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कलाः वंचितों का रंगमंच

"आउटसाइडर'' में अपनी एक और कृति में कांबले ने एक पैर को सांचे में इस प्रकार ढाला है जिसमें दरारें दिखती हैं और उसमें एकरूपता नहीं है. कांबले कहते हैं, "विभाजन का विचार भी बिल्कुल वैसा ही है जैसा भ्रम; यह अस्तित्व में है लेकिन कोई भी इस सचाई पर बात नहीं करना चाहता.''

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aajtak.in
चिंकी सिन्हा नई दिल्ली, 19 September 2018
कलाः वंचितों का रंगमंच मंदार देवधर

फिल्म नगरी मुंबई के क्लार्क हाउस इनिशिएटिव के हालिया शो "आउटसाइडर'' में कलाकार अपने "राजनीतिक कार्यों'' के प्रदर्शन में जुटे थे. उन कलाकारों में से एक 31 वर्षीय प्रभाकर कांबले ने अपनी कला के जरिए सहजता से दलित समुदाय की समाज से अलगाव की परेशानी को रेखांकित किया.

कांबले ने अपने आर्ट "स्टिल प्रैक्टिसिंग'' में दलितों के प्रति भेदभाव के लिए एक रूपक का प्रयोग किया जिसमें मिट्टी के बर्तनों के ढेर के ऊपर एक श्वेत मस्तिष्क बैठा दिखता है. "स्वीट बॉक्स'' में मिठाई के डिब्बों के अंदर सिक्के रखे गए थे और ये सिक्के व्यवस्था में घुसकर बैठी रिश्वतखोरी पर कटाक्ष करते थे. "सप्रेशन'' में, एक कुर्सी पर विश्व का मानचित्र था, उस पर मुट्ठी भर कारतूस रखे गए थे जो सड़कों पर होने वाले विरोध प्रदर्शनों का प्रतीक हैं.

"आउटसाइडर'' में अपनी एक और कृति में कांबले ने एक पैर को सांचे में इस प्रकार ढाला है जिसमें दरारें दिखती हैं और उसमें एकरूपता नहीं है. कांबले कहते हैं, "विभाजन का विचार भी बिल्कुल वैसा ही है जैसा भ्रम; यह अस्तित्व में है लेकिन कोई भी इस सचाई पर बात नहीं करना चाहता.'' कांबले ने कलाकार बनने से पहले एक साइन पेंटर के रूप में प्रशिक्षण लिया था. वे कहते हैं, "यहां टूटा पांव, समाज में गहराई तक मौजूद जातीय भेदभाव की वास्तविकता का प्रतीक है.''

कांबले का परिवार महाराष्ट्र के शेंडूर से कोल्हापुर जिले के इचलकरंजी चला आया था, जहां उनके पिता कपड़े की मिलों में काम किया करते थे. अंबेडकर नगर का 10-10 का कमरा उनके कला सृजन की एक प्रयोगशाला बन गया, वे कहते हैं कि उनकी अपनी कहानी से उनके समुदाय के सामूहिक इतिहास की झलक ली जा सकती है.

उन्होंने मुंबई में एल.एस. रहेजा स्कूल ऑफ आर्ट्स में दाखिला लिया. वे छात्रावास के गलियारे में सोया करते थे क्योंकि वे कमरे का खर्च नहीं उठा सकते थे. 2013 में उन्होंने जे.जे. स्कूल ऑफ आर्ट के एक डिप्लोमा कोर्स में दाखिला लिया. उन्हें विदेशी विश्वविद्यालयों में पढऩे के लिए भी प्रस्ताव मिले पर नहीं जा सके क्योंकि छात्रवृत्ति के लिए जरूरी लालफीताशाही को वे साध नहीं सके.

वे प्रेम में भी दो बार बदकिस्मत रहे हैं. कांबले को दो बार प्रेम हुआ लेकिन दोनों ही बार लड़कियों के परिवारों ने उन्हें दुत्कार दिया. उन्होंने अपनी सारी निराशाओं को अपनी कला में पिरो दिया. कांबले कहते हैं, "जातीय भेदभाव समाज में खुले तौर पर तो नजर नहीं आएगा लेकिन जब बातचीत शुरू होती है, तो आपको एहसास होता है कि आप परित्यक्त हैं. मेरी कला इन्हीं बहिष्कारों से पनपती है.''

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