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टाटा के आगे बढऩे का वक्त

रिटायर हो रहे टाटा संस के चेयरमैन को भारतीय कारोबार जगत का नैतिक दिशा निर्धारक बनना चाहिए.

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aajtak.in
राजीव कुमारनई दिल्‍ली, 20 January 2013
टाटा के आगे बढऩे का वक्त

दस वर्षों के फासले पर मुझे रतन टाटा से दो दफा मिलने का मौका मिला. इस मुलाकात से मेरे दिमाग में यह बात साफ तौर पर बैठ गई कि वे किसी प्रोटोकाल या ऊंचे-नीचे पद की बात से बिल्कुल बंधे नहीं होते. पहली मुलाकात दिल्ली के इंदिरा गांधी हवाईअड्डे के पुराने अंतररार्ष्ट्रीय टर्मिनल पर महाराजा लाउंज में हुई थी और दूसरी, अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा के भारतीय कारोबार जगत को संबोधित करने के दौरान मुंबई के ट्राइडेंट होटल में रीगल बॉलरूम की पहली कतार में.

दोनों मौकों पर वे यूं ही मेरे बगल की खाली सीट पर आकर बैठ गए और किसी ने गौर नहीं किया. उनके लोकतांत्रिक और खुले स्वभाव की वजह से हमारे बीच बातचीत का सिलसिला शुरू हुआ. बातचीत के अंत में मैंने उनसे मेरे हाल के कुछ आलेख/किताबें पढऩे का अनुरोध किया. और मैं यह बात स्वीकार करना चाहूंगा कि खुद अपने संकोच की वजह से ही मैं उन्हें ये सामग्रियां भेज नहीं पाया. मुझे उम्मीद है और मेरा मानना है कि वे इसे समझेंगे.

मुझे लगता है कि इस तरह के आत्मविश्वास और दिखावेबाजी से दूर होने के उनके स्वभाव की वजह है सुख-समृद्धि के बीच उनका लालन-पालन, अव्वल स्कूलों-कॉलेजों में पढ़ाई, इसके बाद शॉप फ्लोर में वापस लौटने पर टाटा स्टील के सामान्य कर्मियों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर काम करना. दूसरे कारोबारी समूह वाले परिवारों को भी उनका उदाहरण अपनाना चाहिए, बजाए इसके कि मैनेजमेंट के सबसे ऊपर के पदों पर अपने किसी वंशज को लाकर बैठा दिया जाए. मेरा मानना है कि इस अनुभव और फीडबैक की वजह से ही रतन टाटा को दृढ़ता से आगे बढऩे का साहस मिला, जब उन्होंने चेयरमैन बनने के बाद उन ताकतवर क्षत्रपों को साधा जो टाटा समूह के कारोबार के बड़े हिस्से पर नियंत्रण रखते थे.tata

इस काम के लिए न केवल अदम्य साहस की बल्कि उद्देश्य की स्पष्टता और दूरदर्शी नजरिए की दरकार थी. वे इसमें लचीलापन लाने के अलावा टाटा के कारोबार को ग्लोबल प्रतियोगिता में शामिल करने और उसे एक वास्तविक बहुराष्ट्रीय कंपनी में कामयाब रहे. इससे उनके फौलादी संकल्प का ही पता चलता है, जो आम तौर पर उनके कम बोलने वाले स्वभाव और प्रसिद्धि से दूर रहने की जानी-समझी कोशिश की वजह से एक तरह से छुपा ही रहा.

अपनी आधुनिकता, अपने स्वप्नदर्शी नजरिए और देश की तरक्की के लिए अपनी चिंता की वजह से वे अपने बराबर के लोगों में एक ऊंचाई पर नजर आते हैं. शायद इस समृद्ध दृष्टि की वजह से ही मौजूदा भारतीय कारोबारी दुनिया में उनके मुकाबले बहुत कम लोग ठहरते हैं. वे अपने सीनियर मैनेजमेंट को इस बात के लिए प्रेरित करते हैं कि वे दूरगामी लक्ष्य पर अपनी नजर रखें, इस पूर्ण विश्वास के साथ कि बाजार आगे बढ़ेगा और आगे चलकर इन प्रयासों का फल मिलेगा. उन्हें देश-विदेश, दोनों जगहों पर जबर्दस्त पहचान मिली है, सिर्फ इसलिए नहीं कि उन्होंने पहले से अच्छी तरह से स्थापित एक साम्राज्य का विस्तार किया, बल्कि इसलिए कि उनके नेतृत्व में टाटा भारतीय प्रगति का पर्याय बन गया.

ग्लोबल मानदंडों पर आगे बढ़ते हुए उन्होंने शोध और अनुसंधान को बढ़ावा दिया, तकनीकी की गहराई पर जोर दिया और सबसे महत्वपूर्ण बात, अपने सीनियर मैनेजमेंट को स्वायत्तता और स्वामित्व की भावना दी. हालांकि, उन्होंने इसके साथ कठोर जवाबदेही को भी शामिल किया. उन्होंने कारों, होटलों, सॉफ्टवेयर आदि के अपने ब्रांड के विकास का रास्ता चुना और टाटा की ग्लोबल स्तर पर मौजूदगी कायम की. इस रणनीति पर आगे बढ़ते हुए रतन टाटा ने यह समझ लिया कि भारतीय उद्योग लंबे समय तक संरक्षणवादी नीतियों की आड़ नहीं ले सकता.

दुनिया की अर्थव्यवस्था के साथ भारतीय अर्थव्यवस्था के लगातार बढ़ते संपर्क के बीच उन्होंने ग्लोबल स्तर की प्रतिस्पर्धा को अपनाने पर जोर दिया चाहे कोई कंपनी घरेलू बाजार में काम कर रही हो या विदेशी बाजार में. यह ऐसी वजनदार रणनीति है जिस पर अन्य भारतीय कारोबार समूहों को भी गंभीरता से विचार करना चाहिए.

भारतीय अर्थव्यवस्था के लगातार जारी आधुनिकीकरण में वे भारतीय समाज के सबसे आधुनिक और उन्नत वर्ग के प्रतीक बन गए. वे जिस जुनून के साथ निम्न मध्यवर्ग की जरूरतों के लिए नैनो प्रोजेक्ट, गरीब परिवारों के लिए सस्ता समाधान ‘‘स्वच्छ’’ वाटर प्योरिफायर लेकर आए और टाटा समूह की कंपनियों तथा पारसी समुदाय के समर्थन से चलने वाले कई फाउंडेशन के काम में सहयोग दिया, उससे भारत के निवासियों के प्रति उनकी चिंता जाहिर होती है.

उनका तरीका यह रहा कि गरीबों और कम संपन्न लोगों की जरूरतों को पूरा करने के लिए सबसे उन्नत वैज्ञानिक और तकनीकी समाधान उपलब्ध किया जाए. यह उन लोगों की सोच के बिल्कुल विपरीत है जो हाशिए के लोगों के प्रति झूठी दया दिखाते हैं और समाधान के रूप में बस दान देना उचित समझते हैं.

कोई यह तर्क दे सकता है कि रतन टाटा का लगभग पूरी तरह से ध्यान टाटा समूह को खड़ा करने में रहा और उन्होंने भारतीय कॉर्पोरेट जगत के सामने आने वाले व्यापक मसलों पर पर्याप्त ध्यान नहीं दिया. अपनी दूसरी पारी में वे अपने कद और सामाजिक पहुंच का इस्तेमाल भारतीय उद्योग जगत में ज्यादा आत्म-नियमन और ऊंचे नैतिक मानक अपनाने को प्रेरित करने के लिए कर सकते हैं.

अकेले इससे ही कामकाज में सुधार आने की संभावना है और कानून-व्यवस्था सहित जन सेवाओं की गुणवत्ता में लगातार आ रही दुर्भाग्यपूर्ण गिरावट की दिशा पलटी जा सकती है. काफी स्पष्ट है कि वे खुद उदाहरण पेश करते हुए नेतृत्व करते हैं, न कि उपदेश देकर या किसी मसले पर सार्वजनिक तौर पर राय जाहिर कर.

जब टेलीकॉम सेक्टर के प्रकरण का खुलासा हुआ तो वे भी देश में कुल मिलाकर बने कारोबारी माहौल से अप्रभावित नहीं रह सके. इससे उन्हें इस भारतीय कहावत की सचाई का आभास हो गया कि ‘‘काजल की कोठरी में कितना ही जतन करो, काजल का दाग भाई लागे ही लागे.’’ मुझे पूरा भरोसा है कि मेरी तरह लाखों मध्यवर्गीय भारतीय भी यही चाहते होंगे कि वे आम तौर पर भारतीय कारोबार जगत और खासकर बड़े कारोबारी घरानों की सामाजिक छवि को बदलने के लिए नेतृत्व करें.

निश्चित रूप से मैं यह सुझाव नहीं दे रहा कि वे राजनीति में शामिल हो जाएं (यह ख्याल ही क्यों आया?) लेकिन वे साधारण तरीके से भारतीय कारोबार जगत का नेतृत्व इस बात के लिए कर सकते हैं कि वे देश में प्रगतिशील और नैतिक बदलाव लाने के अगुआ बनें. उनको मिले कई सम्मान और अवॉर्ड और उनके विशाल अंतरराष्ट्रीय कद को देखते हुए लगता है कि रतन टाटा ग्लोबल पूंजीवाद के प्रयासों का भी नेतृत्व कर सकते हैं. मुझे उम्मीद है कि वे कुछ प्रख्यात लोगों के एक ऐसे समूह का नेतृत्व करना उपयुक्त समझेंगे जो इस दृष्टि को पेश करे कि ग्लोबल पूंजीवाद बदलते दौर में ज्यादा प्रासंगिक है और वह अगले दशकों में भी टिका रहेगा.

राजीव कुमार एक स्वतंत्र अर्थशास्त्री और शीर्ष उद्योग चैंबर फिक्की के पूर्व सेक्रेटरी जनरल हैं

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