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कैराना में महागठबंधन की मुस्कान

उपचुनावों के परिणाम ने जहां विपक्षी एकजुटता को मुस्कुराने का मौका दिया है, वहीं भाजपा के लिए चिंतित होने के सबब

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aajtak.in
एम. रियाज हाशमीउत्तर प्रदेश, 06 June 2018
कैराना में महागठबंधन की मुस्कान पीटीआइ

तबस्सुम का मतलब होता है—मुस्कुराहट. और हाल ही में उत्तर प्रदेश की कैराना लोकसभा सीट के उपचुनाव में राष्ट्रीय लोक दल (रालोद) की उम्मीदवार तबस्सुम हसन ने अपनी जीत से न केवल पार्टी बल्कि अन्य विपक्षी दलों को भी मुस्कुराने का मौका दिया है.

कैराना खासकर केंद्र और राज्य में सत्तासीन भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के लिए नाक का सवाल बन गई थी, जहां अपनी अस्तित्व की लड़ाई लड़ रहे रालोद ने समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी और कांग्रेस के समर्थन से भाजपा को पटखनी दे दी.

भाजपा की हार यही तक सीमित नहीं रही बल्कि वह प्रदेश की नूरपुर विधानसभा उपचुनाव भी हार गई. विभिन्न राज्यों में लोकसभा की चार और विधानसभा की 11 सीटों के उपचुनाव के नतीजे भाजपा के लिए अच्छी खबर नहीं है.

प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने 26 मई को शामली की चुनावी जनसभा में कहा था, ''अखिलेश यादव के हाथ मुजफ्फरनगर दंगों के खून से रंगे हैं और इसीलिए वे कैराना में उधार की प्रत्याशी के लिए प्रचार करने का साहस नहीं जुटा पा रहे हैं.'' जाहिर है, भाजपा की पूरी कोशिश यहां सांप्रदायिक ध्रुवीकरण की थी, जिसके दम पर उसने 2014 में इसी सीट पर 2 लाख 72 हजार मतों से भारी जीत हासिल की थी.

दरअसल, 2013 के मुजफ्फरनगर दंगों के बाद जाटों और मुसलमानों के बीच बनी दूरियों का सबसे ज्यादा फायदा भाजपा को ही मिला था. पर उपचुनाव के नतीजों ने भाजपा के इस दांव की हवा निकाल दी और रालोद के मुखिया चौधरी अजित सिंह जाट-मुसलमान समीकरण बैठाने में कामयाब रहे.

यह जीत अजित सिंह को 2019 के आम चुनाव से पहले विपक्ष के संभावित महागठबंधन में ताकतवर बनाने के लिए काफी है. वे पश्चिमी उत्तर प्रदेश में बड़ी भूमिका अदा कर सकते हैं. वहीं जाट-मुस्लिम एकजुटता का चल जाना ही भाजपा की बड़ी चिंता नजर आ रही है.

अजित सिंह के बेटे जयंत चैधरी ने सहयोगी दलों के नैतिक समर्थन के साथ कैराना की कमान अपने हाथ में रखी. रालोद और जयंत को आगे रखना दरअसल कांग्रेस, सपा और बसपा की रणनीति थी. ये इसके जरिए रालोद के जाट-मुस्लिम समीकरण को फिर से स्थापित करने में कामयाब रहे. 2013 के सांप्रदायिक दंगों के बाद 2014 आम चुनाव में रालोद इस समीकरण के दरकने से शून्य पर पहुंच गई थी और खुद अजित सिंह बागपत से चुनाव हार गए थे.

लिहाजा विपक्षी दलों ने कैराना के पूर्व सांसद दिवंगत मुनव्वर हसन की पत्नी तबस्सुम हसन को रणनीति के तहत प्रत्याशी बनाया. तबस्सुम पति की सड़क हादसे में मृत्यु के बाद 2009 में बसपा के टिकट पर सांसद बनी थीं, लेकिन 2014 में उन्होंने अपने बेटे नाहीद हसन को सपा के टिकट पर चुनाव लड़वाया जो भाजपा के हुकुम सिंह से हार गए थे.

1998 में वीरेंद्र वर्मा के बाद भाजपा ने दूसरी बार यह सीट 2014 में जीती थी और इसकी सबसे बड़ी वजह थी दंगे के बाद हुआ ध्रुवीकरण, जिसके चलते गुर्जर बाहुल्य यह सीट हिंदू और मुसलमान में बंट गई थी.

इसी को ध्यान में रखते हुए लखनऊ में पूर्व मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने जयंत को बसपा सुप्रीमो मायावती से बातचीत के लिए बुलाया और उन्हें रणनीति समझाने में कामयाब रहे. रालोद यह सीट जयंत के लिए मांग रहा था पर 2019 से पहले मजबूत विपक्षी गठबंधन की रणनीति पर सबकी सहमति बनी.

अखिलेश के इशारे पर तबस्सुम ने रालोद की सदस्यता ग्रहण की और जयंत ने उन्हें पार्टी सिंबल भी सौंप दिया. जयंत को अपनों के बीच इस सवाल का सामना भी करना पड़ा, पर उन्होंने संसदीय सीट के लगभग हर गांव में दस्तक दी और 100 से अधिक जनसभाएं की. हुकुम सिंह के निधन के बाद खाली हुई इस सीट पर भाजपा ने उनकी बेटी मृगांका सिंह पर ही दांव खेला.

राज्य सरकार से एक दर्जन से अधिक मंत्री एक पखवाड़े तक कैराना के गांवों में डेरा डाले रहे. खुद योगी आदित्यनाथ ने चुनाव से तीन दिन पहले तक दो बड़ी जनसभाएं कीं. उन्होंने कैराना से पलायन और मुजफ्फरनगर दंगों का जिक्र छेड़ा तो लगा अब चुनाव में ध्रुवीकरण तय है, लेकिन जयंत क्षेत्र से जुड़े असल मुद्दे उठाकर भाजपा को घेरते रहे.

चुनाव से एक दिन पहले 27 मई को इस सीट से चंद किलोमीटर की दूरी पर ईस्टर्न पेरीफेरल एक्सप्रेसवे के उद्घाटन समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस चुनाव को साधने की कोशिश की. लेकिन 26 मई की रात को बागपत में गन्ना भुगतान की मांग को लेकर धरने पर बैठे किसान 61 वर्षीय उदयवीर की मौत ने भाजपा के खिलाफ माहौल को हवा दे डाली.

कैराना में 44,618 मतों से जीत हासिल करने वाली तबस्सुम हसन कहती हैं, ''मुझे हर वर्ग का वोट मिला है, जिसमें जाटों की संख्या निर्णायक रही है. जाट और मुसलमान समझ चुके हैं कि 2013 में उनके बीच पैदा की गई नफरत का फायदा किसे मिला था और यह संदेश कैराना से 2019 में पूरे देश में जाएगा.''

उधर, मृगांका ने इंडिया टुडे से कहा, ''हार से मैं निराश हूं, लेकिन हताश नहीं हूं. विपक्षी एकता हमारे मुकाबले मजबूत साबित हुई और हम लोगों को अपनी बात समझाने में नाकाम रहे हैं.''

जयंत कहते हैं, ''कैराना में जिन्ना और दंगे का मुद्दा हारा है और गन्ने का मुद्दा जीता है. विपक्षी एकता का भविष्य अधिक मजबूत हुआ है.'' दरअसल, जयंत जिस गन्ने को मुद्दा बनाने में कामयाब रहे हैं, उसकी हकीकत नतीजों में नजर भी आती है.

कैराना लोकसभा सीट की थानाभवन विधानसभा सीट के विधायक सुरेश राणा यूपी सरकार में गन्ना मंत्री हैं. कैराना सीट के किसान शामली, ऊन, थानाभवन, नानौता, शेरमऊ और सरसावा छह चीनी मिलों से जुड़े हैं.

इन पर एक मई 2018 तक किसानों का करीब 606 करोड़ रुपए गन्ना मूल्य बकाया है. लेकिन इन मुद्दों पर भाजपा जवाब देने के बजाए ध्रुवीकरण के दांव खेलती रही और भाजपा के मंत्रियों—सुरेश राणा के थानाभवन और धर्म सिंह सैनी के नकुड़ विधानसभा क्षेत्र में मृगांका हार गईं.

वहीं नूरपुर में सपा के नईमुल हसन ने कांग्रेस, बसपा, रालोद, पीस पार्टी और महान दल के समर्थन से कांटे के मुकाबले में भाजपा की अवनि सिंह को हरा दिया. 2017 में अवनि सिंह के पति और भाजपा नेता लोकेंद्र चौहान ने नईम हो हरा दिया था.

चौहान की मौत के बाद यह सीट खाली हुई थी. इन दोनों सीटों पर भाजपा की हार से स्पष्ट है कि विपक्षी एकजुटता उसके लिए बड़ी चुनौती बनकर उभरा है. गठबंधन का कमाल यह है कि बसपा की मायावती और सपा के अखिलेश यादव घर में बैठे-बैठे चुनाव जीत गए जबकि भाजपा अपने मंत्रियों को सड़क पर उतारकर भी चुनाव हार गई!

महागठबंधन की कवायद दूसरे राज्यों के उपचुनावों में भी कारगर होती लग रही है.

झारखंड में भी सत्तासीन भाजपा के लिए उपचुनाव के नतीजे ठीक नहीं रहे. प्रदेश के उपचुनावों में गोमिया लोकसभा सीट और सिल्ली विधानसभा सीट, दोनों विपक्षी झारखंड मुक्ति मोर्चा न जीत लिया. तो महाराष्ट्र में भंडारा-गोंदिया लोकसभा सीट उससे नेशनलिस्ट कांग्रेस पार्टी ने छीन लिया. हालांकि भाजपा प्रदेश की पालघर लोकसभा सीट बचाने में कामयाब रही लेकिन यहां राज्य सरकार में उसकी सहयोगी शिवसेना ही चुनौती बनी हुई है.

उपचुनावों ने जहां विपक्षी दलों को उम्मीद दिखाई है, वहीं भाजपा के सहयोगी दलों में बेचैनी बढ़ा दी है. बिहार में उसकी सहयोगी जद (यू) को राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के हाथों जोकीहाट विधानसभा चुनाव में हार का सामना करना पड़ा.

इसके तुरंत बाद जद (यू) के राष्ट्रीय महासचिव और प्रवक्ता के.सी. त्यागी ने इस हार के लिए केंद्र की मोदी सरकार को जिम्मेदार ठहरा दिया. उन्होंने कहा कि पेट्रोल-डीजल की कीमतों में वृद्धि से देशभर में गुस्सा है. वहीं राजद नेता तेजस्वी यादव ने मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर हमला करते हुए कहा, ''नीतीश जी ने बिहार में 2 लाख कलम की जगह 2 लाख तलवारें बंटवाई. नीतीश चाचा को तलवार बांटने का इनाम मिला है.'' जाहिर है, भाजपा इन उपचुनावों में मुद्दों के अलावा विपक्षी एकजुटता के सामने बुरी तरह पिट गई.

—साथ में सरोज कुमार

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