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फिर छिड़ी पुरानी बहस

आरक्षण पर उठ रहे विवादों को खत्म करने के लिए इसे संविधान की 9वीं अनसूची में शामिल कराने पर जोर लगाना होगा

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aajtak.in
सुजीत ठाकुरनई दिल्ली, 23 June 2020
फिर छिड़ी पुरानी बहस एएनआइ

राजनैतिक दल जिस एक मुद्दे पर एक सुर में एकजुट होते हैं, वह है—आरक्षण. वजह साफ है कि यह मुद्दा सियासी रुख बदलने का माद्दा रखता है और आरक्षण के विरोध में दिखने वाले दल को जबरदस्त नुक्सान उठाना पड़ता है. केंद्र में सत्ताधारी भाजपा यह नुक्सान 2015 के बिहार विधानसभा के चुनाव में उठा चुकी है. वह उस गलती के लिए इस बार कोई गुंजाइश नहीं छोडऩा चाहती. लिहाजा 11 जून को जब सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 'आरक्षण मौलिक अधिकार नहीं है' तो अगले ही दिन भाजपा अध्यक्ष जे.पी. नड्डा को कहना पड़ा, ''पार्टी और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की नेतृत्व वाली सरकार आरक्षण को लेकर प्रतिबद्ध हैं.''

दरअसल, तमिलनाडु के सभी प्रमुख दलों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा था कि मेडिकल कॉलेजों में अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए आरक्षण की व्यवस्था न होना संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है. वे चाहते हैं कि केंद्र से ऑल इंडिया कोटा के तहत तमिलनाडु में अंडर ग्रेजुएट, पोस्ट ग्रेजुएट मेडिकल और डेंटल कोर्स में ओबीसी को 50 फीसद कोटा मिले. इसी को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने आरक्षण पर यह टिप्पणी की. वहीं, चार महीने बाद बिहार में विधानसभा चुनाव हैं.

ऐसे में कोर्ट की इस टिप्पणी के तुरंत बाद आरक्षण को लेकर सियासत तेज हो गई. मौके की नजाकत को भांपते हुए एनडीए के प्रमुख सहयोगी केंद्रीय मंत्री और लोक जनशन्न्ति पार्टी के नेता राम विलास पासवान ने इस मुद्दे को सबसे पहले हाथोहाथ लिया. उन्होंने कहा, ''आरक्षण के मुद्दे पर बार-बार उठ रहे विवाद को खत्म करने के लिए हम सबको (सियासी दलों को) मिलकर इसे संविधान की 9वीं अनसूची में शामिल कराने पर जोर लगाना होगा. ऐसा होने पर आरक्षण को संवैधानिक कवच मिल जाएगा और यह अदालती समीक्षा के दायरे से बाहर हो जाएगा.''

अपने सहयोगी दल के इस बयान से भाजपा असहज है. पार्टी के एक वरिष्ठ नेता कहते हैं, ''भाजपा आरक्षण हटाने के पक्ष में नहीं है पर जिन जातियों को आरक्षण का लाभ मिल रहा है उनमें भी बहुत से ऐसे लोग हैं जो आरक्षण के बावजूद लाभ से वंचित हैं.'' भाजपा के वरिष्ठ नेता संजय पासवान कहते हैं, ''मैं आरक्षण की व्यवस्था को 9वीं अनसूची में डालने के पक्ष में नहीं हूं. बल्कि मैं चाहता हूं कि क्रीमी लेयर का मामला जल्द सुलझ जाए. जो आरक्षण का लाभ ले चुके हैं और समाज की मुख्यधारा में आ गए हैं उन्हें आरक्षण का लाभ छोड़ देना चाहिए.'' उनकी मांग है कि जो जनप्रतिनिधि आरक्षित सीट से तीन बार संसद या विधानसभा पहुंच चुके हैं, वे आरक्षण का लाभ छोड़ दें. वे इसके लिए जरूरी होने पर कानून लाने के पक्षधर हैं.

वहीं कांग्रेस नेता उदित राज कहते हैं, ''जब तक सुप्रीम कोर्ट और हाइकोर्ट में जजों की नियुक्ति में दलितों-पिछड़ों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं मिलता तब तक आरक्षण का कोई मतलब नहीं है.'' वे जोर देकर कहते हैं कि उन्हें जजों पर भरोसा नहीं है. राष्ट्रीय जनता दल (राजद) के नेता और राज्यसभा सदस्य मनोज झा कहते हैं, ''राजद आरक्षण व्यवस्था को सिर्फ 9वीं अनसूची में ही डालने के पक्ष में नहीं बल्कि इसे न्यायिक समीक्षा से बाहर रखने का भी पक्षधर है.'' वे कहते हैं, ''जब समानता का अधिकार, मौलिक अधिकार है तब आरक्षण मौलिक अधिकार के दायरे में ही आता है. कभी कोई जज कुछ बोलता है तो कभी दूसरा कुछ और. इसलिए आरक्षण को न्यायिक समीक्षा से बाहर रखना जरूरी है.''

भाजपा आरक्षण को 9वीं अनसूची में डालने या न्यायिक समीक्षा के दायरे से बाहर रखने की बात पर रणनीति के तहत चुप्पी साध रही है. पार्टी की मजबूरी यह है कि बड़ी तादाद में सवर्ण जाति के लोग उसके परंपरागत समर्थक रहे हैं और यह वर्ग आरक्षण के विरोध में रहा है. वैसे, भाजपा ने सवर्णों को साधने के लिए ही पिछले लोकसभा चुनाव से ठीक पहले जनवरी, 2019 में सामान्य वर्ग के गरीबों के लिए 10 फीसद आरक्षण का प्रावधान किया था. वहीं, अगर भाजपा, रामविलास पासवान की मांग का समर्थन करती है तो फिर पिछड़े और दलितों के वर्ग के वे वंचित, जिनको आरक्षण का लाभ नहीं मिल पा रहा, वे भी भाजपा से खफा हो सकते हैं.

ऐसे में भाजपा के पास यही विकल्प है कि वह खुद पर आरक्षण विरोधी होने या आरक्षण की समीक्षा के पक्षधर होने का लेबल अपने ऊपर चस्पां नहीं होने दे, बिहार चुनाव तक तो बिल्कुल नहीं. इसलिए नड्डा ने दो टूक कह दिया, ''कुछ लोग आरक्षण को लेकर समाज में भ्रम पैदा करने की कोशिश कर रहे हैं. हम आरक्षण के पक्ष में हैं.'' उन्होंने यह कह कर 'सांप भी मर जाए और लाठी भी न टूटे' वाली कहावत को चरितार्थ करने की कोशिश की है.

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