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आयुर्वेदिक लाइफस्टाइल

आयुर्वेद को महज जड़ी-बूटी बताकर कमतर साबित करने की कोशिशों के बावजूद इस प्राचीन पद्धति की ओर लोगों का रुझान बढ़ रहा. आयुर्वेद ने भी आधुनिकता से तालमेल कर पांव पसारना शुरू किया.

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aajtak.in
संतोष कुमार 30 October 2015
आयुर्वेदिक लाइफस्टाइल

आप लोग मुझे गाने के लिए दबाव मत दीजिएगा. मेरा गला छिला हुआ है क्योंकि मैं अभी पंचकर्म प्रक्रिया से लौटा हूं.’’ मशहूर बॉलीवुड गायक सोनू निगम ने एक समारोह में न सिर्फ खुले मंच से इसका इजहार किया बल्कि पंचकर्म से शरीर को होने वाले फायदे के बारे में लंबा व्याख्यान भी दिया. पंचकर्म आयुर्वेद की एक अनोखी पद्धति है जिसमें गलत दिनचर्या और खान-पान की आदतों से शरीर में जमा हो जाने वाली विषाक्त चीजों की बिना किसी चीर-फाड़ के प्राकृतिक तरीके से चंद दिनों में जैविक सफाई हो जाती है.

सोनू निगम ही नहीं, अब दुनिया के अन्य देशों के लोग भी आयुर्वेद की शक्ति को स्वीकारने लगे हैं. तो क्या अब आयुर्वेद दवाई की पुडिय़ा के संकुचित नजरिए से बाहर निकलने को है? दिल्ली स्थित चौधरी ब्रह्म प्रकाश आयुर्वेद चरक संस्थान में भर्ती अफगानिस्तान से आए 8 वर्षीय बच्चे मोहम्मद मूसा की कहानी उसी तरफ इशारा कर रही है. मूसा की गर्दन टिक नहीं पाती थी और उसके दोनों पैर ढीले रहते थे. यूसुफ नईमी ने बेटे का अपने देश में काफी इलाज कराया लेकिन चार साल बाद फिर उसे यह दिक्कत आने लगी तो परिवार ने इसी साल जुलाई में भारत का रुख किया. यूसुफ बताते हैं, ‘‘दिल्ली में अपोलो अस्पताल तक ने यह कहते हुए मना कर दिया कि मूसा को ठीक नहीं किया जा सकता. तभी मेरे एक दोस्त ने आयुर्वेद अस्पताल के बारे में बताया. दो मिनट भी खड़े होकर काम न कर पाने वाला मूसा अब 6-8 मिनट काम कर लेता है. मैं अपने मुल्क लौटकर वहां लोगों को आयुर्वेद के अस्पताल के बारे में बताऊंगा.’’ मूसा का इलाज कर रहे संस्थान के बाल रोग विभागाध्यक्ष डॉ. भरत भोयर कहते हैं, ‘‘वह हेरेडिटेरी मोटर ऐंड सेंसरी न्यूरोपैथी (एचएमएसएन) से पीडि़त है, वह व्हीलचेयर पर आया था और आज खड़ा हो पा रहा है.’’ यहां भर्ती बिहार के मधुबनी जिले के साढ़े तीन वर्षीय विकास और हरियाणा के रोहतक के चार वर्षीय गौरव की कहानी भी कुछ इसी तरह की है.

आयुर्वेद बन रहा जीवन का अंग: हर घर में हर्बल उत्पाद
कई लोग अंग्रेजी इलाज से निराश-हताश होकर अंतिम उम्मीद लिए आयुर्वेद की ओर जा रहे हैं. अंग्रेजी दवाओं से कालांतर में दुष्प्रभाव की आशंका के मद्देनजर लोग सौंदर्य प्रसाधन से लेकर भोजन तक में हर्बल उत्पाद का प्रयोग करने लगे हैं. आज शायद ही कोई घर होगा जहां आयुर्वेद से जुड़ा एकाध उत्पाद न हो. अनियमित जीवनशैली से परेशान लोग हर्बल उत्पाद के प्रति न सिर्फ उन्मुख हो रहे हैं, बल्कि सुबह के व्यायाम में योग से लेकर खानपान और उपचार में आयुर्वेदिक दवाइयों का इस्तेमाल कर रहे हैं. कुछ क्रियाएं ऐसी हैं जिसे अपनाने को लंबा इंतजार भी उन्हें कुबूल है. पंचकर्म उन्हीं में से ही एक है. अलग-अलग ऋतुओं में लोग आयुर्वेद की कुछ क्रियाएं कराते हैं. मसलन, वसंत में वमन. इसमें उल्टी के माध्यम से कफ जैसे रोगों पर नियंत्रण किया जाता है तो जाड़े में विरेचन पद्धति से पेट साफ कराया जाता है. आयुष मंत्रालय में आयुर्वेद के सलाहकार डॉ. मनोज नेसरी बताते हैं, ‘‘पेट की बीमारी, सूजन, हाइपरटेंशन, दमा, पीलिया जैसे रोग दूर करने में यह क्रिया बेहद कारगर है.’’ आयुर्वेद की क्रियाओं में वस्ति भी आजमाई जा रही है. मोटापा, कमर, रीढ़, अस्थि रोग या न्यूरो से जुड़ी बीमारियों में वस्ति बेहद कारगर मानी जाती है. इसमें कमर के निचले हिस्से में मालिश के जरिए दवाई दी जाती है और एनीमा लगाया जाता है. इसी तरह भागदौड़ की जिंदगी में मानसिक दबाव कई रोगों की प्रमुख वजह है. इससे निपटने को लोग शिरोधारा अपना रहे हैं. मधुमेह, अल्सर, पुराने दाद-खाज जैसे रोगों के लिए जलोका की पद्धति कारगर हो रही है.

यही नहीं, शैंपू, साबुन, केश तेल, लोशन, क्रीम, टूथपेस्ट, काजल, बिंदी और नेल पॉलिश तक में हर्बल उत्पादों ने अपना मुकाम बना लिया है. पतंजलि योगपीठ में आयुर्वेद इकाई के प्रमुख आचार्य बालकृष्ण कहते हैं, ‘‘आयुर्वेद अब दैनिक जीवन का अंग बन गया है. पहले लोग इसे गोली-वटी और चूर्ण की विद्या मानते थे. पतंजलि ने बढिय़ा प्रजेंटेशन के जरिए आयुर्वेद के बारे में फैले भ्रम को तोड़ दिया है.’’ चौधरी ब्रह्म प्रकाश आयुर्वेद चरक संस्थान की अतिरिक्त निदेशक (शैक्षणिक) डॉ. तनुजा नेसरी तो एक बार इलाहाबाद में आयुर्वेदिक आइस्क्रीम का स्टॉल देख हैरान रह गईं.

आयुर्वेद से जुड़ा ढांचा अभी एक छतरी के नीचे नहीं आ पाया है, लेकिन पतंजलि, जिंदल नेचुरोपैथी, डाबर, वैद्यनाथ, झंडू, हिमालय, चरक फार्मास्यूटिकल, विक्को लैबोरेट्रीज, इमामी, आर्य वैद्यशाला, श्रीश्री रविशंकर के संस्थान/कंपनियों के उत्पाद लोगों की जिंदगी का हिस्सा बन चुके हैं. केंद्र के आयुष विभाग का भी इतना बड़ा ढांचा है जो एलोपैथी से सामंजस्य बना ले तो यूनिवर्सल हेल्थ केयर का लक्ष्य आसानी से पा सकता है.

आयुर्वेदिक लाइफस्टाइलमिथक बनाम सच: आठ शाखाओं में बंटी है आयुर्वेद चिकित्सा
भारत में आयुर्वेद को एलोपैथी की प्रतिस्पर्धी व्यवस्था के रूप में पेश करते हुए इसे जड़ी-बूटी या घास-फूस के इलाज के रूप में कमतर दिखाया जाता रहा है. हकीकत में आयुर्वेद एलोपैथी का सहायक है, जहां इलाज और रोगों की जांच में उन सभी आधुनिक तकनीकों का इस्तेमाल किया जाता है जो आधुनिक चिकित्सा में जरूरी हैं. आयुर्वेद अस्पतालों में प्रसव भी कराया जाता है, लेकिन उसके लिए एलोपैथी के डॉक्टर होते हैं. हालांकि जन्म के बाद जच्चा-बच्चा की देखरेख और इलाज को आयुर्वेद की पद्धति पर लाया जाता है. 210 बिस्तरों वाले ब्रह्म प्रकाश संस्थान में रोजाना 1,200-1,500 मरीज ओपीडी में आते हैं, जिन्हें 22 चिकित्सक देखते हैं. दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की खांसी एक वक्त राजनैतिक मुद्दा बन चुकी थी, लेकिन बेंगलूरू के जिंदल नेचर केयर में आयुर्वेदिक पद्धति से इलाज के बाद आज वे पूरी तरह स्वस्थ हैं.
आयुर्वेद आज तमाम विरोधों के बावजूद मेडिकल टूरिज्म का मुख्य आकर्षण बन रहा है. आयुष मंत्रालय ने पर्यटन मंत्रालय के साथ मिलकर आयुष वेलनेस गाइडलाइंस जारी की है, जिसमें सुविधाओं के मानक तय कर दिए गए हैं. आयुष मंत्रालय में संयुक्त सचिव अनिल गनेरीवाला कहते हैं, ‘‘आयुर्वेद में कम दवाई और ज्यादा थेरेपी के जरिए कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का भी इलाज हो चुका है. बचाव और प्रचार-प्रसार के मामले में हमारा आयुर्वेद दुनिया में दूसरे नंबर पर है. देश में मजबूत ढांचा मौजूद है इसलिए मेडिकल टूरिज्म के लिए दुनियाभर से लोग आ रहे हैं. केरल, बेंगलूरू, ऋषिकेश जैसे कई वेलनेस केंद्र हैं जहां कई देशों के लोग जाते हैं.’’ केरल, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, तमिलनाडु जैसे राज्यों में वेलनेस केंद्र विदेशी पर्यटकों को आकर्षित करते हैं. हिमाचल प्रदेश में विवेकानंद कायाकल्प अनुसंधान केंद्र विदेशी पर्यटकों को काफी लुभाते हैं और बुकिंग के लिए लंबा इंतजार करना पड़ता है. डॉ. मनोज के मुताबिक, ‘‘लोग सिर्फ स्पा या मसाज के लिए नहीं बल्कि रोगों से बचाव के मकसद से वेलनेस केंद्रों पर जाते हैं जहां शुरुआती अवस्था से ही रोगों से बचाव हो जाता है.’’ आर्ट ऑफ लीविंग के संस्थापक श्रीश्री रविशंकर के श्रीश्री आयुर्वेद ट्रस्ट के मुख्य चिकित्सा अधिकारी तेज कटपिटिया कहते हैं, ‘‘आयुर्वेद की मान्यता दुनिया भर में है और मेडिकल टूरिज्म इसमें महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है क्योंकि दुनिया भर से लोग थेरेपी के लिए आते हैं. चूंकि भारत में आयुर्वेद थेरेपी के अच्छे विशेषज्ञ और संस्थान मौजूद हैं जो बाहर से आने वाले लोगों का विश्वास मजबूत करते हैं.’’ उनके मुताबिक आयुर्वेद आज मेडिसिन की दुनिया का ऐसा हिस्सा बन गया है जो हर व्यक्ति की जिंदगी में शामिल है.

दिल्ली में एम्स की तर्ज पर लगभग तैयार और अगले साल से चालू होने जा रहे ऑल इंडिया इंस्टीट्यूट ऑफ आयुर्वेदिक साइंसेज के निदेशक डॉ. अभिमन्यु कुमार कहते हैं, ‘‘हम प्राचीन ज्ञान और आधुनिक विज्ञान के मंत्र के साथ काम कर रहे हैं और एक साल के बाद हम अपनी सफलता की कहानी बताने की स्थिति में होंगे.’’ इस सात मंजिला संस्थान में 200 बिस्तरों की सुविधा है. यह संस्थान रिसर्च के लिए नोडल एजेंसी के रूप में काम करने के अलावा आयुर्वेद में सुपर स्पेशलिस्ट तैयार करेगा. यह एक भ्रम है कि आयुर्वेद की दवाइयों का कोई मानक नहीं. डॉ. मनोज बताते हैं, ‘‘दवाइयों के अंतरराष्ट्रीय मानक और गुणवत्ता की परख के लिए फार्माकोपिया कमिशन ऑफ इंडियन मेडिसिन ऐंड होम्योपैथी है, जिसकी अलग-अलग समितियां विश्व स्तरीय ड्रग फार्माकोपिया तैयार करती है. सभी दवा निर्माता कंपनियों को इसी मानक के मुताबिक कच्चे माल का इस्तेमाल कर दवाई बनानी होती है.’’ केंद्र सरकार के पास कोई ड्रग लाइसेंसिंग अथॉरिटी नहीं है, लेकिन राज्य की अथॉरिटी ही जांच करके मंजूरी देती है.

मजे की बात है कि सर्जरी से लेकर कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों का इलाज आयुर्वेद के ग्रंथों में दर्ज है. 1,000 ई.पू. में ही आयुर्वेद चिकित्सा को 8 खंडों में बांटा गया था. इनमें काय चिकित्सा (मेडिसिन), बाल चिकित्सा, मानस रोग (न्यूरोलॉजी), शल्य चिकित्सा (सर्जरी), शालक्य चिकित्सा (ईएनटी-दांत), अगद तंत्र (टॉक्सिकोलॉजी), रसायन चिकित्सा और वृष्य चिकित्सा (अगली पीढ़ी को स्वस्थ रखना) शामिल थे. इन सभी चिकित्सा पद्धतियों के लिए अलग-अलग ग्रंथ भी हैं. इसके अलावा पशुओं के इलाज और पेड़-पौधों के लिए भी आयुर्वेद का अलग ग्रंथ है.

इतिहास: क्यों चीन से पिछड़ गया भारत
दादी-नानी की पिटारी और रसोई घर में साधारण बीमारियों से निपटने का नुस्खा आयुर्वेद ने दिया, लेकिन व्यापक होकर भी आयुर्वेद भारत में ही इतना क्यों पिछड़ गया? 11वीं-12वीं सदी में बाहरी हमलों ने सबसे ज्यादा नुक्सान पहुंचाया. उसके बाद भी 17वीं-18वीं सदी में तंजावुर के राजा की ओर से आयुर्वेदिक अस्पताल खोलने के प्रमाण मिलते हैं. लेकिन ब्रिटिश राज में 1835 में आयुर्वेद पर सीधा हमला हुआ और कोलकाता में आयुर्वेद कॉलेज को बंद कर उसे आधुनिक मेडिकल कॉलेज में तब्दील कर दिया गया. वैद्यों को अप्रशिक्षित बताया गया और अंग्रेजों ने अलग से कानून लाकर एलोपैथी को अनिवार्य करते हुए आयुर्वेद, यूनानी, होम्योपैथी चिकित्सा को बाहर कर दिया. लेकिन जिस तरह चीन ने आजादी के बाद हर्बल दवाई को बढ़ावा दिया, भारत वैसा नहीं कर सका. चीन ने 1950 में ही हर्बल दवाइयों के लिए खेती शुरू की और मेडिसिन के क्षेत्र में यूनिफाइड रिसर्च पॉलिसी अपना ली. चीन की सरकार ने अनिवार्य रूप से कैम (कंप्लीमेंट्री अल्टरनेटिव मेडिसिन) को हर मेडिकल कॉलेज में अनिवार्य कर दिया. इन प्रयासों का नतीजा भी मिला. हाल ही में घोषित मेडिसिन के नोबेल पुरस्कार के संयुक्त विजेताओं में चीन की पारंपरिक चिकित्सा पर काम करने वाली यूयू तू को भी चुना गया. भारत में 1970 में पहली बार आयुर्वेद को सुचारू रूप से चलाने को कानून बना. 
आयुर्वेदिक लाइफस्टाइल
मोदी सरकार मेहरबान: आयुर्वेद में वैश्विक लीडर बनने की कोशिश
लोकसभा चुनाव के समय भगवान गणेश की सर्जरी का जिक्र करके प्राचीन इतिहास का बखान करने वाले नरेंद्र मोदी ने प्रधानमंत्री बनने के बाद आयुर्वेद के विकास में कदम बढ़ाया है. आयुष मंत्रालय के अधिकारियों के मुताबिक, मोदी ने अब तक जितने देशों की यात्रा की है, उनमें से ज्यादातर देशों के साथ भारतीय पारंपरिक दवा (आयुर्वेद) को बढ़ावा देने का समझौता भी किया है. हाल ही में अमेरिका के फूड ऐंड ड्रग एडमिनिस्ट्रेशन (एफएडीए) ने आयुष मंत्रालय के साथ बातचीत शुरू की है. एक अधिकारी बताते हैं, ‘‘पहले लोग हमसे बात करने तक नहीं आते थे, आज बात भी कर रहे हैं और हाथ भी मिला रहे हैं.’’ आयुष मंत्रालय के सहयोग से चीन में योग संस्थान बन रहा है. केंद्र सरकार ने दुनिया भर में स्थित भारतीय दूतावासों में आयुष सूचना केंद्र भी खोल दिया है.

देश में आयुर्वेद को मजबूती देने की दिशा में सरकारी पहल शुरू हो चुकी है. केंद्रीय श्रम और रोजगार मंत्रालय अपने करीब 350 ईएसआइ अस्पतालों में आयुर्वेद की अलग शाखा शुरू करने की दिशा में काम कर रहा है. इसके लिए 12 अक्तूबर को श्रम मंत्रालय के संयुक्त सचिव जी. वेणुगोपाल रेड्डी ने आयुर्वेद संस्थानों का दौरा भी किया है. फूड सप्लीमेंट्स के रूप में आयुर्वेदिक उत्पादों का निर्यात यूरोप, अमेरिका, रूस समेत दुनिया के 80 से ज्यादा देशों में होता है. आयुर्वेद के भविष्य पर डॉ. तनुजा नेसरी कहती हैं, ‘‘मैंने 12 देशों में दौरा किया है और दावे से कह सकती हूं कि दुनिया में आने वाले समय में आयुर्वेद में प्रशिक्षित शिक्षकों की भारी मांग होने वाली है.’’

चुनौतियां कम नहीं: आइएमए बनाम सीसीआइएम
केंद्र सरकार भले अब आयुर्वेद को तवज्जो दे रही है, लेकिन उसके लिए एलोपैथी और आयुर्वेद के बीच के मतभेदों को खत्म करना मुमकिन नहीं दिख रहा. आयुर्वेद के डॉक्टरों को झोलाछाप कहना और उसे कमतर दिखाने की कोशिशों को आयुष मंत्रालय के सलाहकार डॉ. मनोज नेसरी इंडियन मेडिकल एसोसिएशन (आइएमए) का दुष्कृत्य करार दे रहे हैं. वे कहते हैं, ‘‘प्राइवेट सेक्टर के एलोपैथी वाले अपना हिस्सा बंटता हुए देख रहे हैं, इसलिए गलत धारणा पैदा की जा रही है. इस बारे में हमने स्वास्थ्य मंत्रालय को एक चिट्ठी भी लिखी है कि आइएमए की ओर से इस तरह की कीचड़ उछालने की प्रवृत्ति को रोका जाना चाहिए.’’ आयुर्वेद में साझा रिसर्च की जरूरत पर जोर देते हुए केंद्रीय आयुर्वेदीय विज्ञान अनुसंधान परिषद के महानिदेशक के.एस. धीमान कहते हैं, ‘‘भारत में आज भी मेडिसिन का अनुसंधान दो पायों पर चल रहा है. लेकिन अब समय आ गया है कि आयुर्वेद और आधुनिक मेडिसिन को आपस में जोडक़र अनुसंधान को मुख्यधारा में लाया जाए. दोनों वर्ग के चिकित्सक मिलकर काम नहीं करेंगे तो जनकल्याण के लक्ष्य के प्रति हम सफल नहीं हो सकते.’’ पर डॉ. तनुजा नेसरी की सुनिए, ‘‘चीन में हर मेडिकल कॉलेज में वैकल्पिक मेडिसिन की पढ़ाई होती है. भारत में मेडिकल क्षेत्र की दोनों बड़ी संस्थाएं आइएमए और सीसीआइएम (सेंट्रल काउंसिल ऑफ इंडियन मेडिसिन) हाथ मिलाने को तैयार नहीं हैं.’’ हालांकि आइएमए के मानद महासचिव डॉ. के.के. अग्रवाल इस तरह के आरोपों को खारिज करते हैं, ‘‘आइएमए और सीसीआइएम के हाथ न मिलाने का आरोप गलत है. आयुर्वेद और एलोपैथी मिलकर काम कर सकते हैं, लेकिन उनकी तो मांग है कि उन्हें एलोपैथी में भी प्रैक्टिस की इजाजत दी जाए, हमें यह मंजूर नहीं क्योंकि अगर वे एलोपैथी में दवाई लिखेंगे तो अपना आयुर्वेद ही भूल जाएंगे, यही करना है तो फिर एलोपैथी को बंद कर दीजिए.’’ चीन की तरह संयुक्त तरीके से अनुसंधान के सवाल पर वे सशर्त सहमति देते हैं, ‘‘एलोपैथी और आयुर्वेद, दोनों एक साथ शोध भी कर सकते हैं, लेकिन हमारी शर्त है कि एक-दूसरे में हस्तक्षेप न हो.’’

अनुसंधान के क्षेत्र में आयुर्वेद की खुद की भी समस्याएं हैं. धीमान के मुताबिक, आयुर्वेद का कोई समानांतर ढांचा नहीं है. इसके लिए अलग से आयुष स्वास्थ्य महानिदेशालय बनाना जरूरी है जबकि ब्रह्म प्रकाश संस्थान के चिकित्सा अधीक्षक डॉ. एन.आर. सिंह कहते हैं, ‘‘सबसे बड़ी मुश्किल प्रशासनिक वजहों से आती है क्योंकि दवाइयों के लिए जारी दिशानिर्देश के मुताबिक, काम का मौजूदा ढांचा इस तरह का है कि कच्चे उत्पाद से मरीजों के इस्तेमाल तक पहुंचाने की लंबी चेन है जिससे आयुर्वेदिक दवाइयों की शेल्फ लाइफ प्रभावित होती है.’’ भारत में आयुर्वेद के विकास में रोड़े की मुख्य वजह विश्व स्तरीय अस्पताल का नहीं होना, नेशनल एक्रिडिएशन बोर्ड फॉर हॉस्पिटल ऐंड हेल्थकेयर प्रोवाइडर्स की मान्यता न होना, हेल्थ इंश्योरेंस में मंजूरी न होना भी है. डॉ. अभिमन्यु कुमार भी कहते हैं, ‘‘आयुर्वेद में सुपर स्पेशिएलिटी का न हो पाना इसके लिए चुनौती है. लेकिन अब हम प्रशिक्षित लोगों में से ही इसे तैयार कर रहे हैं.’’ आयुर्वेद की राह में चुनौती जीवनशैली से जुड़ी बीमारियों को दूर करने के लिए कुकुरमुत्तों की तरह बढ़ते हर्बल मसाज पार्लर, नकली हर्बल उत्पाद और दवाई की गुणवत्ता भी है. इसके लिए सरकार को फार्माकोपिया कमीशन को सुदृढ़ करना होगा.

आयुर्वेद की चुनौती इसको लेकर बनी धारणा भी है. अब नीति निर्माताओं का रुझान आयुर्वेद की ओर तेजी से बढ़ा है, लेकिन स्टेटस की वजह से वे इसे सार्वजनिक तौर से स्वीकार नहीं करते. वैद्य के पास जाने को आज भी लोग हेय दृष्टि से देखते हैं. इस धारणा को बदलने के लिए जरूरी है कि सरकार इसे प्राथमिकता के तौर पर ले. अभी तक का अनुभव बताता है कि एलोपैथी के अस्पतालों के लिए सरकारें प्राइम जगहों पर जमीन मुहैया कराती हैं जबकि आयुर्वेद के मामले में ऐसा नहीं है. अगर सरकार इसे प्राथमिकता के साथ एलोपैथी के अस्पतालों में एक विंग बनाकर प्रचार-प्रसार करे तो आयुर्वेद को एक शक्ति के रूप में स्थापित किया जा सकता है. मुख्य रूप से आयुर्वेद के शिक्षण पर निगाह रखने वालीं डॉ. तनुजा का कहना है कि जैसे एलोपैथी डॉक्टर बनने के लिए भौतिकी, रसायन शास्त्र और जीवन विज्ञान जरूरी होता है, उसी तरह स्कूली पाठ्यक्रम में सुश्रुत, चरक जैसे आयुर्वेदाचार्यों को भी पढ़ाया जाना चाहिए.

हालांकि इन दिक्कतों के बावजूद आयुर्वेद जीवनशैली का अंग बन चुका है. बड़े-बड़े अस्पतालों में इसकी अलग शाखाएं शुरू हो चुकी हैं. आयुर्वेद का मौजूदा ढांचा भी काफी बड़ा है और प्रति 10,000 की आबादी पर 6 आयुष प्रैक्टिसनर मौजूद हैं जबकि एलोपैथी में प्रति 10,000 पर 7 डॉक्टर उपलब्ध हैं. ऐसे में जरूरत है तो सिर्फ मानसिकता में बदलाव लाने की. अब अगर सरकार भी इसे अपनी सर्वोच्च प्राथमिकता में शामिल कर ले तो शायद वे दिन दूर नहीं जब योग दिवस की तर्ज पर विश्व समुदाय विश्व आयुर्वेद दिवस मनाना शुरू करे और भारत अपनी सभ्यता की पहचान का प्रणेता बन जाए.

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