, लेकिन अब स्थिति बदल रही है. '' यह दर्द है मार्च से मई तक उत्तराखंड में चली सियासी उठापटक में रणनीतिकार के तौर पर भूमिका निभाने वाले बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता का. तख्तापलट की कोशिश में पहाड़ों से गिरकर चोटिल बीजेपी का शीर्ष नेतृत्व सहमा हुआ तो है लेकिन उसने उम्मीदों की डोर छोड़ी नहीं है. इसलिए सियासी धोबीपछाड़ में पिछड़ी बीजेपी अब छवि सुधार के साथ-साथ सामाजिक और भौगोलिक समीकरण को ध्यान में रखते हुए रणनीति पर काम कर रही है.

अब चुनावी जंग में कोई चूक न हो, सो पार्टी ने मार्च से मई तक चले 'ऑपरेशन लोटस' के मुखिया रहे राष्ट्रीय महासचिव कैलाश विजयवर्गीय को परे रखते हुए बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह ने दो वरिष्ठ नेताओं केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री जे.पी. नड्डा और केंद्रीय पेट्रोलियम राज्यमंत्री (स्वतंत्र प्रभार) धर्मेंद्र प्रधान को चुनाव प्रभारी बनाया है. प्रधान 2012 के विधानसभा चुनाव में सह प्रभारी रह चुके हैं और राज्य संगठन के नेताओं से वाकिफ हैं तो हिमाचल प्रदेश के नड्डा को पहाड़ की संस्कृति और मिजाज को समझने वाला नेता मानकर शाह ने जिम्मेदारी सौंपी है.

उत्तराखंड विधानसभा चुनावछवि बदलने को फिर वही पैंतरा

बीजेपी ने छवि सुधारने में एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया है. पर उससे ज्यादा पार्टी की कोशिश मुख्यमंत्री हरीश रावत की छवि धूमिल करने की है. यही रणनीति बीजेपी ने राष्ट्रपति शासन से पहले भी अपनाई थी, लेकिन तब बीजेपी औंधे मुंह गिरी और पार्टी के नेता ही दबी जबान कहने लगे थे कि अब चुनाव में भी रावत को हटा पाना मुश्किल होगा. अगले साल जनवरी-फरवरी में संभावित विधानसभा चुनाव के लिए बीजेपी की तैयारियों पर एक नेता की टिप्पणी पार्टी के अंदरूनी खौफ को भी उजागर करती है. वे कहते हैं, ''पार्टी की कोशिश है कि कम से कम दिल्ली-बिहार विधानसभा चुनाव जैसा हश्र न हो, जहां हमारे सामने पार्टी के बजाए एक व्यक्ति केंद्र बना था और हम उसकी छवि को धूमिल करना तो दूर, अपनी साख भी नहीं बचा पाए थे. ''

खैर, बीजेपी ने खास तौर से उन 44 विधानसभा क्षेत्रों में पर्दाफाश यात्रा निकाली जहां उसके विधायक नहीं हैं. इसमें बीजेपी ने उस स्टिंग को खास तौर से दिखाया जिसमें कथित तौर पर रावत अपने कांग्रेस के विधायक से ही वापस लौटने और बदले में मंत्रालय के जरिए कमाने-खाने की छूट देने की बात कर रहे हैं. हालांकि कांग्रेसी खेमे से भी सवाल उठा कि बीजेपी में जाने वाले 10 बागी क्या मुफ्त में गए हैं. बीजेपी के राष्ट्रीय प्रवक्ता अनिल बलूनी आरोप जड़ते हैं, रावत सरकार भ्रष्टाचार में आकंठ डूबी है और रावत ऐसे नेता हैं जिन्होंने अलग उत्तराखंड के आंदोलन का विरोध किया था. बलूनी का तंज है, ''सरकार बचाने के लिए रावत ने विधायकों की खरीद-फरोख्त की थी. अब उसकी भरपाई के लिए हरदा (हरीश रावत) कर, रंजीत (रिश्तेदार) कर, हरीश धामी (विश्वस्त) कर, रेणुका (पत्नी) कर, आनंद (बेटा) कर जनता को हर छोटे-मोटे कामों की एवज में देना पड़ रहा है. बेहतर होगा केंद्र के बनाए जीएसटी की तरह रावत भी सभी को मिलाकर कुटुंब कर शुरू कर दें. ''

इस यात्रा के बाद पार्टी ने कांग्रेस मुक्त उत्तराखंड अभियान शुरू किया है, जिसमें जिला स्तर पर कांग्रेसियों को बीजेपी में शामिल कराने की मुहिम छेड़ी गई है. 12 सितंबर को श्रीनगर में करीब डेढ़ सौ कांग्रेसियों को पार्टी में शामिल कराया गया. यह अभियान चुनाव तक जारी रखने की रणनीति है. राज्य के पांचों लोकसभा क्षेत्र में सैनिक सम्मेलन करने की भी योजना है. इस कड़ी में 1 अक्तूबर को पीठसैण में वीर चंद्र सिंह गढ़वाली की पुण्य तिथि पर कार्यक्रम है, जिसमें रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर शामिल होंगे. बीजेपी कोर ग्रुप के सदस्य धन सिंह रावत कहते हैं, ''आजादी के बाद पहली बार कोई रक्षा मंत्री इस क्षेत्र में आएगा. '' युवा मोर्चे की ओर से सितंबर के आखिर तक 'घेरा डालो, डेरा डालो' अभियान और महिला मोर्चे की ओर से 'हिसाब दो, जवाब दो' कार्यक्रम चल रहे हैं. पार्टी ने गांव चलो अभियान के तहत मोदी सरकार की उपलब्धि, बूथ संपर्क और रावत सरकार की नाकामी को भुनाने का खाका बनाया है.

उत्तराखंड बीजेपीः एक अनार दस बीमारसामाजिक-क्षेत्रीय समीकरण पर जोर
उत्तराखंड में 50 फीसदी से ज्यादा की आबादी वाले राजपूत समाज की यहां के समीकरण में अहम भूमिका है. तभी बीजेपी ने अपनी सरकार बनाने की कोशिश शुरू करने पर पूर्व मुख्यमंत्री भगत सिंह कोश्यारी पर दांव खेलने की रणनीति बनाई थी. रावत की तरह कोश्यारी भी कुमाऊं क्षेत्र से और सहज-सरल नेता माने जाते हैं. 70 सदस्यीय विधानसभा में कुमाऊं क्षेत्र की 29 और गढ़वाल की 41 सीटें हैं. बीजेपी के अंदरूनी सर्वे में कुमाऊं में स्थिति कमजोर दिख रही है क्योंकि मुख्यमंत्री रावत उसी क्षेत्र से आते हैं और कांग्रेस से बगावत करने वाले 10 विधायकों में से 8 गढ़वाल क्षेत्र से थे. सूत्रों की मानें तो बीजेपी का फोकस गढ़वाल क्षेत्र पर ज्यादा रहेगा इसलिए पार्टी ने इन सभी 10 बागियों को चुनाव में टिकट देने का मन भी बना लिया है. सरकार बनने की स्थिति में पूर्व कांग्रेसी मुख्यमंत्री विजय बहुगुणा को भविष्य में राज्यसभा भेजा जा सकता है. उनके छोटे बेटे सौरभ बहुगुणा को उनकी विधानसभा सीट सितारगंज से उम्मीदवार बनाया जाना तय-सा है. एक वरिष्ठ नेता कहते हैं कि बागियों को टिकट दिया गया तो उन इलाकों में पार्टी को भितरघात का सामना करना पड़ेगा क्योंकि पहले से तैयारी कर रहे कार्यकर्ताओं में निराशा होगी. बीजेपी के रणनीतिकारों का कहना है कि दलित और मुस्लिम मतदाताओं में नकारात्मक छवि से ही उसका चुनावी समीकरण बिगड़ता है. इसलिए इस बार पार्टी ने सभी 70 विधानसभा क्षेत्रों में एससी सम्मेलन करने की रणनीति बनाई है. बीजेपी ने ब्राह्मण, राजपूत, वैश्य के साथ दलित मतदाताओं का सामाजिक गुलदस्ता बनाने की दिशा में कदम बढ़ा दिया है.

उत्तराखंड में बीजेपी की तैयारियों पर श्याम जाजू का इंटरव्यूकम नहीं अंदरूनी कलह
कांग्रेस के 10 बागियों के आने के बाद बीजेपी में ही चार पूर्व मुख्यमंत्री हो गए हैं और उन्हें मिलाकर मुख्यमंत्री पद के लिए कम से कम 10 दावेदार पैदा हो गए हैं. बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''उत्तराखंड में हमारी पिछली बार की हार की वजह भी अंदरूनी गुटबाजी थी. यह जारी रही तो जीतना असंभव हो जाएगा. '' 73 वर्षीय कोश्यारी को नरेंद्र मोदी कैबिनेट में शामिल किए जाने की उम्मीद थी पर रणनीतिक लिहाज से दलित सांसद अजय टम्टा को जगह दे दी गई. दबाव बनाने के लिए आखिरी दांव के तौर पर कोश्यारी ने 2019 में राजनीति से संन्यास का ऐलान कर दिया है. पहले भी सतपाल महाराज उनका खुला विरोध कर चुके हैं. कोश्यारी का मानना है कि केंद्रीय संगठन महासचिव रामलाल, संयुक्त संगठन महासचिव शिव प्रकाश और राज्य बीजेपी के संगठन मंत्री संजय कुमार शीर्ष नेतृत्व को जनता की नब्ज के बारे में सही फीडबैक नहीं दे रहे.

पूर्व मुख्यमंत्री 81 वर्षीय बी.सी.खंडूड़ी की भी शिकायत रही है कि सरकार में इस्तेमाल नहीं किया जाना था तो 75 की उम्र पार करने वालों को लोकसभा टिकट ही क्यों दिया गया. और रमेश पोखरियाल निशंक ने तो, सूत्रों के मुताबिक, अगस्त में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मिलकर एक रिपोर्ट सौंपी थी जिसमें उत्तराखंड का सर्वाधिक विकास उनके मुख्यमंत्रित्व काल में होने का दावा था. हालांकि बीजेपी के अंदरूनी सर्वेक्षणों में अब भी खंडूड़ी पहली तो कोश्यारी दूसरी पसंद के तौर पर उभरे हैं. पार्टी खंडूड़ी-कोश्यारी को साझा चुनाव की कमान सौंपने की मन बना रही है, पर मुक्चयमंत्री का चेहरा प्रोजेक्ट नहीं करेगी.

बीजेपी आलाकमान इन नेताओं को एकसूत्र में बांधे रखने के जतन कर रहा है लेकिन वह चौकन्ना भी है कि राज्य के शीर्ष नेताओं की तनातनी में सत्ता फिर कहीं हाथ से निकल न जाए.

(—साथ में अखिलेश पांडे, देहरादून में)

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