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सलीके से निकाली तूफान से कश्ती

तूफान जब आया तो ओडिसा पूरी तरह तैयार था. कुछ सक्षम लोगों ने एक भारी तबाही को कैसे टाला और भारत में आपदा प्रबंधन की दयनीय तस्वीर को कैसे उलट दिया?

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aajtak.in
संदीप उन्नीथन,भुवनेश्वर, 28 October 2013
सलीके से निकाली तूफान से कश्ती

भारतीय मौसम विभाग (आइएमडी) की ओर से 8 अक्तूबर की शाम भेजे गए एक संदेश ने ओडिसा में सरकारी सचिवालय में हड़कंप मचा दिया. मुख्यमंत्री नवीन पटनायक ने आनन-फानन में अपने आला अफसरों की बैठक बुलाई. मौसम विभाग की चेतावनी के मुताबिक पांचवीं श्रेणी का भयानक चक्रवात आने वाला था, जो 200 किलोमीटर प्रति घंटा की तेज रफ्तार वाली हवाओं से ओडिसा के तटीय इलाकों को पूरी तरह तहस-नहस कर सकता था.

हालांकि पश्चिमी देशों की मौसम एजेंसियों ने इससे पहले 310 किलोमीटर प्रति घंटा की रफ्तार और 50 फुट ऊंची लहरें उठने की भविष्यवाणी की थी. भारतीय मौसम विभाग की यह चेतावनी 1999 में अक्तूबर महीने में आए विनाशकारी चक्रवात की भयावह यादें ताजा करने के लिए काफी थी.


पिछली बार 29 अक्तूबर को आए तूफान ने ओडिसा के तटीय इलाकों को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया था और 15,000 लोग मारे गए थे. तब सरकारी मशीनरी इस तरह पंगु हो गई थी कि सिर्फ शवों को हटाने के लिए केंद्र सरकार को दिल्ली से 250 सफाईकर्मियों को विमान से भेजना पड़ा था. उस वक्त केंद्रीय इस्पात एवं खदान मंत्री रहे पटनायक ने तब दुख जाहिर करते हुए कहा था, ''प्रदेश के साथ सरकार भी मलबे के ढेर में तब्दील हो गई है.”

इस बार फैलिन नाम का वैसा ही चक्रवात जब करीब आया तो राज्य सरकार के मुखिया के तौर पर पटनायक ने ठान लिया था कि उन्हें वे शब्द दोबारा न बोलने पड़ें. बैठक में उन्होंने अपने अधिकारियों को सख्त शब्दों में निर्देश दिया, ''हर इंसानी जिंदगी बेशकीमती है, इसलिए एक भी व्यक्ति की मौत नहीं होनी चाहिए.”

तूफान का सामना
चार रातों के बाद 12 अक्तूबर को रात 9.30 बजे के आसपास फैलिन ने कानों के पर्दे फाड़ देने वाली भयंकर दहाड़ के साथ सबसे पहले गंजम जिले में दस्तक दी. अगस्तिनुआगांव के एक 26 वर्षीय किसान रोहित नाहक बताते हैं, ''लग रहा था जैसे कोई अंतहीन एक्सप्रेस ट्रेन छह घंटे तक जोर से शोर करती हुई हमारे घरों के ऊपर से गुजर रही हो.”

फैलिन (थाई भाषा के इस शब्द का मतलब है नीलम) ने अपनी असीम ताकत से पेड़ों को घास-फूस की तरह रौंद डाला, सेलफोन के टावर और बिजली के सब-स्टेशनों को उखाड़ फेंका, बिजली के हाइटेंशन तारों को छिन्न-भिन्न कर दिया, विशालकाय ट्रकों को राजमार्गों पर उलट-पलट दिया, छह लाख हेक्टेयर खेतों में खड़ी फसल को तबाह कर दिया और दो लाख मकानों को धराशायी कर दिया.

इस विनाशकारी तूफान के साथ आई बाढ़ ने राज्य के 30 में से 13 जिलों को अपनी चपेट में ले लिया. सरकारी अनुमान के अनुसार, इस तूफान के कारण प्रदेश को करीब 2,000 करोड़ रु. का नुकसान हुआ. राज्य में चावल का कटोरा कहे जाने वाले गंजम जिले में सबसे ज्यादा तबाही हुई है. अकेले इसी जिले में फिर से विद्युतीकरण करने और पुनर्निर्माण में कई साल लग जाएंगे.

फिर भी संतोष करने के लिए बहुत कुछ था: इतने भयंकर तूफान के बावजूद मृतकों की संख्या 21 थी, क्योंकि 9,73,000 लोगों को चक्रवात आने से 36 घंटे पहले सुरक्षित स्थानों पर पहुंचा दिया गया था. जितने लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाया गया उनकी संख्या सिक्किम की कुल जनसंख्या से ज्यादा है.

अगर समय रहते ऐसा नहीं किया गया होता तो मरने वालों की संख्या हजारों में जा सकती थी. इस साल जून में उत्तराखंड सरकार की निष्क्रियता को देखते हुए यह बहुत सराहनीय काम माना जाएगा. उत्तराखंड सरकार मौसम विभाग की चेतावनी के बावजूद हाथ पर हाथ रखकर बैठी रही थी, जिसके कारण बाढ़ की विनाश लीला में 5,000 से ज्यादा लोगों की मौत हो गई. यह अंतर पटनायक के स्पष्ट निर्देश के कारण ही आया.

एक वरिष्ठ अधिकारी कहते हैं, ''हमारे सामने लक्ष्य एकदम साफ था.” पटनायक ने 14 अक्तूबर को सुरक्षा उपायों के बारे में अपने दफ्तर में कहा, ''लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पहुंचाने के वर्षों अनुभव और सुरक्षा अभ्यासों के साथ-साथ आम लोगों के सहयोग के कारण ही यह संभव हुआ. हमारा जिला प्रशासन पूरी तरह सतर्क था.” उस दिन उन्होंने खुद हेलिकॉप्टर से गंजम जिले का दौरा कर सारी व्यवस्था का मुआयना किया था.

गंजम जिले के छत्रपुर में तबाही का आलम

पलायन
मुश्किल से हफ्ताभर पहले जब मौसम विभाग ने भविष्यवाणी की थी कि समुद्री चक्रवात ओडिसा के 480 किलोमीटर लंबे समुद्र तट के किसी भी जगह को अपनी चपेट में ले सकता है, तो यह काम असंभव लग रहा था. राज्य सरकार की पहली प्राथमिकता यह थी कि तट से 5 किलोमीटर के इलाके में रहने वाले करीब 10 लाख लोगों को सुरक्षित जगहों पर पहुंचा दिया जाए.

इन इलाकों में करीब 30 प्रतिशत घरों में फूस के छप्पर थे, इसलिए वे तेज आंधी में बर्बाद हो सकते थे. इस पूरी कोशिश में सबसे आगे थे गंजम जिले के कलेक्टर कृष्ण कुमार. गंजम जिला राजधानी भुवनेश्वर से 150 किलोमीटर दूर दक्षिण में समुद्र तट पर स्थित है. यहीं पर सबसे ज्यादा नुकसान होने की आशंका थी.

डॉक्टर से आइएएस अधिकारी बने कृष्ण कुमार का प्रशासन में काफी सम्मान है. राज्य के पिछड़े जिले कंधमाल में जब वे जिला कलेक्टर थे तो 2008 के सांप्रदायिक दंगों में आरोपियों पर मुकदमा चलाने के लिए फास्ट-ट्रैक अदालतें स्थापित करने पर उनकी काफी तारीफ हुई थी.

इस बार लोगों को अपने घर खाली करने के लिए राजी करना उनके सामने सबसे बड़ी चुनौती थी. वे कहते हैं, ''आसमान साफ हो तो लोगों को घर खाली करने के लिए समझना सचमुच बहुत कठिन है.”

जगतसिंहपुर और दूसरे कुछ जिलों में लोग घर छोडऩे के लिए आसानी से तैयार हो गए थे, क्योंकि 1999 के तूफान में वहां भारी तबाही हुई थी. लेकिन गोपालपुर जैसे कुछ जिलों में लोगों को बहुत मुश्किल से राजी किया गया. राज्य के अधिकारी लाउडस्पीकरों पर लोगों से घर छोडऩे के लिए लगातार अपील कर रहे थे.

बहुत से लोगों ने इनकार कर दिया. उन्हें डर था कि उनके चले जाने पर उनके घरों को लूट लिया जाएगा. मुख्यमंत्री पटनायक ने टीवी और रेडियो पर खुद जनता से अपील की. उन्होंने सभी सात तटीय जिलों के कलेक्टरों से वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के जरिए बैठक की. पटनायक की छवि एक साफ-सुथरे नेता की है और जो अगले साल लगातार चौथी बार मुख्यमंत्री पद के दावेदार होंगे.

सरकार की लगातार चलने वाली कोशिश कामयाब रही. गांव के गांव खाली हो गए और वहां रहने वाले लोग लगभग 10,000 शरणार्थी स्थलों में पहुंच गए. इन स्थलों में 1,060 बहु-उद्देश्यीय साइक्लोन शेल्टर भी शामिल थे. गांववाले अपने साथ अपनी नगदी, आभूषण, स्कूल प्रमाण पत्र और जमीन-जायदाद के कागजात ले गए थे.

गंजम के कलक्टर कृष्ण कुमार

समय पर चेतानवी और तैयारी
राज्य के विशेष राहत आयुक्त प्रदीप्त कुमार महापात्र ने सचिवालय के पीछे बने राजीव भवन में आपात संचालन केंद्र के अधिकारियों और कई एजेंसियों से संपर्क करके तालमेल बनाया. 1999 में जब तूफान आया था तो महापात्र पुरी के कलेक्टर थे और उनके जिले में करीब 800 लोगों की मौत होने पर उन्हें लोगों के गुस्से का सामना करना पड़ा था. वे कहते हैं, ''हमें कुछ भी नहीं पता था कि तूफान कहां आएगा.” उन्हें नई दिल्ली में मौसम भवन के केंद्रीय निगरानी कक्ष से लगातार जानकारी मिल रही थी.

मौसम विभाग के इस हॉल में विशालकाय स्क्रीन लगे थे, जिन पर उपग्रह से ली गईं फैलिन की तस्वीरें दिखाई जा रही थीं. तस्वीरों में बंगाल की खाड़ी के ऊपर लाल और नारंगी रंग के घुमड़ते भयावह घेरे नजर आ रहे थे. सुपर कंप्यूटर इसके पथ का अनुमान लगाने की कोशिश कर रहे थे. मौसम विभाग के महानिदेशक एल.एस. राठौड़ तभी से यहां जमे हुए थे, जब 7 अक्तूबर को फैलिन की शुरुआत एक कम दबाव वाले क्षेत्र के रूप में हुई थी.

उसी समय उनकी टीम ने ठीक भविष्यवाणी की थी कि यह जल्दी ही एक बड़े चक्रवात का रूप ले लेगा और आंध्र प्रदेश तथा ओडिसा के तटीय इलाकों की तरफ बढ़ेगा. 10 अक्तूबर को दिन के 11.30 बजे उन्होंने इसे 'अत्यंत खतरनाक चक्रवाती तूफान’ बताते हुए अपनी निर्णायक भविष्यवाणी की.

भविष्यवाणी की आधुनिक तकनीकी, विकसित उपग्रह संवेदकों, उच्च गति वाले विंड रिकॉर्डर नेटवर्क, डॉपलर वेदर रडार नेटवर्क और तटीय ज्वार मापक नेटवर्क की बदौलत राठौड़ की टीम ने एकदम सही अनुमान लगाया कि 12 अक्तूबर को तूफान तटीय इलाके में कहां टकराएगा.

उनकी यह जानकारी तुरंत राष्ट्रीय आपदा प्रबंधन प्राधिकरण (एनडीएमए) और भुवनेश्वर में आइएमडी के दफ्तर के जरिए ओडिसा सरकार को दी गई. राठौड़ ने कहा, ''मौसम हमें विनम्र होना सिखाता है. अगर हमारा अनुमान सही है तो हमें बहुत खुश नहीं होना चाहिए और गलत है तो मायूस भी नहीं होना चाहिए.”

ओडिसा को सिर्फ पूर्व चेतावनी ही नहीं दी गई, बल्कि उसे समय रहते मुस्तैद भी किया गया. 1999 की त्रासदी के बाद यहां ओडिसा स्टेट डिजास्टर मिटिगेशन अथॉरिटी और 10-बटालियन ओडिसा डिजास्टर रैपिड ऐक्शन फोर्स (ओडीआरएएफ) का गठन किया गया था. यह संगठन हर साल ऐसी ही स्थितियों का सामना करने के लिए अभ्यास करता है.

विशेष राहत आयुक्त प्रदीप्त कुमार महापात्र

फैलिन जब आया तो डीजल जनरेटरों और दिल्ली से भेजे गए नेशनल डिजास्टर रेस्पांस फोर्स के 1,125 कर्मियों के साथ ओडीआरएएफ की टीमों को सभी तटीय जिलों में तैनात कर दिया गया था. राज्य सरकार ने दशहरा और दुर्गा पूजा की छुट्टियां रद्द कर दीं और सभी सरकारी कर्मचारियों को ड्यूटी पर आने का आदेश दिया. सरकार ने तटीय जिलों के लिए रेल सेवा और बिजली की सप्लाई रोक दी.

तूफान के चले जाने के बाद राहत टीमों ने गिरे हुए पेड़ों की तेजी से कटाई करके रास्तों को साफ किया ताकि जल्दी से जल्दी राहत सामग्री लोगों तक पहुंचाई जा सके. गौरतलब है कि सेना के लोग भी इस तरह की तेजी देखकर बहुत प्रभावित हुए, आम तौर पर ऐसे मौकों पर वही सबसे आगे होते हैं. मध्य भारत एरिया के जीओसी लेफ्टि. जनरल रमेश राणा ने कहा, ''हमारे लिए ज्यादा कुछ करने को नहीं रह गया था.”

हालांकि तूफान के बाद राहत पहुंचाने के कामों में कुछ खामियां जरूर देखने को मिलीं. गंजम जिले में गांववालों ने तैयार भोजन न मिल पाने पर सरकारी कर्मचारियों पर गुस्सा उतारा. इससे कांग्रेस को पटनायक की आलोचना करने का मौका मिल गया. लेकिन पटनायक इससे बिल्कुल भी विचलित नहीं हैं. उन्होंने अधिकारियों के साथ बैठक करके तटीय इलाकों में फूस के छप्पर की जगह स्थायी छतें बनवाने की योजना पर विचार किया है. वे जल्दी ही एक और बड़ा आदेश देने वाले हैं.
—साथ में कौशिक डेका

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