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उत्तराखंड: बाल-बाल बचा नैनीताल

नैनीताल आज अगर खड़ा है तो प्रशासन की मुस्तैदी के कारण नहीं, बल्कि एक जनहित याचिका पर आए हाइकोर्ट के आदेश के कारण.

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aajtak.in
अखिलेश पांडे 20 July 2015
उत्तराखंड: बाल-बाल बचा नैनीताल बारिश से मची तबाही में टूट गए कई घर

घनघोर घटा पहले भी छाई थी बरसात पहले भी हुई थी, लेकिन 5 जुलाई से  पहले नैनीताल ने ऐसा नजारा कभी नहीं देखा था. कुछ ही घंटों के भीतर हुई 400 मिलीमीटर बारिश ने पूरे शहर में तबाही का ऐसा मंजर फैलाया कि नैनीतालवासी अब तक उससे उबर नहीं पाए हैं.

सात नंबर, नैनीताल और मार्शल कॉटेज क्षेत्र में नाले के किनारे बनाए गए भवन हवा में लटक गए हैं. मार्शल कॉटेज में रहने वाले डॉ. ललित तिवारी 5 जुलाई के नजारे को कुछ यूं बयान करते हैं, “बारिश ने जो कहर बरपाना शुरू किया, वह बहुत डरावना था. नालों में पानी भरता जा रहा था. पानी घरों के भीतर घुस आया. बहुत से घरों की दीवारें और छत टूटकर गिर गईं. तेज बहाव के कारण नाले के किनारे बसे लोगों ने बमुश्किल अपनी जान बचाई.” मार्शल कॉटेज के कई घर हवा में लटक गए हैं. प्रशासन ने अब लोगों को वहां से विस्थासित करने का आदेश दिया है. लेकिन प्रकृति का तांडव अब भी जारी है. भारी बारिश से मॉल रोड के किनारे लगे विशालकाय वृक्ष भी जड़ समेत उखड़कर गिर रहे हैं. पेड़ के नीचे दबकर एक नाव चालक की मौत भी हो गई. नैनीताल में कृष्णापुर, हरिनगर और जीआइसी क्षेत्र में भूधंसाव बढ़ रहा है. गुफा महादेव, हरिनगर, रईस होटल और अन्य इलाकों में हालात अब भी भयानक बने हैं. पिटरिया और नारायण नगर में मकान अब भी धंस रहे हैं.

आखिर यह हुआ कैसे? नैनीताल के तमाम नालों के आसपास फेंका गया अवैध निर्माण का मलबा बारिश में तबाही का कारण बन गया. इतिहासकार एवं पर्यावरणविद् अजय रावत ने इस मामले में 2012 में एक जनहित याचिका दायर की थी. इस पर सुनवाई करते हुए हाइकोर्ट ने कई नालों को अतिक्रमण से मुक्त करने और उनकी सफाई कराने का आदेश दिया था. कोर्ट के आदेश का पालन करते हुए जिला प्रशासन ने नालों के मुहाने खुलवाए. नैनीताल की विधायक सरिता आर्य कहती हैं, “यदि हाइकोर्ट ने पिछले साल जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए इन नालों के बंद कर दिए मुहाने न खुलवाए होते तो बहुत बड़ी त्रासदी हो सकती थी.”

नैनीताल के संरक्षण में नालों की अहम भूमिका रही है. सितंबर, 1880 में ऐसी ही बारिश से हुए भूस्खलन ने नैनीताल का भूगोल बदल डाला था. इसके बाद तत्कालीन ब्रिटिश हुकूमत ने नैनीताल की सुरक्षा को लेकर एक प्रभावी नालातंत्र विकसित किया, जिसके तहत शहर में 79 किमी लंबे 63 नाले बने. 1927 में अंग्रेजों ने नैनीताल की सुरक्षा को लेकर हिलसाइड सेक्रटी कमेटी का गठन किया. इस कमेटी में कुमाऊं कमिशनर को अध्यक्ष और पीडब्ल्यूडी के इंजीनियर को सदस्य सचिव बनाया गया. इसके अलावा नगरपालिका नैनीताल के अध्यक्ष समेत सिंचाई विभाग, भू-वैज्ञानिक एवं प्रदेश के वित्त सचिव, नियोजन सचिव और पीडब्ल्यूडी सचिव को भी इसके सदस्य के रूप में नामित किया गया. शुरू में तो यह कमेटी नालों का संरक्षण करती रही, लेकिन अस्सी के दशक के बाद इसकी उपेक्षा शुरू हो गई. नैनीताल में नगरपालिका परिषद के सदस्य रह चुके शहर के वरिष्ठ पत्रकार प्रयाग पांडे कहते हैं, “हिलसाइड सेक्रटी कमेटी की उपेक्षा ने ही शहर को आज की इस हालत में धकेल दिया है.”

नैनीताल की इस तबाही के बाद सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह खड़ा होता है कि इस तरह की प्राकृतिक आपदाएं वास्तव में कितनी प्राकृतिक हैं और कितनी खुद इंसान की बनाई हुईं. डॉ. अजय रावत कहते हैं, “अगर नैनीताल में जल निकासी की समुचित व्यवस्था और ऐसी किसी आपदा से निबटने की पूर्व तैयारी होती तो इतना विनाश नहीं होता.” लेकिन प्रशासन ने हमेशा की तरह अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाडऩे का ही काम किया है. नैनीताल नगरपालिका परिषद के अध्यक्ष श्याम नारायण कहते हैं, “नैनीताल की तबाही का कारण पहाड़ों में हो रहा अनियंत्रित निर्माण है. इसके लिए नगरपालिका बिलकुल जिम्मेदार नहीं है. नैनीताल झील विशेष क्षेत्र विकास प्राधिकरण को निर्माण कार्यों की जिम्मेदारी मिलने के बाद ही शहर में मकानों की बाढ़ आ गई है. इस पर प्रभावी रोक लगाने में प्राधिकरण पूरी तरह असफल रहा है.”

नैनीताल की विधायक सरिता आर्य कहती हैं, “हाइकोर्ट ने फेज-1 और फेज-2 में जिन इलाकों को असुरक्षित बताया है, नैनीताल के तकरीबन 5,000 परिवार उसकी जद में आ रहे हैं. इस कारण शहर की 25,000 की आबादी प्रभावित हो रही है. इतने सारे लोगों को विस्थापित करना आसान काम नहीं हैं. हमें उनका भी पक्ष लेना होगा.” आर्य ने इस मामले को लेकर दिल्ली में झुग्गियों के रेगुलेशन की तरह राज्य सरकार द्वारा भी इन्हें राहत देने के लिए कोई रास्ता निकालने की मांग की है. वे कहती हैं, “विशेष झील परिक्षेत्र विकास प्राधिकरण की अनदेखी और लापरवाही के कारण यह नौबत आई है. 25,000 लोग इस आदेश से प्रभावित होने वाले हैं. उनकी जिंदगी भर की पूंजी वहां लगी हुई है. ऐसे में इस स्थिति के लिए प्राधिकरण को ही जिम्मेदार माना जा सकता है क्योंकि उसने अवैध निर्माण समय पर नहीं रोके और यह स्थिति पैदा होने दी.”
यह तो हमेशा ही होता है कि नेता आपदा के गिर्द भी सियासत शुरू कर देते हैं. अधिकारी अपनी जिम्मेदारी से पल्ला झाड़ लेते हैं. आरोपों के ठीकरे एक-दूसरे के सिरों पर फोड़े जाने लगते हैं. नैनीताल में भी यही हो रहा है. लेकिन सवाल यह है कि इसके आगे क्या? 1993 के बाद से इस शहर का कोई मास्टर प्लान बना ही नहीं है. यह जिम्मेदारी प्राधिकरण की थी, लेकिन उसने नहीं निभाई, जिसका खामियाजा आज शहरवासी भुगत रहे हैं. लेकिन अगर अब भी हम नहीं चेते तो कल को प्रकृति का कहर विनाश की कोई नई इबारत लिख सकता है.

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