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हमारी परंपरा मौन रूप से अनदेखा करने की रही है

प्राचीन भारत में समलैंगिक गतिविधि को बेशक उपेक्षित या ओछा माना जाता था लेकिन कभी भी किसी को इसके लिए दोषी ठहराकर सजा नहीं दी जाती थी.

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aajtak.in
सुधीर कक्कड़नई दिल्ली, 01 January 2014
हमारी परंपरा मौन रूप से अनदेखा करने की रही है

अगर देखा जाए तो हिंदू शास्त्र समलैंगिक कामुकता पर काफी हद तक मौन हैं. समलैंगिकता की आधुनिक धारणा को समलिंगी व्यक्ति के प्रति दैहिक आसक्ति के रूप में परिभाषित किया जाता है, जबकि प्राचीन भारत में असंगत आचरण या क्वीयरनेस का अर्थ सामान्य से अलग यौन या लैंगिक आचरण था.

समलैंगिकता के बारे में हमारे कुछ समकालीन दृष्टिकोण प्राचीन भारत जैसे ही हैं. उस जमाने में समाज समलिंगी गतिविधि की बजाए समलैंगिक व्यक्ति को हेय दृष्टि से देखता था. प्राचीन यूनान और लैटिन अमेरिका तथा पश्चिम एशिया के कुछ हिस्सों सहित अनेक अन्य संस्कृतियों में समलैंगिक संबंधों में सक्रिय पार्टनर को उतनी प्रताडऩा नहीं मिलती थी, जितना कि निष्क्रिय पार्टनर को.

कई संस्कृतियों में आज भी यही स्थिति है. स्वीकार्यता के लिए यह बात बÞत मायने रखती थी कि आपने किया क्या है, आप सक्रिय पार्टनर थे या निक्रिय पार्टनर. इस बात का बहुत मायने नहीं था कि आपने किसी पुरुष के साथ सेक्स किया है या स्त्री के साथ. कामसूत्र का नायक अपने यौन सुख के लिए मालिश करने वाले के मुख का उपयोग करता है, तो नायक की बजाए मालिशिया प्रताडऩा का पात्र बनता है.

प्राचीन भारत में समलैंगिकता की निंदा में करुणा का अभाव नहीं था. समलिंगी पुरुषों को हीन पुरुष माना जाता था, जिसके लिए संस्कृत में शब्द है क्लीव. क्लीव शब्द के दायरे में अनेक वर्ग आते थे, नपुसंक, बधिया किया हुआ, किन्नर, किसी पुरुष को मुख मैथुन करके सुख प्रदान करने वाला पुरुष, गुदा मैथुन कराने वाला पुरुष, भंग या अक्षम लिंग वाला पुरुष, सिर्फ  कन्या को पैदा करने में सक्षम पुरुष या उभयलिंगी पुरुष.

क्लीव शब्द का प्रयोग आजकल नहीं होता, लेकिन उससे जुड़ी अक्षमता की धारणा और दया, लाचारी तथा विवाह करके संतान उत्पन्न करने में अक्षम पुरुष के प्रति कुछ हद तक उपेक्षा की भावना आज भी भारतीय समलैंगिंकों के साथ चिपकी हुई है.

प्राचीन भारत में समलिंगी गतिविधि को अनदेखा कर दिया जाता था या हीन माना जाता था, लेकिन उसके लिए कभी कोई सजा नहीं थी. धर्मशास्त्र में पुरुष समलिंगी कामुकता के लिए सजा का प्रावधान है, लेकिन सख्त नहीं है: रस्मी स्नान या मामूली जुर्माने को अक्सर पर्याप्त पश्चाताप मान लिया जाता था. इस्लाम के आने के बाद भी इसमें कोई खास बदलाव नहीं आया. इस्लाम में स्पष्ट रूप से समलैंगिकता को गंभीर अपराध माना गया है.

भारत में इस्लामी धर्मशास्त्रियों का मानना था कि पैगंबर साहब ने लौंडेबाजी के लिए सबसे कड़ी सजा की वकालत की है. वैसे भारत में इस्लामी संस्कृति पर फारस की छाप भी है, जिसमें समलिंगी कामुकता को साहित्य में खूब प्रोत्साहन दिया गया है. फारसी और बाद में उर्दू दोनों भाषाओं में सूफियाना कलाम में खुदा और बंदे के बीच के रिश्ते को अक्सर समलिंगी कामुक, अलंकारों में व्यक्त किया गया है.

उस सच्चे बादशाह को इंसान की सतह पर उतार लिया गया. मुसलमानों के कुलीन वर्गों में पुरुषों की काम-वासना को तृप्त करने के लिए लौंडेबाजी को स्वीकृति मिलने लगी, बशर्ते कि वह पुरुष अपने वैवाहिक दायित्व को पूरा करता रहे. शहंशाह बाबर की आत्मकथा में साफ तौर पर कहा गया है कि उसे अपनी बेगम से उतना प्रेम नहीं था और वह एक लड़के को पसंद करता था. इस बात के सबूत हैं कि बीसवीं शताब्दी के मध्य में रियासतों का स्वतंत्र भारत में विलय होने तक उत्तर भारत की कई रियासतों में समलैंगिकता की परंपरा बहुत पुख्ता थी.

ऐसा लगता है कि समलिंगी गतिविधि या कहें कि लौंडेबाजी की मौजूदा धारणा की जड़ें भारतीय इतिहास के मुगल काल में देखी जा सकती हैं. जैसी कि हमने पहले चर्चा की है कि हिंदू शास्त्रों में समलिंगी गतिविधि की इमेज गुदा की बजाय मुख मैथुन क्रिया की है. कामसूत्र प्राचीन भारत में कामवासना और यौन सुख की जानकारी देने वाला मुख्य ग्रंथ है.

इसमें लौंडेबाजी का वर्णन बहुत संक्षेप में किया गया है और वह भी समलैंगिक की बजाय विषमलिंगी यौन संबंध के संदर्भ में. इसके विपरीत संस्कृत के क्लीव के समकक्ष तीसरी प्रकृति के पुरुष की मुख मैथुन की क्रिया का वर्णन अधिक विस्तार से किया गया है.

उन्नीसवीं शताब्दी के महान रोमांच प्रिय विद्वान रिचर्ड बर्टन ने 1001 नाइट्स (अलिफ लैला की कहानियों) के अनुवाद के साथ-साथ अंग्रेजी में काम सूत्र का पहला अनुवाद किया है. वे भारत, अफ्रीका और पश्चिम एशिया में बहुत घूमे हैं. वे कई साल तक ब्रिटिश सेना के सदस्य रहे. उनका कहना है कि उस सेना में हिंदू सिपाहियों में लौंडेबाजी का शौक नहीं था.

पंजाब और कश्मीर के महाराजाओं रंजीत सिंह और गुलाब सिंह के लौंडेबाजी के शौक का जिक्र करने के बाद उन्होंने लिखा है, ''मैं फिर कहता हूं कि हिंदू लौंडेबाजी को नफरत की नजर से देखते हैं और अंग्रेजों की तरह लौंडेबाजी के लिए गंड़ मरा और गांडू जैसी गालियां देते हैं. 1843-44 के दौरान मेरी रेजिमेंट में बॉम्बे प्रेजिडेंसी के लगभग सभी हिंदू सिपाही बंदर चारा में तैनात थे.

ये मुख्यालय करांची से करीब चालीस मील उत्तर में रेतीले समतल मैदान की हरी सफेद झाडिय़ों में पड़ाव डाले रहते थे. आसपास के मिट्टी और फूस के कच्चे घरों वाले गांव उनके लिए औरतें नहीं दे पाते थे. फिर भी लौंडेबाजी का सिर्फ  एक वाकया सामने आया और वह भी घटना के कुछ साल बाद बड़े दुखद अंदाज में उजागर हुआ.

एक नौजवान ब्राह्मण ने अपने से कमतर जाति के एक सैनिक के साथ रिश्ता जोड़ लिया था और यह सिलसिला तब तक चला जब तक वह एजेंट नहीं बन गया. अरबी में अकसर अल-फाल मतलब करने वाले को प्रताडऩा का उतना पात्र नहीं माना जाता, जितना कि अल-माफुल यानी करवाने वाले को. ब्राह्मण सिपाही में पश्चाताप और प्रतिशोध की ऐसी भावना जागी कि उसने बंदूक उठाकर अपने संगी को गोली मार दी

हैदराबाद में कोर्ट मार्शल में उसे फांसी की सजा सुनाई गई. जब उससे आखिरी इच्छा पूछी गई तो उसने प्रार्थना की कि उसे पैरों के बल लटकाया जाए, जो नहीं मानी गई, किंतु इसके पीछे मंशा यह थी कि इस तरह प्राण त्याग से उसकी दूषित आत्मा अनंतकाल तक निम्न योनियों में भटकती रहेगी.”

मैं यह भी कहना चाहूंगा कि हिंदुओं में समलिंगी यौनाचार के लिए गुदा मैथुन को उतना पसंद न किए जाने की एक वजह यह भी थी कि हिंदुओं में शुद्धि और अशुद्धि की भावना बहुत प्रबल थी. मुंह को गुदा से अधिक शुद्ध माना जाता है.

स्त्री समलिंगी यौनाचार को हमेशा औरतों की परिस्थितियों से संचालित माना गया है. अर्थात् पुरुष साथी की अनुपस्थिति और इसे हमेशा व्यक्तिगत शौक का दर्जा मिला है. आधुनिक युग में धारणा इसके एकदम विपरीत है. इसमें मूल स्त्री समलैंगिकता को स्त्री के वश से बाहर माना गया है, जबकि शौकिया स्त्री समलैंगिकता को स्त्री खुद चुनती है.

हालांकि समलिंगी पुरुष के लिए ऐसी कोई संभावना नहीं है. काम सूत्र में हरम संबंधी अध्याय में प्राचीन भारत में स्त्री समलिंगी संबंधों का वर्णन मिलता है. हरम में अनेक स्त्रियां पुरुषों की अनुपस्थिति में रहती थीं. जब कई रानियों का एक राजा होता था और वह भी शासन के कार्यों में व्यस्त रहता था. कोई भी राजा भगवान कृष्ण की तरह हर रात अपनी सोलह हजार रानियों को तृप्त करने में समर्थ नहीं था.

इसलिए महिलाएं छद्म लिंग, पुरुष लिंग से मिलते-जुलते बल्ब, जड़ों या फलों का उपयोग किया करती थीं. इसका अर्थ यह हुआ कि स्त्री समलिंगी संबंध तभी होते हैं, जब पुरुष नहीं होता. कथाओं या फिल्मों में स्त्री समलिंगी संबंधों की रचनात्मक अभिव्यक्ति में भी इसी धारणा की छाप दिखाई देती है.

1998 में दीपा मेहता की फिल्म फायर में दोनों नायिकाएं एक-दूसरे के प्रति इसलिए आकृष्ट होती हैं, क्योंकि वे अपने-अपने विवाह से बेहद नाखुश थीं. इस फिल्म में दो महिलाओं के बीच रति संबंध दिखाए गए थे, इसलिए कुछ धार्मिक गुटों ने सिनेमा घरों में आग लगाकर विरोध जताया था.

प्राचीन हिंदू शास्त्रों में स्त्री समलिंगी संबंधों पर प्रतिबंध है. किसी कुंआरी कन्या को भ्रष्ट करने वाली स्त्री की दो उंगलियां काटने का प्रावधान था. इससे पता चलता है कि शास्त्रों के पुरुष लेखक की सोच में दो महिलाएं बिस्तर में क्या करती होंगी. इतना कड़ा दंड उस क्रिया के लिए नहीं है बल्कि किसी कन्या का कौमार्य भेदना बेहद घृणित अपराध माना जाता था.

ऐसा लगता है, और इसमें कोई आश्चर्य भी नहीं है कि पुरुष समलैंगिकता की तुलना में स्त्री समलैंगिकता के लिए ज्यादा कड़ा दंड था क्योंकि उस समाज में स्त्री के कौमार्य और शुद्धता को सुरह्नित रखने की चिंता ज्यादा थी. परंपरावादी इसे महिलाओं के यौन सुख पर नियंत्रण रखना कहेंगे, तो आधुनिक स्त्री अधिकार समर्थक इसका विरोध करेंगे. उदाहरण के लिए मध्य और आधुनिक भारत में चिपटने या उर्दू में चपटी के लिए कोई दंड नहीं था. इस क्रिया में स्त्रियां अपने योनि द्वार को आपस में रगड़ती हैं.

भारत में स्त्री-पुरुष दैहिक संबंध से अलग हटकर कामुक संबंधों को चुपचाप अनदेखा करने की परंपरा रही है. इसमें समलिंगी प्रेम को मौन स्वीकृति रही है या उसे चुपचाप सहन किया जाता रहा है. यह परंपरा भारतीय सोच का हिस्सा है. सुप्रीम कोर्ट का फैसला इस दृष्टि से ऐतिहासिक है कि इसने हमें हमारी उपेक्षा की तंद्रा से जगा दिया है और सोच-समझकर समलिंगी स्त्री और पुरुष प्रेम के मुद्दे का सामना करने के लिए मजबूर किया है. इसका सामना हमें अपने दिमाग में चल रहे द्वंद्व और सार्वजनिक रूप से हो रहे संवादों और चर्चाओं में दोनों जगह करना होगा.

(लेखक मनोविश्लेषक और उपन्यासकार हैं.)

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