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कैसे बचे अजेय छवि

कांग्रेस के हाथों तीन राज्य गंवाने के बाद सहयोगियों के सख्त तेवर से भाजपा आला नेतृत्व की अजेय छवि पर आम चुनावों से पहले उभरे संदेह, पार्टी नई रणनीति बनाने में जुटी

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सुजीत ठाकुरनई दिल्ली, 02 January 2019
कैसे बचे अजेय छवि गेट्टी इमेजेज

हाल में पांच राज्यों के चुनावी के नतीजों पर तो भाजपा केंद्रीय नेतृत्व की लंबी चुप्पी तो नहीं टूटी, मगर पार्टी के कुछ हलकों और एनडीए के सहयोगियों की आवाजें पहली दफा बुलंद होने लगीं. ये आवाजें ऐसे उठीं कि फौरन हरकत में आने को मजबूर होना पड़ा. लेकिन अहम सवाल यह है कि क्या प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह अपनी अजेय छवि को मिल रही चुनौती की कोई काट ढूंढने में कामयाब हो जाएंगे और पार्टी को आम चुनावों में राह आसान करने का दिलासा दिला पाएंगे. हालांकि भाजपा कार्यकर्ता 8 सितंबर को भी भाजपा अध्यक्ष के उस फीडबैक और बयान को ही अंतिम सत्य मानकर आशंकाओं के बावजूद भरोसे से लबरेज थे. शाह ने 8 सितंबर को दिल्ली स्थित आंबेडकर इंटरनेशनल सेंटर के भाजपा राष्ट्रीय कार्यकारिणी में कहा था, "छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, राजस्थान, मिजोरम और तेलंगाना में हमारी स्थिति पहले से अधिक मजबूत हुई है. इन पांचों राज्यों में भाजपा विजय की ओर अग्रसर है.''

लेकिन 11 दिसंबर की सुबह नतीजों के रुझान आने शुरू हुए तो कार्यकर्ताओं की आशंका सच में बदलने लगी और रात होते-होते साफ हो गया कि भाजपा के हाथों से तीन राज्य छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान निकल गए. तेलंगाना में पार्टी पिछली बार से बुरी दशा को प्राप्त हो गई और मिजोरम में भी भाजपा अपना कोई प्रभाव नहीं छोड़ सकी. हार का झटका भाजपा नेतृत्व को इतनी जोर से लगा कि राष्ट्रीय अध्यक्ष समेत कोई भी पदाधिकारी या बड़ा नेता मीडिया से मुखातिब नहीं हुआ, जबकि छोटी से बड़ी जीत पर पूरे तामझाम के साथ भाजपा नेतृत्व मीडिया से मुखातिब होता रहा है. यही नहीं, 5 दिसंबर को चुनाव प्रचार खत्म होने पर भारी गहमागहमी से भरे दिल्ली के भाजपा मुख्यालय में 11 दिसंबर को सन्नाटा पसरा हुआ था.

 भाजपा अध्यक्ष अमित शाह 14 दिसंबर को मीडिया के सामने तब नमूदार हुए जब सुप्रीम कोर्ट ने राफेल पर केंद्र सरकार को क्लीन चिट दी. लेकिन उस दिन भी शाह ने पांच राज्यों के चुनाव नतीजों पर कोई सवाल नहीं लिया और जाते-जाते सिर्फ इतना बोल गए कि दो-तीन दिनों में इस मुद्दे पर बात करने के लिए वे आएंगे, लेकिन आए नहीं. जीत का जश्न मनाने में देर न करने वाले शाह, हार में नमूदार होने की उदारता नहीं दिखा पाए. कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रमुख रणदीप सिंह सुरजेवाला कहते हैं, "भाजपा नेतृत्व सदमे में है. हार को स्वीकार न करना अहंकार की पराकाष्ठा है. हार की स्थिति में पार्टी का राष्ट्रीय अध्यक्ष कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाने के लिए सामने न आए, यह कार्यकर्ताओं का भी अपमान है. कांग्रेस कई चुनाव हारी है लेकिन हार हो या जीत, कांग्रेस अध्यक्ष हमेशा सामने आकर नतीजों को स्वीकार करते हैं. इस बार भी तेलंगाना और मिजोरम की हार स्वीकार की और तीन राज्यों की जीत पर विनम्रता के साथ पेश आए.''

भाजपा शीर्ष नेतृत्व की यह चुप्पी अनायास नहीं है. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, "इन पांचों राज्यों के चुनाव नतीजों में हार या जीत एक पहलू है. चुनाव हारना चिंता की खास वजह नहीं है. बड़ी वजह यह है कि जिन मुद्दों और ताकतों को समेट कर चुनाव लड़ा गया, वह अब अजेय नहीं रहा. जिस समय (2019 लोकसभा चुनाव से ठीक पहले) नतीजे आए, वह अनुकूल नहीं है. जिस जगह हारे (छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश और राजस्थान) और जिनसे हारे उसने 2019 के लिए जमा हुई भाजपा की सियासी पूंजी को न सिर्फ बिखेर दिया बल्कि कुछ को तो तहस-नहस तक कर दिया है. कम से कम अजेय भाजपा या कांग्रेस-मुक्त भारत का नैरेटिव तो नतीजों ने 2019 के लिए बदल ही दिया है.''

मोदी की लोकप्रियता सहेजने की चुनौती

हाल के पांच राज्यों के पहले फिजा बदलने के संकेत गुजरात और कर्नाटक के चुनाव ही दे गए थे. हालांकि उसके पहले 2014 के लोकसभा चुनाव के बाद जितने भी राज्यों में चुनाव हुए उनमें बिहार और दिल्ली के अलावा भाजपा ने कमोबेश सब में जीत हासिल की. गोवा के चुनाव में भाजपा कांग्रेस के मुकाबले दूसरे नंबर पर रही. इसके बावजूद अमित शाह अपनी रणनीतिक मजबूती और चतुराई से वहां पार्टी की सरकार बनाने में सफल रहे. बकौल अमित शाह, "भाजपा की सबसे बड़ी ताकत प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी हैं.'' शाह यह बात हर चुनावी जीत के बाद कहते आए हैं. आज भी विभिन्न एजेंसियों के सर्वेक्षणों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता सबसे ऊपर है. मोदी की विश्वसनीयता, लोकप्रियता, वाकपटुता और मजबूत नेता की छवि भाजपा की चुनावी जीत की नींव रही है. लेकिन पांच राज्यों के हालिया चुनावी नतीजों ने साबित कर दिया है कि मोदी की लोकप्रियता को भले किसी विपक्षी नेता से चुनौती न हो लेकिन मुद्दे ही उससे टकरा रहे रहे हैं.

यानी मोदी को राजनैतिक मुद्दे चुनौती पेश करने लगे हैं. राष्ट्रीय जनता दल के प्रवक्ता तथा राज्यसभा सांसद मनोज झा कहते हैं, "भाजपा इस मुगालते में है कि विपक्ष के सामने नरेंद्र मोदी से मुकाबला करने वाला नेता नहीं है. दरअसल भाजपा की कथनी और करनी में जो अंतर लोगों ने देखा और जीया है, उससे बने मुद्दों ने मोदी की लोकप्रियता को चुनौती दे दी है. प्रधानमंत्री का आभा मंडल पहले जैसा रहता तो राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भाजपा हारती नहीं.'' कांग्रेस नेता मनीष तिवारी कहते हैं, "चुनाव से पहले भाजपा कहती थी कि कांग्रेस के पास नेता कौन है. भाजपा दावा करती थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे सिंधिया, रमन सिंह की लोकप्रियता के सामने कांग्रेस के पास कौन है. नतीजों ने बता दिया कि मोदी सहित इन नेताओं की लोकप्रियता अब विपक्ष में बैठने की है.''

भाजपा के नेता हालांकि हालिया चुनावी हार पर कुछ भी बोलने से इनकार करते हैं लेकिन कहते पाए जाते हैं, "2019 का चुनाव मोदी की ताकत पर ही पार्टी लड़ेगी. जब चुनाव "मोदी बनाम कौन'' का होगा तो फिर मोदी के सामने दूसरा कोई टिकने वाला नहीं है. मोदी की लोकप्रियता से 2019 की जीत पक्की है.'' फिर भी, भाजपा के लिए राह आसान नहीं लगती है. न तो विपक्षी दल इस चुनाव को मोदी बनाम कौन की तरफ ले जाने को तैयार है, न ही मोदी 2014 की तरह वादे करने की स्थिति में हैं. 2019 में उन्हें अपने काम को लेकर वोट मांगना है क्योंकि 2014 में उनके सामने तो केंद्र में यूपीए-2 सरकार थी जबकि इस बार मोदी की भूमिका सवाल पूछने वाले की जगह जवाब देने वाले की होगी. सुरजेवाला कहते हैं, "2014 के लोकसभा चुनाव के बाद जितने विधानसभा चुनाव हुए हैं, उनमें भाजपा को जीत उन्हीं राज्यों में मिली जहां वह सवाल पूछने की स्थिति में थी, यानी सत्ता में दूसरी पार्टी थी. लेकिन राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में उसे जवाब देना था तो भाजपा की सत्ता खिसक गई. यहां तक कि पश्चिम बंगाल, केरल या हाल के तेलंगाना विधानसभा चुनाव में भी भाजपा का क्या हाल रहा, यह किसी से छिपा नहीं है. मोदी की लोकप्रियता इतनी ही है तो भाजपा को वहां भी सफलता मिलती.''

सहयोगियों को साधना

पिछले लोकसभा चुनाव में भाजपा ने अपने दम पर 282 सीट हासिल जरूर की थी लेकिन इसमें सहयोगी दलों की भूमिका भी अहम रही थी. महाराष्ट्र, बिहार, आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु, उत्तर प्रदेश और पंजाब जैसे राज्यों में भाजपा को सहयोगी दलों के साथ होने का फायदा राष्ट्रीय स्तर पर मिला. लेकिन भाजपा की यह पूंजी समय के साथ खिसकने लगी. 2018 में तेलुगु देशम पार्टी न सिर्फ एनडीए से अलग हुआ बल्कि टीडीपी प्रमुख और आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री चंद्रबाबू नायडू आज मोदी और भाजपा के खिलाफ एकजुट विपक्ष के प्रणेता की भूमिका में हैं. हालांकि चंद्रबाबू नायडू की कमी को पाटने के लिए भाजपा ने बिहार में नीतीश कुमार को साध कर काफी हद तक डैमेज कंट्रोल किया लेकिन एनडीए के बिहार से सहयोगी उपेंद्र कुशवाहा की पार्टी आरएलएसपी को भाजपा अपने पाले में नहीं रख पाई. राम विलास पासवान अभी भी एनडीए में हैं लेकिन उन्होंने भाजपा की सहयोगियों को बचाने की मजबूरी को भांपा और अपने लिए अधिक सीटें हासिल कर लीं.

जब तक कुशवाहा साथ थे, भाजपा पासवान के दबाव में नहीं थी. बिहार की कुल 40 सीटों में से भाजपा और जद (यू) ने 17-17 सीटों पर लडऩे का फैसला किया था. शेष 6 सीटों में 4 पासवान और 2 कुशवाहा को देने का फैसला हुआ था. लेकिन कुशवाहा इसके लिए तैयार नहीं हुए और एनडीए का साथ छोड़ दिया. ऐसे में पासवान की लोक जनशक्ति पार्टी के अलग होने का आशंका बढ़ गई. पासवान ने तुरूप का इक्का फेंका और जीएसटी से हुए लाभ का ब्यौरा मांगना शुरू कर दिया. एनडीए को एक और झटका लगने से बचाने के लिए शाह थोड़े झुके और पासवान को 6 लोकसभा सीटों के साथ खुद पासवान के लिए एक राज्यसभा सीट देने पर राजी हुए. भाजपा के इस लचीले रुख को महागठबंधन में शामिल दलों ने सियासी रूप से भुनाना भी शुरू कर दिया. राजद नेता और बिहार के पूर्व उप-मुख्यमंत्री तेजस्वी यादव कहते हैं, "भाजपा की हालत पतली है. ऐसा नहीं होता तो पिछले लोकसभा चुनाव में सिर्फ 2 सीट जीतने वाले जद (यू) को भाजपा 17 सीट नहीं देती. पार्टी ने अपने जीते हुए 22 सीटों में से 5 सीट जद (यू) के लिए छोड़ दी.''

सूत्रों के मुताबिक बिहार प्रदेश भाजपा में भी सीट के बंटवारे को लेकर असंतोष है. पिछले लोकसभा चुनाव में जो सीटें भाजपा जीती थी, उसे छोडऩे से भाजपा के कार्यकर्ता में निराशा का माहौल है. बिहार भाजपा के कई नेताओं का मानना है कि पासवान, चुनाव जीतने के बाद किधर जाएंगे, इसको लेकर कुछ कहा नहीं जा सकता है. ये नेता कहते हैं कि भरोसेमंद नीतीश कुमार भी नहीं हैं. ऐसे में अपनी सीटें कुर्बान कर सहयोगियों को बांटना सियासी रूप से अंधेरे में तीर मारने जैसा है.

सहयोगियों को लेकर भाजपा आश्वस्त बिल्कुल नहीं है. जिन्हें जाना था, वे चले गए हैं लेकिन बात यहीं नहीं थमी है. शिवसेना, अपना दल जैसे एनडीए के सहयोगियों के तेवर दिनोदिन कड़े होते जा रहे हैं. खासकर शिवसेना की नाराजगी खतरनाक है. उद्धव ठाकरे ने हाल में पंढरपुर में अपनी रैली में प्रधानमंत्री मोदी के लिए "चौकीदार चोर है'' कहा, जो कांग्रेस का नारा है. भाजपा के एक नेता कहते हैं कि आने वाले समय में शिवसेना अलग होकर चुनाव लडऩे का ऐलान करती है तो इसके दो नुक्सान होंगे. एक, शिवसेना के अलग होने से भाजपा के लिए महाराष्ट्र में 2014 का प्रदर्शन दोहराना असंभव नहीं तो कठिन जरूर हो जाएगा. दूसरे, महाराष्ट्र सरकार अल्पमत में आ जाएगी. ऐसे में लोकसभा चुनाव से ठीक पहले महाराष्ट्र में भाजपा की सरकार गिर जाती है तो भाजपा को बड़ा नुक्सान उठाना होगा.

शिवसेना नेता संजय राउत कहते हैं, "2014 में भाजपा ने जो कहा था, वह किया नहीं. किसान परेशान हैं, आम लोग, युवा परेशान हैं. भाजपा राम मंदिर पर सियासत से अधिक कुछ नहीं कर रही है. शिवसेना अपने दम पर चुनाव जीतने की ताकत रखती है इसलिए किसी को मुगालते में रहना नहीं चाहिए कि उसके बिना शिवसेना का काम नहीं चलेगा.'' शिवसेना तो खैर बड़ी सहयोगी है, एनडीए के छोटे घटक दल भी भाजपा से नाराज हैं. नाराजगी पिछले साढ़े चार साल में इस कदर बढ़ गई कि अब सहयोगियों ने खुलेआम भाजपा पर निशाना साधना शुरू कर दिया. अपना दल के कार्यकारी अध्यक्ष आशीष पटेल कहते हैं, "भाजपा सहयोगी दलों का सम्मान नहीं कर रही है. जब हम एनडीए के हिस्सा हैं तो फिर उत्तर प्रदेश में अस्पताल का लोकार्पण हो या कोई और कार्यक्रम, अपना दल के प्रतिनिधियों को बुलाया नहीं जाता है. यह उचित नहीं है. यदि इसका हल नहीं निकला तो सम्मान के लिए अपना दल कोई भी कदम उठा सकता है.'' उत्तर प्रदेश में ही भाजपा की सहयोगी सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी भी भाजपा के खिलाफ समय-समय पर मुखर होती रही है. इसके अध्यक्ष तथा उत्तर प्रदेश सरकार में कैबिनेट मंत्री ओमप्रकाश राजभर लगातार भाजपा, मोदी और मुख्यमंत्री आदित्यनाथ के खिलाफ खुलकर बोलते रहे हैं.

रणनीति में उभरे छेद

भाजपा अध्यक्ष अमित शाह फूलप्रूफ चुनावी रणनीति बना कर भाजपा की जीत में अहम भूमिका निभाते रहे हैं. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, "यह उनकी रणनीतिक कुशलता का ही नमूना था कि उन्होंने गोवा में कांग्रेस से कम सीटें जीत कर भी अपनी सरकार बना ली. इतना ही नहीं, जम्मू-कश्मीर में धुर विरोधी विचारधारा वाले पीडीपी के साथ मिल कर सरकार चलाई और बिहार में नीतीश कुमार को दोबारा अपने पाले में करके बिहार में एनडीए की सरकार बनाने में सफलता दिलाई. लेकिन पिछले एक साल में अमित शाह की फूलप्रूफ रणनीति में कई छेद दिखने लगे हैं.'' इसकी शुरुआत कांग्रेस नेता अहमद पटेल के गुजरात से राज्यसभा चुनाव जीतने से हुई. यह पूर्ण रूप से रणनीतिक चूक इसलिए थी क्योंकि इसमें भाजपा के पक्ष का वोट इसलिए खारिज हो गया था क्योंकि वोट डालने वाले ने बैलट पर वोट किसे दिया, इसे सार्वजनिक रूप से जाहिर कर दिया था. इसके बाद स्थितियों के आकलन, सहयोगियों की उपेक्षा, विरोधियों की ताकत और अपनी कमजोरी आंकने में भूल का सिलसिला चल पड़ा. जम्मू-कश्मीर में सरकार का जाना हो या फिर टीडीपी और उपेंद्र कुशवाहा का एनडीए से अलग होना यह रणनीतिक चूक का उदाहरण है. कर्नाटक में सरकार बनाने की पहल भी इसी का उदाहरण है. भाजपा ने यहां बिना बहुमत के सरकार बनाने का फैसला तो कर लिया लेकिन बहुतम जुटाने के लिए जो रणनीति बनाई थी, वह फेल हो गई और सरकार एक ही हफ्ते में गिर गई. कांग्रेस और जद (एस) ने मिल कर सरकार बना ली.

अति आत्मविश्वास का मामला

2014 में मोदी के नेतृत्व में भाजपा की जीत ऐतिहासिक इसलिए थी क्योंकि पार्टी ने अपने दम पर बहुमत हासिल किया था. भाजपा नेता अनौपचारिक बातचीत में कहते हैं कि अमित शाह ने अध्यक्ष बनने के बाद न सिर्फ संगठन को मजबूत किया बल्कि दावे बढ़ा-चढ़ा कर किए जाने लगे. राहुल गांधी का उपहास और कांग्रेस मुक्त भारत की बात करते-करते भाजपा अति-आत्मविश्वास में आ गई. पार्टी ने कांग्रेस और राहुल गांधी को चुनौती मानने तक से इनकार कर दिया.  भाजपा यह मानकर चलती रही कि कांग्रेस की लचर स्थिति की वजह से 2019 में भाजपा के खिलाफ विरोधी दल लामबंद नहीं हो सकेंगे. लिहाजा, भाजपा ने कांग्रेस मुक्त भारत के नारे को और जोर-शोर से उठाना शुरू किया और क्षेत्रीय दलों को अपना सम्मानजनक विरोधी दिखलाने की कोशिश कर दी. लेकिन गुजरात चुनाव में कांग्रेस भले हार गई लेकिन अपने कार्यकर्ताओं में यह उम्मीद जगाने में सफल रही कि पार्टी वापसी कर सकती है. हालांकि कर्नाटक में कांग्रेस की हार हुई लेकिन भाजपा को रोकने के लिए कांग्रेस ने जद (एस) को बिना शर्त समर्थन देकर गठबंधन की सरकार बनाने में कामयाबी पाई.

बाद में जब छत्तीसगढ़ में मायावती की बहुजन समाज पार्टी (बसपा) ने अजीत जोगी की जनता कांग्रेस छत्तीसगढ़ के साथ मिल कर भाजपा और कांग्रेस से अलग होकर चुनाव लडऩे की घोषणा कर दी तो भाजपा वहां अपनी जीत तय मान कर चलने लगी. राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह ने चुनाव के दौरान यह बात सार्वजनिक रूप से कहा कि मायावती और अजीत जोगी मिल कर कांग्रेस का वोट काटेंगे और भाजपा की जीत आसान हो जाएगी. रमन सिंह के इस बयान को आला नेतृत्व भी मान कर चल रहा था लेकिन नतीजों ने उलट कहानी बयान की. भाजपा महज 15 सीटों पर सिमट गई.

भाजपा सूत्रों का कहना है कि दिल्ली में हुए पिछली राष्ट्रीय कार्यकारिणी में भाजपा अध्यक्ष शाह ने महागठबंधन को लेकर कहा था, "2014 में भी महागठबंधन में शामिल सभी दल हमारे खिलाफ चुनाव लड़े थे और हारे थे. 2019 में उन्हें 2014 से भी बड़ी हार मिलने वाली है.'' लेकिन यह पूरी हकीकत नहीं है. राजद प्रवक्ता मनोज झा कहते हैं, "पिछले लोकसभा चुनाव में टीडीपी, आरएलएसपी, शेतकरी संगठना जैसे दल भाजपा के साथ थे, जो अब अलग हो चुके हैं. बिहार में मुकाबला त्रिकोणीय था. नीतीश, भाजपा तथा सहयोगी और राजद-कांग्रेस का गठजोड़ अलग-अलग चुनाव लड़ रहा था और एनडीए ने 31 सीटें जीती थी. इस बार मुकाबला एनडीए बनाम महागठबंधन में है इसलिए वोट बंटने की संभावना नहीं के बराबर है. एनडीए का सूपड़ा साफ हो जाएगा. कम से कम लोकसभा के लिए हुए उपचुनाव के नतीजे तो यही संकेत देते हैं.''

विकास और आस्था का असंतुलन

2013 के जून में भाजपा के चुनाव अभियान समिति का अध्यक्ष बनने के बाद नरेंद्र मोदी ने हर मंच से और हर जगह से विकास के मुद्दे की ही चर्चा की. राम मंदिर या धारा-370 जैसे मुद्दे उनके भाषण से नदारद ही रहे. सरकार बनने के बाद मोदी ने एक बार फिर "सबका साथ, सबका विकास'' जैसा नारा दिया. लोगों ने इन बातों पर भरोसा किया और फिर विधानसभा चुनावों में भाजपा की जीत का सिलसिला चलता रहा. इन सब के बीच मॉब लिंचिंग और गोरक्षा जैसे मुद्दे उठते रहे. भाजपा नेतृत्व ने खास तव्वजो नहीं दी. लेकिन पिछले छह महीने के दौरान विकास की आवाज राम मंदिर और गोरक्षा के शोर में दबने लगी. राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने मंदिर निर्माण के लिए दबाव बढ़ा दिया है और सरकार पर अध्यादेश लाने का दबाव बढ़ गया है.

खासकर पांच राज्यों के विधानसभा चुनाव में भाजपा के निराशाजनक प्रदर्शन ने विकास के नैरेटिव को बदलना शुरू कर दिया है. संघ और इसके आनुषंगिक संगठनों की ओर से मंदिर निर्माण की आवाज उठने लगी है. भाजपा नेता मान रहे हैं कि सरकार का विकास का एजेंडा आस्था के मुद्दे पर कार्यकर्ताओं के आक्रामक रुख से भटक सकता है. सूत्रों कहना है कि सिर्फ विकास के मुद्दे पर चुनाव जीतना अब कठिन हो गया है. ऐसा नहीं होता तो फिर सबरीमला में महिलाओं के प्रवेश को लेकर सुप्रीम कोर्ट के निर्णय पर सवाल उठाने से भाजपा परहेज करती. राम मंदिर पर बयान नहीं आते.

योगी आदित्यनाथ हर चुनाव प्रचार में स्टार कैंपेनर की भूमिका में होते हैं तो सिर्फ हिंदू वोटों के ध्रुवीकरण के लिए ही. हालांकि भाजपा प्रवक्ता तथा राज्यसभा सदस्य जी.वी.एल. नरसिंह राव कहते हैं, "भाजपा 2019 का चुनाव सिर्फ और सिर्फ विकास के मुद्दे पर लड़ेगी. आस्था का विषय अलग है. हम आस्था के मुद्दे को छोड़ नहीं रहे हैं लेकिन प्रधानमंत्री ने जो वादा 2014 में किया था, उसे पूरा किया.'' लेकिन विकास के मुद्दे ही परेशानी पैदा करते दिखते हैं जिसकी काट तलाशने की जद्दोजहद ही शायद भाजपा के लिए भारी बनी हुई है.

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