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राजस्थान: पर्यावरण पर सरकारी कुल्हाड़ी

राजस्थान में वनक्षेत्र और अन्य इलाकों में पेड़ों की अंधाधुंध कटाई से पर्यावरण खतरे में, लेकिन सरकारी विभाग उदासीन हैं.

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पीयूष पाचकजयपुर, 23 December 2014
राजस्थान: पर्यावरण पर सरकारी कुल्हाड़ी

राजस्थान में वनक्षेत्र से लेकर अन्य इलाकों में  पेड़ों की कटाई का आम नजारा देखा जा सकता है. पेड़ों का विनाश और वन क्षेत्र में कमी गंभीर और संवेदनशील समस्या बन गई है. वनों की अवैध कटाई, कोयला निर्माण, अवैध कृषि, खनन कार्य और अवैध कॉलोनी निर्माण से पर्यावरण चक्र पूरी तरह से गड़बड़ा गया है. राज्य में वन और वन क्षेत्र तेजी से सिकुड़ते जा रहे हैं. लेकिन लगता है कि सरकार और शासन में बैठे अधिकारियों को इसकी कोई फिक्र नहीं है.

प्रदेश की सरकारें पेड़ों और वनों के विकास के लिए वन तथा दूसरे महकमों के माध्यम से अरबों रु. लगा चुकी हैं लेकिन वे पौधों की जड़ों मे जान नहीं फूंक सके. करीब पांच साल पहले पूर्ववर्ती अशोक गहलोत सरकार ने 'हरित राजस्थान योजना' का आह्वान करके राज्य में 3094 कि.मी. लंबी सड़कों के किनारे 72,356 हैक्टेयर शहरी और ग्रामीण इलाकों में 2.76 करोड़ पौधे लगाए थे.

लेकिन सिंचाई और उनकी सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था के अभाव में पौधों का कब सफाया हो गया, पता ही नहीं चला. इसी तरह ग्रामीण विकास विभाग ने 2009 से 2012 के बीच नरेगा के तहत प्रदेश में करीब 4 करोड़ पौधे लगाए थे, जिन पर करीब डेढ़ सौ करोड़ रु. खर्च हुए थे.

अब विभागीय अधिकारी स्वीकार रहे हैं कि उनमें से डेढ़ करोड़ पौधे सूखकर मर चुके हैं. सच तो यह है कि उनमें से पांच फीसदी पौधे भी जीवित नहीं हैं. पर्यावरणविद् और पीपुल फॉर एनीमल के प्रदेश प्रभारी बाबूलाल जाजू सवाल उठाते हैं,  ''उक्ïत योजनाओं पर करोडों रु. बर्बाद करने वाले अफसरों से जवाब तलब होना चाहिए. अफसरों की जवाबदेही तय करना जरूरी है. ''

सड़क निर्माण करने वाले राष्ट्रीय राजमार्ग प्राधिकरण के कारनामे भी कम दिलचस्प नहीं हैं. वह लगातार पेड़ों पर कुल्हाड़ी चला रहा है और बदले में झडिय़ां लगाकर खानापूर्ति कर रहा है. पिछले पांच वर्ष में राज्य के विभिन्न राजमार्गों पर प्राधिकरण ने कुल 4,69 लाख पेड़ काट डाले हैं.

हाल में निर्माणाधीन राजमार्गों पर काटे जा रहे पेड़ों की संख्या इसमें शामिल नहीं है. काटे गए इन पेड़ों की एवज मे नियमानुसार तीन गुना पेड़ लगाने थे लेकिन प्राधिकरण ने राजमार्गों पर कनेर या दूसरी झाडिय़ां लगाकर खानापूर्ति करके अपने कर्तव्यों की इतिश्री कर डाली.

कुछ बानगी देखिए. किशनगढ़, उदयपुर, रतनपुर राजमार्ग, चितौडग़ढ़ बाइपास, सिरोही, स्वरूपगंज, पिंडवाडा और उदयपुर मार्ग पर काटे गए पेड़ों के बदले नियमानुसार पेड़ नहीं लगाए गए हैं. करीब सभी राजमार्गों पर यही आलम है. चित्तौड़, भीलवाड़ा, कोटा एनएच नं. 27 पर 160 कि.मी. मार्ग पर 1,22,000 पेड़ लगाने थे लेकिन उनकी जगह डिवाइडर में कनेर और अन्य झाडिय़ां लगाकर उनकी पेड़ों में गिनती कराकर सरकार और जनता की आंखों मे धूल झेंकी जा रही है.

जयपुर, महुआ एनएच-11 पर 84,724 , जयपुर-किशनगढ़ एनएच-8 पर 81,867 और भरतपुर-महुआ एनएच-11 पर 91,936 पेड़ लगाने की बात कही गई है, जबकि मौके पर 25 फीसदी पौधे भी जीवित नहीं हैं. 
राजस्थान की हाइवे पर कनेर के पेड़ों की हालत
(राजस्थान की हाइवे पर कनेर के पेड़ों की हालत)

पर्यावरणविद् जाजू ने तो इस धोखाधड़ी को लेकर चित्तौड, भरतपुर, बूंदी और भीलवाडा में प्राथमिकी भी दर्ज कराई है. जाजू बताते है कि सिर्फ भीलवाड़ा पुलिस अधीक्षक की ओर से इस मसले में कार्रवाई शुरू की गई है. जाजू ने इसे लेकर पुलिस महानिदेशक को पत्र भी लिखा है. उन्होंने केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्री नितिन गडकरी और वन पर्यावरण मंत्री प्रकाश जावडेकर से भी कार्रवाई करने की मांग की है.

राज्य में वृक्षों के तेजी से हो रहे सफाए और घने वन क्षेत्र को लेकर सवाल पूछने पर राज्य के प्रधान मुख्य वन संरक्षक राहुल कुमार इसे सिरे से खारिज करते हैं, ''राज्य में न तो वृक्ष कम हो रहे है और न ही वन क्षेत्र घट रहा है. ''  वे कहते हैं, ''आप शहरों को देखकर ऐसा कह रहे होंगे लेकिन वन क्षेत्र सुरक्षित हैं. पौधारोपण और वनों में होने वाली अवैध गतिविधियों पर नियमानुसार कार्रवाई की जाती है.

वन भूमि पर अतिक्रमण करने वालों पर एल.आर.ए. लैंड रेवेन्यू एक्ट 1956 की धारा 9 के तहत मुकदमा दर्ज कराया जाता है. '' लेकिन तथ्य इसके उलट हैं. वन भूमि और वन्यजीव अभयारण्य की भूमि पर अनवरत अवैध अतिक्रमण और निर्माणों की प्रदेश मे बाढ-सी आई है. पहाड़ों पर नित नए मकान और होटल खड़े हो रहे हैं.

खुद वन विभाग के अनुसार 30 सितंबर, 2013 तक राज्य में 29,104.35 हेक्टेयर वन भूमि अतिक्रमण का शिकार है. इतना ही नही, वोटों की राजनीति के चलते इंसानों को प्राणवायु देने वाली 21,000 हेक्टेयर बेशकीमती वन भूमि पर राज्य सरकार ने पिछले साल अतिक्रमण करने वालों लोगों को पट्टे भी दे दिए.

राजस्थान में पौधारोपण कीर्तिमान की हकीकतप्रदेश में पौधारोपण की हालत भी बदतर होती गई है. राज्य के वन विभाग ने वर्ष 2007-2008 में 83,134 हेक्टेयर भूमि पर पौधारोपण किया था. फिर 2009-2010 में 97,698 हेक्टेयर, 2011-12 में 89,230 हेक्टेयर और 2010-11 के दौरान 96,145 हेक्टेयर मे पौधारोपण किया. लेकिन 2012-13 और 2013-14 में यह घटकर  49,246 हेक्टेयर और 66,775 हेक्टेयर रह गया. पर सरकार इन मसलों पर उदासीन है.

जाजू सुझव देते हैं, ''पौधारोपण के पांच वर्ष तक पुख्ता सुरक्षा व्यवस्था, ब्लॉक प्लांटेशन पर फेसिंग, अवैध आरा मशीनों पर रोक, विद्युत और एलपीजी शवदाह गृहों का निर्माण, फोरलेन पर नियमानुसार पौधारोपण के जरिए वनों का विनाश रोका जा सकता है. '' एक अनुमान के अनुसार अवैध आरा मशीनों को बंद करने से राज्य में 5 साल में 7.5 करोड़ और विद्युत तथा एलपीजी शवदाह गृह लगाकर सालाना 22 लाख पेड़ बचाए जा सकते हैं.

आजादी के समय में राज्य में 13.5 फीसदी वन क्षेत्र था जो घटकर 9.4 प्रतिशत रह गया है. वृक्षों की सघनता भी 0.8 प्रतिशत से घटकर 0.3 प्रतिशत रह गई है. इसी विषमता की वजह से बारिश का अनुपात भी घटकर 60 फीसदी रह गया है, जबकि पानी का खर्चा बीस गुना बढ़ चुका है. पेयजल की आपातकालीन योजनाओं और वनों के विकास के नाम पर अरबों रु. खर्च किए जा रहे हैं. ऐसे में अगर मौजूदा सरकार नहीं चेतती है तो हालात और भी बदतर हो सकते हैं.

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