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धारा 377 को जायज ठहराने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद विक्रम सेठ के कुछ विचार

समलैंगिकों के साथ-साथ कई एक्टीविस्ट धारा 377 को जायज ठहराने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले का विरोध कर रहे हैं. पढ़िए विश्व प्रसिद्ध लेखक विक्रम सेठ के कुछ विचार.

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विक्रम सेठनई दिल्ली, 30 December 2013
धारा 377 को जायज ठहराने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद विक्रम सेठ के कुछ विचार

1
इंसान के तौर पर हम एक दूसरे के साथ जो क्रूरता बरतते हैं,
उनमें सबसे ज़्यादा क्रूर यह कहना है:

''तुम जिसे पसंद करते हो, उससे प्रेम नहीं करोगे या यौन संबंध नहीं रख सकोगे, यह इसलिए नहीं कि तुम दोनों बालिन्न्ग नहीं हो या एक तरफ़ की रज़ामंदी नहीं है, बल्कि इसलिए कि तुम दोनों अलग धर्म के हो, अलग जाति के हो, एक ही गाँव के हो, एक ही जेंडर के हो.

तुम कह सकते हो कि तुम एक-दूसरे से प्यार करते हो, कि तुम्हें एक-दूसरे से सुकून, साहस और खुशी मिलती है लेकिन तुम्हारे प्यार से मुझे नफ़रत है. यह परंपरा के विरुद्ध है, क़ानून के ख़िलाफ है, प्रकृति के नियम के अनुरूप नहीं है, इससे हमारे परिवार की इज़्ज़त मिट्टी में मिल जाएगी, हमारी नस्ल श्राब हो जाएगी, इससे कलियुग आ जाएगा, यह हमारे समाज में सड़ांध पैदा कर देगा, यह ईश्वर की नज़र में घृणित है. यह वर्जित है.

तुम कह सकते हो कि तुम एक-दूसरे से प्यार करते हो लेकिन मुझे इसकी परवाह नहीं. मैं इसे अनदेखा नहीं कर सकता और तुम दोनों को सुख-चैन से जीने नहीं दे सकता. मुझे कुछ करना ही पड़ेगा, और मैं ज़रूर करूंगा. नहीं, तुमने मेरा कुछ नहीं बिगाड़ा, तुम्हारा बिगाड़ूंगा ज़रूर. मैं तुम्हें निकाल दूंगा, मैं तुम्हें कमीना समझूंगा, तुम्हें जाति बाहर कर दूंगा या अपराधी घोषित करवा दूंगा. मैं तुम्हें बंद करवा दूंगा, तुम्हारे पैर तोड़ दूंगा, तुम्हारे चेहरे पर एसिड फेंक दूंगा, तुम्हें क्रेन से लटका दूंगा, तुम्हें संगसार कर दूंगा.

अगर बलवाइयों का झुंड मेरा साथ देता है तो बेहतर, अगर क़ानून की सहायता मिलती है तो बेहतर, अगर राष्ट्रवादी नारे का सहारा मिलता हो तो बेहतर, अगर धर्म के चोले से मदद मिलती हो तो बेहतर, लेकिन किसी न किसी तरह मैं तुम दोनों को अलग करके ही रखूंगा. मेरे लिए यही करना सही और मुनासिब है.

मैं यह करूंगा क्योंकि मेरी जाति या बिरादरी यही कहती है, मेरी पंचायत यही कहती है, फलाँ शास्त्र यही कहता है, इस क़ानून की यह धारा यही कहती है, सभ्यता ख़ुद यही कहती है, स्वयं ईश्वर यही कहता है.

कोई दलील काम नहीं आएगी. इंसानियत मुझे रिझा नहीं पाएगी. भारतीय इतिहास को मैं नहीं जानता. आधुनिक विज्ञान को मैं नहीं मानता.

सीधी-सी बात है, मेरा यह जाप है:
मेरा प्यार पुण्य है, तेरा प्यार पाप है.”

2
इस तरह सोचने वालों के बारे में क्या कहा जा सकता है—ऐसे लोग जो अपनी ज़िदगी में ख़ुश रहने की बजाए दूसरों की ज़िंदगी, उनकी आज़ादी, उनकी ख़ुशी मिटाने को आतुर हैं?

कोई अपनी बेटी को मौत के घाट उतार देता है क्योंकि वह अपने गाँव के किसी लड़के से प्यार करती है.
कोई आपस में प्यार करने वाले दो मर्दों को ब्लैकमेल करता है या उन्हें जेल भिजवाने की कोशिश करता है.
कोई किसी औरत को उसकी गर्लफ्रेंड से जबरन अलग कर देता है और उसे सही सेक्स का सब़क सिखाने के लिए उसका रेप कर देता है.
कोई अपने बेटे को दूसरी जाति की लड़की से प्रेम करने के लिए जान से मार डालता है.
कोई अपनी बहन के चेहरे को तेज़ाब से जला देता है सिर्फ़ इस वजह से कि वह दूसरे धर्म के लड़के से प्यार करती है.

मानसिकता एक-सी है. सभी मानते हैं कि वे सही कर रहे हैं, और इसी से उन्हें गुनाह का लाइसेंस मिलता है. उनके दिल में न इंसानियत है और न ही वह प्रेम जो हमें बताया जाता है कि धर्म की बुनियाद है. उनमें यह नफ़रत अंदर से नहीं, बल्कि बाहर से आती है: बड़बोले बाबा से, मतलबी मुल्ला से, पापी पादरी से, खाप पंचायत या वोट की शतिर भीड़ को उकसाने वाले राजनैतिक दल से, और नाजायज़ क़ानूनों को जायज़ ठहराने और उन पर अमल करवाने वाले से.

3
हम ब्रह्मांड के एक अदना-से तारे के छोटे-से ग्रह के निवासी हैं. यहाँ जीवन किसी के लिए आसान नहीं है.
भय और भूल, नाकामयाबी और निराशा, दर्द और बीमारी, मौत और जुदाई से वे भी छुटकारा नहीं पा सकते जो ग़रीबी से छुटकारा पा गए हैं.

प्रेम ही इस जीवन को सहने लाय$क बनाता है: प्रेम करना, प्रेम पाना—और मौत या जुदाई के बाद भी यह महसूस करना कि तुमने प्रेम किया या पाया.

अपने प्रिय को प्यार न कर पाना जीते-जी मौत है.

जबरन जुदाई रूह का क़त्ल है.

इस पर विचार करने वाला अगर इंसान है, तो अपने ख़्यालों में भी कभी इतना क्रूर नहीं हो पाएगा.

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