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आरएसएस आरक्षण का पैंतरा

भागवत जानते हैं कि आरक्षण पर चर्चा की पहल भाजपा करेगी नहीं लेकिन चर्चा की पहल विपक्षी खेमे से जरूर होगी इसलिए उनकी तरफ से मुद्दा उठाना सामयिक है

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aajtak.in
सुजीत ठाकुर/ मंजीत ठाकुर नई दिल्ली, 27 August 2019
आरएसएस आरक्षण का पैंतरा फोटोः एएनआइ

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ (आरएसएस) के सर संघचालक मोहन भागवत ने बीते रविवार को जब दिल्ली में प्रतियोगिता परीक्षा पर आयोजित संघ के 'ज्ञान उत्सव' कार्यक्रम के समापन भाषण में 'आरक्षण पर सौहाद्रपूर्ण माहौल में चर्चा' का शिगूफा छेड़ा तो भाजपा के एक वरिष्ठ नेता पूर्व वित्त मंत्री अरुण जेटली (एम्स में भर्ती) के साथ बिताए समय को याद करने लगे. भागवत का बयान और जेटली के जिक्र में तालमेल यह है कि ऐसे मौके पर (असामयिक मुद्दे पर बयान) जेटली फिल्म मुगले आजम का डायलॉग सुनाते थे जिसमें अकबर की भूमिका निभा रहे पृथवीराज कपूर कहते हैं, ''सलीम तुम्हें मरने नहीं देगा और हम तुम्हें जीने नहीं देंगे अनारकली!''

खैर! आरक्षण पर चर्चा की जरूरत संघ ने महसूस की है इसलिए अपने वैचारिक संगठन पर हमलावर होने का मौका भाजपा के पास नहीं है लेकिन पार्टी बड़ी होशियारी से संघ की मंशा समझते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के उस बयान को दोहराती है कि, 'आरक्षण था, है और रहेगा'. हालांकि संघ ने आरक्षण को समाप्त करने या इसकी समीक्षा की बात नहीं की है, बल्कि चर्चा की बात कहकर सियासी भूचाल ला दिया है. अहम बात टाइमिंग की भी है. संघ प्रमुख विभिन्न कार्यक्रमों के दौरान विभिन्न मुद्दों पर अपने विचार रखते हैं लेकिन आरक्षण जैसे संवेदनशील मुद्दे पर अमूमन संयोगवश ऐसे समय बात निकल आती है जो भाजपा के लिए मुफीद नहीं होता है.

इस बार भी संघ प्रमुख की तरफ से आरक्षण का विषय ऐसे समय छेड़ा गया है जब पूरी भाजपा जम्मू-कश्मीर से अनुच्छेद 370 के तहत हासिल विशेष दर्जा हटाने और उसे दो केंद्रशासित प्रदेशों जम्मू-कश्मीर और लद्दाख में बांटने पर अपना पीठ थपथपा रही है. इस मास्टर स्ट्रोक से विपक्ष खासकर कांग्रेस भी बंट गई. पार्टी के पुराने से लेकर नए नेताओं तक ने खुलकर समर्थन जाहिर किया.

यही नहीं, मोदी सरकार इससे पहले तीन तलाक को गैर-कानूनी घोषित करके संघ के दूसरे एजेंडे समान नागरिक संहिता की दिशा में ठोस काम कर चुकी है और राम मंदिर मुद्दा जल्द सुलझने की राह पर चल पड़ा है. इस तरह भाजपा ने संघ के उस सारे एजेंडे को कमोवेश पूरा कर दिया है जिसकी हिमायत संघ करता आया है. अब संघ के  पास भाजपा पर दबाव बनाने का कोई ठोस आधार नहीं रह गया है. ऐसे में सियासी गलियारे में यह सवाल चर्चा में है कि क्या संघ दबाव बनाने के नए मुद्दे तलाश रहा है?

दरअसल ये तीन मुद्दे ऐसे रहे हैं, जिनको लेकर संघ, एनडीए-1 की वाजपेयी सरकार और एनडीए-2 की मोदी सरकार पर दबाव बनाता रहा है. लेकिन एनडीए 3 (मोदी-2) सरकार बनने के साथ ही केंद्र सरकार ने संघ को हमलावर होने का मौका ही नहीं दिया. मोदी-2 सरकार ने शपथ लेने के 100 दिनों के अंदर ही संघ के पास भाजपा पर हमलावर होने के जितने भी हथियार थे सबको भोथरा कर दिया. सूत्रों का कहना है कि मोदी-शाह की जोड़ी ने अनुच्छेद 370 हटाने की तैयारी को लेकर संघ से सलाह लेना तो दूर उन्हे बताने की जरूरत भी नहीं समझी. जिस तरह से अचानक से यह मास्टर स्ट्रोक चला गया उससे संघ भी अचंभित हो गया. शायद यह पहली बार हुआ जब संघ के इतने बड़े वैचारिक मुद्दे को मूर्त रूप देने से पहले भाजपा सरकार ने उससे विचार-विमर्श तक नहीं किया.

भाजपा के एक नेता कहते हैं, ''जब मोदी-1 सरकार ने गरीबों को 10 फीसदी आरक्षण दिया तो संघ और पार्टी के अंदर से भी यह आवाज उठी थी कि जैसे गरीबों को 10 फीसदी आरक्षण का विधेयक पास कराया गया, वही तत्परता अनुच्छेद 370 या राम मंदिर को लेकर क्यों नहीं है? लेकिन पार्टी और संघ के भीतर ऐसे सवाल उठाने वालों के पास अब वह मौका भी खत्म हो गया है जिसके जरिए सरकार पर दबाव बनाया जा सके. ऐसे में अपनी अहमियत जताने के लिए आरक्षण का मुद्दा उठना स्वभाविक है.''

हालांकि भागवत ने पहली बार आरक्षण का मुद्दा नहीं  छेड़ा है. उन्होंने 2015 में बिहार विधानसभा चुनाव के समय भी आरक्षण का मुद्दा उठाया था. उस समय तो संघ के पास अनुच्छेद 370 सहित सभी मुद्दे थे जिसके जरिए वह केंद्र सरकार को घेर सकती थी. इसलिए आज यह कहना कितना मुनासिब है कि अहमियत जताने के लिए आरक्षण राग छेड़ा जा रहा है? भाजपा नेता कहते हैं, ''बिहार चुनाव के दौरान भागवत के बयान पर जब विपक्ष ने सवाल उठाए तो संघ की तरफ से कहा गया कि, जब तक भेदभाव है तब तक आरक्षण जरूरी है.''

हालांकि यह दोधारी तलवार से हमले जैसा है. संघ के बयान को अक्षरश: लिया जाए तो भाजपा जब तक आरक्षण का समर्थन करती रहेगी, उसका मतलब है कि देश में असमानता का महौल है. भाजपा अगर यह दावा करती है कि देश में समानता के अवसर हैं या फिर असमानता की खाई घटी है, तब संघ की तरफ से आरक्षण पर समीक्षा का मुद्दा उठ सकता है.

ऐसे में संघ यह दबाव बनाने की कोशिश कर सकता है कि संविधान में आरक्षण की व्यवस्था स्थायी नहीं है तो फिर इसे कब तक लागू रखा जाएगा. जैसे भाजपा अनुच्छेद 370 को अस्थायी प्रावधान बताकर उसे हटाने को जायज ठहरा रही है, उसी दलील को आधार बनाकर संघ भाजपा को आईना दिखा सकता है कि आरक्षण भी अस्थायी प्रावधान है तो उसकी भी समीक्षा क्यों न की जाए. अगर नहीं तो सरकार यह माने की देश में असमानता भारी है. ये दोनों बातें संघ को वह मौका दे सकता है जिसके जरिए वह भाजपा को बैकफुट पर धकेलने की कोशिश कर सकता है.

बहरहाल, भाजपा के अंदर इस बयान को अधिक तवज्जो नहीं दी जा रही है. आरक्षण पर पार्टी का स्टैंड स्पष्ट है कि भाजपा आरक्षण का समर्थन करती है और किसी भी तरह की समीक्षा या चर्चा की जरूरत नहीं समझती है. लेकिन संघ प्रमुख ने जो बयान दिया है, वह अनायास नहीं हो सकता है. संघ प्रमुख ने यह भी कहा है कि सरकार, भाजपा और संघ अलग-अलग हैं. तीनों की अलग पहचान है. यह सही है कि संघ के कई लोग पार्टी और पार्टी की अगुवाई वाली सरकार में हैं. वे संघ की बात सुनते हैं लेकिन यह आवश्यक नहीं कि वे संघ की बात से सहमत ही हों, वे असहमत भी हो सकते हैं.

यानी संघ प्रमुख का यह बयान कायम है कि, ''सौहाद्रपूर्ण महौल में जो आरक्षण के समर्थक हैं वे आरक्षण का विरोध करने वालों की बातें सुनें और जो आरक्षण के विरोधी हैं वे आरक्षण के समर्थन करने वालों की बात सुनें तो मामले का समाधान एक मिनट में हो जाएगा.'' संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख अरुण कुमार, भागवत के बयान को खारिज नहीं करते हैं. अरुण कुमार के मुताबिक सर संघचालक ने, ''समाज में सद्भावनापूर्ण परस्पर बातचीत के आधार पर सब प्रश्नों के समाधान का महत्व बताते हुए आरक्षण जैसे संवेदनशील विषय पर विचार व्यक्त करने का आह्वान किया. भाषण के एक हिस्से पर अनावश्यक विवाद खड़ा करने का प्रयास किया जा रहा है.''

संघ की तरफ से स्पष्टीकरण जरूर दिया गया लेकिन भागवत के इस बयान ने विपक्षी दलों को भाजपा पर हमला करने का एक मौका जरूर दे दिया है. कांग्रेस के मीडिया विभाग के प्रमुख रणदीप सिंह सुरजेवाला कहते हैं, ''भागवत की टिप्पणी ने आरएसएस और भाजपा का दलित विरोधी चेहरा बेनकाब कर दिया है.'' कांग्रेस महासचिव प्रियंका गांधी ने ट्वीट कर कहा है कि, ''आरएसएस का हौसला बढ़ा हुआ है और मंसूबे खतरनाक है. जिस समय भाजपा सरकार एक-एक करके जनपक्षधर कानूनों का गला घोंट रही है आरएसएस ने भी लगे हाथ आरक्षण पर बहस करने की बात उठा दी है.'' बसपा प्रमुख मायावती ने भी ट्वीट कर कहा है कि, भागवत के बयान से एससी/एससी और ओबीसी वर्ग में एक खतरनाक संशय पैदा हो गया है.

भागवत के बयान से विपक्षी दलों को जाने-अनजाने एक हथियार मिल गया है. साल के अंत तक हरियाणा, महाराष्ट्र, झारखंड जैसे भाजपा शासित राज्यों में विधानसभा के चुनाव होने हैं. विपक्षी दल चुनाव में इस मुद्दे को उठा सकते हैं. इसलिए भाजपा में भागवत के बयान की टाइमिंग को लेकर सवाल उठ रहे हैं.

वैसे, संघ प्रमुख आरक्षण पर चर्चा की वकालत करते हैं और इसकी जरूरत भी बताते हैं. लेकिन चर्चा शुरू कौन करेगा और कैसे करेगा. भाजपा सियासी वजहों से चर्चा चाहती नहीं है. संघ का कोई भी आनुषांगिक संगठन सेमिनार या व्याख्यान आयोजित कर चर्चा की पहल करे (2019 में भाजपा की बड़ी जीत के  बाद) इसकी उम्मीद नहीं के बराबर है. ऐसे में चर्चा जाहिर रूप से विपक्षी खेमे से शुरू होगी. शायद इसी के मद्देनजर संघ प्रमुख ने यह बात कही है. चुनाव ही वह समय हो सकता है जब संघ की ओर से समान नागरिक संहिता को लेकर यह प्रश्न भी उठाया जाए कि जब गोवा जैसे राज्य में वर्षों से समान नागरिक संहिता है तो फिर भाजपा शासित राज्यों में इसे लागू करने की चर्चा तो होनी ही चाहिए. संघ का यही एजेंडा वह प्लेटफॉर्म तैयार करेगा जिस पर अपराजेय भाजपा-संघ के साथ सौहाद्रपूर्ण माहौल में चर्चा करने के लिए विचार करे.

संघ की मुश्किल

भाजपा के बढ़ते आकार से संघ का उस पर पकड़ बनाए रखना कठिन

समाज के हर तबके में संघ के समानांतर भाजपा का कैडर बन जाना

धारा 370 के बाद अयोध्या भी सुलझने की कगार पर, संघ के पास वैचारिक मुद्दा विहीन होने का खतरा

संघ पर भाजपा की निर्भरता कम होते जाना

सरकार और संगठन में संघकी पसंदीदा को तव्वजो नहीं.

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