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खुले में शौच जाने को मजबूर महिलाएं कब तक बनेंगी दरिंदगी का शिकार

शौचालय के अभाव में खुले में शौच के लिए जाने पर मजबूर महिलाएं आखिर कब तक बनेंगी दरिंदगी की शिकार. खुले में शौच काफी शर्मनाक है. महिलाएं इससे बचने के लिए अंधेरा होने का इंतजार करती हैं.

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शुरैह नियाज़ी 17 June 2014
खुले में शौच जाने को मजबूर महिलाएं कब तक बनेंगी दरिंदगी का शिकार

उत्तर प्रदेश के बदांयूं जिले में दो बहनों के साथ हुई बलात्कार और हत्या की पूरे मुल्क को हिला देने वाली घटना ने एक बार फिर महिलाओं के खुले में शौच के मुद्दे को गरमा दिया है. दोनों बहनें शौच के लिए बाहर गई थीं, तभी उनके साथ सामूहिक बलात्कार हुआ और उनकी हत्या कर दी गई.
मध्य प्रदेश में भी ऐसे मामलों में अछूता नहीं है. अशोक नगर जिले के अमनचार गांव में एक नाबालिग लड़की के साथ तब बलात्कार हुआ जब वह खुले में शौच के लिए गई थी. पिछले साल हुई यह घटना अकेली नहीं थी. भिंड के उबाई गांव में खेत में शौच के लिए गई दसवीं कक्षा की एक लड़की से गांव के ही एक व्यक्ति ने जबरदस्ती की कोशिश की. ग्वालियर के उटिला में सामूहिक बलात्कार की शिकार 15 वर्षीया किशोरी ने आग लगाकर आत्महत्या कर ली. शौच के लिए गई इस लड़की को तीन दरिंदों ने शिकार बनाया.
खुले में शौच के लिए मजबूर बच्चियों और महिलाओं की अस्मिता पर हर वक्त खतरा मंडराता रहता है. राज्य सरकार के तमाम दावों के बावजूद हकीकत यह है कि प्रदेश के 70 फीसदी से अधिक घरों में आज भी शौचालय नहीं है. यह तथ्य 2011 की जनगणना में सामने आया था. ग्रामीण क्षेत्रों में यह आंकड़ा 86 फीसदी है, जो राष्ट्रीय औसत 67 फीसदी से कहीं अधिक है. मध्य प्रदेश में जहां महिलाओं के साथ बलात्कार के मामले अन्य राज्यों की तुलना में कहीं अधिक है, शौचालय का अभाव स्थिति को और भयावह बना देता है. भोपाल की गैर-सरकारी संस्था आरंभ की डायरेक्टर अर्चना सहाय बताती हैं, ‘‘2004-05 में भोपाल में ऐसी घटनाओं की तादाद बहुत अधिक थी. झुग्गियों में रहने वाली बच्चियों को खुले में शौच के कारण हर रोज शर्मनाक परिस्थितियों का सामना करना पड़ता था. उनके साथ बलात्कार की कोशिशें भी हो चुकी थीं.’’ तब आरंभ ने अंतरराष्ट्रीय एनजीओ वाटर एड के साथ मिलकर शहर की 53 झुग्गी बस्तियों में सामुदायिक शौचालय बनवाए. इनके संचालन की जिम्मेदारी समुदायों को ही दी गई. सहाय कहती हैं, ‘‘इसके बाद ऐसे मामलों में कमी आई. जाहिर है कि शौचालय का मामला महिला की अस्मिता से सीधा जुड़ा हुआ है.’’
तैयार सामुदायिक शौचालय
शौचालयों का अभाव महिलाओं की सेहत पर भारी पड़ रहा है. हिंसा और उत्पीडऩ की आशंका के चलते महिलाएं दिन निकलने से पहले शौच जाने के लिए मजबूर हैं. यही नहीं, दिन के वक्त वे जरूरत से बहुत कम पानी पीती हैं, सिर्फ इसलिए ताकि उन्हें शौच के लिए नहीं जाना पड़े.
प्रदेश में शौचालय का मुद्दा 2012 में तब चर्चा में आया था जब बैतूल जिले को झीटूढाना गांव की अनिता नर्रे ने शादी के अगले ही दिन पति का घर छोड़ दिया था क्योंकि वहां शौचालय नहीं था. इस पर गांव की पंचायत ने आठ दिन के भीतर शौचालय का निर्माण करवाया, तब जाकर वह ससुराल लौटी थी. प्रदेश सरकार के समग्र स्वच्छता अभियान की ब्रांड एंबेसडर बन चुकी अनिता कहती हैं, ‘‘अभियान की सफलता के अभी बहुत कुछ करने की जरूरत है.’’
प्रदेश सरकार खुले में शौच पर रोक लगाने के लिए जोर-शोर से मर्यादा अभियान चला रही है. इसके तहत शौचालय का निर्माण करवाया जाता है और लोगों को जागरूक किया जाता है. लेकिन उसके प्रचार-प्रसार का तरीका विवादों में आ गया है. इस अभियान के तहत हरदा में एक होर्डिंग लगाया गया था जिसमें खुले में शौच करते एक व्यक्ति की तुलना कुत्ते से की गई थी. होर्डिंग पर लिखा था, ‘‘जानवर तो शौचालय का प्रयोग नहीं कर सकते हैं, लेकिन आप तो कर सकते है.’’ इस अमर्यादित पोस्टर को लोगों ने फाड़ दिया. होर्डिंग का उद्देश्य जागरूकता लाना कम और अपमानित करना ज्यादा लग रहा था. हालांकि हरदा जिला पंचायत के सीईओ गणेश शंकर मिश्र दावा करते हैं, ‘‘अभियान का अच्छा परिणाम मिला है. जून माह के अंत तक हम 30 पंचायतों को ओपन डिफेकेशन फ्री घोषित कर देंगे.’’ पर महिलाएं अब भी जानना चाहती हैं कि उनके अच्छे दिन कब आएंगे?   

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