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अयोध्या राम मंदिर विवाद: पानी की थाह लेने को फिर आ गए पत्थर

केंद्र और राज्य सरकार अयोध्या को सियासी अखाड़ा बनाने के लिए तैयार हैं, लेकिन 1992 से अब तक तरह-तरह के मंजर देख चुकी अयोध्या की जनता नेताओं के इरादों से खुश नहीं.

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aajtak.in
आशीष मिश्र/ आशीष मिश्र अयोध्या, 20 July 2016
अयोध्या राम मंदिर विवाद: पानी की थाह लेने को फिर आ गए पत्थर

शहर फैजाबाद के बेनीगंज चौराहे से चंद कदम की दूरी पर बने अयोध्या प्रवेश द्वार पर रामचरितमानस के सुंदरकांड की चौपाई लिखी हैः
'प्रबिसि नगर कीजे सब काजा।
हृदय राखि कोसलपुर राजा॥'

भावार्थ यह है कि अयोध्यापुरी के राजा भगवान राम को हृदय में रखते हुए नगर में प्रवेश करने से कठिन से कठिन कार्य आसानी से संपन्न हो जाता है. इसी अयोध्या नगरी में राम का नाम एक बार फिर कसौटी पर है.

प्रवेश द्वार से तकरीबन पांच किमी दूर रामसेवकपुरम में 'श्री राम जन्मभूमि न्यास' की कार्यशाला में 20 दिसंबर की शाम चार बजे, राजस्थान में भरतपुर के पास मौजूद बंसी की पहाड़ी से 'सैंड स्टोन' की खेप का अचानक पहुंचना एक सहज घटना नहीं थी. 2007 से बंसी की पहाड़ी में पत्थरों के खनन पर लगी रोक कोर्ट के आदेश के बाद 2013 में हट चुकी थी. रोक हटने के दो साल बाद अचानक पत्थरों का अयोध्या की कार्यशाला पहुंचना, श्री राम जन्मभूमि न्यास के कार्याध्यक्ष महंत नृत्यगोपाल दास का पत्थरों की पूजा करना और इससे पहले 7 से 10 दिसंबर तक विश्व हिंदू परिषद (विहिप) के महामंत्री और मंदिर निर्माण कार्यशाला के प्रमुख चंपत राय का यहां डेरा डालना महज संयोग नहीं था. यह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) की एक सोची-समझी स्क्रिप्ट का हिस्सा था, जिसने अयोध्या की प्रयोगशाला में एक बार फिर राम मंदिर मुद्दे की उर्वरता को आंकने का काम शुरू किया है.

बिहार चुनाव में बीजेपी की हार और विहिप के संरक्षक अशोक सिंघल के देहांत के बाद अयोध्या में अचानक राम मंदिर निर्माण कार्यशाला की गतिविधि का बढऩा कई रणनीतिक संकेत दे रहा है. विहिप दिखाना चाहती है कि सिंघल की मृत्यु के बाद राम मंदिर आंदोलन अभी ठंडा नहीं पड़ा है. मंदिर निर्माण के लिए कुछ पत्थर अयोध्या भेजकर संघ हवा के रुख को भांप रहा है ताकि यह पता लगाया जा सके कि मंदिर मुद्दे में अभी कितनी तपिश बाकी है?

संघ की बढ़ी सक्रियता की काट के लिए प्रदेश में सत्तारूढ़ सपा भी सीधे तौर पर उतर चुकी है. राम मंदिर आंदोलन के दौरान कारसेवकों पर गोली चलाने का आदेश देने वाले तत्कालीन मुख्यमंत्री और सपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव को इसी अयोध्या में संतों ने 'मुल्ला मुलायम' की उपाधि दी थी.

23 नवंबर को 77 वर्ष के हुए मुलायम सिंह का अयोध्या-फैजाबाद में 77 दिवसीय जन्मोत्सव मनाया जा रहा है. अयोध्या की सीमा पर स्थित जालपा देवी के मंदिर में दिन की शुरुआत एक विशेष हवन कार्यक्रम से होती है, जिसमें साधु-संतों के अलावा मुस्लिम समाज के लोग भी माथे पर टीका लगाए हवन में आहुति देते हैं. इसके बाद दिन भर कंबल वितरण, रक्तदान, गोष्ठी जैसे कार्यक्रमों के जरिए मुलायम सिंह को सभी वर्गों के हितैषी के रूप में पेश किया जाता है. जाहिर है कि पिछले विधानसभा चुनाव में अयोध्या में मुंह की खाने वाली बीजेपी और 2014 के लोकसभा चुनाव में बुरी तरह हारने वाली सपा के बीच एक बार फिर अयोध्या विधानसभा सीट प्रतिष्ठा का सवाल बन गई है.

अभी और गरमाएगा मंदिर मुद्दा
यह भी महज संयोग नहीं है कि बीजेपी ने फैजाबाद के सांसद लल्लू सिंह को दंगा पीड़ित जिले मुजफ्फरनगर में पार्टी के संगठनात्मक चुनाव का प्रभारी बनाकर भेजा है. रामसेवकपुरम से एक किमी दूर रामघाट चौराहे पर 'श्री रामजन्मभूमि न्यास' की एक दूसरी कार्यशाला है, जहां पत्थर तराशने का काम चल रहा है. फिलहाल यहां केवल दो शिल्पी, दो सुपरवाइजर और छह मजदूर ही इस काम में लगे हैं. अभी तक इसमें मंदिर निर्माण के लिए जरूरी पत्थरों में 60 फीसदी को तराशने का काम पूरा हो चुका है. गुजरात से आए सुपरवाइजर गिरीश भाई सोमपुरा कहते हैं, ''पिछले आठ साल के दौरान कार्यशाला में पत्थर न आने से काम धीमा हो गया था. अब नए पत्थर आने के बाद से जल्द ही शिल्पियों की संख्या बढ़ाई जाएगी.''
 स्थानीय लोगों का समर्थन नहीं
संघ ने भले ही मंदिर मुद्दे की आंच तेज करने के लिए मंदिर निर्माण कार्यशाला की सक्रियता बढ़ाई है, लेकिन इसे अयोध्या के स्थानीय लोगों का ही समर्थन नहीं मिल रहा. 1992 में बाबरी मस्जिद ध्वंस के बाद अंतरराष्ट्रीय पटल पर छाई अयोध्या में हालात जैसे-जैसे सामान्य होते गए, यहां देशी और विदेशी पर्यटकों की संक्चया में भी इजाफा हुआ. इसी दौरान यहां गाइड के व्यवसाय ने भी जोर पकड़ा. आज अयोध्या में मौजूद 70 फीसदी से ज्यादा गाइडों की उम्र 19 से 23 वर्ष के बीच है, जो बाबरी मस्जिद ध्वंस की घटना के बाद पैदा हुए हैं. ये युवा पढ़ाई के साथ-साथ अपना खर्च चलाने के लिए गाइड का काम भी करते हैं. इन्हीं में से एक मनीष पांडेय कहते हैं, ''अयोध्या में पत्थर आने के बाद हुए शोर-शराबे से दहशत पैदा हुई है और अचानक पर्यटकों की संख्या आधे से भी कम हो गई है.''

स्थानीय लोगों में आज भी मंदिर आंदोलन के दौरान लगने वाले कर्फ्यू का खौफ है. हनुमान गढ़ी के बाहर मिठाई की दुकान लगाने वाले कन्हैया गुप्ता कहते हैं, ''बरसों बाद अयोध्या में स्थितियां सामान्य हुई हैं. व्यवसाय पटरी पर लौट आया है. बच्चे शांति से स्कूल जाने लगे हैं. किसी भी तरफ से माहौल खराब करने की कोशिश को जनता माफ नहीं करेगी.''

कार्यशाला में पत्थर आने के बाद स्थानीय जनता से मिली ठंडी प्रतिक्रिया से विहिप नेता भी चौकन्ने हो गए हैं और इस मुद्दे पर फूंक-फूंककर कदम रखने की कोशिश कर रहे हैं. नेताओं को पहली बार यह महसूस होने लगा है कि इस मुद्दे पर अनावश्यक तेजी विरोध में माहौल बना सकती है. कार्यशाला से 200 मीटर दूरी पर मौजूद कारसेवक पुरम में कैंप कर रहे विहिप के केंद्रीय समिति के सदस्य और संरक्षक पुरुषोत्तम नारायण सिंह कहते हैं, ''हम सब कोर्ट के फैसले से बंधे हैं. इसका पूरा सम्मान होगा. कार्यशाला की जमीन हमारी है. यहां पत्थर लाने से कोर्ट के फैसले का अपमान तो हुआ नहीं. विपक्षी दल मुसलमानों के वोट हथियाने के लिए हाय-तौबा मचा रहे हैं.''

बीजेपी की राह कठिन
अयोध्या विधानसभा सीट पर दोबारा कब्जा जमाने में जुटी बीजेपी की राह आसान नहीं है. अयोध्या में बीजेपी के झंडाबरदार रहे पूर्व विधायक लल्लू सिंह 2014 के लोकसभा चुनाव में अयोध्या को समाहित करने वाली फैजाबाद सीट से जीतकर सांसद बन चुके हैं. विधानसभा चुनाव के लिहाज से बीजेपी अयोध्या में फिलहाल नेतृत्व विहीन नजर आ रही है.

साकेत डिग्री कॉलेज में इतिहास विभाग के शिक्षक रहे बांके बिहारी मणि त्रिपाठी, हनुमान गढ़ी के युवा साधू राजूदास, बीजेपी में शामिल हुए सपा व्यापार सभा के पूर्व अध्यक्ष और सपा के टिकट पर अयोध्या विधानसभा सीट से चुनाव लड़ चुके वेद प्रकाश गुप्ता, आजादी के बाद बाबरी मस्जिद परिसर में भगवान राम की मूर्तियां रखवाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाने वाले फैजाबाद के तत्कालीन सिटी मजिस्ट्रेट ठाकुर गुरुदत्त सिंह के पौत्र शक्ति सिंह जैसे नाम बीजेपी के संभावित उम्मीदवारों के रूप में सामने आए हैं. लेकिन इनमें से किसी एक का चयन करना गुटबाजी में फंसी पार्टी के लिए आसान नहीं होगा. हालांकि सांसद लल्लू सिंह कहते हैं कि पार्टी ने अयोध्या विधानसभा सीट के लिए एक खास रणनीति तैयार की है.

केंद्र और सूबे की सत्तारूढ़ सपा सरकार ने विकास योजनाओं के जरिए अयोध्या में अपनी पार्टियों की पैठ बनाने की कसरत शुरू की है. केंद्र सरकार की ज्यादातर घोषणाएं अभी जमीन पर न उतर पाने से भी पार्टी के खिलाफ स्थानीय लोगों की नाराजगी बढ़ी है. उधर, फैजाबाद लोकसभा सीट पर हारने के बाद अयोध्या के विधायक पवन पांडेय से राज्यमंत्री पद छीनने वाली सपा ने इन्हें दोबारा राज्यमंत्री बनाकर अपने इरादे जाहिर कर दिए हैं.

अयोध्या एक बार फिर अपने भविष्य को लेकर आशंकित है. अयोध्या से सटे गोंडा के जनकवि अदम गोंडवी की ये पंक्तियां जनमानस की मंशा को बखूबी रेखांकित करती हैं, ''हिंदू या मुस्लिम के एहसास को मत छेड़िए, अपनी कुर्सी के लिए जज्बात को मत छेड़िए. गर गल्तियां बाबर की थीं जुम्मन का घर फिर क्यों जले, ऐसे नाजुक वक्त में हालात को मत छेड़िए.''

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