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कांग्रेसियों के हाथ तो मिले, दिल का क्या?

सिंधिया को सामने लाने से उत्साह, लेकिन क्षत्रपों को साधना नहीं आसान.

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संतोष कुमारभोपाल,नई दिल्ली, 15 November 2013
कांग्रेसियों के हाथ तो मिले, दिल का क्या?

मध्य प्रदेश चुनाव की हमारी थीम है, सभी नेताओं की एकता’’ 15 अक्तूबर की शाम को यह कहते हुए 24, अकबर रोड के अपने दफ्तर में बैठे प्रभारी महासचिव मोहन प्रकाश फोन काट देते हैं. ज्योतिरादित्य सिंधिया को कमान सौंपे जाने के बाद से हो रही लगातार साझा रैलियां भी दूसरे क्षत्रपों की टीस कम नहीं कर पा रहीं.

हालांकि सिंधिया मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार होने से जुड़े हर टेढ़े-मेढ़े सवाल को बखूबी टाल जाते हैं. लेकिन वे हर जिम्मेदारी निभाने को भी तैयार बताते हैं. कांग्रेस के सामूहिक नेतृत्व की नीति का बखान करते हुए वे कहते हैं, ‘‘पिछले 2-3 महीनों से हम 8-9 लोग सब साथ हैं. इनमें दिग्विजय सिंह, कमलनाथ, मैं खुद, सत्यव्रत चतुर्वेदी, सुरेश पचौरी, कांतिलाल भूरिया, अजय सिंह और अरुण यादव शामिल हैं.’’ लेकिन मंच पर आकर मतभेद भुलाने का संदेश दे रहे कांग्रेस नेताओं के मनभेद अभी खत्म नहीं हुए हैं. राहुल के डंडे की वजह से सभी नेता मंच पर तो पहुंच जाते हैं, लेकिन टिकटों से लेकर सिंधिया के नेतृत्व तक की बात पर खटास सामने आ ही जाती है. खुद सिंधिया समर्थकों का आरोप है कि चुनाव अभियान समिति का मुखिया होने के बावजूद भोपाल प्रदेश कार्यालय से जारी होने वाले बयानों में सिंधिया का नाम आखिर में रखा जाता है.

दिग्विजिय के खास माने जाने वाले कांतिलाल भूरिया प्रदेश पार्टी अध्यक्ष हैं तो अजय सिंह विधायक दल के नेता. भोपाल में सिंधिया की प्रेस कॉन्फ्रेंस में दिग्विजय को घुसने न देने की खबर खूब चर्र्चा में रही थी. इसके लिए केंद्रीय स्तर के नेताओं ने दिग्विजय को ही गलत ठहराया. शायद यही वजह थी कि ग्वालियर में राहुल की रैली में दिग्विजय बोलने को तैयार न थे, लेकिन जब सिंधिया के अनुरोध पर माइक थामा तो दर्द जुबान पर आ ही गया, ‘‘डूबते सूरज को कोई नहीं पूजता, उगते सूरज को पूजते हैं.’’ मंच पर दिग्विजय सबसे पीछे की कुर्सी पर बैठे थे. भूरिया और अजय सिंह ने अपने संबोधन में सिंधिया का नाम तक लेना मुनासिब न समझा.

हालांकि कमलनाथ और चतुर्वेदी को सिंधिया का हिमायती माना जाता है. लेकिन उन्हें मुख्यमंत्री का उम्मीदवार घोषित करने के पक्ष में वे भी नहीं हैं. अर्जुन सिंह के बेटे अजय सिंह को टीस है कि पार्टी के लिए सड़कों पर संघर्ष उन्होंने किया, लेकिन अब प्रोजेक्ट किए जा रहे हैं सिंधिया. भूरिया तो कई बार केंद्रीय मंत्री की कुर्सी छोड़ पार्टी अध्यक्ष बनने की दुहाई दे चुके हैं. इन क्षत्रपों की अपनी महत्वाकांक्षाएं हैं.

हालांकि अटकलें लगाई जा रही थीं कि राहुल गांधी ग्वालियर की जनसभा में सिंधिया को औपचारिक रूप से मुख्यमंत्री पद का उम्मीदवार घोषित कर सकते हैं. लेकिन राहुल ने भाषण के आखिर में मध्य प्रदेश की सत्ता में आने की उम्मीद जाहिर करते हुए कहा, ‘‘इस चुनाव में कांग्रेस पार्टी सत्ता में आएगी, चाहे जो भी उस सरकार को चलाए, लेकिन राज्य के गरीबों की इज्जत की जाएगी.’’

राहुल की तमाम कोशिशों के बावजूद मतभेद खत्म नहीं हो रहे. प्रदेश के प्रभारी महासचिव मोहन प्रकाश तो सिंधिया को चेहरा बनाए जाने के सवाल से ही असहमति जाहिर करते हैं. उनके शब्दों में, ‘‘हमारे चारों-पांचों नेता वहां पार्टी का चेहरा हैं.’’ अंदरूनी कलह को थामने के लिए राहुल ने टिकट बंटवारे का फॉर्मूला दिया था कि सर्वे के आधार पर केंद्र टिकट बांटे. लेकिन ऐसे में क्षत्रप जिम्मेदारी लेने को तैयार नहीं हुए. अंदरूनी खींचतान पर पार्टी के एक और वरिष्ठ नेता कहते हैं, ‘‘सिंधिया को कमान सौंपे जाने के बाद बड़े नेताओं ने न बड़ा दिल दिखाया, न ही युवा सिंधिया सबको साथ लेकर चल पाए.’’

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