एडवांस्ड सर्च

आप सरकार के सौ दिन: नए विवादों के भंवर में

ऐतिहासिक जीत दर्ज कर दिल्ली की सत्ता पर काबिज आम आदमी पार्टी महज सौ दिन के सफर में दो-फाड़ की ओर बढ़ी तो अब शासन में नौकरशाही पर नियंत्रण को लेकर टकराव से संकट.

Advertisement
संतोष कुमार 25 May 2015
आप सरकार के सौ दिन: नए विवादों के भंवर में

आइ एम लुकिंग फॉरवर्ड टू ऑवर मीटिंग." बेंगलूरू से खांसी का इलाज करवा दिल्ली लौटने के बाद तब आम आदमी पार्टी (आप) के नेता प्रशांत भूषण ने स्वस्थ होने की शुभकामनाओं के साथ मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल को जब यह एसएमएस किया तो उन्होंने जवाब में लिखा, "मैं लौट आया हूं. मैंने कुछ लोगों को आपसे बात करने के लिए कहा है. मैं अभी बजट की तैयारी में लगा हूं, उसके बाद आपसे मिलते हैं."

इस संदेश के बाद 21, 22, 23 मार्च की तीन दिन की बैठक में आप नेता संजय सिंह, आशुतोष, आशीष खेतान की योगेंद्र यादव, प्रशांत भूषण, प्रो. आनंद कुमार आदि के साथ बैठक हुई. मामला सुलझने के कगार पर था, लेकिन बात एक चाय की प्याली पर आकर थम गई. विरोधी पक्ष ने सवाल उठाया कि इस सहमति पर कौन भरोसा करेगा? इसलिए प्रस्ताव दिया गया कि अब प्रशांत और अरविंद को चाय पर चर्चा करा दो ताकि दोस्तों के बीच की कड़वाहट दूर हो जाए. लेकिन सूत्रों के मुताबिक संजय सिंह ने कहा, "इतना तो भरोसा करना पड़ेगा." इस पर प्रशांत उखड़ गए और कहा कि ऐसा तीसरी बार हो रहा है कि अपने हिस्से की बात मनवाकर खुद पीछे हट जा रहे हैं. बात यहां बिगड़ी तो बागी नेताओं को राष्ट्रीय परिषद से निकालने की धमकी दे दी गई. इससे उठे राजनैतिक भूकंप ने उन आम वॉलंटियरों के सपने को भी हिला दिया जिस पर सवार होकर आप एक माह पहले सत्ता का सोपान चढ़ गई थी. लेकिन पहले पार्टी में टूट, फिर मीडिया और अब शासन में टकराव ने आम जन की उम्मीदों को आशंकाओं में बदल दिया है.

फिर वही विवाद लाया हूं
पूर्ण बहुमत की उम्मीद पाले केजरीवाल को जब दिल्ली की जनता ने संपूर्ण बहुमत दे दिया तो उनके शुरुआती कदमों से यह संदेश गया कि परंपरागत राजनीति को धूल चटा नए मॉडल की कल्पना अब आकार लेगी. उन्होंने धरना-प्रदर्शन या टकराव-मतभेदों से हटकर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, गृह मंत्री राजनाथ सिंह, शहरी विकास मंत्री वेंकैया नायडू सरीखे मंत्रियों से मिलकर सहयोग मांगा तो लगा कि अब केजरीवाल का अंदाज अलग होगा. लेकिन यह भी तथ्य है कि केजरीवाल सरकार और विवादों का आपस में गहरा नाता रहा है. पहले 49 दिनों की सरकार में केजरीवाल ने दिल्ली पुलिस के इंस्पेक्टरों और एसीपी के निलंबन को लेकर गणतंत्र दिवस से ठीक पहले राजपथ के नजदीक रेल भवन पर धरना दिया था तो इस बार नौकरशाहों की नियुक्ति-स्थानांतरण के मुद्दे पर उपराज्यपाल नजीब जंग से ही सीधी लड़ाई ठान ली है. यह मामला राष्ट्रपति भवन तक पहुंच गया और केजरीवाल ने सीधे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को चिट्ठी लिखकर हमला बोल दिया. हालांकि यह लड़ाई केजरीवाल सरकार के उस आदेश से शुरू हुई जिसमें उन्होंने अधिकारियों को निर्देश दिया कि उपराज्यपाल के पास वही फाइल भेजी जाए जो जरूरी हो और वह भी मुख्यमंत्री दफ्तर के जरिए. लेकिन उपराज्यपाल ने इसे अधिकारों का हनन माना और केजरीवाल को चिट्ठी लिखकर नाराजगी जताई. मामला तब बढ़ा जब मुख्य सचिव के.के. शर्मा ने कुछ आइपीएस अधिकारियों की तैनाती से जुड़ी फाइल सीधे उपराज्यपाल को भेज दी. इससे खफा केजरीवाल ने शर्मा को कारण बताओ नोटिस जारी कर दिया, जबकि उनकी दलील थी कि पुलिस का मामला दिल्ली सरकार से जुड़ा नहीं है. फिर भी नोटिस से खफा शर्मा ने पारिवारिक वजह बताकर छुट्टी ले ली. इसके बाद कार्यवाहक मुख्य सचिव के तौर पर उपराज्यपाल की ओर से ऊर्जा विभाग की प्रमुख सचिव शकुंतला गैमलिन की नियुक्ति को लेकर केजरीवाल और उपराज्यपाल इस तरह उलझे कि बुराड़ी की एक रैली में उन्होंने गैमलिन पर बिजली कंपनियों से सांठगांठ का खुला आरोप मढ़ दिया, जबकि पैनल में उनका नाम था.

सौ दिनों में सरकार के साथ विवाद की फेहरिस्त यही खत्म नहीं होती. कानून मंत्री जितेंद्र सिंह तोमर की फर्जी डिग्री का मामला हाइकोर्ट में है तो एक और विधायक सुरेंद्र सिंह की कथित फर्जी डिग्री का मामला सामने आ गया है. विधायक नरेश बाल्यान पर चुनाव के दौरान शराब बांटने का आरोप लग चुका है तो एक निगम के एक अधिकारी के साथ दुव्र्यवहार के मामले में जरनैल सिंह की गिरफ्तारी तक की नौबत आ गई थी. लेकिन इन मामलों पर केजरीवाल किसी तरह की जांच कराने से न सिर्फ बचते हैं बल्कि आगे बढ़कर स्लीन चिट दे देते हैं. पार्टी गठित करते वक्त 2012 में एक साक्षात्कार में उन्होंने इसी संवाददाता से कहा था कि पार्टी के किसी नेता पर आरोप लगता है तो मामले की जांच आंतरिक लोकपाल को सौंपेंगे और फिर कार्रवाई करेंगे.

आप को अपनों से चुनौती
हल्की सर्दी के खुशनुमा एहसास के साथ दिल्ली की 70 में से 67 सीटें जीतकर सत्ता में आई आम आदमी पार्टी बदले हुए मौसम की पहली तपिश में ही झुलसती दिख रही है. जीत के बाद पार्टी को कब्जे में लेने की जंग परंपरागत राजनीति को ध्वस्त कर 'नए मॉडल' की पैरोकार पार्टी को दो-फाड़ की ओर खींच ले गई. 'एक व्यक्ति, एक पद' के फॉर्मूले पर केजरीवाल से राष्ट्रीय संयोजक का पद छोडऩे की आवाज उठी तो 5 मार्च को राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक में प्रशांत भूषण और योगेंद्र यादव को राजनैतिक मामलों की कमेटी (पीएसी) से बाहर निकाल दिया गया. लेकिन यह फैसला आंकड़ों के लिहाज से केजरीवाल को चौंकाने वाला था. 22 में से 11 ने तो प्रस्ताव के पक्ष में वोट किया, लेकिन 8 ने खुलकर भूषण-यादव का साथ दिया, जबकि तीन तटस्थ रहे. इससे केजरीवाल गुट को लगा कि पार्टी का एक बड़ा खेमा टूट सकता है और एक स्टिंग में केजरीवाल यह कहते सुने गए थे कि वे अपने 67 विधायकों के साथ नई पार्टी बना लेंगे और आप वही लोग (भूषण-यादव-आनंद-अजीत झा) चला लें. इसके बाद सुलह की एक और कोशिश हुई लेकिन जब बात नहीं बनी तो चार वरिष्ठ नेताओं को राष्ट्रीय परिषद और आखिर में पार्टी से निकाल दिया गया.

लेकिन निष्कासित नेताओं ने हार नहीं मानी और स्वराज अभियान नाम से एक मंच बना लिया. इस मंच के बनते ही आम आदमी पार्टी से इस्तीफा देने वालों की संख्या बढ़ गई, महाराष्ट्र में 300 से ज्यादा कार्यकर्ताओं ने एक साथ इस्तीफा दे दिया तो बड़ी संख्या में अन्य राज्यों से भी लोग इस अभियान से जुड़ गए. हालांकि यह मंच अभी राजनैतिक रूप नहीं ले सका है. लेकिन स्वराज अभियान के संयोजक प्रो. आनंद कुमार कहते हैं, "पार्टी में दो-फाड़ से ज्यादा की स्थिति है. आप के अंदर एक जबरदस्त तात्कालिक एकता की क्षमता का कारण दिल्ली की सरकार पर अगले पांच साल के लिए स्वामित्व है. इसलिए बहुत से लोग दिल और दिमाग के बीच का अंतद्र्वंद्व झेल रहे हैं, लेकिन दिल्ली के बाहर जो आम आदमी पार्टी का परिवार है उसमें इसको लेकर कोई खास दुविधा नहीं है." हालांकि आप के प्रवक्ता आशुतोष दो-फाड़ के दावे को खारिज करते हैं और इसे महज अनुशासनात्मक कार्रवाई मानते हैं. (देखें दोनों से बातचीत) भले आप इससे इनकार करे, लेकिन स्वराज अभियान ने दो साल बाद होने वाले दिल्ली नगर निगम चुनाव में सभी 272 सीटों पर लडऩे की रणनीति बना ली है. इस अभियान से जुड़े नेताओं का मानना है कि जिस तरह मोदी की हवा नौ महीने में फुस्स हो गई, उसी तरह अगर केजरीवाल सरकार मौजूदा ढर्रे पर चलती रही तो यह भी पंक्चर हो जाएगी. अभियान ने अपनी क्षमता के मुताबिक बिहार, यूपी, पंजाब, उत्तराखंड विधानसभा चुनावों में भी उतरने का मन बनाया है.

क्यों हो रहा मोहभंग
नरेंद्र मोदी के विजय रथ को दिल्ली में रोकने में सफल रहे केजरीवाल से उनके ही भरोसेमंद साथी आखिर इतने कम समय में दूर क्यों होते चले गए. पार्टी में इस कदर आपसी विश्वास था कि पार्टी के झंडे में भी केजरीवाल का फोटो स्वीकार कर लिया गया. आप के एक पूर्व नेता का कहना है, "दुनिया के किसी भी राजनैतिक दल या तानाशाह गद्दाफी और माओत्सेतुंग का भी फोटो झंडे में नहीं था. लेकिन हमने केजरीवाल का फोटो स्वीकार किया पर उन्होंने हमारी कृपा को अपना अधिकार समझ लिया. जंतर मंतर की आप की रैली के दौरान किसान गजेंद्र की खुदकुशी ने भी आप की साख को धक्का पहुंचाया क्योंकि उस वक्त वहां केजरीवाल समेत आप के तमाम नेता मौजूद थे. लेकिन खुदकुशी की घटना के बाद भी पार्टी ने रैली नहीं रोकी.

वादों पर कितना हुआ अमल
दिल्ली में जनता की नब्ज को छूने वाली बिजली-पानी का वादा तो आप सरकार ने फौरी तौर पर पूरा कर दिया. लेकिन 49 दिन में जनलोकपाल बिल के मुद्दे पर सरकार छोडऩे वाले केजरीवाल इस बार इस पर खामोश हैं. दिल्ली को पूर्ण राज्य का दर्जा दिलाने की दिशा में कोई औपचारिक पहल की बजाए छोटे मुद्दों पर सरकार ने सीधे केंद्र सरकार से टकराव मोल ले लिया है. महिलाओं की सुरक्षा का मसला भी जोर-शोर से चुनाव में उठाया गया था. मोबाइल में एक सुरक्षा बटन देने, बसों में मार्शल तैनात करने, सीसीटीवी कैमरे लगाने का भी वादा था, लेकिन इसे सरकार ने अपनी सौ दिनी प्राथमिक पहल में नहीं रखा. हालांकि आशुतोष का दावा है कि अगले दो हफ्ते में डीटीसी की बसों में मार्शल तैनात हो जाएंगे. दिल्ली को फ्री वाइ-फाइ देने का मुद्दा तो पहले दिन से ही विवादों में है. चुनाव में आप ने इसमें कारीगरी की थी. हिंदी में जारी घोषणापत्र और केजरीवाल के फोटो के साथ चुनाव के वक्त लगी होर्डिंग्स में पूरी दिल्ली को मुफ्त वाइ-फाइ देने की बात कही गई है, लेकिन अंग्रेजी के घोषणापत्र में सार्वजनिक जगहों की बात है. यह सुविधा भी 2016 से पहले दिल्ली वासियों को नहीं
मिलने जा रही.

केजरीवाल सरकार ने सौ दिनों में बिजली-पानी के मुद्दे पर काम वादा निभाया है. लेकिन जिस तरह से दिल्ली में अधिकारों को लेकर संवैधानिक टकराव पैदा हुआ है, उसके बाद उपराज्यपाल और मुख्यमंत्री, दोनों को समझना होगा कि व्यवस्था नियम-कायदों से चलेगी, कल्पनाओं से नहीं.

आजतक के नए ऐप से अपने फोन पर पाएं रियल टाइम अलर्ट और सभी खबरें. डाउनलोड करें
Advertisement
Advertisement

संबंधित खबरें

Advertisement

रिलेटेड स्टोरी

No internet connection

Okay