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वेंटिलेटर घोटालाः सांस के लिए संघर्ष

जब अहमदाबाद के एक प्रमुख अस्पताल के प्रबंधन ने एक पत्र में मशीनों को 'वांछित परिणाम' देने में असमर्थ बताया था, तो फिर धमन-1 वेंटिलेटर को राज्य के इलेक्ट्रॉनिक्स और गुणवत्ता विकास केंद्र से कैसे अनुमोदन मिल गया?

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aajtak.in
उदय माहूरकरअहमदाबाद, 17 June 2020
वेंटिलेटर घोटालाः सांस के लिए संघर्ष आधा-अधूरा राजकोट में 22 अप्रैल को धमन-1 का ट्रायल किया गया

एक स्थानीय अखबार में पिछले महीने एक खोजी खबर छपने के बाद, गुजरात सरकार स्थानीय स्तर पर निर्मित 'धमन-1' वेंटिलेटर की खरीद का बचाव करने को विवश हुई. नौकरशाहों और डॉक्टरों ने आरोप लगाया था कि ये वेंटिलेटर घटिया गुणवत्ता के हैं. आलोचकों का आरोप है कि बिना पर्याप्त परीक्षण के मशीनों का उत्पादन शुरू कर दिया गया क्योंकि उसके निर्माता ज्योति सीएनसी ऑटोमेशन के एमडी पराक्रमसिंह जडेजा भी उसी राजकोट शहर के हैं जहां के मुख्यमंत्री विजय रूपानी हैं और दोनों एक दूसरे को अच्छी तरह से जानते भी हैं.

9 जून को, राज्य कांग्रेस अध्यक्ष अमित चावड़ा ने राज्य की भाजपा सरकार को इसका जवाब देने को कहा. उन्होंने मांग की, ''हम जानना चाहते हैं कि धमन-1 वेंटिलेटर का उपयोग करके कितने गंभीर रोगियों का इलाज किया जा रहा है, और उनमें से कितने की मृत्यु हो गई है?'' गुजरात के स्वास्थ्य सचिव जयंति रवि का कहना है, ''इस मामले को जरूरत से ज्यादा तूल दी जा रही है.'' अहमदाबाद सिविल अस्पताल में सैकड़ों लोगों की मौत हो गई है और राज्य के उच्च न्यायालय ने अस्पताल के हालात पर टिप्पणी करते हुए 'दयनीय' तक कहा था.

अस्पताल के एक डॉक्टर का दावा है, ''धमन-1 के कारण एक भी व्यक्ति की मृत्यु नहीं हुई है. यह कम गंभीर मरीजों के लिए अच्छा वेंटिलेटर है.'' ये डॉक्टर अपना नाम जाहिर नहीं करना चाहते, लेकिन यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि 'कम गंभीर' का क्या तात्पर्य है क्योंकि वेंटिलेटर की जरूरत उसी मरीज को होती है जिसे सांस लेने में गंभीर संकट हो.

चावड़ा का कहना है, ''रूपानी सरकार ने लोगों के जीवन के साथ खिलवाड़ किया है. यह सिर्फ आपराधिक लापरवाही का मामला नहीं है, बल्कि सरकार गुणवत्ता के मापदंडों को नजरअंदाज करके मुख्यमंत्री के दोस्त को फायदा पहुंचा रही है.'' वहीं, भाजपा प्रवक्ता भरत पंड्या कहते हैं, ''कांग्रेस इतनी गिर चुकी है कि वह वैश्विक महामारी पर भी राजनीति से बाज नहीं आ रही.'' इन सियासी आरोपों-प्रत्यारोपों के पीछे 19 जून को होने वाला राज्यसभा चुनाव भी एक कारण हो सकता है. गुजरात में राज्यसभा की चार सीटों के लिए चुनाव होगा. हाल ही में कांग्रेस के तीन और विधायक भाजपा के खेमे में चले गए तथा राज्य विधानसभा में कांग्रेस की ताकत 2017 में जीती 77 सीटों से घटकर 65 रह गई है. और टूट-फूट को रोकने के लिए उसने अपने सभी बचे हुए विधायकों को एक रिजॉर्ट में रखा है.

अगर राजनैतिक रस्साकशी से इतर कांग्रेस ने जो सवाल उठाए हैं उसको लेकर रूपानी सरकार लोगों को आश्वस्त करने में नाकाम रही है. वेंटिलेटर को फैक्ट्री से सीधे अस्पतालों में क्यों ले जाया गया जब निर्माता ने खुद कहा था कि उत्पाद पूरी तरह तैयार नहीं है? वेंटिलेटर के प्रदर्शन को उन्नत करने के लिए इसे चार और पुर्जों की आवश्यकता थी. उन पुर्जों में से कितनों को, दुनियाभर में इस्तेमाल हो रहे वेंटिलेटर्स के लिए बहुत आवश्यक माना जाता है? जब अहमदाबाद के एक प्रमुख अस्पताल के प्रबंधन ने एक पत्र में मशीनों को 'वांछित परिणाम' देने में असमर्थ बताया था, तो फिर धमन-1 वेंटिलेटर को राज्य के इलेक्ट्रॉनिक्स और गुणवत्ता विकास केंद्र से कैसे अनुमोदन मिल गया? शहर के सिविल अस्पताल में वरिष्ठ स्टाफ ने मीडिया को बताया कि धमन-1 का उपयोग आपात स्थिति में केवल तभी किया जा सकता है जब कोई अन्य वेंटिलेटर उपलब्ध नहीं हो. अस्पताल को कम से कम 236 धमन-1 वेंटिलेटर दिए गए थे, वैसे यह स्पष्ट नहीं कि उनमें से कितने इस्तेमाल किए गए.

सूत्रों के मुताबिक, राष्ट्रव्यापी लॉकडाउन के ठीक एक दिन बाद 26 मार्च को धमन-1 के निर्माण का विचार आया. एक अनाम सरकारी अधिकारी जडेजा के पास पहुंचा जिनके भारत और फ्रांस स्थित कारखाने रक्षा, एयरोस्पेस और ऑटोमोबाइल सहित विभिन्न उद्योगों के लिए विशेष मशीन टूल्स का निर्माण करते हैं, तथा सुझाव दिया कि उन्हें वेंटिलेटर के निर्माण में अपना हाथ आजमाना चाहिए. दुनिया भर में वेंटिलेटर की मांग को देखते हुए गुजरात सरकार का मानना था कि एक समय ऐसा आ सकता है जब बहुत अधिक वेंटिलेटर की जरूरत होगी पर वैश्विक बाजारों में यह पर्याप्त संख्या में उपलब्ध नहीं हो पाएगा.

जडेजा को बहुत संभावना दिखी और ज्योति सीएनसी सिर्फ 10 दिनों में वेंटिलेटर बनाने में सक्षम हो गई. अप्रैल की शुरुआत में ही धमन-1 को एक स्वदेशी उपलब्धि के रूप में बताया जाने लगा. 4 अप्रैल को मुख्यमंत्री कार्यालय की वेबसाइट पर एक लेख में सीएम रूपानी के हवाले से लिखा गया कि 'सस्ता वेंटिलेटर विकसित करने की यह उपलब्धि' गुजरात को 'घातक वैश्विक बीमारी से लडऩे में एक पथप्रदर्शक' बनाएगी. उन्होंने यह भी कहा कि धमन-1 ''प्रधानमंत्री श्री नरेंद्रभाई मोदी के 'मेक इन इंडिया' अभियान की एक बड़ी उपलब्धि है.''

सरकारी सूत्र, जो अपनी पहचान नहीं जाहिर होने देना चाहते, कहते हैं कि प्रधानमंत्री की नजर में खुद को चमकाने की रूपानी की लालसा में धमन-1 को अस्पतालों में पहुंचा दिया गया. वैसे, रूपानी के करीबी एक सूत्र ने जोर देकर कहा, ''मामूली खामियों के बावजूद धमन-1 की गुणवत्ता में कोई कमी नहीं है जैसा कि विपक्ष आरोप लगा रहा है. वेंटिलेटर को अपग्रेड किया जा चुका है और सभी कोविड रोगियों पर उपयोग के लिए पूरी तरह तैयार है.''

लेकिन तब जडेजा ने खुद मीडिया को बताया था कि उनकी कंपनी ने कभी भी गुजरात सरकार के सामने धमन-1 को 'पूर्ण-वेंटिलेटर' के रूप में पेश नहीं किया और इस मशीन को अपग्रेड करने के लिए जरूरी पुर्जे तभी उपलब्ध हो सकेंगे जब आयात संभव हो. सरकार ने भी आधिकारिक तौर पर इसे बचाव के तौर पर प्रयोग किया है. पर जरूरी पुर्जों के बिना, ज्योति सीएनसी ने गुजरात सरकार को 1,000 धमन-1 मशीनें क्यों दे दीं?

यहां तक कि अगर अपग्रेड भी कर दिया जाता है, तो यह स्पष्ट नहीं है कि गुजरात सरकार ने आखिर एक आधे-अधूरे उत्पाद को कैसे मंजूरी दे दी, और केंद्र सरकार के स्वामित्व वाली एचएलएल लाइफकेयर ने ऐसी मशीन के लिए क्यों ऑर्डर दे दिए जिसका पर्याप्त परीक्षण भी नहीं हुआ है. विवाद बढऩे के बाद, पुदुच्चेरी की सरकार ने वेंटिलेटर के लिए अपना ऑर्डर रद्द कर दिया. इस बीच, पीएम-केयर्स फंड ने मई में घोषणा की कि उसने 'मेड इन इंडिया' वेंटिलेटर पर खर्च करने के लिए 2,000 करोड़ रुपए निर्धारित किए थे. यह घोषणा धमन-1 की गुणवत्ता के बारे में चिकित्सा बिरादरी की आशंकाओं की खबरें आने के ठीक दो दिन पहले हुई थी.

अगर वास्तव में धमन-1 को अपग्रेड किया जा चुका है और यह अब एक 'पूर्ण-विकसित' वेंटिलेटर है, जो गंभीर रूप से बीमार कोविड रोगियों पर उपयोग के लिए सुरक्षित है, तो राज्य सरकार को इसके लिए पूर्ण आश्वासन के साथ एक अधिसूचना जारी करनी चाहिए. भारत में अभी प्रति दिन कोविड के 9,000 से ज्यादा मामलों के सामने आने, और सिर्फ अहमदाबाद में (10 जून को) 3,569 सक्रिय मामलों के होने, से वेंटिलेटरों की बहुत जरूरत हो सकती है क्योंकि अस्पताल बेड और उपकरणों की कमी से जूझ रहे हैं. क्या धमन-1 इतना भरोसेमंद है कि उससे इस कमी को पूरा किया जा सके? हमें तब तक पता नहीं चलेगा जब तक सरकार कुछ जवाब नहीं देती.

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