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पंजाब में आम आदमी पार्टी को लगा पलीता

भ्रष्टाचार और यौन शोषण के आरोपों से घिरी आम आदमी पार्टी के लिए पंजाब में अचानक हालात बिगडऩे लगे.

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असित जॉलीचंडीगढ़, 14 September 2016
पंजाब में आम आदमी पार्टी को लगा पलीता पंजाब में आप के पूर्व प्रमुख सुच्चा सिंह छोटेपुर 3 सितंबर, 2016 को स्वर्ण मंदिर में

वह जबरदस्त उत्साह याद है? जब दिल्ली के मुख्यमंत्री और आम आदमी पार्टी (आप) के मुखिया अरविंद केजरीवाल ने पंजाब में अपना पहला बड़ा धावा बोला था और जनवरी के माघी मेले में जोरदार खुशगवार नारों से उनका शानदार स्वागत किया गया था. दो टूक कहें तो उस वक्त उन्होंने भगत सिंह के अंदाज में बसंती सिख पगड़ी भी बांध रखी थी. अपने लड़ाकू तेवर दिखाते हुए केजरीवाल ने भ्रष्टाचार, नशीले पदार्थों और तमाम दूसरी बुराइयों को पंजाब से उखाड़ फेंकने का वादा किया था. यहां तक कि उन्होंने नाम लेकर हमले किए थे—उन्होंने वादा किया था कि अगर सत्ता में आए तो ''विक्रम मजीठिया (शिरोमणि अकाली दल के मंत्री और उपमुख्यमंत्री सुखबीर बादल के साले) को कानों से पकड़ घसीटकर लाएंगे और जेल में डाल देंगे.'' भीड़ ने तब उन्हें हाथोहाथ लिया था और राज्य में संगठन खड़ा करने की शुरुआत के बाद महज छह महीनों में आप पक्की कामयाबी की ओर बढ़ती दिखाई दे रही थी. वह पंजाब के सियासी अखाड़े का नया और उत्साही पहलवान थी.

मगर अचानक अब चीजें उतनी शानदार दिखाई नहीं दे रही हैं. आने वाले विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी के टिकट बेचने से लेकर संभावित उम्मीदवारों से केंद्रीय पर्यवेक्षकों के यौन अनुग्रहों की मांग करने तक, एक के बाद एक संगीन आरोपों के बीच अमृतसर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र के लंबे वक्त से आप के क्षेत्रीय प्रभारी 50 वर्षीय गुरिंदर सिंह बाजवा ने 4 सितंबर को पार्टी छोडऩे का ऐलान कर दिया. बड़ी तादाद में 85 दूसरे पदाधिकारियों ने भी इस्तीफे दे दिए. कुछ लोगों का कहना है कि इस्तीफा देने वालों में अमृतसर-गुरदासपुर की सरहदी पट्टी में आप के 80 फीसदी अहम कार्यकर्ता शामिल हैं.

ये सामूहिक इस्तीफे आप के केंद्रीय नेतृत्व के 27 अगस्त के उस फैसले के बाद आए जिसमें राज्य संयोजक सुच्चा सिंह छोटेपुर को पार्टी से निकाल दिया गया था. सूबे के सियासी दिग्गज और पूर्व अकाली नेता छोटेपुर ने राज्य में पार्टी को खड़ा करने में अहम भूमिका निभाई थी. छोटेपुर को एक स्टिंग ऑपरेशन के बाद हटाया गया, जो बहुत-से लोगों के मुताबिक, दिल्ली के आप नेताओं के इशारे पर किया गया था और इसमें वे एक पार्टी कार्यकर्ता से 2 लाख रुपए लेते हुए पकड़े गए थे. छोटेपुर की जगह अब टीवी के हंसोड़ गुरप्रीत सिंह 'घुग्गी' को लाया गया है.

जाहिरा तौर पर 'बाहर वालों' और 'दिल्ली वालों'—संजय सिंह और दुर्गेश पाठक की अगुआई में आप के 54 नेताओं और पर्यवेक्षकों के दस्ते को सूबे के कार्यकर्ता यही कहते हैं—को कतई अंदाजा नहीं था कि राज्य में पार्टी को खड़ा करते हुए छोटेपुर ने कितनी गहरी जड़ें जमा ली थीं. छोटेपुर को बाहर करने के महज दो दिन बाद 30 अगस्त को आप के 13 क्षेत्रीय समन्वयकों (हर लोकसभा निर्वाचन क्षेत्र के लिए एक) ने केंद्रीय नेतृत्व को अल्टीमेटम दे दिया कि छोटेपुर को बहाल करो और संजय-दुर्गेश की जोड़ी को पंजाब से वापस बुलाओ. अल्टीमेटम के बाद सामूहिक इस्तीफों का सिलसिला शुरू हो गया. केवल अमृतसर में ही नहीं, बल्कि मनसा, बठिंडा, फिरोजपुर और फरीदकोट में भी. पार्टी से इस कूच के साथ ही तलहटी में दबी सारी कीचड़ और गंदगी बाहर आ गई.

उधर, बिजवासन (दिल्ली) से पार्टी के विधायक देविंदर सहरावत ने केजरीवाल को लिखी अपनी चिट्ठी जारी कर दी, जिसमें उन्होंने पंजाब में नेताओं की कथित 'यौन चरित्रहीनता' को लेकर चिंता जाहिर की थी. उसके फौरन बाद संगरूर के सांसद भगवंत मान के गृह निर्वाचन क्षेत्र के बरनाला में आप के धड़े ने एक ऑडियो रिकॉडिंग जारी कर आरोप लगाया कि दिल्ली से भेजे गए पर्यवेक्षक विजय चौहान ने एक नौकरानी का यौन शोषण किया, जिसे उन्होंने पंजाब में काम करने के लिए रखा था. बरनाला में आप की युवा शाखा के प्रमुख रविंदर ढिल्लों ने चौहान पर आरोप लगाया कि उन्होंने ''नौकरानी का मुंह बंद रखने के लिए घूस दी'' थी.

वैसे चौहान ने आरोपों से से इनकार किया है, मगर यह और दूसरे इतने ही चिंताजनक आरोप पंजाब में आप की चुनावी संभावनाओं को बुरी तरह नुक्सान पहुंचा सकते हैं. पंजाब से राष्ट्रीय परिषद के सदस्य पवित्तर सिंह ने संजय सिंह और पाठक पर फिल्लौर से टिकट के लिए 50 लाख रुपए मांगने का आरोप लगाया. वहीं छोटेपुर के सहयोगी हरदीप सिंह किंगड़ा ने दावा किया कि लुधियाना के क्षेत्रीय समन्वयक अंबरीश त्रिखा ने पाठक से मिलवाने के लिए 5 लाख रु. मांगे. ऐसी कलंक गाथाओं ने उस आक्रोश को और बढ़ा दिया, जो पार्टी की रकमों और टिकट बांटने पर 'बाहरी' नेताओं के सक्चत नियंत्रण को लेकर पहले से भीतर ही भीतर खदबदा रहा था.

अमृतसर के गुरिंदर बाजवा ने इंडिया टुडे को बताया कि ढाई महीने पहले शहर के एमके होटल में फंड जुटाने वाले एक शख्स से इकट्ठा किए गए 22.5 लाख रुपए किस तरह ''पाठक का आदमी कपिल वस्तुत: छीन-झपटकर दिल्ली ले गया. '' पहले आप से जुड़े बाजवा कहते हैं, ''ऐसी रकम दिल्ली के नेताओं की 'आर्थिक सहायता' के लिए इस्तेमाल की जाती हैं, वहीं हमसे रैलियों- सभाओं का खर्चा उठाने के लिए स्थानीय स्तर पर और रकमों की उगाही करने कहा जाता था. ''

6 सितंबर को चंडीगढ़ में मौजूद पाठक ने 'बाहरी' के पूरे मुद्दे को पंजाब के सत्तारूढ़ गठबंधन की साजिश करार दिया. आप के राष्ट्रीय संगठन प्रमुख ने कहा, ''अकाली नेतृत्व इसे दिल्ली बनाम पंजाब, टोपीवालों बनाम पंजाबियों की लड़ाई बनाने की कोशिश कर रहा है. पंजाबी मतदाताओं पर इसका कोई असर नहीं होगा. ''

पंजाब के आप नेता कहते हैं कि आरोपों और भंडाफोड़ों का मौजूदा दौर 'अस्थायी' है और अगस्त में पार्टी उम्मीदवारों के ऐलान के बाद मोटे तौर पर उम्मीद के मुताबिक ही है. वे बताते हैं कि ज्यादातर 'असंतोष और गुस्सा' उन जगहों पर सामने आया है जहां टिकट बांटे जा चुके हैं. राज्य में सबसे आगे रहते हुए आप ने 117 में से 32 निर्वाचन क्षेत्रों के लिए उम्मीदवारों का ऐलान कर दिया है. मौजूदा बगावत इन्हीं में से कई इलाकों से हुई है.

पूर्व पत्रकार और अब चंडीगढ़ में आप के राज्य मीडिया प्रकोष्ठ के प्रभारी मनप्रीत रंधावा कहते हैं, ''यह कार्यकर्ताओं की पार्टी है, नेताओं की नहीं. हर शख्स टिकट का तलबगार है और जब नहीं मिलता तो अपमानित महसूस करता है. तपे-तपाए नेताओं वाली दूसरी पार्टियों के विपरीत हमारे लोग साधारण नागरिक हैं और गुस्से में फूट पडऩे का रुझान भी उनमें ज्यादा है. ''

इस बीच, जिसे पार्टी में कई लोग 'गंभीर झटका' कह रहे हैं, पूर्व क्रिकेटर और सांसद नवजोत सिंह सिद्धू आप के साथ जाने के अपने पूर्व के फैसले से पलट गए और सूबे में संभावित चौथे सियासी विकल्प आवाज-ए-पंजाब में शामिल हो गए. लिहाजा अचानक चारों तरफ से घिरी पार्टी पंजाब में अपने पहले के लड़ाकू तेवर से पीछे हटती दिखाई दे रही है. छोटेपुर को मनाकर वापस अपने पाले में लाने की खुल्लमखुल्ला कोशिशों के अलावा पार्टी ने कहीं ज्यादा खुलकर आक्रामक चंडीगढ़ के वकील हिम्मत सिंह शेरगिल के बजाए मृदुभाषी गुरप्रीत 'घुग्गी' को अपना नया राज्य संयोजक नियुक्त करके एक अर्थपूर्ण संकेत दिया है, जबकि शेरगिल के छोटेपुर की जगह लेने की चौतरफा उम्मीद की जा रही थी. संजय-पाठक के गड़बड़झाले और छोटेपुर की जुबानी आप को खुलेआम 'सिख विरोधी' करार दिए जाने के बाद रोम से ही (जहां वह मदर टेरेसा के संत उपाधि वाले समारोह के लिए गए थे) केजरीवाल ने ऐलान किया कि अब से ''वे खुद पंजाब का चुनाव अभियान देखेंगे. ''

आप के नए नरम रवैये का कुछ ऐसा ही पता उसके हैरानी भरे कदम से भी चलता है, जिसमें उसने पूर्व कांग्रेस सांसद और सीडब्ल्यूसी के सदस्य जगमीत सिंह बरार के साथ हाथ मिला लिया. कुछ महीनों पहले कांग्रेस से निकाले जाने के बाद से ही बरार आप को संदेश भेज रहे थे, जिन्हें वह अब तक ठुकराती आ रही थी. पंजाब के आप नेता जोर देकर कहते हैं कि पार्टी टिकट बांटने समेत ज्यादातर दूसरे फैसलों की तरह यह फैसला भी दिल्ली से ही लिया गया है.

आप के नए राज्य संयोजक 'घुग्गी' 7 सितंबर को अमृतसर के स्वर्ण मंदिर गए और बनिस्बतन शांत नजर आए. परेशानियों को खारिज करते हुए उन्होंने कहा, ''आप अब पंजाब का नया मजहब बन चुकी है. '' बॉलीवुड की स्टाइल में उन्होंने यह भी कहा, ''हर पंजाबी फैन है. '' केवल आने वाले हफ्ते ही बताएंगे कि आप की मौजूदा परेशानियां 'अनुमान के मुताबिक सफाई की प्रक्रिया' का हिस्सा हैं, जैसा कि उसके नेता दावा करते हैं, या पंजाब में उसकी चुनावी संभावनाएं वाकई नाकामी की तरफ बढ़ रही हैं.

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