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हम जो वादे करें, उसे पूरा भी करें: बराक ओबामा

ओबामा कहते हैं कि नरेंद्र मोदी के पास भारत की जरूरतों के बारे स्पष्ट नजरिया है. वे उनकी ऊर्जा से प्रभावित हैं. जानिए और क्या-क्या कहा ओबामा ने. उनका खास इंटरव्यू.

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aajtak.in
शेखर गुप्तानई दिल्ली, 27 January 2015
हम जो वादे करें, उसे पूरा भी करें: बराक ओबामा

अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के बारे में और खुद उनसे बात करते हुए, भले इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से ही क्यों न हो, मैं उस पंक्ति का इस्तेमाल करने का लोभ छोड़ नहीं पा रहा हूं, जो मैंने नरेंद्र मोदी के निकटतम पूर्ववर्ती के लिए इस्तेमाल किया है. वह यह कि इतिहास उनका आकलन पत्रकारिता के मुकाबले ज्यादा उदारता से करेगा. अगर आप अंतरराष्ट्रीय मीडिया को पढ़ें, खासकर अमेरिका में, तो उदार टिप्पणियों में भी यही लगेगा कि ओबामा कभी सही कदम नहीं उठा सकते हैं.

उन पर काम करने से ज्यादा बोलने, अपने लक्ष्य से हटने, अमेरिका की बिगड़ी राजनीति को सही रास्ते पर लाने में असमर्थ होने का आरोप लगाया जाता है. लेकिन संभलकर अपनी पारी खेल रहा कोई बल्लेबाज पारी के बीच में शायद यही कहेगा कि बल्लेबाजी पर नहीं, बल्कि स्कोर बोर्ड पर नजर डालो.

मीडिया तुरंत अपना फैसला सुना देता है, गंभीर टिप्पणीकारों के पास भी किसी इतिहासकार जितना धैर्य नहीं होता है. लेकिन सामने दिखने वाले तथ्यों पर नजर डालें, या जैसा कि मैंने कहा, स्कोर बोर्ड पर गौर करें. आर्थिक मंच पर यूरोपीय निराशा के बीच एक अच्छी खबर यह आ रही है कि अमेरिकी अर्थव्यवस्था की वृद्धि दर फिर से बढ़ रही है, जो 3.5 प्रतिशत तक पहुंच गई है. 19 खरब डॉलर की अर्थव्यवस्था के लिए यह बहुत बड़ी बात है, जिससे वहां रोजगार बढऩे के साथ खुशहाली आ रही है.

विदेश नीति के मोर्चे पर भी उन्होंने बड़ी सूझ-बूझ से इराक और अफगानिस्तान से सेना हटाने का काम किया और आइएसआइएस के खिलाफ गठबंधन तैयार किया. वे क्यूबा और ईरान के साथ भी बातचीत की नई शुरुआत कर रहे हैं. इसके अलावा हाल की कई पहल, जो धीमी पड़ती जा रही थीं, उन पर नए सिरे से ध्यान दे रहे हैं. भारत के साथ नया संबंध भी उनमें से एक है.

इस प्रकार हमें गौर करना होगा कि गणतंत्र दिवस के मौके पर ओबामा एक शक्तिशाली और सफल अमेरिकी राष्ट्रपति के रूप में आ रहे हैं, जिनके पास भारत के बारे में स्पष्ट सोच है. ई-मेल पर हुई इस विशेष और विस्तृत बातचीत में वे भारत को रणनीतिक सहयोगी नहीं, बल्कि स्वाभाविक सहयोगी बताते हैं. यह ज्यादा महत्वपूर्ण बात है, क्योंकि ‘‘रणनीतिक’’ शब्द की सीमित संभावनाएं हैं. वे भारत के साथ कई मुद्दों जैसे आतंकवाद के खिलाफ लड़ाई, जलवायु परिवर्तन और इबोला जैसी बीमारी पर आपसी सहयोग की संभावनाएं देखते हैं.

ओबामा ने अंतरराष्ट्रीय रिश्तों में व्यक्तिगत संबंधों के महत्व पर पूछे गए सवाल का भी खुलकर जवाब दिया. उन्होंने मोदी के साथ अपने समीकरण के बारे में बेबाकी से बात की. ओबामा ने मनमोहन सिंह के साथ मधुर संबंधों की बात भी स्वीकार की. ‘‘चाय बेचने वाले से प्रधानमंत्री बनने’’ वाले मोदी और उनसे जनता की भारी अपेक्षाओं को समझते हुए ओबामा बातचीत में गर्मजोशी और अनौपचारिकता का एहसास कराते हैं.

विदेशी नेताओं के मानकों के हिसाब से मोदी युवा नेता नहीं हैं, लेकिन भारत के लिए, खासकर किसी खानदान से ताल्लुक न रखने के कारण वे काफी युवा हैं और हम उनके तथा ओबामा के बीच अच्छी दोस्ती देख सकते हैं. चूंकि अब कई राष्ट्रों के नेता अपेक्षाकृत कम उम्र के हैं, इसलिए उनमें ज्यादा अनौपचारिकता देखी जाती है और वे एक-दूसरे को प्रथम नाम से ही संबोधित करते हैं. उदाहरण के लिए ब्रिटिश प्रधानमंत्री डेविड कैमरन कहते हैं कि ओबामा उन्हें ‘‘ब्रो’’ (दोस्त) कहकर संबोधित करते हैं.

हम नहीं जानते कि उनके निजी संबंध कैसे हैं, लेकिन ओबामा ने गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि बनने का मोदी का निमंत्रण स्वीकार किया. हो सकता है, जैसा ओबामा ने कहा कि हमारी ग्रह दशा आखिरकार मिल रही है. उनकी विस्तृत बातचीतः

बतौर राष्ट्रपति आपके कार्यकाल में पहले भारत के साथ संबंधों में गर्मजोशी आई थी. अपने पहले विदेशी दौरे में आप भारत आए थे और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह व्हाइट हाउस में सरकारी मेहमान थे. इसके बावजूद धारणा यही है कि नई दिल्ली और वॉशिंगटन के संबंध कमजोर हुए हैं. क्या आप इससे सहमत हैं कि आपसी संबंधों को जल्दी मजबूत बनाने की जरूरत है? आप और प्रधानमंत्री मोदी क्या इस दिशा में तेजी से आगे कदम बढ़ा रहे हैं?

जबसे मैं राष्ट्रपति बना हूं तभी से दोनों देशों के बीच गहरा संबंध बनाना मेरी विदेश नीति का मुख्य हिस्सा रहा है. अपने पहले सरकारी दौरे में ही मैंने भारत से दोस्ती को महत्व दिया था. राष्ट्रपति बनने के बाद शुरू में ही मैंने भारत का दौरा किया, क्योंकि मेरा दृढ़ता से मानना है कि अमेरिका और भारत के बीच संबंध 21वीं सदी की महत्वपूर्ण साझेदारियों में एक हो सकता है. हम स्वाभाविक सहयोगी हैं. दोनों ही बड़े लोकतांत्रिक देश होने के कारण हमारी ताकत हमारे नागरिकों की ताकत और उनकी क्षमताओं में निहित है.

उद्यमी देश होने के कारण हम नए प्रयोग, विज्ञान और तकनीकी के क्षेत्र में ग्लोबल लीडर हैं. रणनीतिक रूप से भारत की भौगोलिक स्थिति को देखते हुए हम एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अपनी सुरक्षा और समृद्धि को बढ़ा सकते हैं. जब भारत और अमेरिका मिलकर काम करते हैं तो दोनों ही देश और विश्व ज्यादा सुरक्षित और समृद्ध होते हैं. इसीलिए जब मैंने पिछले दौरे में भारतीय संसद को संबोधित किया था तो अपने विचार व्यक्त करते हुए बताया था कि वैश्विक चुनौतियों का सामना करने में हम किस प्रकार वैश्विक सहयोगी बन सकते हैं.

हालांकि यह सही है कि इस दिशा में हमारी अपेक्षाओं के मुताबिक उतनी तेजी से प्रगति नहीं हुई है, लेकिन भारत-अमेरिका संबंधों को प्रगाढ़ करने में हम सफल रहे हैं. पिछले कुछ वर्षों में हमने दोनों देशों के बीच व्यापार को लगभग 60 प्रतिशत तक बढ़ाया है और भारतीयों तथा अमेरिकियों के लिए ज्यादा रोजगार मुहैया कराए हैं. हमारी सेनाएं पहले से ज्यादा संयुक्त अभ्यास कर रही हैं. हमने आतंकवाद के खिलाफ आपसी सहयोग काफी हद तक बढ़ाया है और हम परमाणु हथियारों का प्रसार रोकने के लिए आपस में मिलकर काम कर रहे हैं. हम अफ्रीका में कृषि के विकास को बढ़ावा देने में भी आपसी सहयोग कर रहे हैं.

पूर्व प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के साथ मेरे निजी संबंध प्रगाढ़ थे और वे करीबी सहयोगी थे. अब प्रधानमंत्री मोदी का चुनाव और आपसी संबंधों में एक नए अध्याय के प्रति उनकी प्रतिबद्धता हमें अपनी भागीदारी बढ़ाने की दिशा में एक नया अवसर मुहैया करा रही है. मैं चाहूंगा कि आखिरकार ग्रह दशा मिल जाए ताकि संसद में मैंने जो विचार व्यक्त किया था, वह पूरा हो सके यानी भारत और अमेरिका सच्चे ग्लोबल पार्टनर बन सकें.

इसीलिए मैंने गणतंत्र दिवस पर मुख्य अतिथि बनने वाले पहले अमेरिकी राष्ट्रपति के तौर पर निमंत्रण स्वीकार किया. यह मेरे लिए बहुत सम्मान की बात है. मैं राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी, प्रधानमंत्री मोदी और भारतीय जनता के साथ भारतीय संविधान के 65वें वार्षिक समारोह में शामिल होने के लिए उत्सुक हूं.

मुझे इस बात का भी गर्व है कि मैं भारत का दो बार दौरा करने वाला पहला अमेरिकी राष्ट्रपति होने जा रहा हूं और मेरे साथ एक बार फिर मेरी पत्नी मिशेल भी होंगी. जहां मैं इस दौरे के प्रतीकात्मक महत्व को समझ्ता हूं, वहीं मैं इसे प्रधानमंत्री मोदी के साथ मिलकर ठोस प्रगति की दिशा में एक अवसर के रूप में भी देखता हूं. उम्मीद है कि हम दोनों देशों के बीच संबंधों के इतिहास में एक नया युग शुरू कर सकेंगे.

भारत और अमेरिका के बीच अच्छे संबंधों के लिए क्या बातें जरूरी हैं?
सबसे बुनियादी स्तर पर कहें तो भारत और अमेरिका के रिश्ते उन्हीं सिद्धांतों पर आधारित होने चाहिए, जिनके आधार पर दुनिया में दूसरे देशों के साथ हमारे अच्छे संबंध हैं. इसके लिए आपसी सम्मान भी जरूरी है, जहां हम एक-दूसरे के अलग-अलग इतिहासों और परंपरा को स्वीकार करते हुए एक-दूसरे के गुणों का सम्मान करें. आपसी संबंधों को मजबूत बनाने के लिए आपसी हितों की पहचान करना भी जरूरी है. इसमें दो राय नहीं कि जब हम साथ मिलकर काम करते हैं और आगे बढ़ते हैं तो हमारे लोगों को ज्यादा नौकरियां और अवसर उपलब्ध होंगे.

कोई भी दो देश हर बात पर एकमत नहीं हो सकते हैं, इसलिए भारत और अमेरिका भी एक-दूसरे से असहमत हो सकते हैं. लेकिन मेरा विश्वास है कि हम किसी भी तरह का मतभेद रखते हुए भी आपसी सम्मान की भावना के साथ काम कर सकते हैं. इतना ही नहीं, हमारे बहुत से आपसी हित मतभेदों को गौण कर सकते हैं.

इसके लिए अच्छा संवाद और तालमेल जरूरी है, न सिर्फ दोनों देशों के नेताओं के बीच, बल्कि दोनों सरकारों के बीच भी. जब हम नेता के तौर पर किसी बात पर सहमत हो जाएं तो हमारी सरकारों को चाहिए कि हमारे फैसलों को अमल में भी लाया जाए. हमें यह तय करना होगा कि जो हम कहें, उस पर अमल भी हो.

भारत-अमेरिका संबंधों के मामले में मेरी राय में ऐसे कई खास क्षेत्र हैं, जहां हम अपने प्रयासों पर ध्यान दे सकते हैं. दोनों ही देशों में हमारा जोर लोगों की दैनिक जिंदगी को बेहतर बनाने पर है. इसमें नौकरियों और रोजगार के अवसर तैयार करने, शिक्षा को सुधारने और लड़कियों तथा महिलाओं समेत सभी लोगों के लिए ज्यादा संभावनाएं तैयार करना शामिल है. हम व्यापार, निवेश और उच्च तकनीकी सहयोग के रास्ते में आने वाली बाधाओं को कम करने की दिशा में मिलकर काम कर सकते हैं.

अमेरिकी कंपनियां बुनियादी सुविधाएं तैयार करने में मदद देने को तैयार हैं. ये बुनियादी सुविधाएं भारतीय वृद्धि में उत्प्रेरक का काम करेंगी. हम स्वच्छ  वायु, पर्याप्त जल और बिजली के मामले में भारतीय जनता की दशा बेहतर बनाने के प्रधानमंत्री मोदी के प्रयास में मिलकर काम कर सकते हैं. इसमें हमारा नागरिक परमाणु समझौता भी मददगार हो सकता है. हम अपना सुरक्षा सहयोग भी बढ़ा सकते हैं, जिसमें एशिया-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा भी शामिल है. और मेरा मानना है कि ग्लोबल पार्टनर बनने का एक मतलब यह भी है कि हम दुनिया की सबसे जरूरी चुनौतियों में से एक जलवायु परिवर्तन की समस्या पर मिलकर काम करें.

अंतरराष्ट्रीय संबंधों में निजी मित्रता कितना महत्व रखती है? कृपया आप प्रधानमंत्री मोदी के बारे में अपनी राय बताएं.
दूसरे नेताओं के साथ मेरे व्यक्तिगत संबंध महत्वपूर्ण हैं, क्योंकि सरकारों के बीच आने वाले कठिन मुद्दों पर वे अक्सर मददगार हो सकते हैं, जिनका सामना अमूमन होता है, यहां तक कि सहयोगियों और मित्र देशों में भी.

प्रधानमंत्री मोदी का ऐतिहासिक चुनाव साफ तौर से तमाम भारतीयों की उम्मीदों और आकांक्षाओं को परिलक्षित करता है. उनकी अपेक्षाओं में शामिल हैं-ऐसी आर्थिक वृद्धि जो समावेशी हो, अच्छी सरकार जो अपने लोगों की सेवा करे, और ऐसी शिक्षा जो भारतीयों को कुशल और योग्य बना सके. और प्रधानमंत्री मोदी की शानदार जीवन यात्रा-एक चाय बेचने वाले से ऊपर उठकर प्रधानमंत्री बनना-भारतीय लोगों में सफलता पाने के दृढ़ निश्चय का प्रतिबिंब है.

सितंबर में व्हाइट हाउस में प्रधानमंत्री मोदी का स्वागत करने में मुझे बहुत खुशी हुई थी. मैंने उन्हें निमंत्रित किया था क्योंकि मुझे लगा कि उनके कार्यकाल के शुरू में ही उनसे मिलना जरूरी है ताकि हम उनकी नई ऊर्जा और उनके चुनाव से जुड़ी उम्मीदों का पूरा फायदा उठा सकें. भारत को बड़ी उपलब्धियां दिलाने के लिए उनका स्पष्ट नजरिया है. मैं बड़ी आर्थिक वृद्धि हासिल करने के रास्ते की बाधाओं को दूर करने के प्रति उनके निश्चय और उनकी ऊर्जा से काफी प्रभावित हुआ हूं.

मैं खास तौर से भारत-अमेरिका संबंधों को ज्यादा मजबूत करने के लिए उनकी इच्छा की सराहना करता हूं. उनके दौरे के दौरान हम अपने प्रयासों को तेजी से संचालित करने के लिए संयुक्त नजरिए पर सहमत हुए थे. बिलाशक, भारत का मेरा दौरा उसी नजरिए को आगे बढ़ाने के मामले में एक अच्छा अवसर है.

वॉशिंगटन के उनके दौरे के समय प्रधानमंत्री के साथ मुझे भी डॉ. मार्टिन लूथर किंग, जूनियर का स्मारक देखने का अवसर मिला था. महात्मा गांधी को अमेरिका की स्थापना के बुनियादी आदर्शों से कुछ हद तक प्रेरणा मिली थी. बदले में डॉ. मार्टिन लूथर किंग ने भी गांधी जी और अहिंसा के जरिए सामाजिक परिवर्तन लाने की उनकी प्रतिबद्धता से प्रेरणा ली थी. दूसरे शब्दों में भारत और अमेरिका विविधताओं से भरे लोकतांत्रिक समाज हैं. दोनों ही देश अपने मूल आदर्शों पर चलने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन मेरा मानना है कि हमारी जातीय और धार्मिक विविधता अपने देश और दुनिया में हमारी ताकत का स्रोत है.

अमेरिका के सामने आने वाले बड़े मुद्दों पर राष्ट्रपति ओबामा की क्या राय है? क्या हमारी बहुस्तरीय संस्थाएं इन मुद्दों के रास्ते में अड़चन हैं?
आज हमारे राष्ट्र और लोग पहले की अपेक्षा एक-दूसरे से ज्यादा जुड़े हैं, इसलिए आज की दुनिया जहां हमें असाधारण अवसर देती है, वहीं तमाम चुनौतियां भी खड़ी करती है, जिनका सामना कोई भी देश अकेले नहीं कर सकता है. इसीलिए मैं भारत के साथ द्विपक्षीय और बहुपक्षीय स्तर पर बेहतर भागीदारी बनाने के लिए प्रतिबद्ध हूं. मेरा मानना है कि जब हम दोनों देश मिलकर काम करेंगे तो हमारे लिए अवसरों का लाभ उठाने और आज की चुनौतियों का सामना करने के लिए अच्छा मौका होगा.

द्विपक्षीय आधार पर आपसी सहयोग बढ़ाने के साथ ही हमें यह भी सुनिश्चित करना होगा कि बहुस्तरीय संस्थाएं प्रभावी रूप से काम करें. इसीलिए मैंने वैश्विक आर्थिक निर्णय प्रक्रिया में उभरती अर्थव्यवस्थाओं-जिनमें भारत भी शामिल है-को ज्यादा महत्व देने के लिए जी-20 की भूमिका बढ़ाने पर जोर दिया. यही वजह है कि मेरी राय में संशोधित संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में भारत को स्थायी सदस्य के रूप में शामिल किया जाना चाहिए.

अवसरों के मामले में हमें विश्व अर्थव्यवस्था की वृद्धि को बनाए रखना है. मुझे खुशी हुई थी कि प्रधानमंत्री मोदी और मैंने विश्व व्यापार संगठन में बड़ी उपलब्धि हासिल करने के लिए मिलकर काम करने में कामयाबी पाई, ताकि वैश्विक व्यापार सौदे पर बातचीत फिर से शुरू हो सके. लोकतांत्रिक देश होने के कारण हमारी जिम्मेदारी है कि हम दूसरे देशों के नागरिकों के साथ खड़े हों ताकि वे लोकतांत्रिक भविष्य और मानवाधिकार हासिल कर सकें.

भारतीयों और अमेरिकियों द्वारा शुरू की गई तकनीकियां, जिनमें अक्सर दोनों का आपसी सहयोग होता है, हमें लोगों का जीवन बेहतर बनाने का अभूतपूर्व अवसर देती हैं. मुझे पूरा विश्वास है कि अफ्रीका में कृषि विकास तेज करने के लिए हम आपसी सहयोग बढ़ा सकते हैं, इबोला जैसी भयानक बीमारियों से लड़ सकते हैं और वैश्विक स्वास्थ्य को बेहतर बना सकते हैं. इसके अलावा दुनिया भर में भयानक गरीबी खत्म करने का लक्ष्य हासिल कर सकते हैं.

चुनौतियों के मामले में हमारी पहली जिम्मेदारी है अपने लोगों की सुरक्षा. अमेरिका और भारत आतंकवाद का मुकाबला करने के मामले में आपसी सहयोग बढ़ा सकते हैं. एशिया-प्रशांत क्षेत्र में हम क्षेत्रीय संगठनों के साथ काम करते हुए यह सुनिश्चित कर सकते हैं कि सभी देश एक ही नियमों का पालन करें और न्यायपूर्ण तरीकों से दुनिया को चलने दें. परमाणु हथियारों का प्रसार रोकने के लिए हमें मजबूती से प्रयास करना होगा.

हालांकि हमारी अर्थव्यवस्थाएं विकास के अलग-अलग चरणों में हैं, फिर भी हम दूसरे देशों के साथ मिलकर काम कर सकते हैं और जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण प्रदूषण से लडऩे के लिए इस साल पेरिस में एक ग्लोबल समझौता कर सकते हैं. आज हर देश जलवायु परिवर्तन से प्रभावित हो रहा है और इसका सामना करने के लिए हर देश को अपनी भूमिका निभाने की जरूरत है. वरना धरती पर आने वाली पीढिय़ां हमें गुनहगार बताएंगी.

आप पश्चिम एशिया, इस्लामिक स्टेट और अरब प्रायद्वीप में आतंकवाद और उग्रवाद की नई लहर को लेकर कितने चिंतित हैं?
राष्ट्रपति के रूप में मैंने यह आश्वस्त किया है कि अमेरिका आतंकवादी संगठनों के खिलाफ लड़ाई में किसी तरह की नरमी न बरते. इस लड़ाई में भारतीय और अमेरिकी लोग एक साथ हैं. न्यूयॉर्क में 9/11 हमले में भारतीय लोग मारे गए थे, जैसा कि मुंबई में 26/11 हमले में अमेरिकी लोगों की जान गई थी.

भारत के अपने पहले दौरे के समय मैं मारे गए भारतीयों के सम्मान में ताज होटल के मेमोरियल में गया था. वहां मैं हमले में बच गए लोगों से मिला और भारतीय जनता को एक मजबूत संदेश दिया कि हम सुरक्षा के मामले में उनके साथ खड़े हैं. मैंने स्पष्ट कर दिया है कि आतंकवाद के खतरे का मुकाबला करने के लिए अमेरिका पाकिस्तान के साथ काम कर रहा है, लेकिन पाकिस्तान में आतंकवादियों के पनाहगाह कतई स्वीकार्य नहीं हैं और मुंबई हमले के दोषियों को सजा मिलनी चाहिए. पेशावर के स्कूल में मासूम बच्चों की बेरहमी से की गई हत्याओं से भारतीय और अमेरिकी लोग भी सदमे में हैं.

सहयोगियों और भागीदारों के साथ काम करते हुए अमेरिका ने अफगानिस्तान और पाकिस्तान के कबायली  इलाकों में अल कायदा के नेतृत्व को तबाह कर दिया है. इसके अलावा यमन और सोमालिया में भी अल कायदा से जुड़े संगठनों के नेताओं को पकड़ा है. हालांकि अफगानिस्तान में लड़ाई का हमारा मिशन खत्म हो गया है, लेकिन हम अफगान सेना को लड़ाई की ट्रेनिंग देते रहेंगे ताकि अल कायदा वहां फिर से सिर न उठा सके. मैं कहना चाहूंगा कि अफगान लोगों का जीवन बेहतर बनाने में भारत ने इतने वर्षों में जो मदद की है, मैं उसका आभारी हूं.

सीरिया और इराक में आइएसआइएस का उभार एक और बड़ा खतरा है, जिस पर मैंने ध्यान दिया है. यह आतंकवाद का एक नया रूप उभर रहा है. बड़ा खतरा यह भी है कि अलग-अलग जगहों से युवा आतंकवादी विचारधारा से प्रेरणा लेकर खुद-ब-खुद हिंसा करने और अपनी जान देने को तैयार होने लगे हैं. यह नए तरह का रोमांटिक फैशन बनता जा रहा है. इसलिए आइएसआइएस पर नकेल डालना जरूरी हो गया है.

आज दुनिया में सबसे बड़ा खतरा कई देशों में अल कायदा से जुड़े संगठनों, हिंसक उग्रवादी संगठनों और ऐसे निजी आतंकवादियों से पैदा हो रहा है, जो आतंकवादी विचारधारा से प्रेरित हो रहे हैं. हाल ही में हमने पेरिस में हुए हमले को देखा है. इस प्रकार हम कई मोर्चों पर इस खतरे को देख रहे हैं. हम अपने देश की सीमा में आतंकवाद से लड़ रहे देशों की मदद कर रहे हैं, चाहे वह अरब प्रायद्वीप हो या उत्तरी अफ्रीका. हम आइएसआइएल को नेस्तनाबूद करने के लिए अंतरराष्ट्रीय गठबंधन की अगुआई कर रहे हैं. हम विदेशी आतंकवादियों को सीमा पार करके हमारे नागरिकों पर हमला करने से रोकने के लिए कई देशों के साथ काम कर रहे हैं, ताकि खून-खराबे का यह दौर खत्म हो.

अंत में हम उन लोगों और देशों के साथ मिलकर काम कर रहे हैं जो इन विनाशकारी आतंकवादी विचारधाराओं के खिलाफ खड़े हैं. आतंकवादी सिर्फ मारना और बर्बाद करना जानते हैं और धर्म के नाम पर जो ऐसा कर रहे हैं, वे अपने ही धर्म के साथ धोखा कर रहे हैं. अमेरिका भारत समेत दुनिया के सभी देशों के साथ काम करता रहेगा ताकि हम एक ऐसे भविष्य का निर्माण कर सकें, जिसमें बेहतर सुरक्षा, समृद्धि और सभी लोगों के लिए सम्मान हो.

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