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अरबपति का पतन

कभी देश के दिग्गज कारोबारी रहे अनिल अंबानी आज जेल की सजा का सामना कर रहे बकायेदार की भूमिका में हैं. इसके पीछे की बड़ी वजहें उनकी बेलगाम महत्वकांक्षाएं, खराब प्रबंधन और जोखिम भरे कारोबार का डूबना है. बड़ा सवाल अब यहां से कहां?

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aajtak.in
एम.जी. अरुण/ संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर मुबंई,दिल्ली, 20 March 2019
अरबपति का पतन शैलेष रावल

वर्ष 2005 की बात है. रविवार की एक सुबह नवी मुंबई के कोपर खैरणे स्थित धीरूभाई अंबानी नॉलेज सिटी (डीएकेसी) में सैकड़ों पत्रकार इक्ट्ठा थे. वे यहां रिलायंस घराने के छोटे युवराज अनिल अंबानी के मीडिया रिलेशंस सेल के बुलावे पर आए थे. उनके बड़े भाई मुकेश अंबानी प्रेस से इसी तरह कई बार मिल चुके थे, खासकर उन मुद्दों को लेकर, जिनके चलते परिवार के कारोबार का दोनों भाइयों के बीच बंटवारा हो गया. लगता था कि अनिल को वह मिल गया था जो वे चाहते थे—नए जमाने का टेलीकॉम कारोबार, उसके साथ वित्तीय सेवाएं और ऊर्जा कारोबार—जिनमें उस परिवार की रोजी-रोटी रहे पेट्रोकेमिकल कारोबार के मुकाबले भविष्य की बेहतर संभावनाएं थीं.

मुकेश के हिस्से में पेट्रोकेमिकल आया जो उस समूह का मूल कारोबार था और जिसमें वक्त-वक्त पर उतार-चढ़ाव आते रहते थे. मैराथन दौडऩे वाले और उम्र के चालीसवें में चल रहे अनिल उस दिन टेलीकॉम में अपनी भविष्य की योजनाओं का खाका पेश करते हुए आत्मविश्वास से दिपदिपा रहे थे. वे उत्साही और आक्रामक कारोबारी की तरह दिखाई दे रहे थे, जो हिंदुस्तान की मोबाइल टेलीकॉम क्रांति की संभावनाओं का पूरा फायदा उठाने के साथ ही अपने समूह—एडीएजी यानी अनिल धीरूभाई अंबानी ग्रुप—को कामयाबी की ऊंचाइयों तक ले जाने के लिए कमर कस चुके थे.

अब 2019 में आइए. अनिल के मोबाइल टेलीफोन उद्यम रिलायंस कम्युनिकेशंस (आरकॉम) का बोरिया-बिस्तर लगभग बंध चुका है और उनके ऊपर कर्जदाताओं का 48,000 करोड़ रु. बकाया है. उनका कारोबार फिक्स्ड-लाइन संचार, डेटा सेंटर सेवाओं और उद्यम समाधानों तक सिमट चुका है, जिसका राजस्व 2008 के 19,000 करोड़ रु. से बहुत-बहुत नीचे गिरकर 2018 के वित्तीय वर्ष में 4,684 करोड़ रु. रह गया था. इसका बाजार पूंजीकरण (शेयर बाजार में कंपनी के कामकाज को आंकने का एक तरीका) जनवरी 2008 के 1,65,917 करोड़ रु. की सबसे ऊंचे पायदान से फिसलकर 18 फरवरी, 2019 को 1,687 करोड़ रु. पर आ गया. अनिल की सूचीबद्ध कंपनियों का बाजार पूंजीकरण कुल मिलाकर महज 23,392 करोड़ रु. रह गया है. इसके मुकाबले मुकेश की रिलायंस इंडस्ट्रीज (आरआइएल) का बाजार पूंजीकरण 18 फरवरी को 7,70,592 करोड़ रु. था.

आरकॉम ने पिछले साल कहा था कि वह टेलीकॉम कारोबार से बाहर निकल जाएगी मगर इस साल 2 फरवरी को उसने यह कहकर निवेशकों को हैरत में डाल दिया कि वह राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (एनसीएलटी) में कर्जों के समाधान की एक योजना पेश करने जा रही है और ''उम्मीद करती है कि चुकाए न जा सकने वाले कर्ज और देनदारियों का बड़ा हिस्सा एनसीएलटी की प्रक्रिया के तहत समाप्त हो जाएगा.'' इस ऐलान के एक दिन बाद ही आरकॉम के साथ ही समूह की दूसरी छह कंपनियों के शेयर धड़ाम से नीचे आ गिरे, जिनमें आरकॉम के शेयरों ने तो 48 फीसदी का गोता लगाया. अनिल ने आरोप लगाया कि आरकॉम के 11 कर्जदाताओं में से दो—एलऐंडटी फाइनेंस होल्डिंग्ज और इडलवाइस—ने अपने पास ''गैरकानूनी तरीके से्य्य गिरवी रखे गए समूह की कंपनियों के शेयरों का कुछ हिस्सा बेच दिया, जिसकी वजह से दूरगामी असर की शुरुआत हुई. बाद में वे 90 फीसदी से ज्यादा कर्जदाताओं के साथ इस सैद्धांतिक 'स्थिर सहमति' पर पहुंचे कि उनके पास गिरवी रखे प्रमोटरों के कोई भी शेयर इस साल 30 सितंबर तक नहीं बेचेंगे.

इस बीच 20 फरवरी को अनिल को सुप्रीम कोर्ट की तरफ से जेल की सजा काटने की धमकी का सामना करना पड़ा. यह 550 करोड़ रु. की उस देनदारी के मामले में हुआ, जो आरकॉम को कभी उसके टेलीकॉम कारोबार को आउटसोर्स सेवाएं मुहैया करवाने वाली स्वीडिश कंपनी इरिकसन को चुकानी थी. सर्वोच्च अदालत ने कहा कि अनिल और दो डायरेक्टर—रिलायंस टेलीकॉम के चेयरमैन सतीश सेठ और रिलायंस इन्फ्राटेल की चेयरपर्सन छाया विरानी—को चार सप्ताह के भीतर इरिकसन इंडिया को 453 करोड़ रु. (पहले किए गए आंशिक भुगतान के बाद बची रकम) चुकाने होंगे और ऐसा नहीं करने पर उन्हें कम से कम तीन महीने तक जेल में रहना होगा. उम्मीद क की जा रही है कि आरकॉम अपने खाते में पड़ी तकरीबन 400 करोड़ रु. की इनकम टैक्स रिफंड की रकम से यह भुगतान करेगी.

सिर पर सवार महत्वाकांक्षा

एक दशक से कुछ ज्यादा वक्त में हिंदुस्तान के एक सबसे विवादास्पद कारोबारी का यह उत्थान और पतन इस बात को जानने-समझने की आदर्श मिसाल है कि बेलगाम महत्वाकांक्षा, एक साथ कई कारोबार में हाथ-पैर फैलाने और उन्हें संभाल नहीं पाने और कारोबार को फैलाने के लिए अंधाधुंध कर्ज लेने के साथ-साथ प्रतिकूल कारोबारी माहौल एक कारोबारी साम्राज्य को किस तरह धराशायी कर सकता है. जुलाई 2002 में जब दिल के दौरे से मुकेश और अनिल के पिता धीरूभाई अंबानी की कोई वसीयत छोड़े बगैर मृत्यु हो गई थी, तब यह मालूम देता था कि उन्होंने 25 से ज्यादा वर्षों की मेहनत से 28,000 करोड़ रु. का जो कारोबारी साम्राज्य खड़ा किया था और जिसने 1977 में आरआइएल के शेयर बाजार में सूचीबद्ध होने के बाद उन्हें पूंजी बाजारों का चहेता बना दिया था, वह बगैर किसी परेशानी के उनके दोनों बेटों के हाथों में आ जाएगा.

जब पिता अंबानी चेयरमैन थे, तब भी दोनों बेटे मिल-जुलकर जिम्मेदारी  संभालते थे. उनकी मृत्यु के बाद स्टैनफोर्ड से प्रबंधन की डिग्री लेने वाले केमिकल इंजीनियर मुकेश आरआइएल के चेयरमैन बने और व्हार्टन से एमबीए अनिल मैनेजिंग डायरेक्टर बने.

उम्मीद क थी कि दोनों भाई साथ मिलकर इस कारोबार को चलाएंगे—उस कारोबार को, जिसे कभी यमन में पेट्रोल पंप पर सहायक का काम करने वाले धीरूभाई ने बिल्कुल खाक से खड़ा किया था और पेट्रोकेमिकल में कारोबारी रणनीतियों के जरिए विभिन्न कारोबारों को ऊपर से नीचे तक आपस में जोड़ते हुए कपड़ा उद्योग में कच्चे माल के तौर पर काम आने वाले फाइबर के देश में सबसे बड़े निर्माता बन गए थे. मगर जल्दी ही यह साफ हो गया कि इस कारोबार का अगली पीढ़ी को हस्तांतरण आसान नहीं होगा.

दोनों भाइयों के बीच अनबन और कलह के पहले इशारे 2005 के शुरुआती दिनों में मिले, जब मीडिया के एक हिस्से में नाम लिए बगैर परिवार में आसन्न बंटवारे की खबरें छपीं. भाइयों के बीच खींचतान तब तक चलती रही, जब तक कि उनकी मां कोकिलाबेन आगे नहीं आईं.

अप्रैल 2005 में उन्होंने चार्टर्ड अकाउंटेंट एस. गुरुमूर्ति और बैंकर के.वी. कामथ सरीखे बाहरी वार्ताकारों की मदद और समर्थन से दोनों भाइयों के बीच एक सुलह-समझौता करवाया.

एक रविवार को ही सार्वजनिक किए गए इस समझौते के मुताबिक, रिलायंस इंडस्ट्रीज के तहत चलने वाला पेट्रोकेमिकल कारोबार मुकेश के हिस्से में आया, जबकि अब तक मुकेश की अगुआई में पाला-पोसा जा रहा टेलीकॉम कारोबार अनिल को मिला. दोनों भाइयों ने एक-दूसरे से होड़ या प्रतिस्पर्धा नहीं करने के एक समझौते पर भी दस्तखत किए—मुकेश टेलीकॉम कारोबार में पैर नहीं रखेंगे, जबकि अनिल ऊर्जा और पेट्रोकेमिकल से दूर रहेंगे.

जोखिम भरे निवेश

रिलायंस-अनिल धीरूभाई अंबानी ग्रुप या आर-एडीएजी के चेयरमैन की जिम्मेदारी संभालते ही अनिल के भड़कीले तौर-तरीके जाहिर हो गए. (बाद में इस समूह का नाम रिलायंस ग्रुप रख दिया गया, पर मुख्यधारा के मीडिया में इसका पहला संक्षिप्त नाम ही इस्तेमाल किया जाता रहा.) अपने भाई के मुकाबले मीडिया को बेहतर जानने-समझने वाले अनिल ने पूरे जोशो-खरोश से एक के बाद एक प्रेस कॉन्फ्रेंस (ज्यादातर रविवार को ही) संबोधित कीं और मीडिया में मिल रही तवज्जो का खूब मजा लिया.

उन दिनों यह लतीफा ही चल पड़ा था कि अनिल अपने टेलीकॉम कारोबार के नए प्रोडक्ट तक का ऐलान करने के लिए प्रेस कॉन्फ्रेंस बुलाएंगे और उसमें अपने अफसरों से उस ऐलान के बारे में भारी-भरकम प्रजेंटेशन पेश करवाएंगे, जिन्हें फिर बाद में पत्रकारों को फैक्स या ई-मेल से भी भेजा जा सकता है. उनके मुरीद उनकी जिन बातों की तारीफ करते नहीं अघाते थे, उनमें से एक यह थी कि वे दक्षिण मुंबई के अपने घर से डीएकेसी तक हफ्ते में दो बार अपने हेलिकॉप्टर से उड़कर जाते थे.

अमिताभ बच्चन सरीखी बॉलीवुड सेलेब्रिटी और समाजवादी पार्टी के नेता अमर सिंह सरीखे सियासतदां के साथ उनकी नजदीकी को लेकर जब-तब विवाद उठते रहते थे. इंडस्ट्री पर नजर रखने वाले एक जानकार कहते हैं, ''अनिल के सियासी रिश्तों को, खासकर विवादों से घिरे अमर सिंह के साथ उनकी नजदीकी को, आम जनता अच्छी नजर से नहीं देखती थी.'' अनिल को बॉलीवुड शुरू से ही लुभाता रहा था, तभी से जब उन्होंने उस वक्त की अव्वल अदाकारा टीना मुनीम का दिल जीता था और 1991 में उनके साथ शादी की थी.

फिर ताज्जुब क्या कि उन्होंने जिन कारोबारों में अपने पैर फैलाए, उनमें से एक मनोरंजन का कारोबार भी था. उन्होंने हॉलीवुड के फिल्म निर्माता स्टीवन स्पीलबर्ग की कंपनी ड्रीमवक्स्र स्टुडियो के साथ हाथ मिलाया, जो दुनिया भर के दर्शकों के लिए फिल्में बना रही थी. अनिल ने मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों की शृंखला एडलैब्स भी 2005 में उद्यमी मनमोहन शेट्टी से 350 करोड़ रु. में खरीद ली और 2008 तक हिंदुस्तान और विदेशों में 700 स्क्रीन के साथ सबसे ज्यादा मल्टीप्लेक्स के मालिक बन गए.

अलबत्ता सबसे जोखिम भरे निवेश उन्होंने ऊर्जा और बुनियादी ढांचे में किए. 2000 के दशक में सस्ती पूंजी के फेर में कई सारे कारोबारी—जिनमें गौतम अडानी, एस्सार के रुइया, हैदराबाद के कारोबारी जीएमआर ग्रुप के जी.एम. राव और जीवीके ग्रुप के जी.वी.के. रेड्डी तथा टाटा समूह शामिल थे—इन क्षेत्रों में भारी निवेश कर रहे थे और नई परियोजनाओं के लिए आक्रामक तरीके से बोली लगा रहे थे. अनिल भला कैसे पीछे रहते—उन्होंने 2008 और 2009 में सरकार की तरफ से बोली के लिए पेश की गई तीन बड़ी अल्ट्रा मेगा बिजली परियोजनाएं हासिल कर लीं—मध्य प्रदेश के सासन, झारखंड के तिलैया और आंध्र प्रदेश के कृष्णापटनम में. इस बीच रिलायंस इन्फ्रास्ट्रक्चर रेलवे, बिजली और सड़कों की परियोजनाओं के लिए भी बोली लगा रहा था.

नकदी का भूखा कारोबार

अनिल की मौजूदा हालत को उनके वकील मुकुल रोहतगी ने इस फरवरी में इरिकसन मामले की सुनवाई के दौरान उनकी तरफ से वकालत करते हुए बयान किया था. रोहतगी ने अदालत से कहा, ''कोई भी अपनी कंपनी गंवाना पसंद नहीं करता. बदकिस्मती से आरकॉम पर बुरे दिन आन पड़े हैं. मैंने इसे बचाने की कोशिश की, पर नहीं बचा सका.''

वहां खड़े और अदालत की कार्रवाई देख रहे छोटे अंबानी की मौजूदगी में रोहतगी ने कहा, ''अब यह आइआरपी (दिवालिया प्रक्रिया के लिए नियुक्त किए जाने वाले अंतरिम समाधान पेशेवर) के ऊपर है. मैं किसी भी ऐसे शख्स की तरह हूं जो अपनी कंपनी गंवा चुका है.'' उनके वकील उनकी खातिर यह दलील देते मालूम दे रहे थे कि उन्हें एक ऐसे शख्स की तरह न देखा जाए जिसने अपनी दौलत को हवा में उड़ा दिया, बल्कि ऐसे प्रतिकूल कारोबारी माहौल से प्रताड़ित 'शख्स की तरह देखा जाए जिसमें तगड़ी प्रतिस्पर्धा से लेकर गलत टेक्नोलॉजी पर दांव लगाने और आर्थिक सुस्ती तक कई बाहरी कारक उसके खिलाफ चले गए.

जानकारों का कहना है कि अनिल पारिवारिक कारोबार के बंटवारे के फौरन बाद से ही पूंजी निगलने वाली परियोजनाओं को हाथ में लेने पर उतारू थे. शेयर बाजार के एक टिप्पणीकार, जो अपना नाम बताना नहीं चाहते, कहते हैं, ''उनके फैसले एहतियात से बुनी गई रणनीति से निकलकर नहीं आए थे. ये फैसले महत्वाकांक्षा के फेर में पड़कर लिए गए थे.'' वहीं एक दूसरे टिप्पणीकार कहते हैं कि भारी-भरकम परियोजनाओं के लिए बोली लगाना (उन दिनों) फैशनेबल था, जिनमें सियासतदानों के इशारे पर सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों (पीएसबी) के जरिए रकम लगाई जाती थी.

2008 में लीमन ब्रदर्स के धराशायी होने के फौरन बाद आई आर्थिक सुस्ती के ठीक पहले माहौल यह था कि अपने देश और विदेश दोनों में अधिग्रहण और विस्तार पर खुलकर रकम खर्च की जाए. अलबत्ता आर्थिक सुस्ती के बाद इस माहौल में जमीन-आसमान का फर्क आ गया.

बुनियादी ढांचों और बिजली की परियोजनाओं में अंधाधुंध रकम झोंकने के बाद भारी-भरकम गैर-निष्पादित संपत्तियां जुटा लेने वाले पीएसबी इन क्षेत्रों में और रकम लगाने से हाथ खींचने लगे. यूपीए सरकार के दूसरे कार्यकाल के खत्म होने के समय तकरीबन 2 लाख करोड़ रु. की परियोजनाएं फंस गईं, जब 2जी विवाद और कोलगेट के बाद अफसरशाहों ने नीतिगत अड़चनों से घिरकर हाथ खड़े कर दिए. इस 2जी विवाद में गद्दीनशीन पार्टी के सहयोगी दल डीएमके और तत्कालीन टेलीकॉम मंत्री ए. राजा पर आरोप लगे थे कि उन्होंने बिना बारी के स्पेक्ट्रम आवंटित करके कई कंपनियों को, जिनमें से कुछ को तो इस क्षेत्र का कोई तजुर्बा भी नहीं था, बेजा फायदा पहुंचाया था और कोलगेट में भी कोयला खदानों के अधिकार देने के मामले में इसी किस्म के आरोप लगे थे.

फिर अनिल मुकेश के साथ एक लंबी कानूनी लड़ाई में उलझ गए. इसमें झगड़े की जड़ उस गैस की कीमत थी, जो के-जी बेसिन में मुकेश के तेल क्षेत्रों से उत्तर प्रदेश के दादरी में अनिल के प्रस्तावित 4,000 मेगावाट के बिजली संयंत्र को दी जानी थी. 2010 में सबसे ऊंची अदालत ने फैसला दिया कि दोनों भाई पारिवारिक सौदे पर फिर से बातचीत करें और उसने गैस की कीमत तय करने का अधिकार सरकार को दे दिया. नए करार में उन्हें सरकार की तय कीमत 4.2 डॉलर प्रति मिलियन मीट्रिक ब्रिटिश थर्मल यूनिट (एमएमबीटीयू) पर राजी होना पड़ा, जबकि 2005 में दोनों भाई 17 वर्षों के लिए 2.34 डॉलर एमएमबीटीयू की कीमत पर राजी हो गए थे. जानकारों का कहना है कि इससे प्राकृतिक संसाधनों की कीमत तय करने को लेकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय को गलत संकेत तो गए ही, उधर कानूनी लड़ाई-झगड़े की वजह से दोनों भाइयों के बीच मनमुटाव और गहरा हो गया. 2014 में अनिल ने जमीन हासिल करने में आ रही दिक्कतों और गैस की सप्लाई से जुड़े मुद्दों का हवाला देकर दादरी परियोजना से हाथ खींच लिए.

हालांकि मीडिया ने मुकेश के साथ बाज दफे हुई अनिल की मुलाकातों को खासा बढ़-चढ़कर दिखाया, चाहे वे कारोबारी कॉन्फ्रेंस हों या बिल्कुल हाल ही में कारोबारी अजय पीरामल के बेटे आनंद पीरामल के साथ मुकेश की बेटी ईशा की शादी सहित पारिवारिक कार्यक्रम, पर मुकेश ने इस कानूनी झगड़े के लिए अनिल को जाहिरा तौर पर कभी माफ नहीं किया. लिहाजा आपस में प्रतिस्पर्धा नहीं करने का राजीनामा मई 2010 में रद्दी की टोकरी में डाल दिया गया, तब मुकेश ने जरा वक्त नहीं गंवाया और टेलीकॉम कारोबार में उतर पड़े. 2010 में ही 4,800 करोड़ रु. में इन्फोटेल ब्रॉडबैंड का अधिग्रहण करने के साथ मुकेश ने उस घटना की नींव रखना शुरू कर दिया जो आने वाले दिनों में टेलीकॉम के बाजार में सबसे बड़ी उथल-पुथल मचाने वाली थी. अक्तूबर 2016 में कहीं बेहतर 4जी टेक्नोलॉजी और उसके साथ 2.7 लाख किलोमीटर की फाइबर ऑप्टिक लाइनों के साथ जिओ के आगमन ने तमाम बड़ी टेलीकॉम कंपनियों—आरकॉम, एयरटेल और वोडाफोन—को हिलाकर रख दिया.

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