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पंजाब: मजबूरी पर देश हित का मुलल्मा

हरियाणा और महाराष्ट्र में किला फतह करने वाली बीजेपी नौ साल से पंजाब की सत्ता में भागीदार होने के बावजूद विधानसभा चुनाव से पहले बैकफुट पर. अब लाज बचाने को कर रही कसरत.

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aajtak.in
संतोष कुमार 16 February 2016
पंजाब: मजबूरी पर देश हित का  मुलल्मा

छह फरवरी की शाम ठीक छह बजे जब पंजाब कोर ग्रुप के 17 नेता लुटियन्स दिल्ली के 2, कृष्ण मेनन मार्ग वाले बंगले में बुलाए गए तो आलाकमान के साथ होने वाली इस बैठक का एकमात्र एजेंडा था—अगले साल होने वाले विधानसभा चुनाव में शिरोमणि अकाली दल से गठबंधन को तोड़ अकेले लड़ें या यथास्थिति बरकरार रखें. राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह तो बैठक में खामोश रहे, लेकिन केंद्रीय वित्त मंत्री अरुण जेटली ने चार सवाल पूछे—राजनैतिक परिस्थिति क्या है? बीजेपी अकेले चुनाव लड़े तो कितना फायदा होगा? गठबंधन में लड़ेंगे तो कैसी स्थिति होगी? करीब ढाई घंटे चली बैठक में राज्य इकाई ने एक सुर में कहाः मौजूदा राजनैतिक हालात में बीजेपी को अकालियों के साथ गठबंधन से कोई लाभ नहीं है.

लेकिन इस बैठक के तीन दिन बाद जब अकाली नेता और पंजाब के उपमुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल शाह और जेटली से मिले तो बीजेपी के तेवर ठंडे पड़ गए. सूत्रों के मुताबिक, शाह ने बादल को भरोसा दिलाया कि गठबंधन जारी रहेगा. इसके बाद बादल ने सार्वजनिक तौर पर ऐलान कर दिया, ''अकाली-बीजेपी गठबंधन स्थायी है जो नहीं टूट सकता. हम साझा रूप से चुनाव जीतने की रणनीति पर काम करेंगे.'' इस फैसले से निराश बीजेपी के एक वरिष्ठ नेता याद दिलाते हैं, ''चार महीने पहले (11 अक्तूबर को) जब प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने चंडीगढ़ में आयोजित एक कार्यक्रम में मंच पर मौजूद पंजाब के मुख्यमंत्री प्रकाश सिंह बादल को भारत का नेल्सन मंडेला बताया था, उसी वक्त साफ हो गया था कि कार्यकर्ताओं की अपेक्षा का दमन होने वाला है.'' हालांकि बीजेपी की ओर से गठबंधन के भविष्य को लेकर अभी कोई औपचारिक ऐलान नहीं हुआ है लेकिन बीजेपी को पंजाब में अपनी ताकत का बखूबी एहसास है.

प्रधानमंत्री मोदी और जेटली की पंजाब में निजी रुचि है. मोदी बतौर संगठन महासचिव सूबे का प्रभार संभाल चुके हैं और उन्हें बीजेपी के लिहाज से राज्य की सियासी जमीन की उर्वरता मालूम है, जबकि पार्टी के सबसे उम्दा रणनीतिकार माने जाने वाले जेटली मोदी लहर में भी एक लाख से ज्यादा वोटों से अमृतसर लोकसभा सीट पर चुनाव हार चुके हैं. गठबंधन के मसले पर हुई बैठक के बारे में पंजाब बीजेपी के अध्यक्ष कमल शर्मा कहते हैं, ''गठबंधन और राजनैतिक परिदृश्य के बारे में राज्य इकाई से बैठक में चर्चा हुई.'' जबकि राज्य बीजेपी के प्रभारी और राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा कहते हैं, ''हाइकमान के सामने नेताओं ने अपनी बात रख दी है और अब फैसला हाइकमान को करना है.''

पंजाब में चुनावी स्थितिगठबंधन बनी मजबूरी
पंजाब की राजनैतिक परिस्थिति की औपचारिक समीक्षा भले शाह ने की, लेकिन प्रधानमंत्री मोदी खुद सूबे के हालात को लेकर इतने चिंतित हैं कि उन्होंने केंद्रीय गृह राज्यमंत्री किरेन रिजिजू को पंजाब भेजा और संसदीय क्षेत्रवार रिपोर्ट मांगी. रिजिजू ने 31 जनवरी और एक फरवरी को पंजाब जाकर हर क्षेत्र के कार्यकर्ताओं से मुलाकात कर फीडबैक लिया. सूत्रों के मुताबिक, रिजिजू के साथ बैठक में बीजेपी के स्थानीय नेताओं ने अकाली सरकार के काम करने के तरीकों पर नाराजगी जताई तो माहौल को अराजक बताया. बीजेपी नेताओं का दर्द सरकार में शामिल होने के बावजूद दोयम दर्जे के व्यवहार को लेकर था. इस रिपोर्ट के बाद ही प्रधानमंत्री ने समीक्षा बैठक बुलाने के निर्देश दिए. बीजेपी की दलील है कि भले आज की स्थिति में अकालियों से गठबंधन राजनैतिक रूप से नुक्सान पहुंचाने वाला है, लेकिन रणनीतिक लिहाज से लाभ देने वाला है.

पंजाब सीमावर्ती राज्य है जिसका सामरिक महत्व है और गठबंधन टूटता है तो उग्रवाद की आग में झुलस चुके इस सूबे में राजनीति के अलावा भी अन्य परिणाम देखने को मिल सकते हैं. बीजेपी के रणनीतिकार इस दलील को अक्तूबर 2015की घटना से जोड़ते हैं, जब गुरु ग्रंथ साहिब के चोरी हुए कुछ पन्ने कई इलाकों में बिखरे हुए मिले जिससे सिख समाज भड़क उठा था और राज्य में तनाव की स्थिति पैदा हो गई थी. पठानकोट और गुरदासपुर में हुए आतंकी हमले को भी उसी से जोड़ते हुए एक बीजेपी नेता कहते हैं, ''बीजेपी राष्ट्रीय पार्टी है और फिलहाल केंद्र में सत्ता में है, इसलिए खास तौर पर पंजाब के मामले में राजनीति से पहले देश हित है. समीकरण के लिहाज से अकाली दल गांवों में सिख समाज का तो बीजेपी शहरी हिंदुओं का प्रतिनिधित्व करती है, ऐसे में यह गठबंधन एकता-भाईचारे का संदेश देता है.'' इन दलीलों के अलावा भी बीजेपी के एक नेता का कहना है कि अब गठबंधन तोडऩे से पार्टी को कोई फायदा नहीं मिलने वाला क्योंकि वह भी सवा नौ साल से सत्ता में भागीदार है और सत्ता विरोधी लहर से बच नहीं सकती.

पंजाब में 117 सदस्यी विधानसभा चुनाव में दलीय स्थितिबीजेपी की दबाव की रणनीति
देश हित में गठबंधन बरकरार रखने का जज्बा महज ढाई घंटे की बैठक में नहीं आ सकता. यह स्थिति बीजेपी नेतृत्व के सामने पहले से ही थी. लेकिन केंद्र के साथ पड़ोसी राज्य हरियाणा में पहली बार बहुमत की सरकार बनने और महाराष्ट्र में 25 साल पुराना गठबंधन तोड़कर किला फतह करने वाली बीजेपी के हौसले इतने बुलंद हो गए कि उसने पंजाब में भी गठबंधन को फिर से तराजू पर तौलने की रणनीति बना ली. बीजेपी के एक व्यथित नेता का कहना है, ''राज्य में हमारी हिस्सेदारी कम है. महज 20 फीसदी हिस्सेदारी को गठबंधन नहीं कहा जा सकता. हरियाणा विधानसभा चुनाव में अकाली दल की ओर से बीजेपी के विरोधी आइएनएलडी को समर्थन देने के बावजूद वहां पार्टी बहुमत के साथ सत्ता में पहुंची.'' दरअसल, बीजेपी आलाकमान की रणनीति गठबंधन के खिलाफ गुस्से को सार्वजनिक करने की थी, इसलिए राज्य इकाई के नेताओं को अकाली दल की आलोचना से कभी रोका नहीं गया. बीजेपी की रणनीति थी कि अकाली दल पर दबाव बनाकर सीटों की संख्या बढ़ाई जाए. बीजेपी विधानसभा की कुल 117 में से 23 सीटों पर लड़ती है. पार्टी के एक रणनीतिकार का कहना है कि गठबंधन को तर्कसंगत बनाने के लिए बीजेपी को कम से कम 40 सीटें मिलनी चाहिए जिन पर वह कभी न कभी चुनाव लड़ चुकी है. हालांकि अकाली दल के तेवरों से इतना तो साफ है कि बीजेपी की सीटों की संख्या नहीं बढऩे वाली, लेकिन सीटों की अदला-बदली जरूर हो सकती है.

कमजोर संगठन और अंतर्कलह
स्थानीय कार्यकर्ताओं की उपेक्षा कर गठबंधन में बने रहने की वजह बीजेपी की सांगठनिक शक्ति भी है. बीजेपी और अकाली दल का गठबंधन 1997 से है, जिसकी नींव उस वक्त पड़ी थी जब 1996 में अटल बिहारी वाजपेयी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार बहुमत का आंकड़ा जुटा रही थी. उस वक्त अकाली दल और बीएसपी का गठबंधन था, लेकिन अकाली दल ने बिना शर्त बीजेपी को समर्थन दिया. तत्कालीन बीजेपी प्रभारी मदन लाल खुराना ने इस गठबंधन की नींव रखी. उस समय से बीजेपी 23 सीट पर ही लड़ती आ रही है. पार्टी का प्रभाव शहरी हिंदू इलाकों तक ही सीमित है. इतने लंबे समय से सत्ता में भागीदार होने के बावजूद बीजेपी सभी 117 विधानसभा क्षेत्रो में अपना मजबूत आधार खड़ा नहीं कर पाई है. बीजेपी जहां-जहां चुनाव लड़ती आ रही है वहां पर उसके बूथ कार्यकर्ताओं की संख्या 10 से 15 के बीच है तो कमजोर इलाकों में यह संख्या 4-5 तक सीमित है.

बीजेपी का विधानसभा में सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन 2007 में था जब उसे 23 में 19 सीटें मिली थी. लेकिन तीन टर्म तक अमृतसर लोकसभा सीट के सांसद रहे नवजोत सिंह सिद्धू के कड़े तेवर पार्टी के लिए मुश्किल पैदा कर रहे हैं. सिद्धू लंबे समय से अकाली दल से गठबंधन तोडऩे की मांग कर रहे हैं. लेकिन इस मुद्दे पर हुई निर्णायक बैठक में सिद्धू नहीं पहुंचे. अब उनके आप में जाने की अटकलें लग रही हैं. दूसरी तरफ प्रदेश अध्यक्ष को लेकर भी खींचतान जारी है. मौजूदा अध्यक्ष कमल शर्मा दूसरे कार्यकाल की कोशिश में लगे हैं, लेकिन हाल ही में उनके पूर्व निजी सहायक जिम्मी संधु के ड्रग तस्करों से कथित संबंधों को लेकर विवाद हुआ था.

परिवारवाद और आप-कांग्रेस फैक्टर
लोकसभा चुनाव के दौरान देश भर में अच्छा प्रदर्शन करने वाला एनडीए पंजाब में पिछड़ गया था जबकि पहली बार चुनाव लड़ रही आप ने देश भर में से सिर्फ पंजाब में चार सीटें जीत लीं. उसे बीजेपी से तीन गुना और अकाली दल से महज दो फीसदी कम वोट मिले. बीजेपी के नेता मानते हैं कि जिस तरह सभी हलकों में आप को वोट मिले उससे अकाली सरकार के खिलाफ माहौल का अंदाजा लगाया जा सकता है.
सरकार में जिस तरह परिवारवाद और बिजनेस में अकाली दल का वर्चस्व बढ़ा है, उसे आप और कांग्रेस ने बड़ा मुद्दा बना रखा है. ड्रग्स की बढ़ती तस्करी, भ्रष्टाचार कुछ ऐसे मुद्दे हैं जो मौजूदा सरकार के खिलाफ है. हालांकि बीजेपी का कहना है कि सत्ता विरोधी वोट जब विपक्षी धड़ों में बंटेगा तो उसका फायदा अकाली-बीजेपी को मिलेगा. एक नेता कहते हैं, ''पिछले चुनाव में बादल परिवार से अलग होकर मनप्रीत बादल ने पीपल्स पार्टी ऑफ पंजाब बनाकर चुनाव लड़ा तो उसे 5 फीसदी वोट मिले और प्रकाश सिंह बादल सरकार सत्ता में वापस लौट आई.'' हालांकि चुनावी मुद्दे के तौर पर पक्ष में गिनाने के लिए बीजेपी-अकाली के पास कुछ लोक-लुभावन योजनाएं और कृषि के लिए 100 फीसदी बिजली सब्सिडी है.

जाहिर है कि पंजाब में बीजेपी संभावित परिणामों से सहमी हुई है, लेकिन उसे इतना एहसास हो गया है कि वह राज्य में अकेले दम पर अस्तित्व की लड़ाई भर ही लड़ पाएगी.

—साथ में असित जॉली

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