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गुजरातः आसान नहीं रूपाणी की दूसरी पारी

अपने दूसरे कार्यकाल में रूपाणी की सबसे बड़ी चुनौती भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की छाया से बाहर निकलकर अपनी आधिकारिक छवि बनाने की होगी. विश्लेषकों के अनुसार उन्हें शासन में सकारात्मक बदलाव लाने और विकास के मुद्दे पर स्पष्ट दृष्टिकोण रखने की जरूरत होगी.

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उदय माहूरकरनई दिल्ली, 04 January 2018
गुजरातः आसान नहीं रूपाणी की दूसरी पारी शक्ति प्रदर्शन रूपाणी के शपथ समारोह में शामिल हुए पीएम नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह समेत

वरिष्ठ पारसी संतों ने गुजतरात विधानसभा चुनाव के पहले विजय रूपाणी को 23 दिसंबर को होने वाले अपने कार्यक्रम  में आमंत्रित किया था. तब रूपाणी ने वादा किया था कि अगर वे मुख्यमंत्री रहे तो जरूर आएंगे. फिर चुनावी रिजल्ट आ जाने के बाद गवर्नर से मिलने के लिए एक सहयोगी को तैनात कर और नई सरकार के गठन का दावा करने के बाद रूपाणी समारोह में शामिल होने के लिए विमान से उदवाड़ा (दक्षिण गुजरात) में पारसी अग्नि मंदिर गए.

संत उनसे काफी प्रभावित हुए. अपने बढ़ते 'अहंकार' के लिए जानी जाने वाली पार्टी में रूपाणी 'विनम्र' व्यक्ति हैं, लेकिन दूसरी बार मुख्यमंत्री बनने वाले रूपाणी के लिए विनम्रता से ज्यादा वर्ष 2019 में नरेंद्र मोदी के लिए गुजरात जीतना जरूरी है. राज्य विधानसभा की 99 सीटों पर जीत ही भाजपा के लिए एक कठिन चुनौती रही. ग्रामीण गुजरात में कृषि संकट बढ़ता जा रहा है.

हालांकि अपने पहले कार्यकाल में वे विवादों से दूर रहे, लेकिन अक्सर रूपाणी पर राज्य नौकरशाही से निपटने में कमजोर होने का आरोप लगाया गया. वे वास्तव में कभी प्रशासन पर पूरी पकड़ नहीं बना सके. अपने दूसरे कार्यकाल में रूपाणी की सबसे बड़ी चुनौती भाजपा अध्यक्ष अमित शाह की छाया से बाहर निकलकर अपनी आधिकारिक छवि बनाने की होगी. विश्लेषकों के अनुसार उन्हें शासन में सकारात्मक बदलाव लाने और विकास के मुद्दे पर स्पष्ट दृष्टिकोण रखने की जरूरत होगी.

यह सब उन्हें 182 सीटों वाली विधानसभा में अपेक्षाकृत कम बहुमत के साथ करना होगा. विधायकों की कम संख्या उन्हें न केवल जातिगत लॉबी के दबाव में ला सकती हैं, जिसने पटेलों के आंदोलन के बाद अपना जोर दिखाना शुरू कर दिया है, बल्कि उन पर अपने विधायकों का दबाव भी होगा. भाजपा की चुनौती रहे अल्पेश ठाकोर और जिग्नेश मेवाणी विधानसभा में उन पर निशाना साधेंगे.

राजनीतिक पर्यवेक्षक 1980 के दशक के उत्तरार्ध से इस स्थिति की समानता देख रहे हैं, जब मुख्यमंत्री अमरसिंह चौधरी को अपनी पार्टी के विधायकों के दबाव में विभिन्न समूहों की मांगे माननी पड़ी थीं. राजनीतिक विश्लेषक जपन पाठक कहते हैं, ''जाति की स्थिति बहुत ढुलमुल होती है. उदाहरण के लिए बलात्कार के मामले में सरकार के खिलाफ एक तेज आंदोलन खड़ा किया जा सकता है.'' वे कहते हैं कि कांग्रेस ''ऐसे आंदोलनों का लाभ उठा सकती है.''

लेकिन कुछ चीजें रूपाणी की राह आसान बना सकती हैं. छोटे से जैन-बनिया समुदाय से ताल्लुक रखने के नाते उन्हें जातिगत रूप से तटस्थ माना जाएगा और एक वर्चस्व वाली जाति के राजनेता की तुलना में वे जातिगत संघर्ष से बेहतर ढंग से निपट सकते हैं. रूपाणी विभिन्न समूहों में सबसे ज्यादा स्वीकार्य माना जाता है और संघ, शाह तथा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के साथ बेहतर तालमेल के लिए जाना जाता है.

26 दिसंबर को दूसरी बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेने के बाद उन्होंने कहा, ''हम सभी मुद्दों से निपटेंगे और हमारा उद्देश्य हर तरफ विकास है.'' अपने मार्गदर्शकों के सहयोग के साथ लगता है कि रुपाणी ने अपना बीस सदस्यीय मंत्रिमंडल अच्छी तरह बनाया है. सौरभ पटेल ने नरेंद्र मोदी (जब मोदी मुख्यमंत्री थे) के साथ मिलकर 24 घंटे घरेलू बिजली आपूर्ति और 2006 में ऊर्जा क्षेत्र में सुधार के लिए काम किया था.

इस बार मंत्रिमंडल में उनकी वापसी हुई है. इसमें अनुभवी राजपूत नेता भूपेंद्र सिंह चुडास्मा भी शामिल हैं. मेहसाणा से जीतकर आए उपमुक्चयमंत्री नितिनभाई पटेल सरकार का हिस्सा बने. रमन पाटकर, और बच्चुभाई खाबड़ जैसे पुराने निष्ठावान नेताओं को ठीक ढंग से समायोजित किया गया है. रूपाणी के शपथ ग्रहण समारोह में मोदी, शाह और 18 राज्यों के मुख्यमंत्रियों का शामिल होना भाजपा के लिए गुजरात के महत्व को दर्शाता है.

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