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कृषि संकट-कड़वी फसल

फल और सब्जियों के किसान सही दाम न मिलने से संकट में, रिकॉर्ड पैदावार और भंडारण तथा बिक्री की पर्याप्त व्यवस्था न होना बना अभिशाप, सरकारी नीतियों से खास राहत नहीं.

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aajtak.in
संध्या द्विवेदी/ मंजीत ठाकुर 27 March 2019
कृषि संकट-कड़वी फसल हिसार में फसल के मुनासिब दाम न मिलने से नाराज किसान

उत्तर प्रदेश के बरेली जिले की मीरगंज तहसील के रसूलपुर गांव के एक एकड़ की छोटी जोत के किसान रतनलाल सिर थामे बैठे हैं. उनके खेत की गोभी पड़ोस के बाजार मीरगंज में एक रुपए प्रति किलो बिकी तो वे हैरान हैं कि आखिर वे किसके लिए खेत में दिन-रात जुटे रहे. वे कहते हैं, ''पत्नी और दो बच्चों के साथ हमारे पूरे परिवार ने तड़के पांच बजे से लगकर दोपहर 12 बजे तक करीब 1,000 किलो गोभी तोड़ी. लेकिन उससे 500 रु. ही मिले. अब इसमें ढुलाई, बीज, खाद, यूरिया, डीजल, दवा सब खर्चा जोड़ लें तो लागत भी नहीं निकल रही है.'' रतनलाल ने मंडी न जाकर पास के बाजार में ही उपज बेचने का फैसला किया क्योंकि मंडी 35 किलोमीटर दूर है और परिवहन खर्च के अलावा मंडी शुल्क और पल्लेदारी भी देनी पड़ती है.

रसूलपुर के करीब 100 किसानों में से 90 से ज्यादा परिवार अपनी छोटी जोत में आलू, अरबी, गोभी, मिर्च, केला, प्याज, धनिया जैसी सब्जियों और फलों की ही खेती करते हैं. हालांकि फल-सब्जियों की खेती उनका शौक नहीं, बल्कि मजबूरी है.

दो-चार अपवादों के अलावा ज्यादातर किसानों की जोत का आकार दो से तीन बीघे ही है. रतनलाल कहते हैं, ''इतनी छोटी जोत में अगर धान, गेहूं या गन्ना लगा देंगे तो साल भर खाएंगे क्या? सब्जी की खेती में मेहनत ज्यादा है, लेकिन फसल थोड़े समय में हो जाती है.''

इस खेती का क्या करें

रतनलाल की विपदा उस भीषण संकट की मिसाल भर है जो देश में बागवानी किसानों के आगे खड़ा है. उपज में लगातार बढ़ोतरी हो रही है मगर लागत में बढ़ोतरी के साथ दाम लगातार टूटते जा रहे हैं.

इस साल जारी कृषि मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 2018-19 में फल और सब्जियों की पैदावार के 1 फीसदी बढ़कर 31.45 करोड़ टन रहने का अनुमान है. सब्जियों की उपज इस साल 3.5 फीसदी बढ़कर 18.75 करोड़ टन और फलों की पैदावार 4.8 फीसदी बढ़कर 9.73 करोड़ टन रहने का अनुमान है.

यही नहीं, सब्जियों में आलू, प्याज, टमाटर, तीनों ही फसलों की उपज बढऩे से दाम टूटने के संकेत मिल रहे हैं. एक सरकारी पूर्वानुमान के मुताबिक आम, सेब, केला और रसदार खट्टे फलों की पैदावार भी इस साल बढ़ सकती है और दाम टूट सकते हैं (देखें ग्राफिक्स).

बागवानी के किसान चाहे जो उगाएं, संकट में ही हैं. रसूलपुर के ही किसान हरिप्रसाद के दो बीघे खेत से आलू निकाला जा रहा है. हरिप्रसाद कहते हैं, ''आलू अगर सात रुपए प्रति किलो से कम में बिकता है तो लागत नहीं निकलती. इस समय मंडी में आलू 500 रु. से 550 रु. प्रति क्विंटल बिक रहा है.

यह तेजी भी त्यौहारी सीजन में बढ़ी मांग के कारण देखने को मिल रही है. फरवरी में आलू का भाव 400 रु. क्विंटल था. हरिप्रसाद आगे कहते हैं, ''यह चुनावी साल है. आलू-प्याज के दाम चुनावी मुद्दा बन जाते हैं. इसलिए इस साल दाम बहुत नहीं चढ़ेगा.''

पूरे गांव में आधा दर्जन से ज्यादा किसानों से बातचीत का कुल जमा निष्कर्ष यह था कि किसान फसल के सही दाम न मिलने से परेशान हैं.

देश में सबसे ज्यादा आलू पैदा करने वाले उत्तर प्रदेश के आलू किसानों का संकट इतना भीषण है कि 30 जनवरी को ये किसान सत्याग्रह यात्रा लेकर दिल्ली में राजघाट पर महात्मा गांधी की समाधि पर पहुंचे. उन्होंने मांग की कि आलू का न्यूनतम मूल्य 1200 रुपए प्रति क्विंटल या 12 रु. प्रति किलो किया जाए.

इसी तरह देश की सबसे बड़ी प्याज मंडी महाराष्ट्र के लासलगांव में दारी गांव से आए 40 वर्षीय किसान वि-ल पिसाई बताते हैं, ''इस सीजन में प्याज के भाव सौ रुपए प्रति क्विंटल से भी नीचे गिर गए. वि-ल ने इस बार डेढ़ एकड़ रकबे में प्याज लगाया था. जिस पर 80,000 रु. की लागत आई थी और 22 टन प्याज की पैदावार हुई थी.

मंडी की फीस और पल्लेदारी तक के खर्चे के बाद पूरी फसल बेचने पर उनके हाथ कुल 42,000 रुपए आए.'' इस पर भी वे खुद को खुशकिस्मत मान रहे हैं क्योंकि इसके बाद प्याज के भाव उनके बिक्री मूल्य से आधे रह गए थे.

टमाटर के मामले में अग्रणी तेलंगाना के किसान टी. सागर कहते हैं, ''टमाटर की खेती घाटे का सौदा होती जा रही है. खेत में टमाटर लगाने से लेकर मंडी लाने तक एक क्विंटल टमाटर की लागत का हिसाब लगाएं तो 600-650 रु. तक आती है, जबकि इस सीजन में टमाटर 300 रुपए प्रति क्विंटल तक बिक गया.''

यह हाल उन किसानों का है जो तेलंगाना की बड़ी मंडी रंगारेड्डी के 100-150 किलोमीटर तक के दायरे में रहते हैं. जो किसान दूर से आते हैं उनकी परिवहन लागत और बढ़ जाती है, जबकि भाव वही मिलता है.

सब्जियों की तरह फलों की खेती करने वाले किसान भी उपज के सही दाम न मिलने से परेशान हैं. उत्तराखंड के रामनगर के किसान अनिल शारदा ने करीब 15 एकड़ जमीन पर अमरूद लगा रखे हैं. शारदा कहते हैं, ''इस साल बाग से अमरूद 15 से 20 रुपए प्रति किलो उठ रहा है, जबकि पिछले साल यही भाव 45 से 50 रु. तक था.''

दरअसल मौसम की मार से पिछले सीजन में उपज कम हुई थी तो अमरूद 100 रुपए किलो तक बिक गया था. शारदा कहते हैं, ''भाव अच्छा देखकर इस साल ज्यादा किसानों ने अमरूद लगाए लेकिन बाजार में ज्यादा माल आने से कीमतें टूट गई.''

हिमाचल प्रदेश के कोटखाई में सेब उपजाने वाले दिग्विजय चौहान कहते हैं, ''इस सीजन में सेब के दाम पिछले साल की तुलना में 500 रु. प्रति पेटी तक कम थे. इसकी वजह बाजार में सेब की भरमार थी.''

इस भरमार की वजह चीन और अमेरिका से आयातित सेब और अनुमान से ज्यादा सेब की उपज थी. चौहान आगे कहते हैं, ''सेब की क्वालिटी, ग्रेड के हिसाब से सेब की पेटी के भाव अलग अलग होते हैं. टॉप क्वालिटी का जो सेब इस साल बाजार में 1500 रुपए पेटी बिका, उसका दाम पिछले साल 2,000 रुपए प्रति पेटी तक था.''

  

महाराष्ट्र के नंदुरबार जिले में केले की खेती करने वाले किसान सागर देशपांडे कहते हैं, ''इस सीजन में केले का भाव 500 रुपए प्रति क्विंटल तक मिला है, जो किसानों को औसतन 1200 रुपए तक मिलता था.''

कीमतों में इस गिरावट की वजह फसल के अनुकूल मौसम रहने से पैदावार का ज्यादा होना और निर्यात का कमजोर रहना बताया जाता है.

देशपांडे आगे कहते हैं, ''इस बार एक एकड़ में केला पैदा किया था, जिसमें 60-65,000 रुपए का खर्चा आया जबकि पूरी फसल मंडी में बेचने पर कुल 50 से 55,000 रुपए ही मिले.''

किसान से व्यापारी किलो के भाव केला खरीदते हैं और ग्राहक को दर्जन के हिसाब से बेचते हैं. गौरतलब है कि फलों को सड़क पर फेकने की घटनाएं सामने नहीं आतीं लेकिन इस सीजन में मध्य प्रदेश के बड़वानी जिले में केले को सड़क पर फेंकने की खबरें भी सामने आई थीं. बड़वानी में केले की खेती प्रमुखता से होती है.  

पैदावार बढ़ाओ और रोओ

देश के सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) में 17 फीसदी से ज्यादा योगदान करने वाले कृषि क्षेत्र में बागवानी की हिस्सेदारी 30 फीसदी की है, जबकि बागवानी का रकबा कुल कृषि क्षेत्रफल में 15 फीसदी से कम है.

बागवानी में फल और सब्जियों की उपज की हिस्सेदारी 90 फीसदी है. बाकी 10 फीसदी में मसाले, शहद, प्लांटेशन वगैरह है. सरकारी आंकड़े भी बताते हैं कि देश में आलू, प्याज और टमाटर की पैदावार मौजूदा मांग से ज्यादा हो रही है.

फल और सब्जियों का रकबा और उर्वरता कम होने के बाबजूद देश में बागवानी की पैदावार लगातार बढ़ रही है.

भारत में सब्जियों की प्रति हेक्टेयर पैदावार 17.6 टन है, जबकि चीन में प्रति हेक्टेयर पैदावार 23.4 टन और अमेरिका में 32.5 टन है.

यही नहीं, 2012-13 में बागवानी की कुल पैदावार (26.88 करोड़ टन) अनाज की कुल उपज (25.71 करोड़ टन) से भी अधिक हो गई. 2016-17 में बागवानी की कुल पैदावार 30 करोड़ टन को पार कर गई, जबकि अनाज की कुल उपज 27.5 करोड़ टन के करीब थी.

बागवानी पैदावार में इस बढ़ोतरी की वजह बताते हुए भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के उप-महानिदेशक (बागवानी) आनंद कुमार सिंह कहते हैं, ''सरकार ने कृषि उपज से जुड़ी नीतियां बनाईं और उस पर ध्यान केंद्रित किया. इसका फायदा बागवानी को भी हुआ.

इसके अलावा हाल के वर्षों में बागवानी क्षेत्र में टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा और इसकी पहुंच किसानों तक हुई. इसके अलावा बीज की नई किस्मों से भी उपज में वृद्धि हुई.''

फिर, सचाई यह भी है कि नकदी फसल के जरिए अच्छे रिटर्न की उम्मीद में भी किसान फल और सब्जियों की खेती अधिक करने लगे हैं. भारत में इसे किसानी के क्षेत्र में मौलिक बदलाव का संकेत भी मान सकते हैं.

मंडियों का टोटा

फल और सब्जियों के किसान बुनियादी ढांचे के अभाव में इस पैदावार बढ़ोतरी का लाभ नहीं ले पाते. फसल तैयार होने के बाद किसान इसको खेत में ज्यादा दिन तक नहीं छोड़ सकते. समय आने पर उसे तोडऩा जरूरी हो जाता है. ऐसे में अगर सही समय से मंडी में उपज नहीं बिकी तो कोल्डस्टारेज की कमी या उसमें उपज रखने का खर्च वहन न कर पाने के कारण किसान उसे सड़क पर फेंकने को मजबूर हो जाता है.

छोटे किसान फसल के दामों में गिरावट की स्थिति में दूर मंडी जाने से कतराते हैं. मंडी तक पहुंचने में परिवहन की लागत भी बढ़ती है और मंडी का शुल्क भी भरना पड़ता है. ऐसे में केवल बड़े किसान ही मंडियों का रुख करते हैं और छोटे किसान आसपास के बाजारों में ही अपनी उपज खपाने को मजबूर होते हैं.

कृषि नीति विशेषज्ञ देवेंद्र शर्मा कहते हैं, ''देश में इस समय कुल 7,700 कृषि उपज बाजार समिति (एपीएमसी) मंडियां हैं, जबकि जरूरत 42,000 मंडियों की है.'' बकौल शर्मा, हर पांच किलोमीटर के दायरे में एक मंडी या बड़ी मंडी का खरीद केंद्र होना चाहिए, जहां किसान आसानी से अपनी उपज बेच सके. शर्मा आगे कहते हैं, ''सरकार दूध की तरह ही सब्जियों और फल की खरीद के लिए पहले से उपलब्ध बुनियादी ढांचे मसलन, मदर डेयरी का को-ऑपरेटिव बनाकर इस्तेमाल कर सकती है. किसानों को अगर उनकी उपज बेचने के लिए उपयुक्त बाजार मिले तो मौजूदा हालात में सुधार लाया जा सकता है.''

आलू और प्याज को छोड़ दें तो ज्यादातर फल और सब्जियां खेत से टूटने के बाद एक या दो दिन तक ही ताजा रहती हैं, इसलिए दूर की मंडियों तक पहुंचने में उपज की कीमत घट जाती है. केंद्रीय कृषि मंत्री राधा मोहन सिंह ने इंडिया टुडे से खास बातचीत में कहा, ''देश में मंडियों की कमी को दूर करने के लिए कई मोर्चे पर प्रयास किए जा रहे हैं.''

फिलहाल देश में कुल 6,630 सरकारी कृषि उपज मंडियां हैं. मंडियों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ देश में पहले से चल रहे 22,941 ग्रामीण हाटों को भी अपग्रेड किया जा रहा है. राज्य सरकारों को नियमों में सुधार करके गोदामों और कोल्ड स्टोरेज को भी बाजार का दर्जा दिए जाने के लिए सुझाव दिया गया है.

राधा मोहन सिंह आगे कहते हैं, ''विपणन अधिनियमों में सुधार करके निजी क्षेत्र की भी मंडियां स्थापित की जा रही हैं, ताकि मंडियों की संख्या बढऩे के साथ-साथ बिक्री में होड़ बढ़ाई जा सके. फिलहाल 100 ऐसे निजी क्षेत्र की मंडियों की स्थापना के लिए संबंधित राज्य सरकारों ने अनुमति भी दे दी है.''

ई-मंडी आने से हालात कितने बदले, इस सवाल के जवाब में नेशनल हॉल्टीकल्चर बोर्ड के एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, ''मंडियों के इलेक्ट्रॉनिक होने से कुछ असर तो पड़ा है. पहले किसी एक मंडी में किसी फल या सब्जी की भरमार होती थी और दूसरे में उसका अभाव रहता था. लेकिन अब देश में किसी मंडी में वह स्थिति तब आती है जब देश की ज्यादातर मंडियों में स्टॉक भर जाता है. वरना किसी भी बाजार से मांग आती रहने पर फल या सब्जियों के दाम स्थायी रहते हैं.''

देशभर में अभी करीब 600 मंडियां ही ई-नैम से जुड़ी हैं. वे बताते हैं, ''मंडियों में धांधली भी बाजार में संकट का एक बड़ा कारण है. मंडियों में आढ़ती बनने के लिए राज्यों में मोटी रिश्वत चलती है. मंडियों में आने वाली गाडिय़ों की एंट्री पूरी नहीं होती.

राजनैतिक दवाब के कारण मंडियों में कई अनियमितताएं होती हैं.'' जब तक मंडियों के कामकाज में पारदर्शिता नहीं आएगी और मडिंयों की संख्या नहीं बढ़ाई जाएगी, तब तक सूरत-ए-हाल बदलना मुश्किल है.

कोल्डस्टोरेज की समस्या

भारत फल और सब्जियों की पैदावार में चीन के बाद दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा देश है. लेकिन देश में भंडारण की बुनियादी सुविधाओं के अभाव में बड़ी मात्रा में किसान की उपज बर्बाद हो जाती है.

सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी रिसर्च की रिपोर्ट 'गवर्नमेंट रोल इन इंडियाज एलिंग कोल्ड स्टोरेज सेक्टर' के मुताबिक देश में 18 फीसदी फल और सब्जियां खेतों से कटाई के बाद भंडारण की सुविधा के अभाव में नष्ट हो जाती हैं.

देश में केवल 2 फीसदी उपज ही कोल्ड स्टोरेज में रखी या इसके माध्यम से ट्रांसपोर्ट की जाती है, जबकि अमेरिका में यह आंकड़ा 85 फीसदी है.

भारत में कुल कृषि उपज 57.5 करोड़ टन के करीब है जबकि कोल्डस्टोरेज 7,129 ही हैं, जिनकी कुल भंडारण क्षमता 3.2 करोड़ टन है. देश में 96 फीसदी कोल्डस्टोरेज निजी हाथों में हैं, केवल 4 फीसदी ही सरकार या को-ऑपरेटिव के हैं. देश में उपलब्ध कुल क्षमता में से 75 फीसदी कोल्डस्टोर आलू के हैं. 23 फीसदी कोल्डस्टोरेज बहुउद्देशीय हैं. फल और सब्जियों के लिए माकूल कोल्ड स्टोरेज की संख्या मात्र 0.39 फीसदी है.

उद्योग जगत के आंकड़ों के मुताबिक देश के विभिन्न शहरों के बीच हर साल 10.4 करोड़ टन जल्द खराब होने वाली (पेरेशिएबल) उपज की ढुलाई होती है. जिसमें महज 40 लाख टन ही रेफ्रिजरेटेड माध्यम के जरिए होती है, शेष 10 करोड़ टन की ढुलाई बिना रेफ्रिजरेटर के ही होती है. नेशनल सेंटर फॉर कोल्डचेन मैनेजमेंट के मुताबिक देशभर में करीब 10,000 ऐसे वाहन हैं जिनमें रेफ्रिजरेटर की व्यवस्था है, जबकि उद्योग जगत के आंकड़े बताते हैं कि असंगठित क्षेत्र में निजी खिलाडिय़ों की ओर से में कुल 25,000 वाहन चलाए जा रहे हैं. इनमें फल और सब्जियों की ढुलाई में महज 15 फीसदी वाहनों का ही इस्तेमाल किया जाता है.

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