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केदारनाथ: त्रासद सन्नाटे में रेल का सपना

चारधाम को रेल नेटवर्क से जोडऩे की सुनहरी कल्पना नई सरकार ने की है, लेकिन पिछले साल की त्रासदी के बाद मंदिर को छोड़ दें तो अभी यहां हर तरफ अवशेष फैले हैं.

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aajtak.in
संतोष कुमारनई दिल्ली, 21 July 2014
केदारनाथ: त्रासद सन्नाटे में रेल का सपना

चारधाम को रेल नेटवर्क से जोडऩे की सुनहरी कल्पना नई सरकार ने की है, लेकिन पिछले साल की त्रासदी के बाद मंदिर को छोड़ दें तो अभी यहां हर तरफ अवशेष फैले हैं, उस भयावह सर्द रात को मची तबाही की कल्पना केदार घाटी में जाए बिना कतई नहीं की जा सकती. इंडिया टुडे के प्रमुख संवाददाता संतोष कुमार ने एक साल बाद पिछले दिनों केदार घाटी के सरकारी टेंट में रात बिताते हुए लिया.

हालात का जायजा चार धाम अब रेल नेटवर्क से जुड़ेगा. यह सुनहरा सपना दिखाया गया है नरेंद्र मोदी सरकार के पहले रेल बजट में. लेकिन क्या इस सरकार के पूरे कार्यकाल में इस योजना की नींव भी पड़ सकती है? इसका जवाब ढूंढऩा उतना मुश्किल नहीं. आपदा के एक साल बाद भी केदारनाथ में कुछ नहीं बदला है. सरकारी तंबू-बंबू और केदारनाथ की यात्रा संचालित करने भर को कर्मचारियों के अमले के सिवा यहां अब कुछ भी नहीं है

घाटी में पहुंचते ही एहसास होता है कि दूर बैठकर उस त्रासदी की जैसी कल्पना लोग करते हैं, दरअसल तबाही का मंजर उससे कहीं गहरा है. अब मंदिर क्षेत्र नदी की दो धाराओं के बीच टापू की शक्ल ले चुका है, जिससे खतरा और बढ़ गया है. केदारनाथ मंदिर के मुख्य पुजारी गंगाधर लिंग कहते हैं, ''पूरा इलाका सचमुच पहले से ज्यादा खतरनाक हो गया है. जमीन करीब 50 फुट ऊपर आ गई है और मंदाकिनी नदी ने मंदिर के दोनों तरफ धारा बना ली है.

लेकिन आपदा के बाद बनी धारा को सरकार के प्रयासों से बंद करने की कोशिश हाल ही में शुरू की गई है. यह काम उत्तरकाशी की संस्था नीम (नेहरू इंस्ट्टीयूट ऑफ माउंटेनियरिंग) को दिया गया है.” प्रशासन ने इन दो धाराओं के बीच ही एक पुल बनाकर मंदिर तक पहुंचने का रास्ता बनाया है. हालांकि पुल पार करने के बाद मंदिर जाने के लिए अभी भी खंडहर बन चुके घरों की छोटी-छोटी गलियों से गुजरना पड़ता है.

मंदिर के सामने बड़ी-बड़ी चट्टानें जस-की-तस पड़ी हैं और खंडहर हुए घरों में मलबा और सामान बिखरा पड़ा है. आपदा से पहले का यात्रा मार्ग कुछेक मीटर की जगह में अवशेष के रूप में अब भी दिखता है. इसके दोनों किनारों पर घोड़े-खच्चर, डंडी-कंडी वाले मजदूरों का आशियाना होता था, जिसे 16 जून की रात आए पहले सैलाब ने अपने आगोश में ले लिया.

लेकिन उस आपदा का दंश अभी भी लोगों के दिलों में किस कदर समाया है, उसकी बानगी गुप्तकाशी के पास के गांवों—देवली-भनिग्राम-सिरवानी- में दिखती है जिन्हें  केदारनाथ की त्रासदी ने एक अभिशप्त पहचान दे दी है: 'विधवाओं के गांव’. आपदा ने इन गांवों के 54 परिवारों के वारिस लील लिए. इन्हीं गांवों के बाशिंदों से कभी आबाद रहने वाली केदार घाटी में अब अजीब वीरान-सी दिखती है.

ऐसी ही वीरानी लोगों के दिलों में भी है. ''मेरे पापा को लाओ, मेरे पापा को लाओ...” ऐसा कहते-कहते पांच वर्षीया रुचिता का दिमाग अकसर सुन्न हो जाता है. इधर-उधर ताकते हुए वह बेहोश हो जाती है. पिछले साल भर से रुचिता की यह दशा 23 वर्षीया मां धनिता आर्य के लिए पहेली बन गई है. उनके पति सुनील केदार घाटी में घोड़ा-खच्चर से तीर्थयात्री ढोने और माला बेचने का काम करते थे.
धनिता आर्य
(धनिता आर्य)
आपदा के दो महीने बाद जन्मी, दूसरी बेटी सुकन्या को गोद में लिए धनिता उस दिन की याद करते हुए रो पड़ती हैं: ''16 जून को उनका फोन आया था. बेटी रुचिता से बात करके रोने लगे. अपनी मां से भी बात की. मुझसे कहा कि डिलिवरी के टाइम पर आ जाऊंगा.” तब तक किसी आपदा की आहट से अनजान धनिता को क्या पता था कि अब पति से फिर कभी उसकी बात नहीं हो पाएगी.

केदार घाटी की खिसकी हुई पहाड़ी देखकर ऐसा मालूम पड़ता है मानो उस रात पर्वत ने मंदाकिनी नदी के साथ मिलकर घाटी पर धावा बोल दिया हो. हालांकि इतनी तबाही के बावजूद मंदिर को बड़ा नुकसान नहीं हुआ. मंदिर के ठीक पीछे चट्टानों का ढेर है. लेकिन सबके लिए कौतूहल है मंदिर के आकार से बड़ी चट्टान जो मंदिर के पीछे आकर रुक गई और मंदाकिनी के कहर से बचा लिया.

इस चमत्कार को अब 'दिव्य भीम शिला’ नाम दिया गया है, जिसकी पूजा भी शुरू हो चुकी है. 44 वर्षीय राम प्रसाद हेलिकॉप्टर से आने वाले यात्रियों का इंतजार कर रहे हैं. वे नेपाल के सीतापुर से आकर यहां डंडी-कंडी का काम करते हैं. पिछले 6-7 साल से वे इसी पेशे में हैं, लेकिन पिछले साल नहीं आ पाए, जिसके लिए खुद को भाग्यशाली मान रहे हैं. उन्हीं के शब्दों में, ''इस बार यहां आकर देखा तो मंदिर के ऊपर-नीचे पत्थरों के सिवा कुछ नजर ही नहीं आया.”

जिन परिवारों ने अपनों को खोया है, उनकी आस्था डोल चुकी है. देवली-भनिग्राम की 29 वर्षीया रजनी देवी ने आपदा में अपने पति, दो देवर और ससुर को खो दिया. घर में इकलौते बचे देवर मनोज ही खानदानी पुरोहिताई का पेशा करते हैं, जो एक बल्ली के सहारे हादसे में जिंदा बच निकले.
रजनी देवी
(रजनी देवी)
लेकिन मनोज कहते हैं, ''भले कुछ और काम कर लूंगा, लेकिन केदार नहीं जाऊंगा.” इन गांवों की विधवाओं को सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक डॉ. बिंदेश्वर पाठक की संस्था से सहारा मिला है. वे कहते हैं, ''सरकारी प्रक्रिया लंबी है. अगर एनजीओ के माध्यम से सीधे काम हो तो हालात को तेजी से बदल सकते  हैं.”

लेकिन लोगों को पूरी राहत देने की बजाए सरकार ने सब्जबाग दिखाए हैं. केंद्र सरकार ने रेल नेटवर्क के अलावा उत्तराखंड में राष्ट्रीय हिमालयी केंद्र स्थापित करने के लिए भी 100 करोड़ रु. का प्रावधान किया है. केदारनाथ समेत गंगा के घाटों पर सौंदर्यीकरण के लिए भी इतना ही बजट है. अब सवाल है कि क्या आपदा से मची तबाही का पुनरुद्धार किए बिना रेल नेटवर्क या अन्य आधारभूत संरचनाएं संभव हैं?

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